गुरु और शिष्य का मिलन: आंतरिक परिवर्तन की यात्रा || आचार्य प्रशांत (2019)

प्रश्नकर्ताः छोटा मुँह और बड़ी बात है। तकरीबन, मैं एक-दो, एक-डेढ़ साल की बात कर रहा हूँ। पहले जब गुरुजी मिले थे 1995 में, तो कुछ देर उनके साथ रहे फिर वो आस्ट्रेलिया चले गये। तो तब भटक गया था। कभी याद आती थी उनकी, लेकिन शायद बिलकुल ही मेरा भ्रम हो। मैं निर्णय करने के काबिल नहीं समझता अपनेआप को।
आपका शिविर सितम्बर में अटेंड किया था, मैं कह सकता हूँ कि कोई ऐसा क्षण नहीं है कि जब गुरुजी या गार्ड या आप किसी वक्त न साथ हों या न मन में हों। तो ये क्या भ्रम है या ये बात ठीक भी हो सकती है?
आचार्य प्रशांतः शिष्य का मन ऐसे होता है जैसे तपती हुई मिट्टी। जेठ माह की मिट्टी। कई बार फट भी जाती है, इतनी तपती है, जून की मिट्टी। शारीरिक गुरु का आगमन ऐसे होता है जैसे आषाढ़। जून का अन्त आया और पानी बरसा। ये जो पानी की बूँद पड़ रही है, ये देही गुरु है। जो ऐसे सामने बैठ जाता है, आपके हाथ-पाँव लेकर के, मुँह लेकर के और कुछ-कुछ बोलता है। ठीक है? तो इसका जब मिलन होता है शिष्य से तो बात पता चलती है कि मिलन हुआ है। मिट्टी का रंग बदलता है और मिट्टी से खुशबू उठती है।
पहली बारिश की खुशबू, याद है न? और मिट्टी है, मिट्टी माने गन्दगी और उससे क्या उठ रही है? खुशबू। कितनी अजीब बात है! ये शिष्य और शरीरी गुरु का मिलन है। बारिशें होती हैं और जितना मिलता है शिष्य शरीरी गुरु से, उतना गीला होता जाता है, मिट्टी की तरह। कैसा? गीला। आसू बहते हैं, दिल नम हो जाता है, गीलापन आ जाता है। जहाँ सख्ती होती है वहाँ चीज़ आद्र हो जाती है, मुलायम हो जाती है।
पर शरीरी गुरु हमेशा तो रह नहीं सकता। बादल आगे बढ़ जाते हैं, बारिशें बीत गयीं, सावन, आषाढ़ सब खत्म, बीत गया। अभी तक मिट्टी बिलकुल गीली दिखाई दे रही थी। सतह पर भी पानी दिखाई दे रहा था। अब मॉनसून बीत गया। पहले तो तपती हुई मिट्टी थी फिर मानसून पर मॉनसून भी बेचारा हमेशा तो रह नहीं सकता था। शरीरी गुरु हमेशा तो रह नहीं सकता। अब ये जो गीली मिट्टी थी, ये फिर उपर से सूखी दिखाई देने लगती है। ऊपर-ऊपर से ये फिर सूख जाती है, सख्त हो जाती है। ये ऊपर-ऊपर से सूख जाती है पर अब पानी इसने पी लिया है। अब पानी इसके भीतर इसकी गहराई में पहुँच गया है, अब ऊपर-ऊपर नहीं पता चलेगा।



