जब भी विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आएँगे, लोकधर्म मुँह की खाएगा, क्योंकि लोकधर्म किससे बना है? कल्पना और भावना से। और कल्पना और भावना, तथ्य से नीचे की बातें होती हैं, विज्ञान तथ्यों पर चलता है। लेकिन विज्ञान से भी ऊपर क्या है? अध्यात्म। क्योंकि विज्ञान, सब कुछ हटा देने के बाद भी कल्पना, भावना, इत्यादि कचरा हटा देने के बाद भी, एक द्वैत में तो विश्वास करता ही है न?
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आचार्य प्रशांत: जीवन में जो कुछ भी होता है, वो, ये, तू, मैं, उससे रिश्ता बनाने के चार-पाँच तलों की आज हम बात करेंगे। और हर तल रिश्ते का द्योतक है अहंकार के एक तल का, क्योंकि रिश्ता तो अहंकार ही बनाता है न।
जो सबसे निचला तल होता है, किसी भी विषय से, दृश्य से, व्यक्ति से, वस्तु से रिश्ता बनाने का, वो होता है तल — कल्पना का। तो “चंद चढ़ा कुल आलम देखे,” चाँद है और चाँद उस दिन से है, जिस दिन से मनुष्य की चेतना है। आदिमानव भी चाँद को देखता था तो बड़ा विस्मय करता था। लेकिन चाँद के विषय में उसने कोई जिज्ञासा नहीं करी, करी भी होगी तो उस समय के कुछ छिटपुट लोगों ने करी होगी, जिसका कोई वृतांत नहीं मिलता और जो बात बहुत आगे तक नहीं जा पाई।
वो चन्द्रमा का तथ्य क्या होता है, ऐसी कोई बात सामने आई नहीं। चाँद मनुष्यता के लिए एक ज़बरदस्त विषय तो रहा अति प्राचीन काल से। लेकिन आप अगर उन लोगों से पूछें, जो आज से 20 हज़ार साल पहले के, या 50 हज़ार साल पहले के, या लाख साल पहले के हैं, आप उनसे पूछें “चाँद क्या है?” तो वो आपसे चाँद के बारे में कुछ कहानियाँ कह देंगे। ये रिश्ता बनाने का सबसे निचला तल होता है — न उसको जाना, न इसको जाना, (न दृश्य को जाना, न दृष्टा को जाना) और कहानियाँ बना दीं, मिथ।




