जिसका मूल्य समय पर, स्थिति पर आश्रित हो, उसको अस्तित्वगत रूप से शून्य महत्त्व देना — ये सीख है। शून्य महत्त्व देना माने ये नहीं कि उसको थप्पड़ मार दिया, तू कुछ है ही नहीं, तो पटाक! ये नहीं। अस्तित्वगत महत्त्व क्या? कि तेरे होने से मेरी हस्ती का सत्यापन नहीं हो पाएगा। तुझसे जुड़ने से मेरी हस्ती को पूर्णता तो नहीं मिल पाने वाली, तो मैंने तुझसे ये आशा हटा दी, ये है महत्त्व को शून्य कर देना। इस अर्थ में महत्व को शून्य कर देना कि तुझसे ये आशा नहीं रखेंगे कि तुझे जीवन में ले आएँ, तो भीतर जो तमाम तरह के रोग लगे हुए हैं — उदासी, लटका हुआ मुँह, सूनापन ये सब दूर हो जाएँगे, कुछ नहीं दूर होना है।
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आचार्य प्रशांत: दुख अध्यात्म की केंद्रीय समस्या है, और दुख कामनाओं के होने और पूरे न होने का नाम है।
पहली बात क्या? ये सारी बातें ही इसलिए हैं क्योंकि दुख है, दुख न हो तो धर्म की कोई आवश्यकता भी नहीं है। दूसरी बात ये, कि धर्म कामनाओं के अस्तित्व में होने से और अपूरित होने से आता है, कामना है तो, पर पूरी नहीं है। तीसरी बात ये, कि कामना के लिए मुझे होना होगा और किसी विषय को होना होगा। चौथी बात, विषय को मुझसे स्वतंत्र, भिन्न, अनाश्रित होना होगा।
चौथी शर्त क्यों है, क्योंकि विषय अगर मूलतः मेरी ही तरह है, तो उसको स्वयं में जोड़ने से मैं स्वयं में स्वयं को ही जोड़ रहा होऊँगा, और उससे अपूर्णता नहीं मिटेगी। तो विषय का मुझसे भिन्न होना बहुत ज़रूरी है, और भिन्न भी संख्यात्मक तौर पर नहीं गुणात्मक तौर पर, नहीं तो जो अपूर्णता मुझ में है जो मेरा दुख बनी हुई है वो अपूर्णता बची ही रह जाएगी, विषय को यदि स्वयं में जोड़ लिया तो भी। आपने नल खोला नहाने के लिए, और ये क्या! टोटी में तो पानी गंदा आ रहा है, मिट्टी मिली हुई है न जाने कैसे, बड़ा बुरा लगा साफ़ कुछ चाहिए था उसमें मिट्टी लगी हुई थी। एक बाल्टी पूरी, उसमें पाया एक किलो मिट्टी है तो बहुत हैरान हो गए, बुरा लगा। बोले, खोजते हैं बाहर कुछ जिसमें शुद्धता हो, जिसको स्वयं में जोड़ लें जिससे जाकर हम जुड़ जाएँ, तो शुद्धता मिल जाएगी।




