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गीता का ज्ञान ही नहीं, डंडे की चोट भी चाहिए || आचार्य प्रशांत, अद्वैत महोत्सव (2022)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, अभी जैसे आपने बात करी — ऊँचा दुख और ऊँची लड़ाई — तो पहले जैसे मैं एक गृहिणी थी, तो गृहिणी के रूप में तो बिलकुल शान्त, अध्यात्म के लिए भी समय मिलता था, आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना या किसी सत्संग में जाना, तो उससे बड़ी शान्ति रहती थी। लेकिन उसके बाद अपनेआप ही ऐसा कुछ माहौल बना कि थोड़ा व्यापार की ओर क़दम बढ़ाया, तो उससे मतलब अब दिखता है, वरना पहले तो ऐसे लगता था कि जैसे हमारे जितना साफ़-सुथरा कोई नहीं था।

अब अपनेआप में लोभ दिखता है, लालच,‌ डर, ईर्ष्या — सारे ही अपनेआप में विकार दिखते हैं बहुत ज़्यादा। और जैसे आप ऊँचे दुख और ऊँची लड़ाई की बात करते हैं, वो भी साथ-साथ प्रयास रहता है, लेकिन अभी मैं देख रही हूँ कि भौतिक जगत में जो लड़ाई है, उसमें बहुत ज़्यादा चल रहा है।

कुछ दिन पहले कुछ ऐसी घटना हुई व्यापार के सिलसिले में, तीन-चार रात तक मैं सो नहीं पायी ढंग से, मतलब सो भी रही हूँ तो ऐसा लगता है कि जाग ही रही हूँ और वही मेरे विचार चल रहे हैं। और जैसे कल और परसों बात हो रही थी कि हमें गहराई में जाना चाहिए ताकि थोड़ी ऊँचाई आये, लेकिन वो गहराई में जाने से पहले ही जैसे ही परिस्थितियाँ सामान्य होती हैं तो हम फिर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं, ऊँचाई की तरफ़ जाना ही भूल जाते हैं। तो ये कैसे हो पाएगा?

आचार्य प्रशांत: ये तो अर्जुन के साथ भी होता था। अगर अर्जुन लगातार गहरी चेतना में ही वास कर रहे होते तो गीता की ज़रूरत ही क्यों पड़ती? कृष्ण से यदा-कदा दूर हो जाते रहे होंगे, तभी तो मन में इतने तरह के संशय उठे। जो आपके साथ हो रहा है वो किसी के साथ भी होगा जो कृष्ण से दूर हो जाएगा। अब एक ग़लती ये होती है कि कृष्ण से दूर हैं, और दूसरी ग़लती ये होती है कि जब संशय उठे तो उन्हें ख़ुद ही निपटा दिया, कृष्ण-चेतना के अभाव में ही निपटा दिया।

सर्वप्रथम समझिए कि आप कौन हैं। आप वो हैं जो बीच में टॅंगा हुआ है और बीच में टॅंगे रहकर गिरने की जिसकी वृत्ति ज़्यादा है। नारियल के पेड़ पर नारियल टॅंगा हुआ है, पहली बात तो वो बीच में है, न नीचे है, न ऊपर है। दूसरी बात — सम्भावना ये है कि जैसा है अगर वैसा ही रह गया तो गिरेगा तो बेटा नीचे ही। वैसी ही हमारी हालत है — जड़ और चेतन के बीच में हैं, और वृति यही है कि जड़ता की ओर ही और गिरें — सबकी; आपकी, अर्जुन की, हम सबकी साझी वृत्ति। कृष्ण चाहिए, कोई उपाय और नहीं।

ईर्ष्या, लोभ, भय, जिसकी भी आपने बात करी, क्यों ऐसे हम उनकी बात करते हैं जैसे कि वो विसंगतियाँ हों, जैसे वो अनहोनी हों, जैसे वो दुखद संयोग मात्र हों? ये सब, जिनका नाम आपने विकारों की तरह लिया, ये विकार नहीं हैं भाई, ये हमारा भाग्य हैं, ये हमारी देह हैं। इनको ऐसे मत देखिए कि अरे कुछ अनघट घट गया है, हम तो बड़े अच्छे आदमी थे, ये हममें ईर्ष्या कहाँ से आ गयी! ‘मैं तो बड़ी साहसी स्त्री हूँ, आज मैं डर कैसे गयी!’

गर्भ से हम साहस नहीं, भय ही लेकर पैदा होते हैं, प्रेम नहीं, ईर्ष्या ही लेकर पैदा होते हैं, पर आश्चर्य हम यूँ दिखाते हैं जैसे बड़े भले, बड़े निर्दोष, एकदम निर्मल पैदा हुए थे और किसी दुष्ट ने आकर के हमको मलिन कर दिया।

है न, ‘लागा चुनरी में दाग, दिखाऊँ कैसे?’ वो बात ठीक है, पर असलियत उससे भी आगे की है — ये चुनरी पैदा ही काली होती है। जिसको साहब कहते हैं न, ‘झीनी-झीनी बीनी रे चदरिया’, उसमें एक बात नहीं बोलते वो कि चादर का रंग क्या है। झीनी-झीनी बीनी तो ठीक है, पर एकदम काली होती है पैदा, और जीवन भर फिर क्या करना पड़ता है? घिसो, उस पर ज्ञान का साबुन लगाओ, जितना घिस सकते हो घिसते रहो।

ये काला रंग क्या है? वही, वो सब जो आप बता रही हैं। और सबकी चदरिया एक जैसी होती है। हाँ, काले के भी फिर अलग-अलग प्रकार होते हैं — किसी का कोयले वाला काला, किसी का रात वाला काला, किसी का नागिन वाला काला — तो उसी प्रकार मनुष्यों में विविधताएँ पायी जाती हैं। फिर हम कहते हैं, ‘नहीं-नहीं, देखो मैं इससे अलग हूँ, वो काला है, मैं काला नहीं हूँ।‘ वो काला काला है, तुम कोयला काला हो, इससे ज़्यादा नहीं अन्तर है दोनों में।

मनुष्य-मनुष्य में प्राकृतिक रूप से इससे ज़्यादा अन्तर नहीं होता, इससे ज़्यादा अन्तर तब आता है जब मनुष्यों में कोई एक कृष्ण के संग जाता है, तब कुछ आयामगत अन्तर आता है, अन्यथा तो..।

चुनाव कर लो, कौनसा चाहिए।

हेनरी फ़ोर्ड ने कहा था, उनकी कार आयी थी और वो बड़ी माँग में थी, हर कोई ख़रीदना चाहता था, मॉडल टी‌ था शायद। तो अब अलग-अलग रंगों की अगर वो गाड़ियाँ निकालें, उत्पादन करें तो समय लगेगा, तो वो सारी गाड़ियाँ एक ही रंग की निकालते थे, काली। तो लोगों ने कहा, ‘भई हमें थोड़े अलग-अलग रंगों की चाहिए, कैसे कर रहे हैं आप!’ अब उनकी मोनोपोली (एकाधिकार), वो काहे को सुनें! उन्होंने कहा, 'यू कैन हैव एनी कलर ऐज़ लॉन्ग ऐज़ इट इज़ ब्लैक' (आप कोई सा भी रंग चुन सकते हैं जब तक वो काला है)।

वैसे ही हमारा हाल है। दीदी वाली ईर्ष्या, भैया वाला दाह, अंकल वाला ज्ञान, आंटी वाला भ्रम — चुन लो जो चाहिए।

स्वयं को लेकर के अनभिज्ञता, बल्कि एक साज़िश — जिसे ग़लतफहमी कहना उतना ठीक नहीं, साज़िश कहना ज़्यादा ठीक है — उसमें क्यों रहते हैं आप? ‘अरे! मेरे से धोखे से ग़लती हो गयी।‘ धोखे से कुछ नहीं होता, हम ऐसे हैं! और वैसा होने से आपको सिर्फ़ कृष्ण बचा सकते हैं। ‘कृष्ण’ यहाँ जब मैं कह रहा हूँ तो मैं यहाँ पर मोरपंख वाले कृष्ण की तो नहीं बात कर रहा न, मैं गीता वाले कृष्ण की बात कर रहा हूँ। उससे बस आपको कृष्ण बचा सकते हैं।

ताज्जुब इस बात का मत किया करिए कि गिर गये, ताज्जुब तब किया करिए जब कृष्ण के समीप न हों लेकिन ऐसा लग रहा हो कि नहीं गिरे — ये बड़ी ख़तरनाक हालत है। गिर गये, तो ये तो होना ही था, गिरने के लिए ही तो पैदा होते हो। लेकिन कृष्ण के साथ हैं नहीं, फिर भी ऐसा लग रहा है गिरे नहीं हैं, सब ठीक-ठीक चल रहा है, ज़िन्दगी बढ़िया चल रही है, तब बिलकुल सहम जाया करिए, कुछ बहुत ख़तरनाक चल रहा है जीवन में। कृष्ण जीवन में नहीं हैं फिर भी ऐसा लग रहा है कि सब ठीक चल रहा है — कुछ बहुत-बहुत विनष्टकारी होने जा रहा है, हो रहा है।

कृष्ण जीवन में नहीं, लेकिन कोई पूछ रहा है, 'हाउ इज़ लाइफ़?' (जीवन कैसा चल रहा है?)

'कूल!' (बढ़िया)।

खौफ़नाक! ये बात बहुत-बहुत भयंकर है।

प्र: आचार्य जी, शायद ये कुछ अति माँग है, चार साल ही हुए आपके साथ जुड़े हुए, तो ऐसा लगता था कि मैं तो अध्यात्म में काफ़ी आगे बढ़ चुकी हूँ, अपनेआप को ये भी शायद भ्रम था। और अब लगता है कि कुछ भी नहीं सीखा, तो इससे बहुत ज़्यादा ग्लानि भी लगती है कि ये क्या हुआ।

आचार्य: कभी ‘सखा’ बोलते हैं, कभी ‘गुरु’, कभी ‘सम्बन्धी’, ‘मित्र’ तो बोलते ही रहते हैं — इतनी निकटता है दोनों में, उसके बाद भी अर्जुन भ्रमित। और उनका रिश्ता उतना ही पुराना है जितनी अर्जुन की उम्र, और महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन की उम्र पचास पार कर चुकी थी। तो कम-से-कम पचास साल का रिश्ता, और वो भी इतनी गहराई का — गुरु भी, सखा भी, सम्बन्धी भी — और तब भी अर्जुन बहक गये। और आप कह रही हैं, ‘चार साल में मैंने लगभग छः कोर्स (पाठ्यक्रम) करे हैं, आठ किताबें पढ़ी हैं, और साढ़े सात कैम्प (शिविर) करे हैं, मैं कैसे फिसल गयी?’

अर्जुन फिसल सकते हैं, आप बच जाऍंगी?

आपके सुपुत्र बोधस्थल में रहते हैं, वो दिन में, कौनसा ऑंकड़ा बोलूँ, उतनी बार फिसलते हैं, और वो मुझसे चार क़दम की दूरी पर होते हैं।

हमें अपनी हालत का कुछ ठीक-ठीक अनुमान है ही नहीं, हमें लगता है कि हम बड़े बढ़िया लोग हैं और हम यूँही, अकस्मात्, कभी-कभार फिसल जाते हैं। फिसलना तो तय है, आप कभी-कभार फिसलने से बच कैसे जाते हैं इसका अनुग्रह किया करिए।

प्र: आचार्य जी, एक प्रश्न और था। जैसे मैं पहले किसी सत्संग में जाती थी, तो वहाँ पर — जैसे अष्टावक्र गीता का आपने कहा कि यहाँ पर आज उपयोगिता नहीं है उसकी, तो उसमें जैसे अष्टावक्र जी ने बताया कि ब्रह्म-ही-ब्रह्म है, आत्मा-ही-आत्मा है — उस चीज़ को इस तरह से लिया गया है कि मतलब अभी मैं गयी थी अपने सम्बन्धी के यहाँ, वो भी उसी सत्संग में जाते हैं, तो वहाँ पर क्या हुआ कि किसी कीड़े को ऐसे ही मार दिया गया तो बोला गया कि इसकी तो मुक्ति हो गयी, इसकी ये वाली योनि ख़त्म हो गयी।

तो मुझे जैसे आपको सुनते हुए जितनी भी समझ पड़ी, तो मैंने उनको बताया। तो बताते हुए भी ऐसे हो जाता है कई बार कि अपना नियन्त्रण खो देती हूँ, तो थोड़ी नाराज़गी भी हो गयी। मतलब ये चीज़ समझ नहीं आती कि उन्होंने ऐसा क्यों बना रखा है कि किसी भी जीव को, छोटे जीवों को तो ऐसे मारते हैं — मच्छर है, मक्खी है, कीड़ा है, चूहा है — बहुत ज़्यादा उसमें हिंसा कर देते हैं, यही कहकर के कि इसकी तो मुक्ति हो गयी, इसकी ये योनि हमने ख़त्म कर दी, अब ये ऊँची योनि में चला जाएगा।

तो इस पर कुछ कहें।

आचार्य: एक बेसबॉल बैट (बल्ला) आप भी रखा करिए! मुक्ति-प्रदाता।

(श्रोतागण हॅंसते हैं)

कोई पूछे, ‘ये क्या है?’

‘ये मुक्ति का उपकरण है! गुरु जी, आपसे ज़्यादा तो कोई योग्य है ही नहीं मुक्ति के! आपने इतनी गीताऍं पढ़ी हैं, आप ही कहते हैं कि ब्रह्म-ही-ब्रह्म है, आपको तो कबकी मुक्ति मिल जानी चाहिए थी। कृपया मुझे मौक़ा दें।‘

क्या बोलूँ अब इस पर?

प्र: उत्तर नहीं दे पायी थी न सही से।

आचार्य: नहीं, ऐसों को उत्तर चाहिए ही नहीं। (हाथ से दंड देने का इशारा करते हुए)

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: वो कुछ सम्बन्धी होने की वजह से या कुछ सम्बन्धों की वजह से अभी हो नहीं पाता।

(श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य: आंसर (उत्तर) से, शब्दों से, उत्तरों से काम चलता तो क्यों कहते कृष्ण अर्जुन को कि उठा गांडीव? वो दुर्योधन को बुलाते न, ‘इधर आ, तू भी बैठ चम्पू! गीता चल रही है, तू भी सुन!’ उसको बुला भी लें तो आ भी जाता, कृष्ण का उतना सम्मान सब करते थे। एक बार वो आ भी जाता, बैठ जाता, वो सुन भी लेता, तो क्या होता?

एक बिन्दु आ जाता है जिसके बाद शब्दों से काम चलता ही नहीं। ज्ञानमार्ग चैतन्य व्यक्तियों के लिए है, मूढ़ों को तो दंड चाहिए। इसीलिए गीता उपनिषदों से अधिक प्रभावकारी रही है, प्रसिद्ध और प्रचलित रही है। उपनिषदों में दंड का कोई विधान ही नहीं है, उपनिषद् बहुत ऊँची चेतना के वातावरण के लिए हैं। गुरु हैं, शिष्य हैं, और बहुत ऊँचे तल का संवाद चल रहा है — वो उपनिषद् हैं।

गीता ज़रा ज़्यादा धरातल पर है, वहाँ ऐसे भी लोग मौजूद हैं, दु:शासन तरह के, जयद्रथ घूम रहे हैं। उपनिषदों में आपको दु:शासन और जयद्रथ जैसे नमूने मिलेंगे ही नहीं! लेकिन दुनिया में क्या हैं — उपनिषदों जैसे ज़्यादा चरित्र, या गीता जैसे ज़्यादा चरित्र?

श्रोतागण: गीता जैसे।

आचार्य: तो इसलिए भारत में गीता को ज़्यादा उपयोगी पाया गया। हालाँकि शुद्ध उपनिषद् ही ज़्यादा हैं, पर लाभकारी गीता ज़्यादा हुई; क्योंकि उपनिषदों में बाण नहीं हैं, उपनिषदों में गदा नहीं हैं, और लाभकारी अक्सर गदा और बाण ही होते हैं, लेकर चला करिए! एक हाथ में अष्टावक्र गीता, और कन्धे पर गदा।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=bOgXrtanJww

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