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गीता में कृष्ण के अनेकों नाम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: हम सबके भीतर, हम कितना भी छुपा लें, पर होता है कोई जो सत्य को छोड़ नहीं सकता। हम स्वयं को कितना भी भ्रम में रख लें, एक तल पर सच्चाई हम सबको पता होती है। वास्तव में अगर सच्चाई पता ना हो तो स्वयं को भ्रम में रखने का कोई औचित्य भी नहीं है।

तो शंखनाद होता है दोनों सेनाओं की ओर से और संजय बताते हैं कि शंखनाद में विशेषतया धृतराष्ट्र के पुत्रों के, कौरवों के हृदय में हलचल कर दी, मन उनके कंपित हो गए, हृदय विदीर्ण हो गया। ये सुनने के बाद अब आते हैं दूसरे पक्ष पर, अर्जुन की ओर क्या चल रहा है। संजय कह रहा है —

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वज:

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव: ।।20।।

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।

अर्जुन उवाच

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत । । 21 । ।

“राजन! उसके अनंतर, उसके बाद कपिध्वज; (अर्जुन के ध्वज पर कपि चिन्ह था; कपिध्वज), पांडव (अर्जुन) ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए अवस्थित देखकर और अस्त्र संचालन करने के लिए उद्यत होकर धनुष उठाकर ऋषिकेश ‘कृष्ण’ से कहा, ‘हे अच्युत! उभय (दोनों) सेनाओं के मध्य में मेरा रथ स्थापित करो’।“

~ श्रीमद्भगवद्गीता गीता, श्लोक २०–२१, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: हम जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, हमें श्रीकृष्ण के कई नाम सुनने को मिलेंगे। तो ‘केशव’, ‘ऋषिकेश’ और अभी यहाँ पर कहा ‘अच्युत’; अच्युत माने जो बटा हुआ नहीं है, खंडित नहीं है। नामों की बड़ी महत्ता है और नाम यूँ ही नहीं होते। नाम सिर्फ़ किसी व्यक्ति विशेष की ओर संकेत करने को नहीं होता, नाम उस व्यक्ति को और नाम लेने वाले को यह स्मरण कराने के लिए भी होता है कि जिस व्यक्ति का वो नाम है वो सिर्फ़ व्यक्ति नहीं है। आप बैठे हैं देहधारी हो करके, सिर्फ़ इंगित अगर करना है यदि तो यह भी कहा जा सकता है कि ‘क’; ‘क’ पर्याप्त है, या कोई अर्थहीन-सी ध्वनि ‘अह्र’, जिसका कदाचित कोई अर्थ ना हो पर एक निश्चित ध्वनि है तो उससे निश्चित हो जाएगा, पता चल जाएगा कि किसकी ओर इशारा है। लेकिन नहीं, नाम बड़ी समझ-बूझ से दिए जाते हैं। बाकी नामों की तो बात बाद में है जो सबसे प्रचलित नाम है ‘कृष्ण’— वह भी कितना सुंदर और सांकेतिक है।

‘कृष्ण’ माने वो जिसकी ओर आए बिना आप रह नहीं पाएँगे, चैन नहीं मिलेगा। ये कहना आवश्यक ही इसीलिए हो जाता है क्योंकि सदा से ज्ञात है कि वृत्तियाँ हमारी ऐसी ही हैं जो कृष्ण की ओर आने का करेंगी तो विरोध ही। हम ऐसे ही हैं। इसीलिए उनका नाम है कृष्ण, जिसमें कर्षण है, जिसमें एक ‘खींच’ है। फिर उसी से शब्द आता है आगे ‘आकर्षण’। वो खींचते हैं। खींचने की ज़रूरत क्या पड़े यदि कोई विरोधी बल ना हो। कुछ ना हो जो विरोध करता हो और आप खींचें तो खींचना अर्थहीन हो जाएगा, हास्यास्पद। कृष्ण नाम ही इसीलिए दिया गया है क्योंकि अहम् आत्मा की ओर बढ़ने का पुरज़ोर विरोध करता है, यद्यपि अहम् की गहरी, अंतिम किन्तु प्रच्छन्न इच्छा भी यही होती है कि वो आत्मस्थ हो जाए। यही जो दोहरी चाल है अहंकार की, इससे संसार में सारी गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं।

संसार एक शाश्वत गतिशीलता है और गति तभी हो सकती है जब एक बल को रोकने वाला दूसरा बल मौजूद हो। इन दो बलों के आपसी संयोग और संघर्ष से गति उत्पन्न होती है।

आप एक रॉकेट को आकाश की ओर भेजना चाहते हैं, जानते हैं उसके लिए क्या आवश्यक है? उसके लिए रॉकेट में वज़न होना आवश्यक है। आप कहेंगे, ‘ये कैसी बात है!’ जी हाँ, और वज़न का अर्थ ही होता है कि रॉकेट को ऊपर उठाने वाला बल जिस दिशा में काम करेगा, वज़न के कारण, गुरुत्वाकर्षण उसकी विरोधी दिशा में काम करेगा। यदि शून्य भार का हो रॉकेट तो आप कैसे उसे उठा लेंगे, बताइए मुझे? कोई वस्तु है जिसका कोई भार ही नहीं, उसके साथ कुछ भी किया जा सकता है क्या? और यदि भार होगा तो विरोध होगा।

सारा संसार इसी तरह दो परस्पर विरोधी ताक़तों के आपसी नृत्य से परिणीत होता है। इसको आप ‘डायलेक्टिक्स’ बोल सकते हैं। आप चल रहे हो ज़मीन पर, आप चल नहीं सकते यदि घर्षण ना हो। आप आगे बढ़ पाएँ इसके लिए आवश्यक है कि आपको पीछे धकेलने वाली एक ताक़त मौजूद हो। और यदि पीछे धकेलने वाली ताक़त शून्य हो जाए तो आप आगे नहीं बढ़ पाएँगे, आप वहीं पर गिर जाएँगे।

ये जो दो ताक़तें हैं ये मूलतः आत्मा और अहंकार के ही प्रतिनिधि हैं। क्योंकि मूल विरोध वहीं पर है और उसी मूल विरोध से संसार उत्पन्न हुआ है। अहंकार आत्मा का मूल रूप से विरोध ना करता हो तो संसार ही नहीं आएगा; और संसार का ही अर्थ होता है गति, तो फिर कोई गति भी नहीं आएगी अगर अहम् आत्मा का विरोध ना करता हो। और यदि अहम् आत्मा का ऐसा विरोध कर पाए कि जीत ही ले आत्मा को, आच्छन्न ही कर ले आत्मा को, निगल ही जाए आत्मा को तो भी फिर संसार अस्तित्व में नहीं बचेगा। इन दोनों का बने रहना ज़रूरी है संसार की हस्ती के लिए। इसी को कई बार आप अच्छाई और बुराई के परस्पर संघर्ष के रूप में भी देखते हो। सत्य यदि पूरी तरह जीत गया तो दुनिया मिट जाएगी। असत्य भी यदि पूरी तरह जीत गया तो भी दुनिया मिट जाएगी। ये संसार चल ही रहा है एक तरह की रस्साकशी में। समझ में आ रही है बात?

गीता कहाँ से आती यदि सामने दुर्योधन की सेना ना खड़ी होती? दुर्योधन सदा रहेंगे — दो पक्ष सदा रहेंगे जिसमें एक पक्ष सदा दुर्योधन का होगा; आत्मा होगी, अहंकार होगा; एक पक्ष सदा अहंकार का होगा। ऐसे ही संसार को चलना है। पर आप संसार की बात छोड़िए, आप अपनी बात करिए। आपको तो आपके संसार और आपके जीवन से प्रयोजन है न, तो इस द्वंद में आपको चुनना है कि आप इधर खड़े हैं कि उधर। कृष्ण माने आकर्षण, कृष्ण तो खींच रहे हैं, बुला रहे हैं, आपको खिंचना है या नहीं खिंचना है? कृष्ण खड़े हैं, अर्जुन खिंच आए। जिन्हें नहीं खिंचना था वो विरोध में ही रहे। जिन्हें नहीं खिंचना था उन्होंने तो कृष्ण को ही मारने का षड्यंत्र किया।

‘अच्युत’ — जो सब तरीके के विभाजनों के पार है, जिसके लिए अब ये द्वंद समाप्त हो चुका है, वो अच्युत है। जो द्वैत का झूला नहीं झूल रहा अब, कि कभी इस तरफ़ कभी उस तरफ़, जिसके प्रभाव में जब आ गया तब उसी का हो गया, जिसकी ऐसी अवस्था नहीं रही अब, वो अच्युत। जिसका निर्णय हो चुका है, वो अच्युत। जिसके लिए अब कोई संशय बाकी नहीं, वो अच्युत। जिसको अब और विचार नहीं करना है कि ‘मैं कौन हूँ और जीवन कैसे जीना है’, वो अच्युत। जो टिक गया, जो थम गया, जिसकी संशय की यात्रा पूर्ण हो गई, वो अच्युत। जिसको दूसरा पक्ष अब खींच सकता ही नहीं, वो अच्युत। जो अब स्वयं ऐसा हो गया है कि दूसरे पक्ष को खींच लाएगा या कम-से-कम उस पर अपने आकर्षण का प्रभाव डालेगा, वो अच्युत। जिसको अब आप डिगा नहीं सकते, वो अच्युत।

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