
आचार्य प्रशांत: जीवन में जो कुछ भी होता है, वो, ये, तू, मैं, उससे रिश्ता बनाने के चार-पाँच तलों की आज हम बात करेंगे। और हर तल रिश्ते का द्योतक है अहंकार के एक तल का, क्योंकि रिश्ता तो अहंकार ही बनाता है न।
जो सबसे निचला तल होता है, किसी भी विषय से, दृश्य से, व्यक्ति से, वस्तु से रिश्ता बनाने का, वो होता है तल — कल्पना का। तो “चंद चढ़ा कुल आलम देखे,” चाँद है और चाँद उस दिन से है, जिस दिन से मनुष्य की चेतना है। आदिमानव भी चाँद को देखता था तो बड़ा विस्मय करता था। लेकिन चाँद के विषय में उसने कोई जिज्ञासा नहीं करी, करी भी होगी तो उस समय के कुछ छिटपुट लोगों ने करी होगी, जिसका कोई वृतांत नहीं मिलता और जो बात बहुत आगे तक नहीं जा पाई।
वो चन्द्रमा का तथ्य क्या होता है, ऐसी कोई बात सामने आई नहीं। चाँद मनुष्यता के लिए एक ज़बरदस्त विषय तो रहा अति प्राचीन काल से। लेकिन आप अगर उन लोगों से पूछें, जो आज से 20 हज़ार साल पहले के, या 50 हज़ार साल पहले के, या लाख साल पहले के हैं, आप उनसे पूछें “चाँद क्या है?” तो वो आपसे चाँद के बारे में कुछ कहानियाँ कह देंगे। ये रिश्ता बनाने का सबसे निचला तल होता है — न उसको जाना, न इसको जाना, (न दृश्य को जाना, न दृष्टा को जाना) और कहानियाँ बना दीं, मिथ।
“चन्दा मामा दूर के, पुए पकाए पूर के, आप खाएँ थाली में और मुन्नी को दें प्याली में।” चन्दा मामा।
बात थोड़ी मीठी हो सकती है। बात में, हो सकता है, बहुत अगर खनन-खुदाई की जाए तो कुछ सार भी निकल आए। लेकिन ले-दे के बात पूरी काल्पनिक है, ये रिश्ता बनाने का सबसे निचला तल है, सबसे आरंभिक। और ये तल कुछ हद तक स्वीकार सिर्फ़ तब करा जा सकता है जब और कोई साधन ही न हो। तो जैसे आप आदिमानव को ले लें, उसके मामले में ये बात स्वीकार करी जा सकती है कि ज्ञान नहीं था, साधन नहीं थे, प्रयोगशालाएँ नहीं थीं, पीछे की पीढ़ियाँ नहीं थीं, जिन्होंने जानकारी आगे सौंप दी हो। तो बेचारे को क्या पता। तो वो ऐसे चाँद को देखता था, तो चाँद को लेकर कहानियाँ बनाता था।
और भारत हो, चीन हो, यूनान हो, जितने भी पुराने लोग हुए हैं, सबमें चाँद को लेकर सैकड़ों-हज़ारों कहानियाँ हैं, मान्यताएँ, मिथ। सिर्फ़ यदि चन्द्रमा को ही ले लिया जाए तो चन्द्रमा से संबंधित मान्यताओं से इतनी किताबें भर जाएँगी कि हमारी मेज कम पड़ जाए। क्योंकि ज़बरदस्त चीज़ है न चन्द्रमा, रोज़ आकर रात में आकाश को आभा दे जाता है। और सूरज की तरह नहीं है कि उससे आँख मिलाने में आँख घबरा जाए। चाँद से आँखें मिलाई जा सकती हैं, और सूरज की तरह नहीं है कि बिल्कुल सुनिश्चित, इतने बजे निकलता है, इतने बजे ढलता है, इस दिशा से आता है, इस दिशा को जाता है और ये लगभग उसका आकार है साल भर वैसा ही रहता है।
चाँद की तो कलाएँ होती हैं, हर 15 दिन में पूरा मामला उलट जाता है। 15 दिन हम क्या कह रहे हैं, मामला रोज़ ही बदल जाता है, तो चाँद बड़ा विस्मित करता रहा। जब चाँद विस्मित करता रहा तो हमने चाँद को लेकर कल्पनाएँ बना लीं। ये दूसरे से रिश्ता बनाने का, हम कह रहे हैं सबसे आरंभिक तल होता है। हम कहें सबसे निचला तल होता है, तो वो बात भी सही है, पर कई लोगों को बात अखरेगी कि आप जो पूरी मिथोलॉजी होती है, आप उसको नीचे की बात क्यों बोल रहे हो। तो चलो, आरंभिक तल होता है।
उसके बाद, जब आप थोड़ा सा और जानने-समझने की स्थिति में आते हो, आप कहते हो, “नहीं, जो हमें धारणाएँ दे दी गई हैं, जो बातें प्रचलित हैं, हम बस उनको नहीं मानेंगे। क्योंकि मिथ जो होती हैं, सामाजिक होती हैं, पारंपरिक होती हैं। आप अकेले बैठ-बैठकर अपनी कोई व्यक्तिगत मिथ नहीं बना सकते। मिथ — हिंदी में मिथक बोलते हैं उनको। यहाँ मिथ से आशय झूठ नहीं है, मिथ का एक अर्थ झूठ भी होता है, हम उस अर्थ में नहीं कह रहे हैं। हम मिथक के अर्थ में कह रहे हैं, लगभग कह दो किंवदंती या लोककथा, इस अर्थ में, जनश्रुति। तो ये सामाजिक होती है, पारंपरिक होती है, सार्वजनिक होती हैं।
सब लोग एक ही बात मान रहे हैं, “चन्दा मामा दूर के,” चन्दा मामा हैं, चन्दा मामा ये नहीं कि सिर्फ़ शिवा के मामा हैं वो आरती के भी मामा हैं, वो बगल के गाँव वाले के भी मामा हैं, वो बगल में जो देश है, हो सकता है वहाँ के लोग भी मामा ही बोलते हों। तो बात सार्वजनिक होती है। उससे जब थोड़ा हम आगे बढ़ते हैं, तो हम कहते हैं कि वो विषय सिर्फ़ वही क्यों रहे जैसा दूसरों ने उसको बताया है, हमारा उससे कोई निजी रिश्ता नहीं हो सकता क्या? वो निजता बहुत सतही है, बहुत शुरुआती है, पर फिर भी ये निजता का आरंभ बात को आगे चलकर दूर तक ले जाता है। उस निजता की शुरुआत होती है भावना से। समझ में आ रही बात?
तो फिर जो लोग सार्वजनिक मान्यताओं से आगे बढ़ते हैं, वो कदम रखते हैं निजी भावनाओं के क्षेत्र में। तो यहाँ पर आ जाएँगे वो सब लोग, जिन्होंने गर्मियों की रातों में छत पर लेटकर चाँद को निहारा है और चाँद में अपनी प्रियतमा का चेहरा देखा है। सार्वजनिक नहीं होती न प्रियतमा, ‘मेरी प्रियतमा।’
कितने ही गाने होंगे चाँद पर, जो आपने सुन रखे हैं, है न। चाँद से बातें करी हैं, इतनी कविताएँ हैं जो चाँद पर लिखी गई हैं और शायरी का तो कहना ही क्या। अब ये जो शायरी है ये आप ख़ुद लिख रहे हो, ये परंपरा ने और विरासत ने आपको नहीं सौंपी है। आप उसमें अपनी प्रेमिका का चेहरा देख रहे हो, पड़ोसी की प्रेमिका का चेहरा नहीं देख रहे हो। तो ये बात कुछ हद तक निजी हुई है और निजता की शुरुआत अहम् के आत्मा की तरफ़ बढ़ने की शुरुआत होती है। क्योंकि अहम् पूरी तरह से बिखरा हुआ होता है, प्राकृतिक होता है।
प्राकृतिक माने सार्वजनिक, जो सबके लिए है। और आत्मा का तो अर्थ ही होता है, ‘मैं’। तो ये बात अब थोड़ी-सी आगे बढ़ी है, आप ये नहीं कह रहे कि चाँद वही है, जो सबने जाना है। आप कह रहे हो, “नहीं, मेरा चाँद से एक व्यक्तिगत भी संबंध हो सकता है। मैंने पूछा चाँद से कि देखा है कहीं…” अब ये बात शुरू हो गई, चाँद से बातचीत हो रही है। है काल्पनिक ही, पर निजी हो गई है।
मिथक में काल्पनिक होता है और सार्वजनिक होता है। भावना जो है, वो भी काल्पनिक ही पर मामला अब निजी हो गया है। “मैंने पूछा चाँद से कि देखा है कहीं मेरे यार-सा हसीन, चाँद ने कहा, चाँदनी की कसम नहीं-नहीं।” मतलब, “चाँद-सी महबूबा हो मेरी, मैंने कब सोचा था पर तुम बिल्कुल वैसी ही हो, जैसा मैंने सोचा था।” तो मामला अब बिल्कुल क्या होता जा रहा है, व्यक्तिगत होता जा रहा है। लेकिन सत्य से तो कोसों दूर है, बहुत दूर की बात है, पर अहंकार चलो थोड़ी तो प्रगति करा।
उसके बाद आप तथ्यों में प्रवेश करते हैं। तो कल्पना – चाँद आपकी कल्पना हो सकता है, भावना – चाँद आपकी भावना हो सकता है। और फिर आता है विज्ञान, वहाँ चाँद आपके लिए जो पूरी लूना सीरीज़ थी, वो हो सकता है। वो सारे यान जो भेजे गए थे चाँद का अनुसंधान करने के लिए, जैसे भारत का अभी चंद्रयान था।
फिर चाँद क्या है, ये आप अपनी कल्पना से नहीं पूछोगे, ये आप नील आर्मस्ट्रांग से पूछोगे, तो मामला अब भावना से उठकर के तथ्य में आ गया। लेकिन तथ्य के साथ भी एक चीज़ अभी जुड़ी हुई है, क्या? निजी स्वार्थ। आप अगर चाँद पर जाते हो तो सिर्फ़ अपनी आकुलता मिटाने नहीं जाते, आप चाँद पर जाते हो तो अपना झंडा साथ लेकर जाते हो। आप चाँद पर जाते हो तो कहते हो, मैं यहाँ के खनिज का दोहन कैसे कर सकता हूँ, यहाँ अपना स्टेशन कैसे स्थापित कर सकता हूँ, यहाँ अपनी कॉलोनी कैसे बना सकता हूँ। समझ में आ रही है बात?
तो हम जिसको तथ्य भी कहते हैं, उसमें भी, उस रिश्ते में भी, तथ्यात्मक रिश्ते में भी, स्वार्थ बैठा होता है। वरना हमारी आँखें हैं नहीं कि किसी भी विषय पर जाकर टिक जाएँ उसका तथ्य जानने के लिए। हमारी आँखें अगर किसी विषय पर जाकर रुकती हैं तो हमारा स्वार्थ होता है। बहुत बड़ी भीड़ होगी, भीड़ में हर चेहरा संभावित रूप से एक तथ्य है पर आपकी आँख हर चेहरे पर जाकर नहीं रुकती है। आपकी आँख कुछ विशेष चेहरों पर ही जाकर रुकती है, जिनके साथ आपका स्वार्थ जुड़ा होता है। आप दुकान में जाते हो, दुकान में जितना माल रखा हुआ है, माल तो माल है। पर आपकी निगाह उड़ती-उड़ती किसी खास माल पर जाकर रुक जाती है, और फिर आप उस माल के बारे में कुछ तथ्यगत पूछताछ करना शुरू कर देते हो, “हाँ भाई साहब, कितने का दिया, कहाँ से आता है, क्या गारंटी है, क्या डिस्काउंट है?” ये सब आप पूछना शुरू कर देते हो।
अभी जो आप पूछ रहे हो, अब सुनने में लगेगा कि आप तो फैक्ट्स पूछ रहे हो न, पर उन फैक्ट्स के पीछे भी क्या बैठा हुआ है? स्वार्थ बैठा हुआ है। बात आ रही है समझ में? तो ये चाँद से रिश्ता बनाने का एक बहुत ऊँचा तल हो गया, लेकिन हम नहीं कह सकते कि ये सबसे ऊँचा तल है। समझ में आ रही है बात?
अब जो उच्चतम हो सकता है, उसको आज हमारे सामने रखा जा रहा है। ये काम कबीर साहब कर रहे हैं, और जिस तरीक़े से कर रहे हैं, वो इतना अनूठा है कि आपने कभी देखा-सुना नहीं होगा। तभी तो हम कहते हैं, “वारी जाऊँ मैं सतगुरु के।” वो कुछ ऐसा करके दिखा देते हैं, जो न मिथक के बस का है, न भावना के बस का है, न विज्ञान के बस का है।
मिथक आपको कल्पनाओं में धकेल देता है। भावना आपको जंजीरों में बाँध देती है, और विज्ञान तथ्यों की बात करता है पर विज्ञान में भी स्वार्थ छुपा रहता है। अभी जो होने जा रहा है, वो इतना अपूर्व है, कि वाह! और इसी में ज्ञानियों की विरलता होती है, उनका निरालापन होता है, कि बहुत बड़ा काम कर जाते हैं, पर इतनी सरलता से कि पता ही नहीं चलता कि काम इतना बड़ा था।
अक्सर होता क्या है न, कि बड़े से बड़े काम में बड़प्पन इसमें नहीं होता कि क्या किया; बड़प्पन इसमें होता है कि क्या नहीं किया। जो नहीं किया, वो दिखाई तो पड़ेगा नहीं, क्योंकि किया ही नहीं। क्योंकि वो आपको दिखाई नहीं पड़ेगा, तो आप उसके न करने का श्रेय भी, कभी न करने वाले को नहीं दे पाएँगे।
भाई, मैं चाँद को लेकर के कुछ अपनी कल्पनाएँ लिख दूँ या शायरी लिख दूँ, तो आप आधा-तिहा ही सही, पर मुझे श्रेय देने को विवश हो जाएँगे क्योंकि मैंने कुछ किया। यहाँ संत कबीर हैं, चन्द्रमा को जिन भी रूपों में लिया गया है, वो उन सब रूपों से इंकार कर रहे हैं। वो नहीं कह रहे हैं कि वहाँ पर चन्दा मामा है, कि चंद्र देवता हैं, नहीं बात करना चाहते। न वो ये कह रहे हैं कि चाँद मेरी प्रेमिका है। न तो वो चंद्र देव की बात कर रहे, न चन्दा मामा की बात कर रहे हैं, न चाँद को प्रेमिका कह रहे, न ये कह रहे हैं कि चाँद क्या है, चट्टान का टुकड़ा भर तो है। जैसे पृथ्वी है, जैसे सब ग्रह हैं, वैसे ही चाँद भी बस चट्टान, हवा, पानी, गैस, यही तो है और क्या है चाँद। वो ये सब कुछ नहीं कह रहे।
वो कुछ ऐसा कहने जा रहे हैं, जो मैं कह रहा हूँ, बहुत बोधन उठा है। लेकिन वो जो कह नहीं रहे, उसका आप श्रेय भी इनको कैसे दे दोगे?
बड़ा मुश्किल हो जाता है न ये देख पाना कि एक इंसान महान बस उन कामों से नहीं होता जो उसने किए। एक इंसान महान ज़्यादा उन कामों से होता है, जो वो कर सकता था पर उसने नहीं किए। पर चूँकि उसने नहीं किए, तो हमें दिखाई भी नहीं दिए। जब दिखाई भी नहीं दिया, तो इतनी हमारी बुद्धि ही नहीं होती कि हम देख पाएँ कि वो व्यक्ति क्या-क्या कर सकता था, पर कौन-कौन सी राहें उसने ठुकरा दीं।
यहाँ आपके सामने जो संत शिरोमणि बात रख रहे हैं, वो बात आख़िरी तल की है। कम से कम तीन तलों को ठुकरा करके उन्होंने ये बात आपके सामने रखी है। पर जो तल ठुकराए गए हैं, मैं फिर कह रहा हूँ, आपको दिखाई देंगे क्या? क्या उनके लिए बहुत आसान नहीं होता कि अगर वो चन्द्रमा का प्रतीक ले ही रहे हैं, तो जैसे इतने प्रतीक भरे पड़े हैं, आप ग्रीक मिथ में चले जाइए, आप पुराणों में चले जाइए, वो उनकी बात कर सकते थे न? वो कवियों, शायरों के पास जा सकते थे, लेखकों के पास जा सकते थे। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया और न उन्होंने यही कह दिया कि चाँद माने क्या, बस ऐसे ही, प्रकृति ही तो है।
उन्होंने चाँद के साथ जो संबंध बनाया है, उन्होंने चाँद में जो देखा है, वो बात इतनी सरल है और इतने आसान तरीक़े से उन्होंने समझा दिया है कि हम चूक जाते हैं महानता को पहचानने से। वो ये नहीं कह रहे कि मैं चाँद को देख रहा हूँ, मनुष्यता ने हमेशा चाँद को देखा है।
जो मिथक लिख रहा है, वो भी क्या कर रहा है नीचे से बैठकर के, वो चाँद को देख रहा है और कल्पना कर रहा है, “अच्छा वो चाँद है, ज़रूर सूरज का भाई है, बृहस्पति का बेटा है, और एक बार चाँद और सूरज में लड़ाई हुई। पृथ्वी दोनों की बहन है। जब चाँद और सूरज में बहुत लड़ाई हो गई, तो बड़े भाई सूरज के पास जाकर के पृथ्वी ने कहा, अरे छोटे भैया, चाँद को छोड़ दो। सूरज ने कहा, नहीं, मैं तो नहीं छोड़ूंगा, मैं तो इसे मार डालूंगा। तो पृथ्वी बहीना गिड़गिड़ाने लग गई कि, नहीं, छोड़ दो, छोड़ दो। तो सूरज ने कहा, अच्छा, तू इतना ही बोलती है, छोड़ ही देता हूँ, लेकिन ये अपना पूरा रूप महीने में बस दो बार दिखा पाएगा, बाक़ी दिनों में इसका रूप कटा-कटा सा रहेगा, क्योंकि इसने बड़े भाई को क्रोधित करा है।”
बहुत आसान होता न, मैं यहाँ बैठ के ऐसे चाँद को देख रहा हूँ, मैंने लिख दिया। और जो मैं लिख देता, न जाने कितनी पीढ़ियाँ और आने वाले कितने मूर्ख इन बातों पर विश्वास करते भी रह जाते। किसी ने यूँ ही बैठ के खुमारी में कुछ लिख दिया और उस पर आज तक विश्वास चल ही रहा है, या मैं कविता लिख देता। बताओ भाई, चाँद पर दो-चार कविताएँ, क्यों नहीं? जब कोई लड़की गोरी-गोरी होती है और उसका गोल-गोल मुँह होता है, तो उसको बोलते ही हैं ‘मून फेस्ड’। करो शायरी जितनी करनी है, चाँद तो है ही नहीं, “वो तो वहाँ दूर बैठी है और शीतल चाँदनी उससे झर रही है। इतनी शीतलता तो मात्र मुझे मेरी प्रेमिका के ही सान्निध्य में मिलती है।”
ये भी कर सकता था। यहाँ भी क्या किया गया, नीचे बैठकर उसको देखा गया।
उसको मैंने क्या बनाया—विषय। क्योंकि अहंकार के लिए सब कुछ क्या होता है? विषय, क्योंकि उसे अपनी स्वार्थ की पूर्ति करनी है। विज्ञान ने भी यही किया। नीचे बैठकर पहले टेलिस्कोप से देखा, “द स्पॉट्स ऑफ़ द मून।” फिर कहा, “अच्छा, यहाँ क्या-क्या हो सकता है, क्या नहीं हो सकता, यहीं से बैठकर के जुगाड़ लगाया।” फिर कहा, “नहीं, प्रयोग करने के लिए और प्रमाण चाहिए, तो सीधे फिर यहाँ से अपना जो खोजी उपकरण है, वो भेजा और वो चाँद से मिट्टी-विट्टी लेकर आ रहा है, वहाँ पिक अप चल रहा है।
लेकिन यहाँ भी जो दृष्टि है, वो स्वार्थ की तो भरी हुई है, ठीक वैसे जैसे जो स्वार्थ में भर के अपनी प्रेमिका को देख रहा है, जो स्वार्थ में बैठ के उसको चंद्रदेव बना रहा है, और फिर चंद्रदेव से कह रहा है, मुझे वरदान दे दो। वरदान में क्या चाहिए? खूब रुपया-पैसा चाहिए, सब स्वार्थ की बातें।
संत कबीर यहाँ से बैठ के चाँद को नहीं देख रहे। वो कह रहे हैं, चाँद वहाँ से बैठकर मुझे देख रहा है। और कैसे देख रहा है? साक्षी की तरह देख रहा है, “चंद चढ़ा कुल आलम देखे।” वो ये नहीं कह रहे हैं कि वो मेरे काम की चीज़ है। ये काम वाली बात वो बहुत पीछे छोड़ आए हैं, वो चाँद को भी देख रहे हैं, तो उनको एक साक्षी दिखाई दे रहा है और वो जो साक्षी है, वो उनका विषय नहीं है। वो कह रहे हैं, “मैं देखूँ भरम दूर।”
कह रहे हैं, मैं चाँद जैसा हूँ, चाँद मेरा कुछ नहीं है। मम का रिश्ता नहीं है, मम का रिश्ता तो तभी होता है जब अहम् का रिश्ता होता है। मिथ वाले ने भी क्या कहा, चाँद मेरा कुछ है। क्या है? मेरा देवता है। भावना वाले ने भी क्या कहा, चाँद क्या है मेरा? महबूब है, महबूबा है। और विज्ञान वाले ने क्या कहा, चाँद क्या है? मेरी खोज का विषय है।
और संत क्या कह रहे? मेरा विषय वो है ही नहीं। विषय बनाना तो हिंसा होती है, किसी को भी मैं क्यों विषय बनाऊँ अपना। विषय बनाना माने जैसे शिकार बनाना, विषय बनाना माने जैसे निशाना लगाना। मुझे बनाना ही नहीं है। वो चाँद को देख के कह रहे हैं, वो वहाँ बैठा हुआ है और वो सारा आलम देख रहा है। आलम माने नजारा, दृश्य। कह रहे हैं, वो वहाँ पर किसी की महबूबा वग़ैरह कुछ नहीं है, वो साक्षीत्व का बिंदु भर है एक। कह रहे, उसको देखकर तो मुझे यही स्मरण आता है कि जैसे वो वहाँ पर बैठकर के सबका निष्पक्ष दृष्टा हो गया है, वैसे ही गुरु-कृपा से मैं भी अब समस्त जीवन का दृष्टा हो गया हूँ, “मैं देखूँ भरम दूर।”
जैसे वो वहाँ बैठ के बस देख रहा है, कुछ लेना-देना है? तुम्हारी पृथ्वी पर क्या चल रहा है, इससे चाँद को क्या लेना-देना? तुम्हारी लॉटरी लग जाए, तुम्हें करोड़ों लग जाएँ, तुम्हारी गाड़ी चोरी हो जाए, कुछ हो जाए। तुम्हारी भैंस भाग जाए तो उससे पूर्णिमा पर क्या असर पड़ेगा, अमावस पर क्या असर पड़ेगा? कुछ नहीं, वो अपना काम कर रहा है चाँद वहाँ।
समझ में आ रही है बात?
निष्पक्ष, निर्लिप्त, निष्पृह दृष्टा— “चंद चढ़ा कुल आलम देखे।” कुल आलम मानें पूरा दृश्य, संपूर्ण दृश्य, आधी बात नहीं। अहंकार हमेशा आधी बात देखता है, जितनी उसके मतलब की होती है, देखता है, बाक़ी की उपेक्षा कर देता है। चाँद वहाँ बैठकर के सब कुछ देख रहा है, सब कुछ देख रहा है, लेना-देना कुछ नहीं, लेना-न-देना मगन रहना। और फिर ये नहीं कह रहे हैं कि मुझे चाँद से कुछ चाहिए, कह रहे हैं, मैं चाँद हूँ। चाँद कोई प्रेमिका वग़ैरह नहीं है मेरी, मैं ही चाँद हूँ।
ऐसा नहीं कि कवियों ने चाँद को हमेशा बड़ी तारीफ़ से ही कहा है। एक बड़ा अच्छा कविता-संग्रह है, जिसका नाम है “चाँद का मुँह टेढ़ा है।” कल्पना की बात है, कुछ भी कल्पना कर लो। कोई कहता है, “अरे, जब मेरा चाँद दाग-धब्बे लेकर के चलता है,” विद्वानों की बातें तो किसी से कहा, “अरे, तुम्हें इतना साफ़ होने का हक़ किसने दिया।” और विद्वानों के पीछे कई बार मूर्ख भी आ जाते हैं, वो भी ऐसी कुछ बातें बोल देते हैं कि, “चाँद से चाँदनी नहीं लो, धब्बे नहीं।” सबकी अपनी-अपनी बात, अपनी-अपनी कल्पना है, जिसने जैसे चाहा वैसे बोल दिया। कह रहे हैं, मुझे कुछ नहीं बोलना उसके बारे में।
ये अहंकार का, चेतना का सबसे ऊँचा तल होता है — मैं साक्षी हो गया हूँ। मेरे पास ऐसी कोई अपूर्णता नहीं है कि जिसके लिए मैं राहु, केतु, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनि, सबका इस्तेमाल कर डालूँ। आप करते हो कि नहीं करते हो? आपकी जितनी कामनाएँ हैं, उनके सबके लिए आपने किसी को छोड़ा? तो गनीमत की बात है कि सौरमंडल में नौ ही ग्रह हैं, नहीं तो बाक़ी अगर 50–60 होते, आप उनका भी इस्तेमाल कर डालते।
“शनि की ये दशा चल रही है, मंगल में ये बैठ गया है, बुध में वो हो गया है, इसका ये हो गया है, सूर्य कुपित है, फलाने का ऐसा है” ये सब स्वार्थ का खेल है, आपको दिख नहीं रहा है। ये सारी विद्याएँ कोई निष्कामता की हैं, या ये सारी बातें बस कामना पूरी करने के लिए की जाती हैं?
“महाराज महाराज, चोरी के धंधे में बड़ा घाटा चल रहा है। पेट्रोल में मिट्टी का तेल मिला रहे थे, पुलिस की रेड पड़ गई, पकड़े गए। महाराज महाराज, ग्रह दशा कब ठीक होगी?” अब वो अपना बैठकर के बता रहे हैं, “ऐसे कर दो, वैसे कर दो, चाँद में ये लगा दो, फलाने को ये कर दो। तुम्हारे घर में शौचालय कहाँ है? तुम्हारे घर में शौचालय पूरब की तरफ़ है? नहीं। तुम अपने घर में हैंगिंग टॉयलेट लगवाओ, आसमान से वर्षा होनी चाहिए।”
ये जो भी चल रहा है, किस लिए चल रहा है? कामना पूर्ति के लिए चल रहा है न। चाँद से ऋषि कामना पूर्ति का रिश्ता नहीं रखेंगे, और कामना और कहानी और कल्पना, ये सब एक साथ चलते हैं। जहाँ भी कहीं पर कहानियाँ सुनना, कल्पनाएँ सुनना, जान लेना कि व्यक्ति का बड़ा भारी स्वार्थ है, नहीं तो ये इतनी कहानी कहाँ से ले आ जाएगा? कहानियाँ आसमान से नहीं टपकतीं, कहानियाँ स्वार्थ के गंदे कीचड़ से पैदा होती हैं, और फिर हम उन कहानियों को पवित्र, पावन मानकर आगे बढ़ाते जाते हैं। कह देते हैं, “कहानियाँ थोड़ी हैं, परंपरा है,” दुनिया भर में हुआ है। और यहाँ है आपके सामने एक वास्तविक ऋषि, संत शिरोमणि, वो कोई कहानी नहीं कह रहे, वो कह रहे हैं — बस साक्षी। कुछ लेना-देना नहीं है।
साक्षी होना कोई किरदार नहीं है, साक्षी होना ऐसा नहीं है कि जैसे वहां चाँद बैठा हुआ है कैमरा लेकर के और पृथ्वी की रिकॉर्डिंग कर रहा है, वो नहीं है, वो काम सेटेलाइट का होता है। आप जब सेटेलाइट छोड़ते हो, तो वहाँ से कैमरे से पृथ्वी को देख रहा होता है। चाँद पर कोई कैमरा नहीं लगा हुआ है। निष्पक्ष दृष्टा ऐसा, जो देख तो रहा है पर देख नहीं भी रहा है। निस्वार्थ देखना, ऐसा देखना जिसमें कुछ मिल नहीं सकता, कुछ खो नहीं सकता।
जो स्वार्थ में भरकर देखे, वो आर्टिफिशियल सेटेलाइट कहलाएगा। अंग्रेजी में हम चाँद को भी सेटेलाइट ही कहते हैं पृथ्वी का, पर नेचुरल सेटेलाइट। समझ में आ रही है बात ये?
"चंद चढ़ा कुल आलम देखे।"
सोचो, कितने आगे की बात है कि आप चाँद को कहो और ये ना कहो कि "मुझे चाँद को खाना है, मुझे चाँद को पाना है, पकाना है" यही तो करते हो। आप कहो, मैं चाँद हूँ। मुझे वैसा ही हो जाना है कि जो पृथ्वी से उठा हुआ है और बस पृथ्वी को चुपचाप देखता है ऊपर से, ये होती है खास बात। ये है उच्चतम तल, किसी विषय से रिश्ता बनाने का — साक्षी हो जाओ। साक्षी हो जाओ, विषय के भी और विषयता के भी।
वास्तव में साक्षी हो जाना और स्वयं को विषय से अभिन्न जान लेना, बिल्कुल एक बात है। क्योंकि वो जो सामने वाला है, वो तुम्हारे लिए विषय रहता ही तभी तक है, जब तक तुम अपने आप को उससे अलग समझ रहे हो। जब समझ रहे हो कि उसमें कुछ खास है, जो उसको हासिल करने पर मुझे मिल जाएगा, वो मुझसे अलग है, उसमें कुछ खास है, तभी तक तो उससे कामना का रिश्ता रहता है न। जब तुमने देख लिया कि तुम और वो विषय एक ही चीज है, तो उससे कामना का रिश्ता मिट जाता है — यही साक्षीत्व है।
साक्षी तो दो तरह से समझा जा सकता है, एक तो ये कि मैं विषय और विषयता, दृश्य-दृष्टा, दोनों को एक साथ देखने लग गया, ऐसे भी समझ लो तो उपाय बढ़िया है।
और दूसरा तरीक़ा ये है कि विषय और विषयता का अंतर ही मिटा दिया, दिख गया दोनों एक हैं। वो भी क्या है? तीन गुण। मैं भी क्या हूँ? तीन गुण। उसमें ऐसा कुछ नहीं है जो मेरी प्यास मिटा देगा। जब उसमें ऐसा कुछ नहीं है तो मैं उसकी कामना क्यों करूँ?
ये मेरे पास इस प्याले में चाय रखी हुई है और ये मुझे पसंद नहीं आ रही, ठीक है मान लो। मैं इसको देख रहा हूँ और खूब लार बहा रहा हूँ, “काश ये मिल जाए, काश ये मिल जाए, आहा! हा! देखो कैसा बढ़िया गोल-गोल आकार है, बिल्कुल महबूबा है। अब मैं तो ऐसा हूँ, ये देखो कोई रंग नहीं, कोई रोगन नहीं, बिल्कुल एकदम। और ये देखो तुम ये, क्या सुराही बनी बैठी है, पता नहीं क्या होगी इसके भीतर खास चीज़, एक बार ज़िंदगी में आ गई, तो चार चाँद लग जाएँगे।” एक नहीं कितने चाँद? चार चाँद! अब देखो, "चार चाँद" ये होती है कवियों की कल्पनाएँ। “चार चाँद लग जाएंगे ज़िंदगी में एक बारी ये आ गई तो।”
“और मैं ये हूँ (चाय के कप की ओर इंगित करते हुए) और मुझ में जो भरा हुआ है, वो मुझे असंतोष से भर रहा है। मुझ में जो भरा हुआ है, उसमें ठंडक और बेस्वादगी के अलावा कुछ नहीं है। मैं तो ये हूँ, मुझे अपना ही स्वाद पसंद नहीं पर मैं इसको देख रहा हूँ (चाय की केटल की ओर इंगित करते हुए) तो, आहा! ज़िंदगी में सुराही आ गई है। और ये सिर पर देखो, इसने क्या बांध रखा है, आहा! हा! क्या बालों का खास इंतजाम किया है। ये देखो, ये मेरे पास क्या है? कुछ नहीं टकला, कुछ भी नहीं। और यहाँ क्या है? ये देखो तुम। और एकदम इसका ऐसा सर्पाकार सा शरीर है, लहराता हुआ सा।”
ये बाहर-बाहर की बात है। मुझे पता चल जाएगा कि ये जो चाय इसमें (केटल) भरी हुई है, वही चाय तो इसमें (कप) भरी हुई है। तो अब मैं इसके पीछे जाऊँगा? बोलो, बोलो। कुछ समझ में आया है तुझे (श्रोता की ओर देखते हुए)। जो इसमें (कप) भरा है न जिसको बोलते हो "आ थू!" वही इसमें (केटल) भरा है, पर तुम इसके शरीर को देख के सोचते हो कि इसमें कुछ खास भरा है। नहीं, जो तुम में भरा है, वो इसमें भरा है, हर तल, स्थूल-सूक्ष्म सब। तो इसको कहते हैं, दृष्टा और दृश्य का अंतर मिट जाना। दृश्य-दृष्टा को दिख गया कि जो मैं हूँ, वही तो ये है तो इसको हासिल करके क्या मिलेगा? ले और मिल गया, यही जो तुम्हारे पास पहले से था वही और मिल गया। पियो अब, मरो।
ख़ुद को पहले नहीं झेल पा रहे थे, और कुछ ऐसा ज़िंदगी में ले आए जिसमें और ज़्यादा वो चीज़ है, जिसको तुम पहले ही नहीं झेल पा रहे थे। अब मरोगे और क्या करोगे। तो दिख गया कि दृश्य और दृष्टा, दोनों एक चीज़ हैं। जब दोनों एक हो गए, तो ये भी मुक्ति है। ये भी प्रकृति, मैं भी प्रकृति, एक अर्थ में ये भी पूरा है, मैं भी पूरा हूँ। एक अर्थ में जो इधर है, वही उधर है। इन दोनों के संगम से, गठजोड़ से कुछ अतिरिक्त हासिल नहीं होना है। तो एक ये तरीक़ा है।
और एक तरीक़ा क्या है, कि ये भाई साहब (चाय के कप की ओर इंगित करते हुए) इनको (चाय की केटल की ओर इंगित करते हुए) टकटकी बाँध के घूरते रहते थे, और मैं समझता था कि मैं ये हूँ (कप)। मैं तो ये था (कप), और मैं इनको (केटल) क्या करता था? टकटकी बाँध के घूरता था और शायरी करता था।
तो मैंने कहा, मैं ये नहीं हूँ, मैं ये हूँ, मैं चाँद हूँ। और चाँद अब क्या कर रहा है, दोनों को देख रहा है — इसको भी मुक्ति कहते हैं। एक तरीक़े से ऐसे कह सकते हो, मैं ये (चाँद) हो गया, तो फिर इसको क्या बोल देते हैं — आत्मस्थ हो जाना। ये तुर्य है, ये चौथा हो गया। नीचे तीन कार्यक्रम चल रहे हैं, ये चौथा हो गया। तीन कार्यक्रम सामान्य चेतना के, ये चौथा हो गया। अभी ऊपर से इन दोनों का खेल देख रहा है, इनके लफड़ों से कोई लेना-देना नहीं, मुक्त हो गया। "चंद चढ़ा कुल आलम देखे"— मैं मुक्त हो गया, नीचे तुम्हें जो करना है, करते रहो, मैं मुक्त हो गया।
मुक्त दूसरों से नहीं हो गया, मुक्त दूसरों के साथ-साथ स्वयं से भी हो गया। मैं ‘मैं’ हूँ, ये तुम हो, मैं ‘मैं’ और तुम दोनों से मुक्त हो गया। ये मैं है (कप), ये तुम है (केटल) — मैं ‘मैं’ और तुम, दोनों से मुक्त हो गया।
समझ में आ रही है बात?
"चंद चढ़ा कुल आलम देखे।" बिल्कुल वही बात है कि इसकी (कप) पहचान ही मिट गई, क्योंकि इसकी पहचान सदा किसके संदर्भ में थी? इसके (केटल)। ये हमेशा यही बोलता था न, इससे पूछा, "तू कौन है?" तो ये बोलता था, “मैं वो, जिसको इसकी अभिलाषा है; मैं वो, जो इसका मित्र है, सेवक है, स्वामी है, पति है, कोई है, पिता है, माता है, कुछ है।” तो इसकी पहचान हमेशा इससे भिन्नता रख के थी न। कामना रख के थी। मैं कौन हूँ? मैं इसका आशिक़ हूँ। अगर दिख गया कि ये और ये एक है, तो फिर इन दोनों में जो भिन्नता है, वो समाप्त हो गई। जब भिन्नता समाप्त हो गई, तो यही समाप्त हो गया।
विषयता की विषय से जो भिन्नता है, काल्पनिक भिन्नता है, वो भिन्नता ही विषयता को जिंदा रखती है। जब दिख गया कि मामले में कोई भिन्नता है नहीं, तो इन दोनों की भिन्नता समाप्त हो गई, तो यही समाप्त हो गया।
इसको समाप्त करने का एक तरीक़ा ये हुआ, हमने कहा कि ये दोनों एक हो गए। और दूसरा ये हुआ कि, मैं अब ये हूँ ही नहीं, मैं अब ये हूँ — "चंद चढ़ा कुल आलम देखे"— मैं ऊपर से देख रहा हूँ इन दोनों का। इन दोनों को अपना खेल चलाने दो। समझ में आ रही है बात?
ये तो सिर्फ़ गाने की बात नहीं है कि रस-विभोर हो गए और अपना लगे गाने, "चंद चढ़ा कुल आलम…"। ये ग़ज़लें नहीं हैं। वैसे कबीर साहब को इतिहास की पहली ग़ज़ल लिखने का भी श्रेय दिया जाता है। फिर पूछे, दुनिया में पहली ग़ज़ल किसने लिखी थी? वो भी उन्होंने ही लिखी थी। कौन-सी वो ग़ज़ल है, आप खोज के लाएँगे, गा के सुनाएँगे। उसकी मैं बहुत बार चर्चा कर चुका हूँ, शायद उस पर बोल भी चुका हूँ।
तो ये बात बस ग़ज़ल जैसी नहीं है कि आप लोग गाना शुरू कर दो। समझो कि ऊपर से अलग होकर के देखने का अर्थ क्या है — "चंद चढ़ा कुल आलम देखे"। और ये भी समझो कि कितनी ज़बरदस्त चेतना चाहिए चाँद को वैसे देखने के लिए, जैसे कबीर साहब ने देख लिया।
चाँद को तो सबने देखा है, हम कह रहे हैं आदिमानव से लेकर आज तक सब चाँद को घूर ही रहे हैं। पर ऐसे किसने देखा है कि चाँद कौन है? चाँद साक्षी है, चाँद आत्मा है।
किसने देखा?
तो बहुत लोगों को मैंने देखा है, वो जब बोलना होगा तो ऐसे कह देंगे कि जब भी किसी आध्यात्मिक व्यक्तित्व की बात आएगी, तो कभी उनके नाम के साथ "श्री" लगाएँगे, कभी "जी" लगाएँगे, कभी कुछ लगाएँगे। लेकिन जब संत कबीर की बात आती है, तो कह देते हैं — कबीर। क्यों कह देते हैं? क्योंकि सीधे थे, सरल थे, अपनी श्रेष्ठता स्वयं ही नहीं बघारते थे।
और जिस तल से वो बात कर रहे हैं, ये कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है, उस तल से ऊँचे से ऊँचे आध्यात्मिक व्यक्तित्व ने बात नहीं करी है। जिनको आप बहुत ऊँचा मानते हो, उनसे भी दो सीढ़ी ऊपर बैठे हुए हैं कबीर साहब। और क्योंकि वो इतना ऊपर बैठे हुए हैं, इसीलिए हम उनकी महानता को पहचान ही नहीं पाते।
कोई थोड़ा-बहुत महान हो, तो हमारी पकड़ में आ जाता है, लपेट में आ जाता है, सीमा में आ जाता है, हमारी रेंज में आ जाता है। पर जब कोई उतना ऊपर चढ़ जाता है न, तो हमारी समझ में नहीं आता, फिर वो हमारे लिए "कबीरा" हो जाता है।
वैसे हिंदी फिल्मों में, "ओ कबीरा मान जा, वो फकीरा मान जा"। आ रही है बात?
अब जो पिछली वाली बात थी, उससे थोड़ा-सा जुड़ते हैं, तो एक और खूबसूरत पक्ष सामने आएगा — "वारी जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर।" और "चंद चढ़ा कुल आलम देखे, मैं देखूँ भरम दूर।।"
वारी जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर। चंद चढ़ा कुल आलम देखे, मैं देखूँ भरम दूर।।
गुरु का यही काम है, आपको चाँद बना दे।
आप चाँद बन जाओगे तो अच्छी बात है, शायरों के लिए आप में बड़ी खूबसूरती आ जाएगी, सब ठीक है। पर चाँद बनने का अर्थ होता है, वो जिसके भ्रम दूर हो गए हैं। और कोई उद्देश्य नहीं होता आध्यात्मिक प्रक्रिया का, कुछ भी नहीं।
रिद्धि-सिद्धि, ये सब कुछ नहीं, लेना-देना नहीं, ज्ञान-भक्ति कुछ नहीं, तंत्र-मंत्र कुछ नहीं। एक ही उद्देश्य होता है — सब भ्रम दूर हो जाएँ। सब भ्रम दूर हो जाते हैं, जब सब भ्रमों के केंद्र में जो भ्रम बैठा होता है, द मदर इल्लूज़न, वो दूर हो जाता है। क्या? अहम् "मैं हूँ।" यही गुरु का काम होता है, और यही ग्रंथ का काम होता है। इसीलिए भगवद्गीता श्रेष्ठ है, और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो गुरु, जो ग्रंथ "मैं" के अतिरिक्त कोई भी और बात कर रहे हों, उनको जान लेना कि वो कुछ और ही है। उन्हें ग्रंथ मत कह देना, उन्हें गुरु मत मान लेना।
चार आपको आज तल बताए, पहला, कल्पना का। कोई किताब मिल जाए जो काल्पनिक कहानियों से भरी पड़ी है, वही "चन्दा मामा,” “सूरज का सातवाँ घोड़ा," और जान लेना अच्छी बात है, बढ़िया बात है, हम पढ़ लेंगे, कुछ सीखने के लिए ठीक होगी। पर इसको हम ग्रंथ नहीं बोल सकते, इसको शास्त्र नहीं बोल सकते। कहानियों की किताबें अच्छी बात है, कहानियों की किताबें कोई बुरी थोड़ी होती हैं। फिर आती है शायरी की बातें, अच्छी बात है, मन बहलाना है तो जाकर के पढ़ लो शायरी। “मैंने पूछा चाँद से” पर उसको भी श्रेष्ठतम का स्थान मत दे देना।
उसके बाद आता है विज्ञान, विज्ञान सबसे ऊँचा है, सबसे ऊँचा है, बहुत उसको इज़्ज़त देना। लेकिन विज्ञान से भी ज़्यादा इज़्ज़त उसके लिए रखना जो तुम्हें "मैं" की असलियत तक ले जाए। उसको ही ग्रंथ कहते हैं, उसको ही शास्त्र कहते हैं, उसको ही गुरु कहते हैं, जो सारे भ्रम दूर कर दे। और हमने कहा सब भ्रमों के केंद्र में क्या बैठा होता है? अहम्-भ्रम। अहम्-भ्रम वही सबसे बड़ा भ्रम है, कि “मैं हूँ।” द ईगो इज़ द फर्स्ट सुपरस्टिशन।
अहंकार क्या है? एक कयास है, एक तुक्का है, एक अनुमान है कि प्रकृति में गति हो रही है, तो ज़रूर गति को करने वाला भी कोई होगा। ये पूरा मुझे संसार दिखाई पड़ता है, तो ज़रूर इस संसार को रचने वाला भी कोई होगा। मेरे मुँह से शब्द निकल रहे हैं, तो ज़रूर भीतर कोई इन शब्दों को बोलने वाला भी होगा। अहंकार ये अनुमान है, जो कर्म को देखता है और कर्ता को खड़ा कर देता है।
आज मैंने एक जगह पर, एक दीवार पर, एक नज़ारा देखा। उन्होंने सजावट के लिए बना रखा था दीवार पर एक शेर, शेर का चेहरा उभार के साथ। जैसे दीवार से एक उभार हो, तो वहाँ पर चेहरा बना रखा था शेर का और उसके मुँह से पानी गिर रहा था। मैंने कहा, ये अहंकार है। पानी तो गिर ही रहा होगा। पानी गिर रहा है, पर उसके इर्द-गिर्द एक चेहरा खड़ा कर देना, यही अहंकार है। जैसे कि उस चेहरे की वजह से पानी गिर रहा है, जबकि पानी तो गिर ही रहा है। वो चेहरा न हो, तो भी पानी गिर रहा है। पर अहंकार कहता है, पानी अगर गिर रहा है, तो मैंने गिराया होगा। और ये हम कर भी देते हैं।
आप पहाड़ों पर जाएँगे, तो वहाँ कई बार ऐसे ही पानी गिर रहा होता है, ऊपर से छोटे-छोटे झरने होते हैं। तो जहाँ से वो पानी थोड़ा-सा रिस रहा होता है, उसके आसपास एक चेहरा बना दिया जाता है, और उसका ऐसा मुँह खोल दिया जाता है, उसके भीतर से ऐसे लगता है पानी आ रहा है। जो ध्यान से न देखे, उसको ऐसा प्रतीत होता है, बल्कि ये जो हमारा सोया हुआ मन है, वो तुरंत ही पहली झलक में यही निष्कर्ष निकालता है कि जैसे किसी के मुँह से पानी आ रहा है। और वो वही दर्शाने के लिए बनाई भी जाती हैं ऐसी आकृतियाँ।
तो उसमें क्या होता है? उसमें चेहरा है, चेहरे के बाद पानी है। कॉज पहले या इफेक्ट बाद में है। जबकि बात असली दूसरी है, पानी पहले है, चेहरा तो बाद में बना दिया गया। यही अहंकार है, कि कर्म हो रहा है, तो करने वाला कोई होगा; पानी गिर रहा है, तो ज़रूर किसी के मुँह से गिर रहा होगा या किसी के किए से गिर रहा होगा। जबकि किसी के किए से नहीं गिर रहा, वो तो प्राकृतिक झरना है। बात प्राकृतिक है, लेकिन कोई खड़ा हो जाता है झूठ-मूठ उसका श्रेय लेने के लिए—उसको ही अहंकार बोलते हैं।
ये चेतना की एक नीचे वाली स्थिति है, कहानी की स्थिति है। इसीलिए आप ये भी समझ रहे होंगे कि मिथकों, कहानियों और कथाओं में अहंकार की इतनी रुचि क्यों रहती है, क्योंकि वो स्वयं एक कहानी है।
गुरु का काम आपको कहानियों में और लिप्त कर देना नहीं है। गुरु का काम आपको भावनाओं में बहाना भी नहीं है, कि गुरुजी के पास गए, और बार-बार भाव शब्द की बहुत बात कर रहे हैं। जो व्यक्ति भाव शब्द की बहुत बात करता हो, वो किसी हालत में गुरु होने योग्य नहीं है। ये भाव, वो भाव लोगों ने साक्षीत्व को भी भाव बना लिया। न जाने कितनी बार आकर मुझसे कहा, "साक्षी-भाव में कैसे जाएँ, बताइए।" साक्षी-भाव! जो व्यक्ति साक्षी-भाव जैसा शब्द इस्तेमाल कर सकता है, उसको कभी गुरु मत मान लेना।
भावों का साक्षी हुआ जाता है, साक्षी होना अपने आप में थोड़ी कोई भाव है! भाव हो, विचार हो, इन सबका साक्षी हो जाते हैं, "चंद चढ़ा कुल आलम देखे।" साक्षी होना कोई भावना थोड़ी है।
तो जो कहानियों में धकेल रहा हो, वो ग्रंथ शास्त्र नहीं। जो कहानियों में धकेल रहा हो, वो व्यक्ति गुरु नहीं। जो भावनाओं में धकेल रहा हो, वहाँ भी न ग्रंथ है, न गुरु है। और जहाँ बात ऐसे की जा रही हो कि, "ये जो भौतिक जगत है, ये बिल्कुल असली है, और तुम्हारा काम है इस भौतिक जगत को देखना ताकि तुम्हारी कामना-पूर्ति हो सके" ये विज्ञान का तरीक़ा है। ये बाक़ी दोनों तलों से तो ऊँचा है, पर ये भी आख़िरी नहीं। क्योंकि यहाँ भी तुम जगत को देख रहे हो, किस दृष्टि से? कामना की दृष्टि से। और जो कामना पालता रहेगा, वो दुखी रहा आएगा।
भूलना नहीं, बुद्ध के जो दूसरे और तीसरे आर्यसत्य थे, भूलना नहीं कि — कामना दुखों का मूल है, और मात्र कामना को ही हटाकर, कामना के निरोध से ही दुखों से मुक्ति पाई जा सकती है, और फिर आगे उन्होंने अष्टांग मार्ग बताया हुआ है। जो कामना को पकड़े हुए है, वो दुख को पकड़े हुए है।
तो वास्तविक गुरु कौन है? "वारी जाऊँ मैं सतगुरु के" वास्तविक गुरु कौन है? जो भ्रम दूर करता है। जो आपको भावनाओं में बहा दे, कह रहे, “गुरुजी के पास बैठते हैं, बस ऐसी कहानी सुनाते हैं, आँखों से टप-टप आँसू बहने लग जाते हैं” वो कुछ नहीं है। कहानीकार अच्छे होंगे, हम उन्हें कहानीकार होने का श्रेय दे सकते हैं, पर गुरु मत कह देना। जो आप में भावनाओं का ही संचार कर दे, काहे का गुरु। गुरु होने का अर्थ ये भी नहीं है कि जो आपकी भावनाओं को सुखा दे, लेकिन भावना का संचार करना गुरु का काम नहीं है। गुरु का काम है, कि आप भावनाओं को भी जान जाओ; भावनाओं को लेकर आप में जो भ्रम है, वो दूर हो जाए, "किया मेरा भ्रम सब दूर।"
हम में भावनाओं को लेकर भी तो बहुत भ्रम है, हम कहाँ जानते हैं भावना क्या चीज होती है। जो आपके भीतर भावना को लेकर जितनी गलतफ़हमी है, उसको हटा दे, भावना को नहीं मार दे, भावना रहे हमें क्या लेना-देना। "चंद चढ़ा, कुल आलम देखे" वो भावनाओं का आलम भी देख रहा है, भावनाओं को मिटा नहीं रहा है, पर भावनाओं को उच्चतम स्थान भी नहीं दे रहा है। न भावना को मिटा देना है, न भावना को इतना उच्चतम स्थान दे देना है, कहना कि "अरे, बस भाव होना चाहिए। भाव होता है तो भगवान मिल जाते हैं। भगवान तो भाव से मिलते हैं न।”
एक से बढ़कर एक हैं कहते हैं, “भगवान भाव के भूखे हैं।” और थोड़ा तो उनसे आगे होंगे वो फिर जैसे कहा हमने, वो साक्षी-भाव वग़ैरह की बात करना शुरू कर देंगे। नहीं, ये सब कुछ नहीं, बेकार की बातें। और जो इनको छोड़ते हैं, वो फिर अपने आप को कह देते हैं, "साहब, हम तो वैज्ञानिक मार्ग के हैं। हम तो नास्तिक हैं। हम कल्पनाओं और भावनाओं में नहीं जीते, हम तथ्यों में जीते हैं। हम तो नास्तिक हैं, हमारा रास्ता विज्ञान का है।"
नहीं,
तुम ऊँचे हो, पर तुमसे ऊँचा भी अभी कुछ है। तुमसे ऊँचा है — शुद्धतम अध्यात्म। कल्पना और भावना से ऊँचा है विज्ञान, पर विज्ञान से भी ऊँचा है, अध्यात्म।
लेकिन मात्र अध्यात्म ही विज्ञान से ऊँचा है, जो प्रचलित धर्म है ये निश्चित रूप से विज्ञान से बहुत-बहुत नीचे है। क्योंकि प्रचलित धर्म तो बस कहानियों और भावनाओं का ही नाम है। और कहानियाँ और भावनाएँ, जिनसे लोकधर्म बनता है, ये विज्ञान से बहुत नीचे की बात है। इसीलिए जब भी विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आते हैं, लोकधर्म मुँह की खाता है। इसीलिए जो लोकधर्म वाले भी होते हैं, जाते हैं अपना ऑपरेशन कराने, किसी अच्छे अस्पताल में ही। मंदिर नहीं जाते, मस्जिद नहीं जाते। हाँ, इतना ज़रूर है कि अस्पतालों में भी वो एक प्रार्थनालय बनवा देते हैं।
जब भी विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आएँगे, लोकधर्म मुँह की खाएगा, क्योंकि लोकधर्म किससे बना है? कल्पना और भावना से। और कल्पना और भावना, तथ्य से नीचे की बातें होती हैं, विज्ञान तथ्यों पर चलता है।
लेकिन विज्ञान से भी ऊपर क्या है? अध्यात्म। क्योंकि विज्ञान, सब कुछ हटा देने के बाद भी कल्पना, भावना, इत्यादि कचरा हटा देने के बाद भी, एक द्वैत में तो विश्वास करता ही है न? द ऑब्जेक्ट एंड द सब्जेक्ट – "आई एम कंडक्टिंग एक्सपेरिमेंट्स ऑन द ऑब्जेक्ट।” ये द्वैत तो अभी विज्ञान पकड़ के रखता है। विज्ञान भी नहीं जानता कि साक्षी क्या है। विज्ञान भी पूरे तरीक़े से निष्काम होना नहीं जानता है, इसीलिए विज्ञान से ऊँचा है, अध्यात्म। लोकधर्म नहीं है विज्ञान से ऊँचा, अध्यात्म है विज्ञान से ऊँचा।
तो जब भी कभी लोकधर्म और विज्ञान के मध्य ठनेगी, तो मैं किसके पक्ष में खड़ा रहूँगा? विज्ञान के। पर कभी विज्ञान और अध्यात्म के मध्य ठनेगी, तो मैं कहूँगा विज्ञान में भी एक अंधविश्वास है, मैं तो अध्यात्म के साथ हूँ। विज्ञान में क्या अंधविश्वास है? “मैं” तो विज्ञान में हूँ ही न! “मैं हूँ” खोजने वाला, तो अहंकार तो विज्ञान में मौजूद है न? तो एक आख़िरी अंधविश्वास तो विज्ञान में भी मौजूद है।
तो अगर विज्ञान और अध्यात्म आमने-सामने आएँगे, तो उसमें श्रेष्ठ कौन है फिर? अध्यात्म। लेकिन अगर विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आते हैं, तो लोकधर्म को छोड़कर तत्काल विज्ञान की शरण में चले जाना।
समझ में आ रही है बातें?