(गीता-15) कृष्ण ज़रूरी नहीं हैं, हम तो अपने अनुभवों से सीखेंगे || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता (2022)

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, दूसरा अध्याय, सांख्य योग।
हम अध्याय के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। आरम्भ होता है आत्मज्ञान के उपदेश से। अहंकार जो कि शारीरिक वृत्तियों और सामाजिक प्रभावों से उठता है उसको सब आमजन और यहाँ पर अर्जुन भी आत्मा माने रहते हैं। ग़लती की शुरुआत उस पहले भाव से हो जाती है जो मन में आता है — 'मैं', अहम्। जिसको 'मैं' कह दिया वह 'मैं' है नहीं, जो 'मैं' है, उसका कुछ पता नहीं। तो आत्मज्ञान का पूरा अर्थ यही है कि जो तुम हो नहीं उसको बार-बार 'मैं-मैं' कहना छोड़ो।
आत्मज्ञान की बात जितनी शुद्ध है, जितनी सरल है उतनी ही मुश्किल है पकड़ने में, ग्रहण करने में, स्वीकार करने में ऐसों के लिए जिनमें मोह बहुत है और जिन्होंने मान्यताओं को और धारणाओं को ही जीवनभर जिया हो। आत्मज्ञान उनको बड़ा कष्टप्रद होता है। उन्हें ऐसा लगता है जैसे सबकुछ उनका छिना ही जा रहा है।
'मैं' के पास बहुत कुछ होता है उसकी दृष्टि में, है न? 'मैं हूँ, मेरे पास एक नाम है। मैं हूँ, मेरे पास एक देह है। मैं हूँ, मेरे पास कुछ ज्ञान है। मैं हूँ, मेरे पास कुछ धन है। मैं हूँ, मेरे पास एक अतीत है, अनुभव हैं, स्मृतियाँ हैं। जो कुछ मेरे पास है उसमें से कुछ माँग लो तो कदाचित् मैं दे भी दूँ। तुमने मेरी कुल निधि का, सम्पदा का एक अंश ही माँग लिया, मैं दे भी सकता हूँ। मैं हूँ तो और इकट्ठा कर लूँगा। मेरे तुमने बीस रुपये ले लिये, पर जब तक मैं हूँ, मैं चालीस इकट्ठा कर लूँगा।
आत्मज्ञान आपसे वो नहीं माँगता जो आपके पास है। आत्मज्ञान आपसे वो माँग लेता है जो आप हैं। बड़ा मुश्किल पड़ता है। आत्मज्ञान आपसे वो नहीं माँगता जो आपके पास है। आत्मज्ञान आपसे वही माँग लेता है जो आप हैं। अब जो पास था वो तो गया ही, जिसके पास था वो भी गया। जो कुछ भी आपको सम्पत्ति की तरह लगता है वो तो गया ही, भविष्य में भी कुछ पाने की सम्भावना भी ख़त्म हो गयी, तो पाएगा कौन? अरे! बात और आगे जाती है, जब आप ही नहीं तो भविष्य किसका? भविष्य में कुछ पाने की सम्भावना भर नहीं ख़त्म हुई, भविष्य ही ख़त्म हो गया। लो, अब बचा क्या? तो आत्मज्ञान ऐसा लगता है जैसे मृत्यु।









