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ग़लत नौकरी में फँसे हो? || आचार्य प्रशांत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मैंने दो साल पहले आपका एक शिविर किया था, उसके बाद अभी मैं आपके सामने उपस्थित हूँ। तो दो साल पहले कुछ सवाल थे उसका मार्गदर्शन आपने मुझे दिया था। तबसे एक साल तक तो चीज़ें सही जा रही थीं लेकिन ये जो पिछले एक साल हैं, उसमें चीज़ें सही नहीं जा रही हैं।

जैसे मतलब पहले अध्यात्म में प्रोग्रेस (प्रगति) अच्छे से हो रही थी लेकिन अभी जो पिछला साल है उसमें कई उतार-चढ़ाव आये। पिछले एक साल से देख रहा हूँ तो जैसे कि मैं ईमानदारी से देख पा रहा हूँ, मैं ऑब्ज़र्व (निरीक्षण) कर रहा हूँ, जैसे मैं एक एजुकेशन कोचिंग सेंटर में जॉब कर रहा हूँ, तो वहाँ पर कुछ चीज़ें होती हैं जिसमें मेरा माइंड (मन) डाइवर्ट (ध्यान हटना) हो जाता है।

जैसे मेरी जो सैलरी थी वो मुझे कम लगती थी लेकिन अभी जैसे दो साल हो गये हैं, मुझे तो सैलरी उतनी ही मिल रही है, फिर भी मैं ओवरऑल (कुल मिलाकर) मार्कशीट (अंकतालिका) देखता हूँ तो मुझे लगता है, ‘नहीं, जितना मुझे मिलना चाहिए उससे कम मिल रहा है।‘

या कभी-कभी मेरे दिमाग में ऐसा ख़याल आता है कि कम्पनी तो इतना कमा रही है फिर मुझे इतना कम क्यों दे रही है? फिर दूसरा ये भी आता है कि कम्पनी में कुछ ऐसी चीज़ें भी होती हैं जो मुझे लगता है कि नहीं होनी चाहिए। लेकिन अभी वहाँ के किसी मेंबर (सदस्य) ने एक लड़की से छेड़छाड़ की तो डाइरेक्टर (निर्देशक) ने बोला कि यहाँ तो ये सब होता ही है, ये छोटी बातें हैं।

लेकिन मुझे लग रहा था इस एजुकेशन इंस्टिट्यूट (शिक्षा संस्थान) में ये भी बात है और ऐसा नहीं है, मतलब वो जितना वो सैलरी दे रही है उसमें तो मेरा काम चल जाता है लेकिन फिर भी दिमाग में ये घूमता रहता है कि नहीं जो मेरी जॉब प्रोफाइल है उसके हिसाब से मुझे थोड़े ज़्यादा पैसे मिलने चाहिए।

तो इन चीज़ों की वजह से मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं मार्ग से भटक रहा हूँ, मुझे इसमें क्लियर (स्पष्ट) नहीं हो रहा है। बस यही प्रश्न है आचार्य जी।

आचार्य प्रशांत: क्लियर (स्पष्ट) रखना भी है? ये तो मैं अकस्मात् आ गया नागपुर, नहीं तो अगर आपको स्पष्टता की चाह होती तो आप बहुत पहले मेरे पास आये होते। तो सिर्फ़ एक संयोग है कि यहाँ आ गया और दो दिन पहले कहा गया कि जो नागपुरवासी हों, उनको भी बुला लो। नहीं तो ऐसा तो कोई यहाँ पर कार्यक्रम भी नहीं था।

क्या बोलूँ इस समस्या के बारे में, ये तो हर व्यक्ति की कहानी है। कोई है जिसको अपनी तनख़्वाह पूरी लगती है? कोई है जो तुलना नहीं करता कि दूसरी जगहों पर कितने पैसे मिल रहे हैं? कोई है जिसको ये नहीं लगता कि मेरी कम्पनी या मेरे कार्यालय में कुछ-न-कुछ ग़लत हो रहा है? कोई भी है ऐसा क्या? तो मैं इसके बारे में आपको कोई विशेष स्पष्टता क्या दे सकता हूँ?

जब आदमी एक धुँधला सा जीवन जीता है तो उस धुंधलके में उसको बहुत सारी छाया दिखायी देती हैं। ये एक प्रकार की छाया है। अभी मैं आपके व्यक्तिगत जीवन में जाऊँगा तो वहाँ आपको दूसरी प्रकार की छाया और भ्रम होंगे। ये सब तो मूल अज्ञान के लक्षण मात्र हैं।

जीवन में दो चीज़ें होती हैं जो आम आदमी को बड़ी ख़ास लगती हैं, जैसे रामकृष्ण कहते थे न ‘कंचन-कामिनी।‘ कंचन माने रुपया-पैसा, सोना। तो मेरी नौकरी कैसी चल रही है, मुझे पैसा कितना मिल रहा है, ये बात बहुत ख़ास लगती है। और दूसरी चीज़ क्या ख़ास लगती है? कि प्रेम-प्रसंग मेरा कैसा चल रहा है, या अभी शादी हो गयी है तो पत्नी के साथ और घर में कैसे सम्बन्ध हैं, ये चीज़ें।

इन दो के अलावा आम आदमी की ज़िन्दगी में और होता क्या है? दफ़्तर और घर, कार्यालय और निवास। और दोनों ही जगहों पर धुंधलका, बेचैनी, खटपट यही लगा रहता है।

ये ऐसी सी बात है कि कोई उठकर के पूछे कि मेरा, मेरी पत्नी से औसत क़िस्म के सम्बन्ध हैं। बहुत बुरे नहीं हैं, बहुत अच्छे भी नहीं हैं। वैसे तो मुझे अपनी पत्नी ठीक लगती है पर जब मैं तुलना करता हूँ कि दूसरों की पत्नी कैसी है तब मुझे लगता है कि मुझे और बेहतर मिलनी चाहिए। ठीक वैसे, जैसे मुझे वैसे तो अपनी तनख़्वाह ठीक लगती है लेकिन जब दूसरों से तुलना करता हूँ तो लगता है और मिलनी चाहिए।

मेरे साले ने अपने मोहल्ले में किसी की लड़की छेड़ दी तो मेरी पत्नी ने कहा, ‘ये तो छोटी बात है, ये तो चलता रहता है।‘ मेरे दफ़्तर में मेरे सहकर्मी ने किसी लड़की के साथ छेड़ाछाड़ी कर दी, मेरे डायरेक्टर (निर्देशक) ने कहा, ‘ये छोटी बात है, ये तो चलती रहती है।‘

ये मुद्दे क्यों हैं जीवन में? ये मुद्दे इसलिए हैं जीवन में क्योंकि जो बड़ी चीज़ है उससे आपको कोई प्रेम नहीं। जब बड़ी चीज़ से प्रेम नहीं होता तो यही छोटे-छोटे मुद्दे जीवन को खा जाते हैं। रसोड़े में कौन था? कितना बड़ा मुद्दा है। आप समझ नहीं रहे कि आप वही सवाल पूछ रहे हैं मुझसे। रसोड़े में कौन था? अब मैं इसमें क्या बताऊँ?

किसको पैसा पूरा पड़ा है आजतक कि आपको हो जाएगा? आप इसमें मुझसे कैसा मार्गदर्शन चाहते हैं, मैं क्या बोल दूँ? न मुझे ये पता है कि आप जीवन में पैसा कमा क्यों रहे हैं? आपके पास जीने का उद्देश्य क्या है? न मैं ये जानता हूँ कि आप जो नौकरी कर रहे हैं, वो नौकरी ही करने के पीछे आपका उद्देश्य क्या है तो मैं आपको क्या सलाह दूँ?

आपकी कुछ उम्र होगी, आप कहीं नौकरी कर रहे हैं, आपने कहा आप कोचिंग में नौकरी कर रहे हैं। आप कुछ दिन तक नौकरी करेंगे, उसके बाद आप बूढ़े हो जाएँगे, आप बीमार हो जाएँगे, आप मर जाएँगे। ये आपकी कुल कहानी है। और बीच में आप सौ तरह के सवाल उठा रहे हैं, बिना अपनी कहानी की मुख्यधारा को बदले। मैं उसमें क्या बोल सकता हूँ आपसे?

आपकी स्थिति ऐसी ही है जैसे कोई व्यक्ति ग़लत ट्रेन में बैठा हुआ है। और वो आई.आर.सी.टी.सी. को और रेलमन्त्री को फोन कर रहा है और ट्वीट कर रहा है कि देखो, टॉयलेट (शौचालय) गन्दी है और खाना अच्छा नहीं बना है। ये बहुत बड़ा मुद्दा है। क्या? शौचालय साफ़ नहीं है और खाना अच्छा नहीं बना है। और जो मुख्य मुद्दा है उसका उसको कुछ पता ही नहीं।

मुख्य मुद्दा क्या है? तुम ग़लत ट्रेन में बैठे हो उसकी कोई बात नहीं करनी है। बात इसकी है कि देखो, पानी नहीं आ रहा मुँह धोने के लिए, तुम मुँह धोकर क्या करोगे? नींद इतनी गहरी है, आन्तरिक है वो, कितना भी मुँह धोलो, वो नींद टूटनी नहीं है। हमारी ज़िन्दगी के मुद्दे ऐसे ही रहते हैं।

ए.सी. ठीक नहीं चल रहा है, ट्रेन में। पैंतालीस मिनट लेट (विलम्ब से) चल रही है। अरे! वो पैंतालीस मिनट विलम्ब से न चले तो भी तुम पैंतालीस मिनट पहले कहाँ पहुँच जाओगे? किसी ऐसी जगह पर जहाँ तुम्हें होना ही नहीं चाहिए।

तुम्हें इस नौकरी में ज़्यादा पैसे भी मिल जाएँ तो भी ये तो बताओ कि ज़िन्दगी किधर को जा रही है? कौनसी पटरी पर ज़िन्दगी की ट्रेन बढ़ रही है, ये तो बताओ।

पैसे कितने मिलते हैं, बहुत बाद की बात है। पहले ये देखते हो कि ट्रेन कहाँ जा रही है? या पहले ये देखते हो कि वो ट्रेन कितने घंटे में पहुँचाएगी?

कहीं जाना होता है, रेलवेज़ की वेबसाइट पर जाते हैं हम, ठीक है न। उसमें सबसे पहले क्या चुनते हो? कहाँ से कहाँ को जाना है, फिर बाद में देखते हो कौनसी श्रेणी की यात्रा करनी है, फिर ये देखते हो ट्रेन कितने बजे चल रही है, फिर ये देखते हो कितने घंटे लेती है। लेकिन ये सब बातें तो बहुत बाद में आती हैं न? सबसे पहले क्या होता है?

या ये कहोगे, ‘ये ट्रेन बढ़िया है, ये दो घंटे में पहुँचा देती है, इस पर बैठ जाते हैं।’ दो घंटे में कहाँ पहुँचा देती है? ‘ये क्या बेकार का सवाल है? ये ट्रेन बढ़िया है, सुपरफास्ट है।’ फिर हम भी सबसे बोलेंगे कि हमारी सुपरफास्ट लाइफ़ है क्योंकि दो घंटे के अन्दर पहुँचा दिया बिलकुल। दौ सौ की गति से चलती है ये। कहाँ को जा रही है? कहाँ को जा रही है? वो नहीं, वो सवाल ही नहीं पूछना है।

लड़की ने लड़का छेड़ दिया, लड़के ने लड़की छेड़ दी, तुम्हें मतलब क्या है इस बात से? माया तो छेड़ ही भर नहीं रही है हमें, हमारा चीरहरण कर रही है। उसकी सुध नहीं है? किसी और की छेड़ाछाड़ी हो गयी, वो बहुत बड़ा मुद्दा हो गया? और जिस तरह का माहौल रहता है आम कार्यस्थलों पर, जहाँ काम ही लालच और डर के इर्द-गिर्द होता है, वहाँ ताज़्जुब की क्या बात है कि किसी की तमन्नाएँ उफान ले गयीं और उसने कुछ अभद्रता कर दी।

ये तो होगा न! एक जगह है जहाँ काम का मूल सूत्र ही यही है कि लालच पैदा करो तभी काम और आगे बढ़ेगा या डराकर रखो तभी काम आगे बढ़ेगा, उस जगह पर और कई क़िस्म के रोग और दुर्गुण पाये जाएँ तो इसमें आश्चर्य क्या? बोलो।

बीमारियाँ तो सारी झुंड में आती है न एकसाथ। एक कर्मचारी है जिसके भीतर आप लालच भड़का रहे हो ज़बरदस्त क़िस्म का। कह रहे हो, ‘इतना और कर ले तो ये मिलेगा। छात्रों को बेवकूफ़ बना दे, कुछ भी करके उनको कोचिंग में एडमिशन दिला दे तो ये मिलेगा।‘ जिसमें लालच भड़क रहा है, ताज़्जुब क्यों हो रहा है कि उसमें वासना भी भड़क गयी? ये दोनों बहुत दूर की चीज़ें हैं, लालच और वासना? एक साथ ही चलना है इनको।

प्रश्न ये नहीं है कि उस व्यक्ति ने वो क्यों किया जो उसने किया, प्रश्न ये है कि तुम जो कर रहे हो वो तुम क्यों कर रहे हो? और तुम भलीभाँति जानते हो कि मेरे सामने पड़ोगे तो मैं यही सवाल उठाऊँगा इसीलिए दो साल से नदारद थे। अभी गड़बड़ हो गयी कि तुम उधर आ नहीं रहे थे उत्तर दिशा तो मैं ज़रा दक्षिण की ओर आ गया।

कहते हैं न कि काजल की कोठरी और कोयले की खान में उतरोगे तो….? तो? मुँह तो काला होगा न? तुम कोयले की खान में काम करते हो और उसके बाद तुमको ताज़्जुब हो रहा है कि वहाँ कोने में कोई मुँह काला कर रहा था। ये कैसा ताज़्जुब है भाई?

अभी मैं कल एम्स में था तो वहाँ पर जो उनके शीर्ष पदाधिकारी थे उनसे बातचीत हो रही थी। और बातचीत में वो एक मुद्दा ये भी उठा रहे थे। बोल रहे थे, ‘पिछले बीस साल में उन्होंने देखा है कि प्रवेश परीक्षा पास करके भीतर आने वाले छात्रों की गुणवत्ता गिरती जा रही है। गुणवत्ता भी गिरती जा रही है और पैसे की तरफ़ रुझान बढ़ता जा रहा है।’ किसकी कृपा से? कोचिंग इंडस्ट्री की कृपा से।

तो जो बिलकुल नैसर्गिक प्रतिभा है उसके लिए और मुश्किल होता जा रहा है मेडिकल या आई.आई.टी या आई.आई.एम में सीधे पहुँच पाना। बीच में कोचिंग की बहुत बड़ी दीवार खड़ी हुई है। कोई बहुत बड़ा वैल्यू एडीशन (मूल्य संवर्धन) तो करती नहीं है ये इंडस्ट्री ? या करती है? चाहे वो यू.पी.एस.सी. की कोचिंग हो, चाहे कोई भी हो।

हाँ, इतना ज़रूर करती है कि जिनके पास ख़र्चने के लिए खूब पैसे हैं, जो कई-कई लाख रुपए कोचिंग में लगा सकते हैं, उनको फ़ायदा दिला देती है। चयनित होने की उनकी सम्भावना बढ़ जाती है।

ये तो मेरे साथ भी हुआ था। दसवीं तक मैं लखनऊ में था तो वहाँ ये माना जाता था कि जो बच्चे पढ़ाई में ज़रा कमज़ोर होते हैं वो ट्यूशन पढ़ने जाते हैं। तो मैंने सदा पढ़ाई अपनेआप की, स्वाध्याय से काम चलाया। और स्वाध्याय से ही काम चलाकर के ही आई.सी.एस.ई. में उत्तर प्रदेश में नम्बर एक मेरी रैंक भी आ गयी। और वही मूल्य थे मेरे भीतर कि ख़ुद पढ़ो और काम चलाओ।

ग्यारहवीं में मैं ग़ाज़ियाबाद आ गया। यहाँ देख रहा हूँ तो यहाँ क्लासरूम में पढ़ाई जैसी कोई चीज़ ही नहीं है, कोचिंग पर ही सारा ज़ोर है, कोचिंग पर ही ज़ोर है, कोचिंग, कोचिंग, कोचिंग। मैंने कोचिंग पकड़ी नहीं क्योंकि मुझे तो यही बात थी कि ट्यूशन तो वो बच्चे जाते हैं जो पढ़ने में कमज़ोर होते हैं। और ख़ुद पढ़ने में क्या बुराई है, किताब में ऐसा क्या लिखा हुआ है जो स्वयं नहीं समझ सकते? और समझ भी लेते थे।

फिर आई.आई.टी. जे.ई.ई. में मेरी रैंक आयी। और मैंने देखा कि आस-पास के कई ऐसे छात्र मुझसे बेहतर रैंक लेकर के बैठे हुए थे जो मैं जानता हूँ किसी गिनती के नहीं थे। फिर थोड़ा खोजा कि बात क्या है तो पता चला कि दिल्ली में बड़ी ज़बरदस्त क़िस्म की कोचिंग है वो उन्होंने जॉइन कर रखी है। और कई सवाल तो जे.ई.ई. पेपर में ऐसे आये थे जो उन कोचिंग ने बिलकुल जस-के-तस उनको करा रखे थे कि लो ये कर लो। और वो उन्होंने जाकर के वहाँ अपना कर दिया।

आप रिसर्च (अनुसन्धान) कर रहे हो? आप नये ज्ञान का निर्माण कर रहे हो? आप क्या कर रहे हो?

किसी ने एक बार कहा था मुझसे, कोचिंग माफिया। ये भी अपनेआप में एक पूरा स्कैम (घोटाला) है। आप आई.आई.टी. वगैरह जाइए, वहाँ प्रोफेसर्स बिलकुल नहीं पसन्द करते इस इंडस्ट्री को, कोचिंग इंडस्ट्री को।

आप कहेंगे, ‘मैं बात कुछ और पूछ रहा था। मैं कह रहा था मुझे नौकरी में पैसा कम लगता है, आपने कोचिंग इंडस्ट्री पर बात करनी शुरू कर दी।‘ हाँ, बात करनी शुरू कर दी क्योंकि मैं ये बात करना चाहता हूँ कि आप किस ट्रेन में बैठे हैं। आप ये बात करना चाहते हैं कि शौचालय साफ़ नहीं है। और मैं तो बार-बार आप सबसे यही सवाल पूछूँगा। कौनसी गाड़ी में बैठे हो और जा किधर को रही है?

ये छोड़ो कि तरक्की करनी है, पहले तृतीय श्रेणी में चलते थे, अब द्वतीय श्रेणी में चलने लग गये, चलो उत्सव मनाते हैं। ट्रेन ग़लत है और बहुत ख़ुश हो रहे हैं कि थर्ड ए.सी. से सेकेंड ए.सी. में आ गये, ट्रेन ग़लत है। उतर भी नहीं रहे हैं, जगह-जगह पर रुकती है ट्रेन।

मौक़ा भी है उतर जाओ, उतर भी नहीं रहे हैं, क्यों? क्योंकि अपने ही जैसे बेहोश लोग उस ट्रेन में बैठे हुए हैं, जो सब ग़लत दिशा में जा रहे हैं और उनसे मोह भी लगा लिया है। किसी से प्रेम भी हो गया है, किसी से विवाह भी कर लिया है। और पंडित भी ट्रेन के अन्दर है, वहीं फेरे भी ले लिये। अब उतरोगे कैसे ग़लत ट्रेन से?

और एक ज़िम्मेदार नागरिक की तरह अब सवाल भी उठा रहे हैं। ‘क्या हम अपनी ट्रेन का रंग लाल से बदलकर पीला कर सकते हैं?’ कितना बड़ा मुद्दा है। हम ज़िम्मेदार नागरिक हैं। ‘देखिए, हम जहाँ रहते हैं उस जगह को साफ़-स्वच्छ, बिलकुल सही दशा में रखते हैं। और एनुअल रिपोर्ट (वार्षिक प्रतिवेदन) प्रकाशित की जा रही है। क्या? कि पहले ये ट्रेन औसतन अस्सी की गति से चलती थी। और हमने जबसे कार्यभार सम्भाला है तबसे इसकी गति बढ़ाकर चौरासी कर दी है। हमें भारत रत्न दिया जाए।’

उस पूरी रिपोर्ट में कहीं उल्लिखित नहीं है कि तुम कौन हो और तुम्हें जाना कहाँ है? ये कोई बात ही नहीं है।

आँख ख़राब हो और अस्पताल जाओ और वहाँ जो सबसे अच्छा आँत का डॉक्टर हो उससे अपनी सर्जरी (शल्य चिकित्सा) करा लाओ और फिर बोलो, ‘देखो, ज़िन्दगी में हमने भी कुछ ख़ास करके दिखा दिया। सबसे बढ़िया डॉक्टर से अपना पेट फड़वाया है।‘

और फिर जाकर के उसको फीडबैक (प्रतिपुष्टि) वगैरह दे रहे हैं। फाइव स्टार (पाँच सितारा) बिलकुल। ‘ये बहुत बढ़िया डॉक्टर है। जितनी बढ़िया इसने सर्जरी करी, विश्वस्तर की बिलकुल। इतनी बढ़िया तो कोई कर ही नहीं सकता था।’

तुम हो कौन? वो करवाने की तुमको ज़रूरत भी थी क्या? बात डॉक्टर और उसकी सर्जरी की है या बात स्वयं को पहले जानने की है? तुम जानते भी हो तुम कौन हो और तुम्हें चाहिए क्या या बस ये देख लिया डॉक्टर अच्छा है, सर्जरी करा लो। और दूसरी ओर अगर तुम्हें ये पता हो कि तुम्हें ज़रूरत आँखों के चिकित्सक की है। उसके बाद तुम्हें कोई साधारण कोटि का चिकित्सक भी मिल गया तो वो बात थोड़ी बेहतर है या नहीं? बोलो।

इसलिए वेदान्त कहता है, ‘आत्मज्ञान।‘ जिसमें आत्मज्ञान नहीं है, जो स्वयं से और अपनी स्थिति से परिचित ही नहीं है, वो जीवन में बहुत ही अज़ीब क़िस्म के काम करेगा। ऐसे मुद्दों में उलझा रहेगा जिनकी कोई अहमियत नहीं। और जो मुद्दे वाक़ई गम्भीर हैं उनका उसे कुछ होश ही नहीं होगा।

पैसा कम लग रहा है, पैसा ज़्यादा लग रहा है। कम या ज़्यादा तो तुल्मात्मक शब्द हैं न? किसी की तुलना में कुछ कम होता है। किसी की तुलना में कुछ ज़्यादा होता है। आपको किस उद्देश्य के लिए पैसा चाहिए, पहले तो ये बताइए। उसकी तुलना में देखा जाएगा कि आपकी जो आय है वो कम है या ज़्यादा है। कोई उद्देश्य होना चाहिए न जीवन में सर्वप्रथम? तब हम कहेंगे न कि ये काम है और इसके लिए इतना चाहिए।

आप कहीं को चलते हो उसके बाद आप बजट निर्धारित करते हो न? कि यदि ये काम करना है, यदि इस जगह पहुँचना है तो इतना बजट चाहिए। तब करते हो न?

पहले क्या आता है? यही तो हमको पता नहीं है न कि पहले क्या आता है। प्रथम क्या है ये हम जानते नहीं। तो फिर सप्तम, अष्टम, नवम सबमें उलझे रहते हैं। उसी प्रथम से प्रेम को अध्यात्म कहते हैं। प्रथम से प्रेम रखो।

इस दुनिया में अनगिनत ऐसी इंडस्ट्रीज़ हैं जिनको होना ही नहीं चाहिए। या जिन्हें होना भी चाहिए तो बहुत न्यून आकार का होना चाहिए, बहुत छोटा होना चाहिए। वो क्यों चल रही हैं? क्योंकि लोग उनमें काम कर रहे हैं, मज़े से कर रहे हैं, पैसे के लिए कर रहे हैं। काम करे ही जा रहे हैं, क्या कहकर? पैसा तो मिल रहा है न। और चूँकि उनके जैसे और भी लोग हैं जो वहाँ काम कर रहे हैं तो कुछ बुरा भी नहीं लगता। सभी कर रहे हैं, मैं भी कर रहा हूँ।

आपके साथ ही मैं गिनती कर लेता हूँ, ठीक है। माँस उद्योग, करोड़ों लोग लगे हुए हैं न इसमें? लगे हैं या नहीं लगे हैं? और उनकी ज़िन्दगी में भी यही मुद्दे होंगे, ‘यार पैसा कम मिल रहा है।‘ वो ये नहीं पूछ रहे कि वो जो काम कर रहे हैं, वो करने लायक है भी या नहीं। उनको भी मुद्दा यही है, ‘पैसा कम मिल रहा है, पैसा ज़्यादा मिल रहा है। यहाँ जाऊँ!’

आभूषण उद्योग, ये ज्वैलरी इंडस्ट्री क्या है? इससे आपके जीवन में कौनसा मूल्यवर्धन होता है, बताइएगा? पर ये दबाकर चल रहा है कि नहीं? जेम्स एंड ज्वेलरी, डायमंड्स पूरा बहुत विशाल उद्योग है, चल रहा है न? इससे कुछ मिलता है किसी को? लेकिन खूब चल रहा है।

कॉस्मेटिक्स इंडस्ट्री (सौन्दर्य प्रसाधन उद्योग), कुछ मिल रहा है? खूब चल रही है। क्यों चल रही है? क्योंकि लोग काम कर रहे हैं। लोग काम कर रहे हैं, उनको पता भी नहीं कि ये जगह काम करने लायक नहीं है, मत करो यहाँ काम। और भी हैं जिनको आप गिना सकते हैं।

वेपंस इंडस्ट्री (हथियार उद्योग), जो हथियार बनाते हैं। वो सिर्फ़ बनाते नहीं हैं। वो ऐसी स्थितियाँ पैदा करते हैं जिनमें हथियार बिकें। हथियार तभी बिकेंगे जब लोगों में और राष्ट्रों में आपस में शत्रुता होगी।

फिल्म इंडस्ट्री। कम-से-कम भारत राष्ट्र को तबाह करने का जितना काम फ़िल्में करती हैं, कोई और नहीं कर सकता। सौ में से कोई एक-आधी फिल्म होती होगी अपवाद, बाक़ी तो सब सीधे-सीधे नर्क में डालती हैं आपको। लेकिन लाखों लोग उनमें लगे हुए हैं, काम कर रहे हैं।

उनको भी ये प्रश्न नहीं उठता होगा कि ये हम क्या तैयार करके देश को दिखा रहे हैं? देश के मनों में हम ये कौनसी चीज़ प्रवेश करा रहे हैं? कभी नहीं उठता होगा। उनको भी सवाल क्या उठते होंगे? सवाल हैं उनके पास, उनको भी बेचैनी है। बेचैनी किस चीज़ को लेकर के है? पैसा ठीक है या नहीं है?

अब ऐसे तो कई देशों में वैश्यावृति भी एक उद्योग है। और सरकार ने उसको मान्यता भी दे रखी है। और उनमें भी जो लोग लगे हुए हैं, शायद ही उनको ये प्रश्न उठता हो कि ये काम करने लायक है भी या नहीं। उनको भी प्रश्न क्या उठता होगा? कि वो जो बगल वाला है या बगल वाली है, उसको दस प्रतिशत मुझसे ज़्यादा क्यों पैसे मिल रहे हैं? ये प्रश्न उठा हुआ है।

सारी समस्या ही यही है कि प्रश्न ही ग़लत हैं हमारे!

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