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एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥

"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०

आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के अनुसार उन्हें युद्ध इसलिए नहीं करना है कि उन्हें कुल के धर्म की बड़ी चिंता है। कुल का धर्म बचाना है, कुलधर्म नष्ट हो गया तो पाप सारे कुल को दबा लेगा। तो सार्वजनिक हित में अर्जुन कह रहे हैं कि, ‘मुझे युद्ध नहीं करना है। नहीं, नहीं मेरे मोह इत्यादि की तो कोई बात ही नहीं है। मैं तो एक वीर, निरपेक्ष, निस्पृह क्षत्रिय योद्धा हूँ। मोह इत्यादि तो मुझे छू नहीं जाते। वो तो बात यहाँ कुलधर्म की है, मैं इसलिए युद्ध नहीं करना चाहता। बड़ी गंभीरता से, बड़ी निष्पक्षता से मैं आपके सामने एक संवेदनशील मुद्दा रख रहा हूँ, कृष्ण। भावुकता वगैरह की कोई बात नहीं है। ना मुझे कोई भाव है, ना मुझे कोई मोह है, मैं तो एक गंभीर वयस्क की भाँति कुल के लाभ की बात कर रहा हूँ।‘

जैसे हम सब गंभीर वयस्क होते हैं और बड़ी बुद्धिमत्तापूर्ण, बड़ी परिपक्व बातें किया करते हैं — ऐसा है वैसा है। बस इतनी-सी बात है कि हमारे ये सब परिपक्व और गंभीर बातों के पीछे, हमारी बचकानी, अधपकी वृत्ति छुपी होती है। थोड़ी देर पहले क्या कह रहे थे, सारे विचार कहाँ से आते हैं? वृत्ति से आते हैं। विचारों ने गंभीरता का चोला पहन रखा होता है। उनका व्यवहार ऐसा होता है, उनका व्यक्तित्व ऐसा होता है, उनका चेहरा ऐसा होता है कि लगता है कि कोई गहरी बात है, कोई पकी हुई बात है। जबकि उनके स्रोत में क्या होती है? कोई बालक वृत्ति। ‘मेरा सेब छिन गया’, ‘मुझे फलाने की शकल नहीं पसंद आ रही’, ‘मुझे डर लग रहा है मुझे अँधेरे में बंद कर देंगे’, ‘मुझे डर लग रहा है मुझे अकेला छोड़ देंगे’ — इस तरीके की, बालक जैसी या पशु जैसी वृत्तियाँ।

और इन वृत्तियों से उठते हैं, बड़े-बड़े गंभीर विचार। विचार जो सम्मान की माँग करते हैं। कहते हैं, ‘देखो’ हम गहरे हैं, हमें सम्मान दो ज़रा। हमारी बौद्धिकता को नमन करो ज़रा।‘ बुद्धि तो सेवक की भी सेवक होती है — आत्मा की दासी वृत्ति, और वृत्ति की दासी, बुद्धि। बुद्धि को क्यों तुम अपनी स्वामिनी बना रहे हो? अभी आगे और धुरंधर तर्क आने वाले हैं, सीटबेल्ट बाँध लें।

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥४१॥

"हे कृष्ण! कुल में अधर्म का प्रभाव होने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर संतान पैदा होती है।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४१

आचार्य: तो अर्जुन कह रहे हैं कि ‘देखिए असली बात ये है कि मुझे राज्य की स्त्रियों की बड़ी चिंता है, मैं इसलिए लड़ाई नहीं करना चाहता। बेचारी स्त्रियाँ दूषित हो जाएँगी। नहीं, लड़ाई तो मैं कर लूँ, आप बोलिए अभी, एक-एक बाण पर इनमें से एक-एक का नाम लिखा हुआ है। और मेरे एक बाण से ऊपर की, किसी की हस्ती नहीं इनकी। एक बाण में भीष्म, एक में कर्ण, एक में द्रोण, सब निपटा दूँगा अभी। वो तो मैं ज़रा गंभीर किस्म का आदमी हूँ, ऊँचे विचारों वाला चिंतक हूँ। दूरदर्शितापूर्ण, आगे की सोच रखता हूँ तो अभी-अभी मैंने आगे की सोची और मुझे दिखाई दिया कि बेचारी स्त्रियों का क्या होगा। तो इसीलिए मुझे लग रहा है, कृष्ण, कि हमें ये लड़ाई नहीं करनी चाहिए।‘

काश! कि हम इस समय देख पाते कृष्ण का चेहरा, जब अर्जुन उनको समझा रहे हैं कि वर्णसंकर पैदा हो जाएँगे। वर्णसंकर जानते हैं क्या होता है? कि माने जितने क्षत्रिय हैं वो तो यहाँ आ कर के खड़े हो गए हैं, और ये सब आपस में लड़ कर जाएँगे मर। तो क्षत्रियों की जो पत्नियाँ होंगी, या क्षत्रियों में जो स्त्रियाँ होंगी, वो सब अन्य वर्णों में विवाह कर लेंगी। तो वर्णसंकर पैदा होगा, और वर्णसंकर बड़ी गड़बड़ चीज़ होता है। क्या पहुँचा हुआ तर्क मारा है!

आप मुसकुरा रहे हैं, सोचिए कृष्ण क्या कर रहे होंगे। बड़ी मुश्किल से तो हँसी रोकी होगी अपनी। उस अतिगंभीर क्षण में भी, भीतर से अट्ठाहस लगभग फूट ही आया होगा कि, ‘वाह बेटा! मुझे ही चरा रहे हो। स्त्रियों की चिंता, कुल के हित की इतनी बात। वर्णों का तुम इतना ख़्याल करने लग गए। तुम्हारे पूरे जीवन में तो हमें वर्णवाद कहीं ज़्यादा दिखाई नहीं देता, अर्जुन। अचानक से तुम्हें क्षत्रियों की स्त्रियों की वर्ण रक्षा की इतनी सुध आ गयी। सब कुछ बोल रहे हो, न जाने कहाँ-कहाँ से तर्क गढ़ कर ला रहे हो। बस एक बात नहीं बोल पा रहे कि मोह ने मुझे पकड़ लिया है।‘

शरीर में बहता रक्त कह रहा है, ‘अपने ही जैसे रक्त को कैसे बहा दूँ?’ और रक्त ये ऐसा इसलिए नहीं कह रहा कि रक्त सहसा चैतन्य हो उठा है, रक्त ये ऐसा कह रहा है क्योंकि रक्त में दुनिया भर के पशु बैठे हुए हैं। ये वक्तव्य हर पशु का है, ‘अपने ही जैसे किसी का रक्त कैसे बहा दूँ?’ घोर-से-घोर हिंसक प्रजाति भी साधारणतया, हमने कहा, अपनों का शिकार नहीं करती। इसमें चेतना की कोई बात नहीं है, इसमें प्रकृति की बात है। प्रकृति चाहती है कि आपका वंश, आपका कुल, आपकी प्रजाति बनी रहे। ये काम हर पशु करता है, ये काम अभी अर्जुन भी कर रहे हैं। अर्जुन पशुवत हुए जा रहे हैं लेकिन पशुता अपने-आपको छुपाने के लिए बुद्धिमत्ता का स्वांग कर रही है।

पशुता हमेशा यही करती है। वास्तव में, जहाँ कहीं भी आपको बुद्धिमत्ता बहुत दिखाई दे रही हो तो सम्भावना यही है कि उसके पीछे पशुता बैठी होगी। बुद्धिमत्ता अपने गुरुगम्भीर लहज़े में कोई बड़ी महत्वपूर्ण बात कह रही होगी, पर कान हैं यदि आपके पास, और ध्यान है यदि आपके पास, तो आप सुनेंगे कि बुद्धिमत्ता की गंभीरता के पीछे कोई पशु हल्के-हल्के गुर्रा रहा होगा। ये जानवर है जो बुद्धि का इस्तेमाल करके अपने उद्देश्य पूरे कर रहा है। जिन्हें सुनना आता है, वो सुन लेते हैं। वो बुद्धि के वक्तव्यों में, पशु की गुर्राहट सुन लेते हैं।

अभी आगे और वर्णसंकर विवरण चलता ही रहता है।

सङ्करो नरकायैव कुलजानां कुलस्य च।

पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२॥

"तो वर्णसंकर, कुलनाशकारियों और कुल के नरक की प्राप्ति के लिए है, क्योंकि इन लोगों के श्राद्ध तर्पण आदि कार्यों के लुप्त होने से उनके पितृलोक पतित हो जाते हैं।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४२

आचार्य: मान्यता, सामाजिक मान्यता, आध्यात्मिक बिलकुल नहीं। इस तरह की बातें वेदांत में दूर-दूर तक नहीं पायी जातीं। वेदांत तो इस तरह की बातों को काटने के लिए है। ठीक वैसे, जैसे अर्जुन ने अभी ये बात कही और कृष्ण इस बात को काट देंगे। तो इन बातों को धर्म की केंद्रीय बात बिलकुल ना समझा जाए कि वर्णसंकर के सब पितरों का बड़ा पतन हो जाता है। ये बात एक सामाजिक मान्यता हो सकती है, ये बात एक अन्धविश्वास हो सकती है, पर इस बात का समर्थन वेदांत कहीं से नहीं करता।

‘कुलनाशकारियों के इन वर्णसंकर कारक दोषों से सनातन जातिधर्म और कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं।‘ तो अर्जुन को बड़ी चिंता है पितरों की अब और वो भी राज्य भर के पितरों की, वो जो मर चुके हैं सौ, दो-सौ, आठ-सौ साल पहले। अर्जुन कह रहे हैं, ‘देखो, उनकी खातिर नहीं लड़ूँगा मैं क्योंकि अगर वर्णसंकर पैदा हो गए तो वर्णसंकरों का श्राद्ध, तर्पण वगैरह तो चलता नहीं। जब श्राद्ध तर्पण नहीं होंगे तो वो पितर बेचारे पाताललोक में आग में ही जलते रह जाएँगे न, उनको तृप्ति कैसे मिलेगी?’

कितने ऊँचे विचार हैं! आम-आदमी तो सिर्फ़ जीवित लोगों की परवाह करता है, अर्जुन तो सैकड़ों साल पहले मरों की भी परवाह कर रहे हैं। ‘देखो, पितरों का क्या होगा?’ पहले बोले, ‘स्त्रियों का क्या होगा? वो बेचारी स्त्रियाँ, उनको क्षत्रिय नहीं मिलेंगे तो वो जा करके अन्य जातियों से, तथाकथित नीचे वाले वर्णों से, विवाह आदि करेंगी और मेल कर लेंगी।‘ तो स्त्रियों की चिंता हुई।

फिर स्त्रियों के बाद जो स्त्रियों से औलादें पैदा होंगी उनकी बड़ी चिंता हुई अर्जुन को कि ‘देखो, वर्णसंकर पैदा हो जाएगा न, वर्णसंकर जीवन भर कहेगा — वर्णसंकर वर्णसंकर’। जैसे कर्ण; कर्ण वर्णसंकर थे। सूत जो होते थे, वो एक प्रकार के वर्णसंकर ही थे। कर्ण को जीवन भर यही लगा रहा, ‘मैं सूतपुत्र हूँ, मैं सूतपुत्र हूँ’। तो जो वर्णसंकर पैदा होगा, बेचारे को बड़ी तकलीफ़ हो जाएगी। फिर बोले, ‘अरे! जो वर्णसंकर तो वर्णसंकर, पर जो वर्णसंकर के दादा-परदादा मरे थे, उन बेचारों का क्या होगा?’

कृष्ण कह रहे हैं कि ‘माया तो मेरी ही है पर मैं भी चमत्कृत हो जाता हूँ इसके रूप-रंग देख कर के। गजब! पितरों का क्या होगा!’ फिर कह रहे हैं, अर्जुन;

दोषैरेतैः कुलजानां वर्णसङ्करकारकैः।

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥४३॥

उत्सन्नकुलधार्माणां मनुष्याणां जनार्दन।

नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥

"अपने दुष्कर्मों से कुल परम्परा का विनाश करने वाले दुराचारियों के कारण समाज में अवांछित सन्तानों की वृद्धि होती है और विविध प्रकार की सामुदायिक और परिवार कल्याण की गतिविधियों का भी विनाश हो जाता है। हे जनार्दन! फिर जिन लोगों का कुलधर्म नष्ट हो गया है उन्हें अनिवार्य रूप से नर्क जाना पड़ता है।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४३-४४

आचार्य: “ये बात हमने सुनी है, तो इन सब लोगों को नर्क जाना पड़ेगा, ये अच्छी बात नहीं है। तो ये नर्क ना जाएँ, इसके लिए मैंने तय करा है कि मैं लड़ाई नहीं करूँगा। तो बात निश्चित रही अब, अब वापस चलें? खेल ख़त्म करते हैं। इनको बता देते हैं कि, ‘देखो भईया, लड़ाई-वड़ाई माफ़ करो। क्या कर रहे हो ये सब हथियार-वथियार ले कर इकट्ठे हो गए हो? नाचो, खेलो, कूदो, खाओ, घर जाओ’।“ अपनी ओर से तो अर्जुन अब आश्वस्त हैं कि निर्णय पर आ गए, सारे तर्क एक ही दिशा में संकेत कर रहे हैं — मत लड़ो। क्या-क्या तर्क निकाले हैं! और आगे चालाकी देखिएगा;

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।

यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४५॥

"हाय! कैसा दुर्दैव है, कैसा दुर्भाग्य है कि हमलोग महान पाप करने को उद्यत हैं, क्योंकि राज्यप्राप्ति रूप सुख पाने की आशा से स्वजनों की हत्या करने के लिए सन्नद्ध हुए हैं।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४५

आचार्य: ये नहीं कह रहे हैं कि, ‘मैं महान पाप करने को उद्यत हूँ’, साथ में कृष्ण को भी लपेट लिया। ‘हाय! ये कितने दुर्भाग्य की बात है, कि ‘हमलोग’ महान पाप करने को उद्यत हैं।‘ इसीलिए मैं कहा करता हूँ कि बाद में है ये कौरवों और पाँडवों के बीच का संघर्ष, पहले तो ये अर्जुन और कृष्ण के बीच का संघर्ष है। अर्जुन चाल चल रहे हैं, अर्जुन पासा फेंक रहे हैं। ये दाँव है, ये मानसिक युद्ध है, साइकोलॉजिकल वॉरफ़ेयर है, कि ‘अरे! देखो, कितने दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग पाप कर रहे हैं।‘

बातों-ही-बातों में कृष्ण को इशारा दे दिया है कि, ‘कृष्ण, मैं आपको भी पापी समझ रहा हूँ। आप मेरी बातों के प्रतिकूल तर्क दे मत दीजिएगा क्योंकि मैंने आपको पहले ही बता दिया है कि जो मेरी बातों के विरुद्ध जाएगा, मैं उसको पापी समझूँगा।‘ तो अर्जुन के अनुसार कृष्ण को थोड़ा डर जाना चाहिए कि, ‘देखो पापी तो बोल ही दिया है, अभी अगर और मैं इसको ज्ञान वगैरह दूँ तो कहीं महापापी या कुछ और बड़ी बात ना बोल दे। तो इससे अच्छा है कि अपना सम्मान संभाल कर रखो और ज़्यादा कुछ बोलो ही मत। और कह दो कि अर्जुन तुमने जो करा वो ठीक। मैं भी तुम्हारे साथ हूँ, चलो वापस चलते हैं; घूमेंगे, फिरेंगे, इतनी बड़ी दुनिया है, एक ही राज्य का क्या करना है।‘ बहुत तर्क हो सकते हैं न?

"हाय! कैसा दुर्दैव है, कैसा दुर्भाग्य है कि हमलोग महान पाप करने को उद्यत हैं, क्योंकि राज्यप्राप्ति रूप सुख पाने की आशा से स्वजनों की हत्या करने के लिए सन्नद्ध हुए हैं।"

देखिए, क्या करा है। धर्म को नीचे गिराया है। कह रहे हैं कि ‘नहीं, हम धर्म के लिए नहीं लड़ रहे, हम तो राज्य प्राप्ति के लिए लड़ रहे हैं।‘ तो लड़ने के पक्ष में जो बात कही जा सकती थी, उस बात को गिरा दिया। कह दिया, ‘नहीं, हम धर्म के लिए थोड़े ही लड़ रहे थे, हम तो लड़ ही रहे थे लालच के लिए।‘ और लड़ने के विरोध में जो बातें कही जा सकती थीं, उनको उठा दिया। समझ रहे हो?

धर्म को गिरा दिया, धर्म की तुलना लालच से करके; और अधर्म को उठा दिया, अधर्म के ऊपर अच्छाई का, नैतिकता का, आवरण पहना कर के। ये काम हम सब करते हैं। कोई अच्छा काम कर रहा होगा तो उसको हम तत्काल कह देते हैं कि ‘उसमें उसका कुछ स्वार्थ होगा तभी तो कर रहा है।‘ ठीक वैसे, जैसे धर्मयुद्ध को यहाँ पर अर्जुन ने गिरा दिया ये कह कर कि ‘ये तो राज्य, और रुपय, और सत्ता के लिए की जा रही लड़ाई है।‘

वो जो युद्ध है वो वास्तव में सत्ता के लिए नहीं है, वो धर्म के लिए है। लेकिन अर्जुन ने उस युद्ध को अलग ही तरह से परिभाषित कर दिया क्योंकि धर्म की राह चलना नहीं है। कैसे कह दें कि धर्म की राह चलना नहीं है? तो धर्म को अधर्म घोषित कर दो ताकि धर्म को ठुकराना आसान हो जाए। समझ में आ रही है बात?

जैसे कोई आपसे पूछे कि, ‘साहब, आप तो इधर-उधर का तमाम कचरा पढ़ते रहते हैं, कभी संत साहित्य क्यों नहीं पढ़ते?’ तो आप कहें, ‘अरे! संतों का क्या है, इन्होंने तो जो करा अपनी ही दूकान चलाने के लिए और प्रसिद्धि पाने के लिए करा, और मेरे पास प्रमाण है।‘ ‘क्या?’ ‘सब संत प्रसिद्ध हैं कि नहीं?’ ‘हाँ।‘ ‘तो इसीलिए तो इन्होंने ये सब बातें कही थीं।‘ इन्होंने क्या कहा है? इन्होंने कह दिया है कि संत धर्म की खातिर नहीं, प्रसिद्धि की खातिर काम करते थे। ठीक उसी तरह यहाँ पर अर्जुन तर्क दे रहे हैं कि ये युद्ध धर्म की खातिर नहीं है, ये युद्ध सत्ता की खातिर है। अगर ये कह दिया कि ये युद्ध सत्ता के लिए है तो युद्ध से भागना, माने धर्म से भागना आसान हो जाएगा न?

ये काम हम सब करते हैं, दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है — हमारी आतंरिक दुनिया में — वो सदा धर्म और अधर्म के बीच का संघर्ष है। उसमें हमें अधर्म का पक्ष जब भी लेना होता है, हम कुछ तर्क देकर धर्म को नीचे गिराते हैं और कुछ तर्क देकर अधर्म को ऊपर उठाते हैं। उदाहरण के लिए — कोई आ जाए सामने और आपको सिद्ध करना है कि आपको उस व्यक्ति के साथ नहीं जाना, भले ही वो व्यक्ति धर्मपथ पर हो, तो आप कह देंगे, ‘अरे! आप भी तो पैसे के लिए ही काम करते हो।‘ अब आसान हो जाएगा उस व्यक्ति की बात को नकारना। समझ रहे हो?

भीतरी व्यवस्था ऐसे काम करती है। हमारे उद्देश्य सब गर्हित, पतित होते हैं। उनपर हम ऊँचाई का आवरण पहना देते हैं। और सच्चाई जो वास्तव में ऊँची होती है, उस पर हम कीचड़ के छींटें मार देते हैं, उसको नीचे खींचने का प्रयास कर लेते हैं ताकि लगे कि वो कोई व्यर्थ की चीज़ है। ये सब कुछ करने के पीछे उद्देश्य हमारा बस एक होता है — अधर्म का साथ देना।

तो आप पूछेंगे कि ‘अगर अधर्म का साथ ही देना है तो इतनी मेहनत क्या करनी है? सच्चाई को सीधे ही अस्वीकार कर दो’; साफ़-साफ़ घोषित कर क्यों नहीं देते कि ‘मैं अधर्म के साथ हूँ’? इतनी हममें हिम्मत नहीं, इतने खुले अधर्मी हम नहीं हो पाते, हमारी मजबूरी ये है कि हमें अधर्मी भी होना है और स्वयं को धर्मी घोषित भी करना है। तो हमें अपने अधर्म को धर्म का नाम देना आवश्यक हो जाता है क्योंकि हम डरे हुए लोग हैं; हम अधर्म के पक्ष में भी डरे हुए हैं। और सत्य को सीधे-सीधे ठुकरा देने का साहस नहीं हममें। तो हम कहते हैं कि सत्य को हम इसलिए ठुकरा रहे हैं क्योंकि वो असत्य है। वो असत्य कैसे है? हमारे पास कुछ तर्क हैं। सब का आतंरिक खेल ऐसे ही चलता है।

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।

धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥

"यदि आत्मरक्षा का प्रयत्न न करने वाले मुझ अशस्त्रधारी को धृतराष्ट्र पुत्र युद्धक्षेत्र में मार डालें, तो भी वो मेरे लिए अधिकतर कल्याणकारी होगा।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४६

आचार्य: अर्जुन ने निष्कर्ष निकाल लिया। बोले कि ‘इन सब बातों से अब ये साबित होता है कि मैं यहाँ मर भी जाऊँ तो बेहतर है, पर मैं लड़ाई तो नहीं करूँगा।‘ स्वयं ही तर्क रचे और अपने ही तर्कों से और ज़्यादा सुनिश्चित अनुभव करने लगे कि ‘बात तो मैं ठीक ही कह रहा हूँ।‘ ‘वाह! क्या बात कही है मैंने और ये बात मैंने बोल दी है तो इससे ये प्रमाणित होता है कि न सिर्फ़ मुझे उन्हें नहीं मारना है पर वो मुझे यदि मार भी दें तो मैं स्वीकार कर लूँगा।‘

मुझे तो यूँ लग रहा है कि ये सब कृष्ण को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है कि, ‘देखिए श्रीकृष्ण, ये बात तो दूर की है कि मैं उन्हें मारूँगा। आप ये समझ लीजिए कि अब मैं उस बिंदु पर आ चुका हूँ जहाँ मैं अपने प्राण त्यागने को तैयार हूँ। वो मुझे मार दें तो मार दें, मैं उन्हें नहीं मारूँगा।‘ जैसे कृष्ण को जताया जा रहा है कि, ‘मुझे अब समझाने की कोशिश भी बेकार है। देखिए कृष्ण, प्रयास भी मत करिएगा, मैं बहुत दूर निकल चुका हूँ।‘ ये एक तरह से कृष्ण को हतोत्साहित किया जा रहा है। ‘अब कोई आप मुझपर युक्ति मत आज़माइएगा, फ़ैसला हो चुका है, मैं आपसे बहुत दूर जा चुका हूँ। सारे तर्क मेरे पक्ष में हैं और मुझे बड़ी गहराई से सुनिश्चित हो चुका है कि सही क्या है। मैं जान चुका हूँ, अब आप व्यर्थ ही मुझे समझाने-बुझाने का प्रयास करेंगे, समय खराब होगा और कुछ नहीं।‘

देख सकते हों तो देखिए कि अभी अर्जुन ने कृष्ण की ओर कैसे देखा होगा। जैसे कुश्ती में, एक पहलवान दूसरे को देखता है ये मान कर कि ‘इसको तो मैंने अब परास्त ही कर दिया’। ‘बेटा, तू तो अब हार चुका है!’ सर्वप्रथम ये मल्लयुद्ध कृष्ण और अर्जुन के बीच है और अर्जुन ने अपने दाँव चल दिए हैं।

आएगी, कृष्ण की बारी आएगी, पर पहले अर्जुन के दाँव-पेचों को समझना ज़रूरी है; पहले अर्जुन बन जाना ज़रूरी है। आप अर्जुन नहीं बनोगे तो कृष्ण आपको पटकेंगे कैसे? बन जाइए पहले अर्जुन, सहमत हो जाइए अर्जुन से आप भी पूरी तरह क्योंकि आप अर्जुन से सहमत हैं ही। अर्जुन का एक-एक तर्क आपका तर्क है। अर्जुन असत्य के प्रति जितना आग्रह यहाँ दिखा रहे हैं, वो आपकी अपनी असत्यनिष्ठा है, बेईमानी।

तो अब अर्जुन ने इस प्रकार कह कर, कृष्ण से किसी प्रकार की अनुमति की प्रतीक्षा भी नहीं करी, बस अपना वक्तव्य सुना दिया है, निर्णय घोषित कर दिया है। तो संजय कहते हैं;

सञ्जय उवाच।

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्खये रथोपस्थ उपाविशत्।

विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥ ४७॥

"संजय कहते हैं कि अर्जुन इस प्रकार कह कर युद्धक्षेत्र में बाण सहित धनुष को छोड़ कर, शोकाकुल चित्त से रथ के पिछले भाग में बैठ गए।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४७

आचार्य: वो उठ करके, जा कर वहाँ पीछे बैठ गए। शारीरिक रूप से भी वो एक खुल्ला संकेत दे रहे हैं कि ‘अब मुझपर प्रयास भी मत करना, कृष्ण, मेरा तो खेल ख़त्म हो चुका है।‘ ये सब प्रतीक होते हैं। शत्रु को तरीके-तरीके से जताया जाता है कि तुम बाज़ी हार चुके हो। यहाँ पर अर्जुन कौरवों को तो शत्रु मानने से इनकार ही कर रहे हैं, तो अर्जुन ने शत्रु बना किसको रखा है? कृष्ण को। और कृष्ण पर ही अर्जुन इस तरीके के प्रयोग कर रहे हैं कि जा करके अब पीछे बैठ गए हैं कि स्पष्ट ही हो जाए कि, ‘मुझे आप समझाने-बुझाने की कोशिश करेंगे तो आपकी अपनी मानहानि होगी क्योंकि आप मुझसे कुछ बोलेंगे, मानूँगा तो मैं हूँ नहीं, तो कृपया प्रयास भी ना करें।‘

पर कृष्ण प्रयास करते हैं और वो प्रयास कुछ ऐसा प्रबल होता है, इतना ज़बरदस्त, कि बीसों शताब्दियाँ बीत चुकी हैं — मरने वाले चले गए, मारने वाले चले गए, कौनसा हस्तिनापुर, कौनसा कुरुक्षेत्र, कहाँ धनुष, कहाँ गदाएँ, कहाँ कौरव, कहाँ पाँडव — लेकिन भगवद्गीता सूरज की तरह आज भी चमक रही है।

एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के।

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