दुनिया की सबसे गंदी आदत, और उसे छोड़ने का तरीका || आचार्य प्रशांत, एन.आई.टी. जमशेदपुर (2023)

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल आपसे ये है कि हमारी एक टेंडेंसी (वृत्ति) होती है कि हम अपने सारे महत्वपूर्ण कार्यों को सबसे आख़िरी में करते हैं, और ख़ासकर के सर, इंजीनियर्स तो इसके लिए कुछ ज़्यादा बदनाम हैं। तो कृपया मार्गदर्शन करें, इस प्रवृत्ति से हम कैसे बचें और उसे कैसे सुधारे?
आचार्य प्रशांत: देखो, जिस काम के बारे में पता होता है कि सही है, ज़रूरी है। उस काम को कभी आगे के लिए थोड़े ही टाला जाता है? आगे के लिए तो वही चीज़ें टाली जाती हैं न, जिनके बारे में हमें कुछ पता ही नहीं होता है कि इससे क्या फ़ायदा होगा, करें तो करें क्यों? उन चीज़ों में फिर मन लगता नहीं है, तो हम उसे आगे के लिए टालते हैं।
अब कोई काम है जिसकी आपको डेडलाइन दी गयी है एक हफ़्ते बाद की, तो उसको आप टालते रहोगे — आज टालोगे, कल टालोगे, परसों टालोगे, नरसों टालोगे; इस उम्मीद में टालोगे कि क्या पता वो काम अन्ततः करना पड़े ही नहीं। टालने के पीछे ये आशा होती है कि हो सके तो किसी तरह इस काम से बच ही जाओ। और अगर किसी और ने वो काम दिया है, तो क्या पता देने वाले का ही मन बदल जाए, वही कह दे मत करो!
जब तक एकदम ही सिर पर न आन पड़े, बचने का कोई तरीक़ा ही न रहे, तब तक किसी तरह उस काम से जी चुराओ। इससे बस ये पता चलता है कि उस काम से जो हमारा रिश्ता है, उसमें दो चीज़ें ग़ायब हैं। बाद में इन दो चीज़ों को भी हम देखेंगे कि ये दो चीज़ें अलग-अलग हैं क्या। कौनसी दो चीज़ें ग़ायब हैं काम से हमारे रिश्ते में?
एक तो हमें पता नहीं है उस काम के बारे में, तो उसको हम बोल देंगे बोध। दूसरा, जितना हमें थोड़ा-बहुत पता है उसके बारे में, वो हमें पसन्द नहीं आ रहा, उसको हम बोल देंगे प्रेम। ठीक है?



