प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मेरा प्रश्न है कि दुख बहुत ज़्यादा आता जा रहा है, जैसे-जैसे मैं सत्य के निकट आ रही हूँ, मुझे बहुत ज़्यादा उदासीनता, बहुत ज़्यादा आ रही है।
मतलब मैं बहुत ही स्पीड (गति) से चीज़ों को त्यागती जा रही हूँ, ये भी नहीं चाहिए, वो भी नहीं चाहिए, वो भी नहीं चाहिए और मैं उनको कभी पीछे मुड़कर याद भी नहीं करती। ऐसा नहीं है कि मैं उनको याद करती हूँ, मिस (याद) करती हूँ और कुछ जो काम कर रही हूँ, इस वक़्त उसका स्पीड भी मैं पकड़ रही हूँ, धीरे-धीरे उसकी गति बहुत अच्छी बढ़ती जाती है।
लेकिन एक समय ऐसा आता है कि जितना ज़्यादा मैं सत्य जानती जा रही हूँ, इस दिशा में कि ये तो जो मैं काम कर रही हूँ — जैसे कि मैं एनीमल राइट एक्टिविस्ट (पशु अधिकार कार्यकर्ता) हूँ। बहुत ज़्यादा दुख — कैसेज़ (मामलों) के बाद कैसेज़ देखने को मिलते हैं — वो दुख बहुत ज़्यादा बढ़ता जाता है मुझे और मेरी गति उस दुख को देखकर कभी-कभी ऐसा होता है कि मैं पाँच दिन-सात दिन एकदम फ्रीज़ (जड़वत्) हो जाती हूँ।
मतलब मुझे समझ में ही नहीं आता कि मैं क्या करूँ। फिर वापस छ:-सात दिन बाद आँसू पोंछती हूँ, वापस काम पर लग जाती हूँ, करने लग जाती हूँ, और स्पीड डबल (दुगनी गति) करने की कोशिश करती हूँ।
अब दुख ये हो रहा है कि मैं वो सात दिन भी क्यों रुकी हूँ, मैं किस बात के लिए इतना ज़्यादा दुख प्रकट कर रही हूँ, क्या मैं लोगों पर डिपेंड (निर्भर) हो रही हूँ किसी चीज़ के लिए या मैं शायद जो बाहर की चीज़ें हैं, उनको बदलने की कोशिश कर रही हूँ?




