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घर-घर की वही कहानी! || पंचतंत्र पर (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, देखने पर पाता हूँ कि सुख से गहरा लगाव है और फिर शायद इसी वजह से किसी विशिष्ट स्थिति का इंतज़ार करता रहता हूँ।

आचार्य प्रशांत: विशिष्ट स्थिति क्या है? सुख का इंतज़ार कर रहे होगे।

प्र: इस लगाव से कैसे उबर सकता हूँ?

आचार्य: उबरने की ज़रूरत नहीं है। सुख क्या है? दुःख तुम्हें सताता है तो तुम सुख माँगते हो। ठीक बोल रहा हूँ? सुख कब माँगते हो? जब दुःख सताता है तो सुख माँगते हो। कुछ ग़लत थोड़े ही कर रहे हो, कोई पाप थोड़े ही कर रहे हो सुख माँग करके। दुःख कोई अच्छी बात है क्या कि दुःख में जियो? तो तुम सुख माँग लेते हो।

अब एक काम करो तुम। तुम अगर सुख के ही ग्राहक हो तो बढ़िया वाला सुख माँगो। भाई, मान लो, तुम गुड़ के ग्राहक हो; कौन-सा गुड़ दूँ तुम्हें? जल्दी बोलो। एकदम सोने की तरह चमकता हुआ गुड़ आता है एक, ताज़ा, मुलायम, और एक गुड़ आता है काला, पुराना, और गन्ने की भी जो ज़रा अविकसित क़िस्में होती हैं उनका, और सस्ता भी होता है। बोलो, कौन-सा गुड़ चाहिए? सस्ता या महँगा, सोने जैसा गुड़? तुम भी सोने जैसा सुख माँगो।

सुख की माँग बुरी नहीं है, क्योंकि सुख अगर बुरा है तो क्या मैं ये कहूँ कि दुःख अच्छा है? नहीं, बाबा! वो सुख माँगो जो दुःख को पूरे तरीक़े से मिटा ही दे, जो दुःख की संभावना ख़त्म कर दे।

अब यहाँ पर हमें पता चला कि शायद दो तरह के सुख होते हैं, एक सुख वो जो दुःख को आमूल हटा देता है, जड़ से और दूसरा सुख वो जो दुःख की छाया मात्र है, जो दुःख पर ही पलता है, जिसके पहले भी दुःख है और जिसके बाद भी दुःख है। बोलो, कौन-सा सुख चाहिए? वो वाला सुख चाहिए जो दुःख को मिटा ही दे या वो सुख चाहिए जो दुःख से ही आया और दुःख को ही जन्म देगा? सोने जैसा गुड़, है न? कल्पना ही सुंदर है, खाने में कैसा होगा! ऐसा सुख कल्पना के ही बाहर चला जाता है कि सुख-ही-सुख है, दुःख फिर रहेगा ही नहीं। हाँ, उस सुख की बात करता है अध्यात्म।

अध्यात्म परमसुख का अनुसंधान है—हीन सुख का नहीं, झूठे सुख का नहीं, असत सुख का नहीं, असार सुख का नहीं—सत सुख का, सार सुख का। उसी परम सुख, सत सुख, सार सुख को आनंद कहा गया है। तुम चाहो आनंद कह लो और तुम चाहो तो परम सुख कह लो, एक ही बात है। आनंद परम सुख है और जो हमारा साधारण सुख है, वो घिनौना सुख है, वो दुःख का उत्पाद है और वो दुःख को आमंत्रण है।

तो अब तुम अपने सुख को ज़रा आँको, ज़रा उसका मूल्यांकन करो, देखो कि तुम्हारा सुख कहाँ से आता है और देखो कि तुम्हारा सुख तुम्हें क्या दे जाएगा। सुख बुरा नहीं है, घटिया होना बुरा है; घटिया सुख बुरा है। हमारे अधिकांश सुख घटिया सुख हैं। तुम ऊँचे सुख की तरफ़ जाओ न। तुम उस सुख की ओर जाओ जो तुम्हें कभी नहीं छोड़ेगा।

कबीरा सो धन संचिये, जो आगे को होय। सीस चढ़ाये गाठरी, जात ना देखा कोय॥

—कबीर साहब

उस सुख का संचय करो जो तुम्हें कभी छोड़ नहीं जाएगा—वो सुख नहीं जो तुम्हें किन्हीं ख़ास हालातों में ही मिलता है, वो सुख नहीं जिसके लिए तुम्हें ग़ुलाम बनना पड़ता है, वो सुख नहीं जिसमें उतार-चढ़ाव होते हैं—उस सुख की ओर बढ़ो। जिस सुख में उतार-चढ़ाव हो, जो सुख सावधिक हो, जिसमें दिन-रात हो, धूप-छाँव हो, उससे बचना।

आम आदमी में और बुद्धों में यही तो अंतर है – आम आदमी स्वार्थी होता है और बुद्ध परम स्वार्थी। आम आदमी छोटे ही सुख से संतुष्ट हो जाता है और बुद्ध परम सुख से पहले तृप्ति नहीं मानते। उन्होंने ऐसा कहा नहीं, ये मैं कह रहा हूँ, पर उनके दिल की बात जानता हूँ। तुम भले ही ये न कहो कि बुद्ध सुख के खोजी हैं, पर तुम्हें इतना तो दिखता है न कि बुद्ध दुःख से मुक्त हो गए? वो बात एक ही है।

दुःख से मुक्ति होगी ही तभी जब तुम्हें परम सुख मिल गया। और बुद्ध में भले ही तुम्हें परम सुख न दिखता हो, बुद्ध में बस इतना ही दिखता हो कि बुद्ध दुःख से मुक्त हो गए; कृष्ण को देखोगे, वहाँ तुम्हें परम सुख का नाच भी दिखेगा। और वो बात एक ही है; दुःख से परम मुक्ति और परम सुख में प्रवेश दो बातें नहीं होतीं।

प्र२: आम जीवन में परम सुख कैसे सम्भव है?

आचार्य: आम जीवन में आम सुख, आम दुःख। ये आम जीवन इतनी बड़ी बात है कि उसको तो बचाना ही है? ये ऐसी-सी बात है कि तुम पूछो कि “ट्रेन के जनरल (सामान्य) डिब्बे में एयर कंडीशंड सीट (वातानुकूलित कुर्सी) कौन-सी है?” रहना तो मुझे जनरल डिब्बे में ही है और सीट मैं खोज रहा हूँ एयर कंडीशंड , वैसे ही कि “आम जीवन में परमसुख कैसे मिले?” जनरल डिब्बे में एयर कंडीशंड सीट कैसे मिले?

अब तुम्हें जनरल डिब्बे से इतनी आसक्ति है, तो एसी सीट क्यों माँग रही हो? आम जीवन में ऐसा क्या है कि पकड़कर बैठे हो? ख़ास जीवन क्यों नहीं हो सकता? उसके लिए तो थोड़ा बदलना पड़ेगा, थोड़ा साहस, थोड़ी भक्ति चाहिए, मोह के कुछ तार काटने पड़ेंगे।

चाय मेरी ख़त्म हो गई, (तो यदि मुझे चाय से आसक्ति है तो मैं चाहूँगा कि) अब रसोई वैसी ही चलती रहे जैसी चल रही है। ताजमहल, ताज़ा!

बुद्ध कह रहे हैं, “बाहर आजा।” तुम कह रहे हो, “नहीं, आम जीवन में ही बुद्धत्व चाहिए।” वो तो होगा नहीं। और दिक़्क़त तुम्हारी ये है कि दो-चार तुम्हें उदाहरण मिल गए हैं, कुछ गुरुजन तुम्हें समझा गए हैं कि ज़िंदगी जैसी चल रही है, चलने दो, तुम्हें दुकान पर बैठे-बैठे ही मोक्ष मिल जाएगा। इससे ज़्यादा ख़तरनाक बात आध्यात्मिक इतिहास में कही नहीं गई है कि "जैसी ज़िंदगी चल रही है, उसी में तुम्हें मोक्ष मिल जाएगा।” झूठ, परमझूठ। कैसे भाई?

तुम्हारी ये ज़िंदगी ही तो तुम्हारा दु:ख है, इस ज़िंदगी को बचाए-बचाए तुम कैसे पार हो जाओगे? पर ये आस सबको रहती है कि बाक़ी सब कुछ वैसा ही चलता रहे और अंदर-ही-अंदर हम परमसत्य को प्राप्त हो जाएँ। कैसे?

“किसी को पता न चले, क्योंकि किसी को पता चल गया तो हमें सताएगा। तो बाहर-बाहर हम वैसे ही रहें—एक सच्ची, सुशील, पवित्र गृहिणी—और भीतर-ही-भीतर मीरा हो जाएँ।” मीरा ने ऐसा करा था कि बाहर-बाहर तो वो वैसी ही रही थीं—राणा की राणी—और भीतर-ही-भीतर कन्हाई की थीं? मीरा ने ऐसा करा था क्या?

प्र२: आचार्य जी, राजा जनक तो गृहस्थ जीवन में थे।

आचार्य: तुम्हें क्या पता राजा जनक का? और मन जाकर राजा जनक पर ही काहे अटकता है? उनके पास तो कम-से-कम सल्तनत थी, तुम्हारे पास तो बस ‘ताज महल ताज़ा’ (चाय) है। जनक से नहीं छोड़ा गया तो उनके पास फिर भी एक बड़ा कारण था, तुम्हारे पास कौन-सा कारण है कि नहीं छोड़ा जा रहा? और तुम्हें कैसे पता कि जनक ने नहीं छोड़ा था? जनक याद हैं, अष्टावक्र नहीं याद हैं; चेला याद है, गुरु नहीं याद हैं। जनक का तत्काल उदाहरण बता दिया, जनक के गुरु का नहीं बताया।

बड़ी तृप्ति मिलती है सुबह-सुबह उठ करके, पानी उबाल करके—ताज महल ताज़ा! इतनी तृप्ति कौन-से निर्वाण में है? वो वॉशिंग मशीन का अनहद नाद, आहाहा! वो जो ‘घर्र-घर्र’, ‘घर्र-घर्र’ घूमती है, तो ऐसा लगता है कि बस अब तर गए। कैसे छोड़ दें उस वॉशिंग मशीन को? और जब परवल कटती है, लगता है कि पाप ही कट गए। कैसे?

तुम्हें न संस्कारित किया गया होता, तुम्हारे दिमाग़ में ये सब बातें न डाली गई होतीं, तुम एक भोली-भाली छोटी-सी बच्ची होती, तो भी क्या तुम्हें यही लगता कि ज़िंदगी इसीलिए है? नहीं लगता न? तो फिर इन बातों को क्यों पकड़े बैठी हो? यही इरादा है न कि परसों ये सब ख़त्म हो जाएगा, फिर परवल कटेगी और मटर छिलेगी? ढाक के तीन पात।

मैंने अक्सर देखा है, शिविर के आख़िरी दिन लोग हड़बड़ी में रहते हैं, देर रात तक तो बैठते भी नहीं। “अगले दिन वापस जाना है।” सुन रहे हो न कितने ख़तरनाक शब्द हैं ये, "वापस जाना है।" तुम आए ही क्यों थे? आज तुम बैठ लोगे, मैं तुम्हें आधी रात तक बैठाऊँगा, कल भी बैठ लिये थे, चौथे दिन नहीं बैठने वाले।

ये कुकर की सीटी में कशिश है। अल्लाह क़सम, दिल चीर देती है, जीत लिया है! कभी कोई पूछेगा कि "परमात्मा कैसा होगा?" तो हम कहेंगे, "माँ क़सम, कुकर जैसा होगा।" भाई, परमात्मा कौन? जिससे गाँठ पक्की बँधती है, जिसको तुम छोड़ ही न सको, वो परमात्मा। और कुकर तुम छोड़ नहीं सकते; परमात्मा कुकर ही हुआ। जो तुम छोड़ ही न सको, उसी का नाम तो परमात्मा है।

तुम किन चीज़ों को नहीं छोड़ सकते, मैं पूछ रहा हूँ। ये घर हैं तुम्हारे! ये क्या है? ये टीवी सीरियल (धारावाहिक) का शोर हैं, ये विज्ञापनों का कोलाहल हैं, ये ड्रॉइंग रूम के दो सोफ़े हैं, ये एक डाइनिंग टेबल हैं, ये दो कमरों के दो बिस्तर हैं; इनमें ऐसा क्या है कि तुम कहते हो कि आम जीवन तो चलता ही रहना चाहिए? बोलो, इनमें ऐसा क्या है?

ये गुसलख़ाने में रखा हुआ दंतमंजन है और साबुन है। लोगों के घरों के गुसलख़ानों में घुस जाओ, सब एक से होते हैं। तुम गुसलख़ाने में जाकर भूल सकते हो कि किसके गुसलख़ाने में हो। वहाँ ऐसा क्या है कि तुम चाहती हो कि आम जीवन चलता ही रहे?

भीतर से भरोसा ही नहीं है न कि कुछ ऊँचा भी सम्भव है? एकदम कलेजा टूट गया है न? अब ये कल्पना भी नहीं आती न कि तुम अधिकारी हो किसी ऊँचे जीवन के? ये बात ही अविश्वसनीय लगती है। हाँ, मैं तुमसे कहूँ कि एक बेहतर डिटर्जेंट आया है बाज़ार में, तो ये तुमको विश्वसनीय लगेगा, “ठीक, वॉशिंग मशीन बेहतर चलेगी।”

सब कुछ बेहतर हो सकता है, तुम ही बेहतर नहीं हो सकती? नया सैंडविच मेकर आ सकता है, नए कपड़े आ सकते हैं, नया टीवी आ सकता है, गाड़ी नई आ सकती है, पर ये तुम्हें भरोसा ही नहीं है कि तुम भी नए हो सकते हो। बिलकुल तुम्हारा हार खा-खाकर, मार खा-खाकर भरोसा ही टूट गया है। सब कुछ बेहतर हो सकता है, तुम बेहतर नहीं हो सकते, ये तुम्हारी मान्यता है।

देखो न, मैं बोल रहा हूँ, तुम बेहतर हो सकते हो, तुम्हारे चेहरे पर आनंद नहीं आ रहा, तुम्हारी आँखों में आशा नहीं जग रही, तुम्हारे चेहरे पर अविश्वसनीयता है, हैरानगी है, बल्कि डर है कि ये कितनी घातक बात बताई जा रही है हमें। तुम्हें अच्छा ही नहीं लग रहा कि मैं क्यों बोल रहा हूँ कि आम जीवन से आगे भी ज़िंदगी है, कि तुम्हारे लिए नहीं ज़रूरी है कि तुम वही पुरानी घिसी-पिटी कहानी दोहराओ। पर पिक्चरों ने दिमाग़ ख़राब कर दिया है बिलकुल, है न? कोई मुझसे पूछे, "माया क्या है?" तो मैं कहूँगा— वो एक पिक्चर है, एक फ़िल्मी कहानी है जो घुस गई है तुम्हारे दिमाग़ में।

कोई नहीं है यहाँ इस वक़्त जो अचानक से जग पड़ा हो और कहे, "अरे! ये किस नई संभावना की बात हो रही है? बताओ, बताओ, बताओ। सुनने में ही बड़ा आकर्षक लग रहा है!" कोई नहीं है। सब बुझ गए अचानक से, सब कह रहे हैं कि “आप जो बात कह रहे हो, वो या तो झूठी है और अगर सच्ची भी है तो हमारे बूते की नहीं है।” यही कह रहे हो न? ये देखो, ये मुँह पर हाथ रखकर बैठा है। जानते हो, मुँह पर हाथ रखने का क्या मतलब होता है? “हमें यक़ीन नहीं आ रहा।” (श्रोता मुँह से हाथ हटा देता है) अब हाथ हटाने से क्या होगा?

(श्रोतागण हँसते हैं)

तुम जाल में फँसे हुए हो, तुम्हें ये बात स्वीकार है। कोई जाल से तुम्हें बाहर लाने की बात करे, तुम्हें लगता है कि तुम्हें जाल में फँसा रहा है। और कोई बड़ी बात नहीं, तुममें से कुछ लोगों को ये ख़्याल भी कौंध गया हो कि “कहीं फँसा तो नहीं रहे? मामला क्या है? कुकर हमने छोड़ दिया तो कहीं ऐसा तो नहीं कि ये ही ले भागेंगे कुकर ? ज़रूर इन्हीं की नज़र हमारे कुकर पर है। हमें तो बहकाकर बता देंगे कि हटाओ कुकर और वॉशिंग मशीन , और पीछे से कुकर और वॉशिंग मशीन लेकर ये ही निकलने वाले हैं।”

"जो बीवी से करते हो प्यार, वो प्रेस्टीज से कैसे करें इनकार?" विज्ञापन आता था प्रेशर कुकर का। ये मिला? “हाँ, भैया, मिला तो है ही, कैसे इंकार करूँ?” ठीक है, तुम्हें इतने में ही संतुष्टि है तो। (सब हँसते हैं)

देखो, अब हँसी देखो। इसमें ख़ुशी छाती है। बुद्धत्व की बात करो तो मुँह ही लटक जाता है बिलकुल कि जाने कौन-सी, कहाँ की बात कर रहे हैं! फँसा ही देंगे ये।

तुम्हें अपनी क़द्र नहीं है, और कोई बात नहीं है। अपनी आँखों में अपनी इज़्ज़त बहुत करते नहीं हो। तुम्हें ये यक़ीन ही नहीं होता कि तुम एक मुक्त जीवन के अधिकारी हो, मानते ही नहीं। बुद्ध को क्या मिला, जानना है तो बुद्ध की कम-से-कम बातें ही पढ़ लो, थोड़ी ख़ुशबू तो आएगी। कबीर साहब के भजन गाओगी तो ऐसा नहीं हो सकता कि तुम्हें बिलकुल ही नहीं समझ में आएगा कि उन्हें मिला क्या था। कुछ न मिला होता तो वो बात वो कह नहीं सकते थे जो उन्होंने कही है।

आज सत्र के बाद गाना, और फिर बताना कि क्या बिलकुल नहीं पता चल रहा कि उन्हें क्या मिला था। लेकिन अगर तुम्हारा इरादा ही यही हो कि मैं जानना ही नहीं चाहती कि कबीर साहब को क्या मिला, तो तुम पहला काम ये करोगी कि कबीर साहब को गाना बंद करोगी। जिसने पाताल के गड्ढे में घुसने का इरादा कर लिया हो, उसके लिए बहुत ज़रूरी हो जाता है कि वो आसमान की ओर देखना ही बंद कर दे। वो फिर क़दम ये उठाता है कि सबसे पहले तो अब आसमान की ओर हम देखेंगे ही नहीं, कभी नहीं देखेंगे। नीचे ही देखो, पाताल में घुसना है; गड्ढा खोदो।

इसीलिए तो हमारे घरों में प्रेशर कुकर की सीटी बजेगी, विज्ञापनों का शोर रहेगा, कबीर साहब की आवाज़ ही नहीं रहेगी। ये संयोग नहीं है, ये साज़िश है। ऐसा नहीं है कि तुम भूल गए, अज्ञानवश हो गया, संयोगवश हो गया कि “अरे! हम कबीर साहब को भूल गए।” तुम भूल नहीं गए, तुमने जानबूझ करके उन्हें अपने घर से निकाला है, अपने जीवन से निकाला है। तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी है कि उन्हें निकालो। क्यों ज़रूरी है कि निकालो? क्योंकि कोई और है जो तुम्हारी ज़िंदगी में अब आ रहा है। और जिसको तुम अपनी ज़िंदगी में अब ला रहे हो, उसका और कबीर साहब का कोई साथ हो नहीं सकता।

जो अपनी ज़िंदगी में छल को, ईविल (शैतान) को अब ला रहा हो, उसके लिए बहुत ज़रूरी हो जाएगा कि वो कबीर साहब को विदा कर दे। फिर तुम ऐसे ही मासूमियत से भरे सवाल करते हो, "हमें क्या पता कि उन्हें क्या मिला था?" जब तुम उनके पास जाओगे नहीं, उनकी वाणी पढोगे नहीं, तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि उन्हें क्या मिला था?

तुम मुझे सुनने न आओ और दूर बैठकर कहो, "हमें क्या पता कि आचार्य जी को क्या मिला है?" तुम्हें पता नहीं है, या तुम पता देने दोगे नहीं? जवाब दो। पता तो चल सकता है। क्यों हैं इतने धर्मग्रन्थ? क्यों है धम्मपद? रमैनी क्यों है? साखी क्यों है? कुछ नहीं पता लगेगा तुम्हें? तुम इतने मूढ़ हो! तुम आदिग्रन्थ पूरा पढ़ जाओगे और तुम्हें गुरुओं की ख़ुशबू नहीं आएगी, ये तो नहीं होगा। तो बेकार की बात है ये कि “हमें क्या पता कि उन्हें क्या मिला था?”

पहले तो संतों को अपने घर से बहिष्कृत कर दो, फिर कह दो कि हमें संतों का चूँकि कुछ पता नहीं है, इसीलिए हम अपने घर में ही क़ैद रहेंगे। तुम्हें क्यों नहीं पता है? बताओ न मुझे। तुम्हें इसलिए नहीं पता है क्योंकि तुम्हारा सारा समय जाता है 'ताजमहल ताज़ा' में। तुम्हारा समय कृष्ण के साथ बीत रहा है? तुम्हारा समय बीत रहा है ये कॉमेडी शो के नमूनों के साथ। उनके नाम जानती हो कि नहीं जानती हो? ईमानदारी से बताना।

और ये जो बिगबॉस के नमूने हैं, इनके सबके नाम जानते ही होगे। देखते नहीं होगे तो नाम तो पता ही है, पता है? और ये जो तमाम नेटफ़्लिक्स पर सीरीज़ चलती हैं और ये जो बेहूदा सीज़न्स चलते हैं, इन सबके बारे में जानकारी तो रखते हो न? इनकी जानकारी तो है। अभी पूछ दूँ, “नागार्जुन कौन? लाओ त्ज़ू कौन?” तो लगोगे सिर खुजाने।

आध्यात्मिक गोष्ठियों में लोग बैठे होते हैं, उनसे इतना पूछ दो, “प्रमुख उपनिषद् कितने हैं?” न पता होगा। एक बार तो इंतिहा हो गई जब ये भी न पता था कि चार वेदों के नाम क्या हैं। हाईक एफ़एम पर आता है 'रास्कल लुल्ला', क्या नाम है उसका? रास्कल लुल्ला। उसका पूरा चरित्र और वृतांत पूछ लो, सबको पता है। जब तुम्हारी ज़िंदगी में रास्कल लुल्ला मौजूद है, तो तुम्हें बुद्धों से तो डर लगेगा न।

"नमस्कार, शाम के सात बज रहे हैं। दिल्ली की सड़कों पर ट्रैफ़िक (यातायात) बहुत ज़्यादा है, और आपके सामने आ रहे हैं दिल्ली के दो कड़क लौंडे," ये पता है न? सुना है न? हाँ। अभी पूछ दूँ, “दरियादास कौन हैं?” तो फिर तुम्हें काहे को पता होगा। तुम्हें 'दो कड़क लौंडे' तो पता हैं न! और पता ही नहीं है, उन्होंने तुम्हारा मन घेर रखा है, वो तुम्हारी चेतना पर चढ़े बैठे हैं। तुम आतुर रहते हो उन्हें सुनने के लिए। ये ऐसी-सी बात है कि कोई रोज़ सुबह अपने चेहरे पर टट्टी मले और बताए कि हल्दी का लेप लगाने से सुंदरता बढ़ती है।

कोई एक बड़े-से-बड़ा गुनाह तुमने किया है अपने साथ तो वो ये है— अपने घर से कबीरों को विदा कर दिया और कुकर को स्थापित कर दिया। कबीर जैसे-जैसे विदा होता जा रहा है, कुकर वैसे-वैसे जड़ जमाता जा रहा है।

मन, समझो न, पूरा ही बदल जाता है, जब मन इस माहौल में बात करना शुरू कर दे, इस तरीक़े की बात करना शुरू कर दे कि “और भैया, आज तो बड़े हॉट लग रहे हो।” और तुमको लगे कि ये बात सामान्य है, तो समझ लो कि तुम बहुत गिर चुके हो, तुम्हारी पूरी चेतना बर्बाद हो चुकी है, मिट्टी हो चुकी है। और तुमको ये बात बहुत अब सामान्य लगती है।

तुम देखो न बातचीत कैसी करते हो, तुम देखो कि तुम्हारे दोस्तों के साथ, तुम्हारे शुभेच्छुओं के साथ या परिवार के लोगों के साथ तुम्हारे मुद्दे ही क्या हैं। मोक्ष मुद्दा है? सत्य मुद्दा है? तथ्य भी मुद्दे हैं क्या? ज्ञान मुद्दा है? बोलो। पतिदेव के साथ ये चर्चा होती है कि खाशोगी काण्ड के कारण सीरिया, तुर्की, अमेरिका और अरब के रिश्तों पर क्या अंतर पड़ेगा? होती है ये चर्चा पतिदेव के साथ? क्या चर्चा होती है? बोलो, क्या चर्चा होती है? "जो बीवी से करते प्यार, वो प्रेस्टीज से कैसे करें इंकार?" ये तुम्हारे घर हैं! मैं इन्हें नर्क बोलता हूँ।

और कबीर साहब ने सौ बार यही बात बोली है कि तमाम तरीक़े की चीज़ें और रिश्ते-नाते तो हर घर में होते हैं, लेकिन जिस घर में राम नहीं हैं, वो घर मसान है, श्मशान है। और फिर तुम इन्हीं घरों की सुरक्षा के लिए ऐसे नादान सवाल पूछते हो कि "कुछ ऐसा हो सकता है कि सब कुछ हमारा पूर्ववर्ती ही रहे, पहले जैसा ही रहे—न घर बदले, न दुकान बदले—और मुक्ति भी मिल जाए?"

जानते हो, ये अभी यहाँ बैठे हो न, तुम देख रहे हो कि यहाँ चुनिंदा लोग हैं बस। यहाँ चुनिंदा लोग इसीलिए हैं क्योंकि मैं तुम्हारे घरों को समर्थन और संरक्षण नहीं देता, मैं तुम्हारी इस कुत्सित माँग को पूरा करने का कोई झूठा वादा नहीं करता कि तुम्हें मुक्ति भी मिल जाएगी और तुम्हारा कुकर भी सलामत रहेगा, इसीलिए यहाँ लोग कम हैं। चाहूँ तो भीड़ इकट्ठी कर लूँ, बस जो बोलता हूँ, उसमें थोड़ा परिवर्तन करना है। पर भाड़ में जाए ऐसी भीड़, किसको चाहिए? मेरी बला से! किसी दिन कोई न आए तो और अच्छा है। हम आज़ाद हुए।

फिर तुम पूछती हो कि "बताइए, बुद्ध को क्या मिला?" मैं बता भी दूँ कि बुद्ध को क्या मिला, तो तुम उसका मूल्यांकन तो अपनी फ़िल्मी कसौटी पर ही करोगी न? तुम्हारी कसौटियाँ ही सारी फ़िल्मी हैं। भाई, पिक्चरों ने तुम्हें बता दिया है कि कौन-सी चीज़ क़ीमती है, कौनसी चीज़ नहीं है, ठीक? अब तुम्हें भलीभाँति पिक्चर प्रदत्त ज्ञान है कि किस चीज़ को क़ीमत देनी है और किस चीज़ को नहीं। बुध्द के पास जो है, उसको तुम क़ीमत दे ही नहीं पाओगे क्योंकि कसौटी ही फ़िल्मी है। तुम्हारी कसौटी करण जौहर और शाहरुख़ ख़ान से आ रही है।

और ये आज नहीं हुआ है, सदा से हो रहा था। तुम्हें क्या लगता है, जीज़स और बुद्ध वैसे ही दिखते थे जैसी तुम उनकी छवियाँ और मूर्तियाँ पाते हो? बिलकुल नहीं। तुमने कभी ग़ौर नहीं किया कि तुम अपने अवतारों को, गुरुओं को कभी शरीर से बेडौल दिखाते ही नहीं। तुम्हारे मन में फ़िल्मी छवि है कि बंदा गठे हुए शरीर का होना चाहिए, लम्बा होना चाहिए, ज़रा ख़ूबसूरत होना चाहिए, तो तुम जीज़स को भी वैसा ही दिखा देते हो, बुद्ध को भी वैसा ही दिखा देते हो।

वास्तव में को कोई बुद्ध तुम्हारे सामने आए, तो वो तुम्हारी कसौटी पर खरा ही नहीं उतरेगा। तुम तुरंत उसको अस्वीकार कर दोगे, तुरंत। तुम्हें तो बुद्ध भी चाहिए छरहरा, छैला, आकर्षक, लम्बा। अब सोचो, बुद्ध आ जाएँ तुम्हारे सामने, वो नाटे से, वो लुढ़कते-पुढ़कते चले आ रहे हैं; तुम कहोगे, "भग, ऐसा कोई बुद्ध होता है? बुद्ध तो वैसा होना चाहिए, वो देखो, गोरे-गोरे, ओ बाँके छोरे।"

इसीलिए तुम देखते नहीं हो, तुम्हें जब राक्षस या दानव दर्शाने होते हैं तो तुम उनको कैसा बना देते हो? बेडौल। तुम्हारे मन में काले रंग के लिए अपमान है तो तुम सब राक्षसों को दिखा दोगे कि वो काले हैं। अब राक्षस होने का रंग से क्या लेना-देना? और किसने कह दिया कि काला रंग गोरे से बुरा होता है? पर तुम्हें तुम्हारी फ़िल्मी कहानी ने यही बताया है कि "गोरे-गोरे, ओ बाँके छोरे," तो सब राक्षस काले हो गए।

तो बुद्ध को जो मिला, मुझे बताओ, वो तुम्हें पसंद कैसे आएगा? तुम्हारी पसंद-नापसंद का निर्धारण तो करण जौहर ने कर दिया है।

और तुम्हें नहीं पता कि तुम कितना फँस चुके हो, तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारी आँखें अब तुम्हारी नहीं हैं; तुम किसी भी चीज़ की ओर अब एक फ़िल्मी नज़र से देखते हो। आदमी के चित्त को कलुषित और संस्कारित करने वाले बहुत से उपकरण रहे हैं। धर्मग्रंथों ने भी आदमी का मन ख़राब करा है। प्रकृति, माया, अविद्या, ये सब तो हैं ही, शिक्षा ने भी ख़राब करा है, तमाम तरह की और चीज़ें ख़राब करती हैं, लेकिन आज के समय में सबसे ज़्यादा ख़राब करा है पिक्चरों ने, पिक्चरों ने और प्रचलित संगीत ने।

जिसको तुम पाओ कि प्रचलित गाने पसंद आ रहे हैं, और ख़ासतौर पर कान में लगाकर वो जो इअरफ़ोन से सुना जाता है, वो काम चल रहा है गानों का, जान लेना कि अब इसकी संभावना बड़ी क्षीण है। वो गाने नहीं हैं, वो यूनिवर्सिटीज़ (विश्वविद्यालय) हैं, वो तुम्हें शिक्षा दे रहे हैं पूरी, तुम समझते क्यों नहीं? वो एक गाना पूरा पाठ्यक्रम है। उसने तुम्हें न जाने क्या-क्या लिखा-पढ़ा दिया, और ये तुम्हें पता भी नहीं चला कि तुमने क्या-क्या सीख लिया उस एक गीत से। वो अपने-आपमें एक पूरी विचारधारा है। उस गाने के पीछे एक पूरा दर्शनशास्त्र है। तुम भोले हो, तुम्हें पता भी नहीं चलता कि तुम इनडॉक्ट्रिनेट (शिक्षित) हो रहे हो।

तुम सोचते हो, “मैं तो अपने मनोरंजन के लिए गाना भर सुन रहा हूँ।” ये गाना नहीं है, ये तुम्हारा मन बदला जा रहा है, ये तुम्हें पलटा जा रहा है, ये तुम्हें कुछ और ही कर दिया जा रहा है; ये तुम्हारी आत्मा पर हमला हो रहा है। पर तुम्हें लगता है कि हम तो मनोरंजन कर रहे हैं अपना। इन बातों को तो तुम ख़तरनाक मानते ही नहीं न?

किचन (रसोई घर) में तुम छौंक लगा रही हो, टीवी पर गाने चल रहे हैं और तुम्हें लग रहा है, “ठीक है, मनोरंजन ही तो हो रहा है। हम यहाँ छौंक लगा रहे हैं, वहाँ गाने बज रहे हैं।” तुम्हें नहीं पता कि उन गानों ने सब्ज़ी में ज़हर घोल दिया। ये बात तुम्हें समझ में नहीं आएगी, तुम कहोगे, “गाने का सब्ज़ी से क्या ताल्लुक़ है?” ये जो तुम छौंक लगाते वक़्त टीवी पर गाने लगा देती हो, एफ़एम पर गाने लगा देती हो, इन गानों ने सब्ज़ी में ज़हर घोल दिया।

पक्का समझ लो, उन गानों की जगह कबीर साहब होते और उनके भजन बज रहे होते, तुम खाना दूसरा बनाती, तुम खाती दूसरे मन से, तुम्हारा मन बदल जाता, तुम्हारी पसंद बदल जाती, तुम्हारे निर्णय बदल जाते।

तुमने कभी देखा नहीं है, शादियों का खाना और शादियों का गाना एक जैसा होता है— मसालेदार। खाने और गाने में बड़ा गहरा संबंध है। किसी भी फूहड़ जगह पर ये दोनों चीज़ें तुम एक साथ पाओगे, मसालेदार खाना और मसालेदार गाना। और वो गाना ज़रूरी है, उससे भोजन में ज़ायक़ा बढ़ता है, मसाला बढ़ता है। तुम्हें क्या लगता है, तुम सिर्फ़ ज़बान से मसाला ग्रहण करते हो? न, कानों को भी मसाले की बहुत लत होती है।

मसालेदार खाना, मसालेदार गाना, और वहाँ देखो, (शादी के) मंच पर क्या चल रहा है, मसालेदार कुर्ता-पजामा, ये तीनों चीज़ें एक साथ हो रही हैं। मंच पर भी मसाले की ही छौंक पड़ रही है। वो जो दो देवी-देवता बैठे हैं मंच पर, तुम्हें क्या लग रहा है, वो एक-दूसरे को बड़ी सात्विक दृष्टि से देख रहे हैं? “देवी, मैं आपके आध्यात्मिक उत्थान के लिए कैसे सहयोगी हो सकता हूँ? कृपया कहें।”

जिसको तुम अपने बगल में बैठा लेते हो, अपना पति या भावी पति बना करके, तुम्हें क्या लग रहा है, वो तुम्हारे उत्थान के लिए तुम्हारे बगल में बैठा है? वो तीर-कमान लेकर बगल में बैठा है, उत्थान का कोई इरादा नहीं है उसका। अभी ये सब ज़रा भीड़ छटे, फिर शिकार का मौसम आए। और तुम उसे बता दो ज़रा कि "शिकार न हो पाएगा जी!" तो देखो उसका मन कैसे उचटता है; चिल्ला ही पड़ेगा।

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