दुख को जड़ से कैसे ख़त्म करूँ?

Acharya Prashant

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दुख को जड़ से कैसे ख़त्म करूँ?
जिसका मूल्य समय पर, स्थिति पर आश्रित हो, उसको अस्तित्वगत रूप से शून्य महत्त्व देना — ये सीख है। शून्य महत्त्व देना माने ये नहीं कि उसको थप्पड़ मार दिया, तू कुछ है ही नहीं, तो पटाक! ये नहीं। अस्तित्वगत महत्त्व क्या? कि तेरे होने से मेरी हस्ती का सत्यापन नहीं हो पाएगा। तुझसे जुड़ने से मेरी हस्ती को पूर्णता तो नहीं मिल पाने वाली, तो मैंने तुझसे ये आशा हटा दी, ये है महत्त्व को शून्य कर देना। इस अर्थ में महत्व को शून्य कर देना कि तुझसे ये आशा नहीं रखेंगे कि तुझे जीवन में ले आएँ, तो भीतर जो तमाम तरह के रोग लगे हुए हैं — उदासी, लटका हुआ मुँह, सूनापन ये सब दूर हो जाएँगे, कुछ नहीं दूर होना है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: दुख अध्यात्म की केंद्रीय समस्या है, और दुख कामनाओं के होने और पूरे न होने का नाम है।

पहली बात क्या? ये सारी बातें ही इसलिए हैं क्योंकि दुख है, दुख न हो तो धर्म की कोई आवश्यकता भी नहीं है। दूसरी बात ये, कि धर्म कामनाओं के अस्तित्व में होने से और अपूरित होने से आता है, कामना है तो, पर पूरी नहीं है। तीसरी बात ये, कि कामना के लिए मुझे होना होगा और किसी विषय को होना होगा। चौथी बात, विषय को मुझसे स्वतंत्र, भिन्न, अनाश्रित होना होगा।

चौथी शर्त क्यों है, क्योंकि विषय अगर मूलतः मेरी ही तरह है, तो उसको स्वयं में जोड़ने से मैं स्वयं में स्वयं को ही जोड़ रहा होऊँगा, और उससे अपूर्णता नहीं मिटेगी। तो विषय का मुझसे भिन्न होना बहुत ज़रूरी है, और भिन्न भी संख्यात्मक तौर पर नहीं गुणात्मक तौर पर, नहीं तो जो अपूर्णता मुझ में है जो मेरा दुख बनी हुई है वो अपूर्णता बची ही रह जाएगी, विषय को यदि स्वयं में जोड़ लिया तो भी। आपने नल खोला नहाने के लिए, और ये क्या! टोटी में तो पानी गंदा आ रहा है, मिट्टी मिली हुई है न जाने कैसे, बड़ा बुरा लगा साफ़ कुछ चाहिए था उसमें मिट्टी लगी हुई थी। एक बाल्टी पूरी, उसमें पाया एक किलो मिट्टी है तो बहुत हैरान हो गए, बुरा लगा। बोले, खोजते हैं बाहर कुछ जिसमें शुद्धता हो, जिसको स्वयं में जोड़ लें जिससे जाकर हम जुड़ जाएँ, तो शुद्धता मिल जाएगी।

वो जो पानी की टंकी थी वहाँ ही पहुँच गए, ये तो एक बाल्टी पानी था, इसमें एक ही किलो मिट्टी थी वहाँ जाकर के बहुत खुश हुए बहुत प्रभावित हो गए, लगा कि सब दुख वग़ैरह चले गए। वहाँ 100 किलो पानी था, “देखा, हम तो छोटे से हैं और दुनिया इतनी बड़ी है, दुनिया में इतना कुछ है जो हमारी कामनाओं की पूर्ति कर देता है। मैं ही तंगी में, गरीबी में, अल्पता में जी रहा था, कुल एक बाल्टी मेरे पास पानी था इसीलिए तो उस एक बाल्टी पानी में एक किलो मिट्टी थी। ये मेरी गरीबी का परिणाम है कि मेरी बाल्टी में एक किलो मिट्टी निकली।” अब उसका आकार देखकर के बड़ी खुशी छाई है।

जिसके पास गए हो, वहाँ पर हो सकता है मात्रा, संख्या सब ज़्यादा हो। हमारे पास एक बाल्टी पानी है, वहाँ पर हो सकता है 100 बाल्टी हो, हज़ार बाल्टी हों, पर अगर वहाँ हज़ार बाल्टी होगा तो उसमें मिट्टी भी फिर कितनी होगी? हज़ार किलो होगी। आप बेशक उसको स्वयं में जोड़ सकते हैं, लेकिन आप उस बाल्टी के पानी से नहाते या टंकी के पानी से नहाएँ, कोई फ़र्क़ पड़ा क्या? हाँ, आपको बाहर-बाहर से ये गुमान ज़रूर हो जाएगा कि आपने कुछ हासिल कर लिया। आप कह दोगे मेरे जीवन में अमीरी है, उपलब्धियाँ हैं, देखो वो बगल वाला है एक बाल्टी, मेरे पास पूरी टंकी। लेकिन नहाने के लिए तो एक बाल्टी भी पर्याप्त है, समस्या ये नहीं थी कि एक बाल्टी पानी था, समस्या ये थी कि उसमें एक किलो?

श्रोता: मिट्टी थी।

आचार्य प्रशांत: और उसके पास अगर एक किलो मिट्टी थी, तो आपने जो स्वयं में जोड़ लिया उसमें हज़ार किलो मिट्टी है, हज़ार किलो पानी भी है। बात समझ में आ रही है?

वो विषय जो है उधर का, यदि मुझे दिख जाए कि बिल्कुल मेरे ही जैसा है तो मैं उसको पाने के लिए मारा-मारा फिरूँगा क्या। उसको पाने के लिए मैं तभी लालायित रहता हूँ, जब मुझे भ्रम बना रहता है कि उसमें और मुझ में कुछ फ़र्क़ है। है ना? अशुद्धि कुछ कम हो गई क्या पूरी टंकी पाने से? मात्रा बढ़ गई, अशुद्धि का अनुपात तो बिल्कुल पुराना ही रहा ना! और परेशान आप अशुद्धि से थे, अशुद्धि तो अभी भी उतनी ही है। वो बिल्कुल वही है जो तुम्हारे पास था बस वो दिखने में अलग है ना। अपनी बाल्टी छोटी सी और आपकी बाल्टी हो सकता है प्लास्टिक की हो, टंकी ईंट-सीमेंट की बनी हुई है वो ज़रा प्रभावशाली लगती है, ग़ज़ब, आसमान में टँगी हुई है। और आपकी कहाँ वो गरीब बाल्टी, उसमें हो सकता है छेद भी हो। टंकी को देखिए — बादशाह सलामत ऊपर बैठी हुई है। लेकिन चीज़ वहाँ भी वही है जो?

श्रोता: यहाँ है।

आचार्य प्रशांत: अब भागोगे? बोलो, भागोगे?

जो विधि है माध्यमिकों की वो ये दिखाने की है, कि जो बाहर विषय है उसकी अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है। और जो हमने चार सूत्र लिखे, उसमें चौथा क्या था?

श्रोता: विषय को विषयता (मुझसे) से भिन्न या स्वतंत्र होना होगा।

आचार्य प्रशांत: तो जो दुख की पूरी कारक श्रृंखला है उसमें इस जगह पर तोड़ा जा रहा है, श्रृंखला कहीं से भी टूट जाए तो टूट गई ना। दुख होने के लिए अनिवार्य है ये मानना कि वो जो उधर (बाहर की ओर इंगित करते हुए) है, वो इधर (अपनी ओर इंगित करते हुए) से भिन्न है, स्वतंत्र है, अलग है, कुछ है उसमें ऐसा जो इधर (अपनी ओर इंगित करते हुए) नहीं है। तो माध्यमिक दर्शन यहाँ पर प्रहार करता है, कहता है, “ये बात ही तुम्हारी ग़लत है कि उधर कुछ ऐसा है जो इधर नहीं है, तो हम दिखा देंगे कि उधर जो है वो इधर पर बिल्कुल आश्रित है” — कि जगत जो है वो जीव पर और संसार जो है वो अहंकार पर पूरे तरीक़े से आश्रित है।

अब यही जो वाक्य है कि संसार अहंकार पर आश्रित है, इसको ऐसे भी लिखा जा सकता है कि, “संसार की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है” और इसी को और कड़ाई के साथ ऐसे भी लिखा जा सकता है कि, “संसार नहीं है” यही शून्यवाद हो गया।

आपके मन में अपनी छाया को लेकर के बहुत उदारता हो तो आप कहेंगे कि छाया मुझसे स्वतंत्र नहीं है, छाया मेरे जैसी दिखती है पर मुझसे स्वतंत्र नहीं है। और कोई आएगा जो और शुद्धता के साथ इसी बात को ऐसे बोल देगा कि “छाया माने ऐसा व्यक्ति जो है ही नहीं, वो व्यक्ति जैसा दिखता है पर वो है ही नहीं” यही शून्यवाद है। वो इतना आप पर आश्रित है, जगत, कि अपने आप में वो कुछ है ही नहीं, जब वो कुछ है ही नहीं तो क्या उसके पीछे भागोगे।

और इसी बात को जब आपकी तरफ़ मोड़ दिया जाता है, तो ऐसे कह दिया जाता है कि आप इतना ज़्यादा आश्रित हो जगत पर कि जगत के बिना आप हो ही नहीं।

तो एक छोर पर जगत शून्य है, दूसरे छोर पर आप शून्य हो। लेकिन ये दो शून्य, एक दूसरे को पकड़ करके न जाने कौन-सी मिथ्या सत्ता प्रदान कर देते हैं, इसको कहते हैं प्रतीत्य समुत्पाद। दो ऐसे जो दोनों ही नहीं हैं, जब एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं तो ग़ज़ब माया खड़ी हो जाती है, जहाँ लगता है कि ये (अपनी ओर इंगित करते हुए) भी है और वो (बाहर की ओर इंगित करते हुए) भी है, हैं दोनों ही नहीं। और स्वतंत्र कर दो, काट दो दोनों का साथ तो दोनों में बचेगा कोई नहीं, लेकिन जहाँ दोनों ने हाथ पकड़ा एक दूसरे का, वहाँ दोनों की ना सिर्फ़ सत्ता खड़ी हो जाती है बल्कि ऐसा लगता है कि दोनों एक दूसरे से पृथक और स्वतंत्र भी हैं।

आप कहते हो ना, “मैं नहीं भी रहूँगा तो दुनिया रहेगी।” कहते हो कि नहीं? “मैं मर जाऊँगा, उसके बाद भी दुनिया रहेगी।” तो आप मानते हो कि दुनिया स्वतंत्र है आपसे, ठीक है। इसी तरीक़े से हम ये भी मानने को तैयार हैं उदाहरण के लिए, कि जलवायु परिवर्तन हो गया खूब, पृथ्वी बिल्कुल ऊपर नीचे हो गई — तो भी इंसान तो बचा ही रहेगा। इसमें क्या भाव निहित है? कि हम पृथ्वी से, शायद पूरे ब्रह्मांड से ही स्वतंत्र हैं।

हमारा वहाँ पर ये गुमान बैठा हुआ है कि वो बाहर वाला सब बदल भी जाएगा तो हम थोड़ी बदलेंगे! हम अपने आप को बचा ले जाएँगे। बाहर जो है वो सब बिल्कुल छत-विक्छिप्त, टुकड़े-टुकड़े भी हो जाएगा तो भी इंसान किसी तरह बच जाएगा, सारी प्रजातियाँ मिट जाएँगी तो भी एक प्रजाति बच जाएगी — हमारी। तो यहाँ क्या भाव है? कि हम उससे…(बाहर की ओर इंगित करते हुए)। हैं ना!

हम दोनों ही बातें मानते हैं — वो मुझसे स्वतंत्र है और मैं उससे स्वतंत्र हूँ, यही ज़बरदस्त भ्रम है।

माध्यमिक दर्शन देखता है कि यही भ्रम दुख के मूल में है, क्योंकि जब वो अलग दिखता है और अपने भीतर बेचैनी दिखती है, तो आदमी उसकी ओर भागता है उसको पाने के लिए। जब ऐसा प्रतीत होता है कि वो जो आगे है, जो इंद्रियों का, मन का विषय है वो मुझसे अलग है, पहली बात तो। और दूसरी बात मुझ में क्या है निरंतर एक? खालीपन, सुनापन, बेचैनी, अपूर्णता। तो फिर ये होकर रहेगा कि हम उसकी ओर भागेंगे।

अब भागोगे तो दो ही चीज़ें हो सकती हैं — या तो पाओगे, या तो नहीं पाओगे।

अच्छा, नहीं पाया तो क्या होगा?

अरे, और निराशा का दंश, हार, हीनता। नहीं मिला! और कई बार तो एक ही विषय होता है, जिसको पाने के लिए एक अनार सौ बीमार होते हैं। होते हैं ना? वो फलानी चीज़ है, वहाँ है उसको मिल जाए तो बिल्कुल एकदम तर जाएँगे, शांति हो जानी है। नहीं मिल सकती, वस्तु एक है चाहने वाले 100 हैं तो 99 को तो नहीं मिलेगी, जाहिर सी बात है। नहीं मिली, तो वैसे ही दिल टूट जाना है और आहत होकर के घूमेंगे। ठीक है? दुख का क्या होगा? फिर दुख और बढ़ जाएगा।

और मिल गई तो क्या होगा? मिली, तो क्या मिलेगा?

नहीं कुछ तो मिलेगा ही, वस्तु तो थी, आँखों को दिखाई पड़ती थी, हाथ से छू भी लोगे। जो मिला, लेकिन वो क्या मिला है? वो एसिडिटी के मरीज़ को एसिड मिला है, पी लो। वही मिला है जो तुम्हारे पास पहले ही आधिक्य में है, प्रचुरता में है। वही मिला है जो तुम हो, जो तुम अपने भीतर लिए बैठे हो वही और मिल गया। जिसका दुख नशा है, उसको और शराब मिल गई है। आ रही बात समझ में?

अब क्या हुआ कि नीचे नहाए उस एक बाल्टी पानी से, पता नहीं कहाँ-कहाँ वो मिट्टी, रेत सब घुस गई शरीर में और लगी खुजली खाएँ, खाएँ, खाएँ, खाएँ — बाल नोच लिए, खुजा-खुजा करके खाल नोच ली, खून निकाल लिया। और कोई एक जगह नहीं, नहाए पूरा ऊपर से नीचे तक थे। कान के अंदर मिट्टी घुस गई, नाक में घुस गई, मुँह में घुस गई, नीचे जाकर तलवे खुजा रहे हैं, पता चल रहा है पीठ पर अभी चिपकी हुई है बड़ा दुख लगा, भयानक दुख है। और एकदम कामना उठी कि कुछ पा ही लें, कि अपनी इस स्थिति से छुटकारा मिले, ये अहंकार की स्थिति है — कुछ पा ही लें कि अपनी स्थिति से निजात मिल जाए।

कहीं तो कुछ होगा ना जो मुझे इस दुख से छुटकारा दिला दे। तो क्या किया झून्नुलाल ने? झून्नुलाल दौड़ के गए ऊपर वाली टंकी में पूरे ही कूद गए। उस टंकी में क्या था?

हाँ ये हो सकता है कि जब जो जल स्रोत होता है, जो जलाशय होता है बहुत बड़ा होता है, तो उसमें मिट्टी नीचे बैठ जाती है। तो ऊपर से झाँक के बोले, "ये कुछ मिला जो मुझसे भिन्न है, स्वतंत्र है, मेरे जीवन में तो बहुत मलिनता है मिट्टी ही मिट्टी है — और ये मिला जो शुद्ध है। ये मेरी सारी कामनाओं की निष्पत्ति, इसी दिन के लिए तो जी रहा था!"

आ गई बाहर, और खड़े होकर के बाक़ायदा ओलंपिक की अदा में डाइव मार दी खुजली बहुत हो रही थी, अब? ये जीव की स्थिति होती है। तुम जिसकी ओर जा रहे हो, तुम उसे उससे भिन्न समझ रहे हो जो तुम हो, जो तुम्हारे पास पहले से है। यहाँ कुछ भिन्न नहीं है, इस अर्थ में वो जो तुम्हें सामने दिख रहा है चूँकि वो स्वतंत्र नहीं है, अतः वो नहीं है। इस अर्थ में तुम भी, चूँकि उससे स्वतंत्र नहीं हो अतः तुम नहीं हो, ये शून्यवाद है। बात समझ में आ रही है?

तो बौद्धों ने ये दर्शन में बड़ी गहरी चीज़ प्रविष्ट कराई और बड़ा इसका अभ्यास कराया। कहाँ कुछ कोई वज़न नहीं है किसी बात में — हल्के हो जाओ। जब कुछ नहीं है, तो उसका कुछ महत्त्व भी तो नहीं है ना, तो पाना क्या और खोना क्या — हल्के हो जाओ। किसी चीज़ को मैं तब महत्त्व दूँ जब उससे मुझे कुछ मिलता हो। और क्या चाहिए मुझे क़तई वो तो बिल्कुल भी नहीं जो मेरे पास, क्योंकि मेरे पास जो पहले से है, उसी से तो मैं परेशान हूँ और वही और मिल गया तो परेशानी और बढ़ ही जाएगी। जब परेशानी और बढ़ जाएगी तो मैं और ज़ोर से कलपूँगा कि, "मुझे कुछ और दो!" तो मुझे कुछ और मिल भी जाएगा, और क्या मिल जाएगा फिर से? वही जो मेरे पास पहले से है, तो फिर मैं और ज़्यादा ज़ोर से कल्पूंगा कि, "मुझे कुछ और दो!" ये जीव का पूरा चक्र है।

इसे हम जीवन बोलते हैं, यही जीवन है। जीव का कालचक्र, जिसमें बस वो छोटे दुख से बड़े दुख की यात्रा करता रहता है। समाप्त हो जाता है। समझ आ रही है बात?

दाल में नमक ज़्यादा था तो उसमें फिर साल्ट मिलाया, क्योंकि साल्ट नमक से भिन्न और स्वतंत्र लगा। न-म-क और साल्ट, दोनों में क्या समानता है? कुछ भी नहीं, दोनों अलग हैं एक दूसरे से, पृथक हैं और स्वतंत्र हैं। ये जीव की होशियारी है, जो तुम्हारे पास पहले ही ज़्यादा है तुम वही अपने जीवन में और जोड़ते हो, जिस वजह से पहले ही हैरान परेशान थे, उसी को श्रम कर करके और अपने घर ले आते हो, बाँध लेते हो। समझ में आ रही बातें?

गाड़ी बहुत तेज़ चली जा रही है और मदहोशी चोटी पर चढ़ी हुई है एकदम। देखा कुछ सामने से आ रहा है — खट! से पैडल दबा दिया। अरे! दर्द उभर आया चेहरे पर, समझ गई (किसी श्रोता की ओर इंगित करते हुए)। समझ गए बात को? जो तुम्हारे पास पहले ही अधिक था, तुमने उसको और बढ़ा दिया, कौन-सा पैडल दबा दिया?

श्रोता: एक्सीलेरेटर।

आचार्य प्रशांत: एक्सीलेरेटर दबा दिया। क्योंकि बेहोश पहले ही थे नहीं तो गाड़ी इतनी तेज़ चल नहीं रही होती। पहले ही बेहोश थे इसलिए गाड़ी इतनी तेज़ चल रही थी और उसी बेहोशी की पिनक में, जब कुछ सामने देखा तो पैडल और दबा दिया। बोले, "अब तो स्पीड कम करनी होगी ना, तो पैडल दबाओ!" दबा दिया! ये हम हैं। बात समझ में आ रही है?

तो एक कसौटी हमको दे रहे हैं आचार्य नागार्जुन। पूछ रहे हैं, "वो जो तुम्हें उधर दिखाई दे रहा है, क्या तुम्हें विश्वास है कि वो वैसा सदा ही तुम्हें दिखाई देगा, या उसका दिखाई देना तुम्हारी भीतरी स्थिति पर निर्भर कर रहा है?" बस ये बताओ।

जो मूल बात है उसको दोहराते चलिए — “दुख का संबंध विषय से है, विषयासक्ति ही दुख है।” ठीक है? तो हम विषय का अन्वेषण कर रहे हैं, ये इनका तरीक़ा है। कह रहे हैं, “अच्छा, विषय सामने आया बड़ा आकर्षित कर रहा है या विकर्षित कर रहा है, कुछ भी, महत्त्वपूर्ण लग रहा है किसी वजह से।”

वो सूत्र दे रहे हैं आज कि पूछो, “वो जैसा लग रहा है, क्या सदा ऐसा ही लगता है? पक्का, ईमानदारी से।” अब ईमानदारी तो गड़बड़ बात हो गई, लेकिन उसका कोई विकल्प किसी गुरु के पास नहीं होता। आचार्य नागार्जुन भी ये बात आपके ऊपर छोड़ देते हैं, क्योंकि देखिए जीवन आपका है, वो विषय आपके सामने आना है तो बचने की आकांक्षा भी आपकी ही होनी चाहिए। वो आचार्य आकर आपको नहीं बचा लेंगे, कोई नहीं कर सकता।

कह रहे हैं, पूछना कि “वो सदा वैसा ही रहता है क्या? क्या उसका होना अविछिन्न है? क्या उसमें एक सतत धार है? निरंतरता है? या वो अभी ऐसा लग रहा है?” बार-बार ये पूछ लो अपने आप से कि, "क्या कोई भी और स्थिति हो, उसमें भी वो विषय वैसा ही लगेगा जैसा अभी लग रहा है?" और यदि पाओ कि विषय का तुम्हारे ऊपर जो प्रभाव है या विषय का तुम्हारे भीतर जो मूल्य है, वो स्थिति और समय सापेक्ष है, तो सीधे कह देना कि वो विषय है ही नहीं।

क्योंकि वो विषय क्या है? जैसा मैं हूँ, वैसा है। अभी मैं ऐसा हूँ, तो वो ऐसा लग रहा है और थोड़ी देर बाद वो विषय बदल जाता है, क्यों बदल जाता है? क्योंकि मैं बदल जाता हूँ। वो विषय बदल जाता है। और कुछ विषय तो ऐसे होते हैं कि उनकी प्रकृति में ही निहित होता है बदल जाना, आप तो बदलते ही हो, वो विषय स्वयं भी बदल जाता है। जैसे हरा पत्ता, दो दिन बाद आओ या तो मिलेगा नहीं, मिलेगा तो पीला। समझ में आ रही है बातें?

जो कुछ भी आप पर निर्भर करता हो, उसको शून्य जान लेना।

शून्य जान लेना इस अर्थ में नहीं कि गर्म कढ़ाई है और हमें पता है कि हम पर निर्भर करती है, इसका मूल्य इसलिए है क्योंकि उसमें पका के हम ही खाते हैं, तो इस मारे ये पक्का हो गया कि इसका मूल्य हम पर आश्रित है। कढ़ाई में बढ़िया छौंक लग रही है, मैं खाता हूँ, इस स्वार्थ के नाते मैं कढ़ाई को महत्त्व देता हूँ। आचार्य नागार्जुन बता गए कि जो स्वतंत्र नहीं है, वो शून्य है। तो गरमा-गरम कढ़ाई में जाकर बैठ गए, वो तो शून्य है। तुम भी शून्य हो जाओगे, शून्य ही छप जाएगा।

किस अर्थ में शून्य है? महत्त्व से शून्य है। क्योंकि उसको महत्त्व प्रदान करने वाला?

श्रोता: हम ही हैं।

आचार्य प्रशांत: हाँ। आंतरिक नहीं है उसके पास मूल्य, इननेट, इंट्रिंसिक नहीं है उसकी वैल्यू। मैं दे रहा हूँ और जो मूल्य मैं दे रहा हूँ, वो भी एक भ्रमित मूल्य है क्योंकि मैं ये सोच के दे रहा हूँ कि उसके पास कुछ ऐसा है जो मेरे पास…, जबकि तथ्य ये है कि वो भी वही है जो तुम हो। वही टंकी और टोटी, जो टंकी से आ रहा है वही टोटी में है, क्यों सोच रहे हो कि वहाँ कुछ अलग है। समझ में आ रही है बात ये?

जिसका मूल्य समय पर, स्थिति पर आश्रित हो, उसको अस्तित्वगत रूप से शून्य महत्त्व देना — ये सीख है। शून्य महत्त्व देना माने ये नहीं कि उसको थप्पड़ मार दिया, तू कुछ है ही नहीं, तो पटाक! ये नहीं। अस्तित्वगत महत्त्व क्या? कि तेरे होने से मेरी हस्ती का सत्यापन नहीं हो पाएगा। तुझसे जुड़ने से मेरी हस्ती को पूर्णता तो नहीं मिल पाने वाली, तो मैंने तुझसे ये आशा हटा दी, ये है महत्त्व को शून्य कर देना। इस अर्थ में महत्व को शून्य कर देना कि तुझसे ये आशा नहीं रखेंगे कि तुझे जीवन में ले आएँ, तो भीतर जो तमाम तरह के रोग लगे हुए हैं — उदासी, लटका हुआ मुँह, सूनापन ये सब दूर हो जाएँगे, कुछ नहीं दूर होना है।

इसी तरह कुछ बहुत डरा रहा है, तो उससे भी यही पूछना है, “क्या स्थितियाँ बदल जाएँ, तो भी ये डराएगा? बदलती स्थितियों के साथ क्या ये स्वयं भी रह पाएगा?” अगर नहीं, तो फिर ये मुझसे कुछ खींच नहीं सकता, कुछ बाहर नहीं निकाल सकता क्योंकि ये वही है जो मैं हूँ। जब ये मुझसे जुड़कर मुझे कुछ दे नहीं सकता, तो मुझसे न जुड़कर मेरा कौन सा नुकसान कर रहा है। या जब ये मुझसे जुड़कर मुझमें कुछ जोड़ नहीं सकता, तो मुझसे जुड़कर मुझसे कुछ तोड़ भी कैसे लेगा।

मिट्टी वाले पानी में मिट्टी वाला पानी अगर मिलेगा, तो न तो आप ये कह सकते हो कि पानी और शुद्ध हो गया, न आप ये कह सकते हो कि पानी और अशुद्ध हो गया। जब कुछ मिलना भी नहीं है, तो कुछ छीनना भी नहीं है। इससे जीवन के प्रति बड़ा स्वस्थ रिश्ता बन जाता है — “न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।” यही निष्कामता है।

सब कुछ है, पर हम भली-भांति जानते हैं कि जो कुछ है, वो न हमारा दोस्त है, न हमारा दुश्मन है। हाँ, यदि हम जीवित हैं, तो इस अर्थ में समष्टि के प्रति अनुग्रहित हैं कि ये जो कुछ है, उसी से जीवन है, यदि जीवन हमको प्यारा लगता है तो, प्यारा नहीं लगता, तो अनुग्रह की भी कोई ज़रूरत नहीं है वो भी हटाओ। अगर ऐसे हो गए हो कि अभी मर भी जाएँ, तो क्या है — तो फिर छोड़ो, प्रकृति के प्रति नमन की भी फिर कोई ज़रूरत नहीं है। पर अगर जीवन में थोड़ी मौज है, आनंद है, तो जो कुछ आसपास है, उससे फिर भोग का, कामना का रिश्ता ज्ञानी नहीं रखता है।

प्रकृति के साथ स्वस्थ संबंध रखने का मतलब ही होता है — निर्लिप्तता, अनासक्ति, जिसमें एक सूक्ष्म अनुग्रह निहित है। ठीक वैसे जैसे भोग में सूक्ष्म हिंसा निहित है। समझ में आ रही है? बदलाव की बात कर रहे हैं, कोई आकर के तर्क की प्रक्रिया में यदि सामने ये तर्क रखे जैसे यहाँ पर कहा है, पूर्वपक्षी की बात, कि “हम ये क्यों कह रहे हैं कि जो सामने है, वो एकदम नहीं है, ये भी तो हो सकता है कि जो सामने है वो बस परिवर्तित हो गया हो। कारण अपना कार्य करके विलीन हो गया हो।” ये भी तो हो सकता है ना।

अब ये तर्क क्यों रखा जा रहा है? क्योंकि हमारी बड़ी कामना रहती है ये मानने की कि जो सामने है, वो है। बड़ा स्वार्थ रहता है, क्यों रहता है स्वार्थ? क्योंकि अगर सामने नहीं है, तो मजे कैसे आएँगे? सामने रसगुल्ला है, सामने वो सब चीजें हैं जो बिल्कुल मन को पकड़े हुए हैं, ज़रा सी वृत्ति है वो बहुत पुरानी, आदिम। और उस आदिम वृत्ति से बड़े पैने, धारदार, विद्वत्ता पूर्ण तर्क पैदा हो जाते हैं। कुल मिलाकर के तर्क का आशय इतना ही है कि देखो, वो जो रसगुल्ला है उसे मिथ्या, माया, शून्य इत्यादि मत कहो क्योंकि अगर कह दिया कि मिथ्या, माया, शून्य है, तो 50 रसगुल्ले भोगूँगा कैसे। और उसके लिए पशुओं का जो शोषण करना पड़ता है, उसको जायज़ कैसे ठहराऊँगा। बात समझ में आ रही है?

तो मूल बात ये है कि सामने जो रखा है, मन उसका गुलाम हो गया है। अहम् ने मन में उस विषय को बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान दे दिया है, जो सामने चीज़ रखी है।

अब वहाँ आचार्य नागार्जुन आ जाते हैं टहलते, वो कहते हैं — शून्य है। किस चीज़ से शून्य है? महत्त्व से शून्य है। तो अब ये कैसे बोले कि “देखो, हम आपकी बात नहीं मानेंगे क्योंकि हम तो पेटू हैं।” कैसा अजीब लगेगा दो विद्वान बैठे हैं, और एक तर्क दे रहा है बड़े ऊँचे-ऊँचे, और दूसरा कह रहा है “आपके सारे तर्कों का मेरे पास एक ही जवाब है —आई ऐम ग्लटनस, मैं पेटू हूँ, मेरी लार बह रही है।” सोचो संस्कृत में ऐसे बोल रहा है, ये शास्त्रार्थ के बीच चल रहा है। उन्होंने बड़ी ऊँची-ऊँची बात करी दर्शन की, और ये बोल रहा है “मेरे पास आपके सारे तर्कों का एक ही जवाब है।” क्या? मुझे रसगुल्ला चाहिए, चाहिए तो चाहिए।

यही होता है, ये मेरा रोज़ का अनुभव है। कोई आएगा, बड़ी से बड़ी बातें करेगा तर्क की, और उसके पीछे को इतनी-सी बात ये होगी — “सोना है, काम नहीं करना।” और तर्क बहुत बड़े-बड़े देगा, उदाहरण के लिए ये भी हो सकता है, 8-10 पुराने ज्ञानियों को उद्धृत करके बोले कि “देखो, सबने बोला है कि इतने आए, इतना काम किया, चले गए। बताओ किसको क्या मिला?” बड़ी-बड़ी बातें। ग़ज़ब बातें। कहीं से कोई रिपोर्ट ला के बता देगा, इस तरह का माल अब खूब मिल जाता है ना जब से चैटजीपीटी आया है।

कोई रिपोर्ट ला के बता देगा कि, “बताया गया है कि ज़्यादा काम करना भी क्लाइमेट चेंज के लिए उत्तरदायी है।” ग़ज़ब तर्क, एक के बाद एक। लेकिन बात कुल कितनी, क्या होगी? “मुझे सोना है।” बस इतनी बात है। लेकिन बेईमान आदमी में हिम्मत भी नहीं कि सीधे बस ये लिख दे कि “काम नहीं करना है, सोना है।”

समस्या बस ये है जीवन में कि पड़े रहना है काम करने में। पता नहीं लोग नानी को क्यों मारते रहते हैं ज़बरदस्ती, नानी का कोई इसमें किरदार होना नहीं चाहिए, पर अब है तो कह देता हूँ — नानी मरती है। समझ में आ रही है बात।

वही यहाँ हो रहा है।

अब जहाँ बता दिया कि, “तुम्हारा दुख कामना की वजह से है, और कामना इसलिए है कि तुम विषय को वस्तुगत समझते हो।” वस्तु से आशय होता है — वो जिसमें सत्ता हो, सच्चाई हो उसको वस्तु बोलते हैं, वस्तु का एक अर्थ ये होता है। लोक भाषा में वस्तु माने हो जाता है — थिंग, ऑब्जेक्ट, चीज़, सामान। दर्शन में वस्तुता का मतलब — सत्यता।

तो वो तर्क ये लेकर के आ गए कि “देखो, चीज़ है, भले ही वो चीज़ कभी दिखती है, कभी नहीं दिखती है। तो भले ही उसकी हस्ती अविछिन्न नहीं है लेकिन फिर भी वो चीज़ है। ठीक है? वो चीज़ है, और बस ये है कि वो रहती है, फिर पलट जाती है, बदल जाती है या एक चीज़ दूसरे में परिवर्तित हो जाती है, या एक चीज़ जो कार्य रूप में है वो कारण बनकर के विलीन हो जाती है। पर अगर थोड़ी देर को भी है तो मानेंगे कि?

श्रोता: है।

आचार्य प्रशांत: माने, इतना तो मान लिया कि चीज़ें हमारे जीवन में धूमकेतु की तरह आती हैं। थोड़ी देर के लिए ललचाती हैं, बर्बाद करती हैं, और गायब हो जाती हैं। इतना तो दिख गया। अब इतनी भी बौद्धिक बेईमानी नहीं करी जा सकती कि कह दें, “नहीं साहब, हर चीज़ का महत्त्व शाश्वत होता है।” तो ये तो मान लिया है यहाँ पूर्वपक्षी ने।

यहाँ ये तो बिल्कुल है कि चीज़ें कभी बहुत महत्त्वपूर्ण लगती हैं, मानस में बड़ा केंद्रीय स्थान ले लेती हैं और कभी उन चीज़ों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। लेकिन अब वो ये साबित करना चाह रहे हैं कि अगर किसी चीज़ का महत्त्व थोड़ी देर के लिए भी रह जाता है, तो भी उस चीज़ का होना मानो। भले ही उसका अस्तित्व अविछिन्न नहीं है, टेम्पोरल है, समय-आश्रित है, समय-सापेक्ष है तो भी ये मानो कि उसमें सच्चाई है।

अभी क्यों मानो?

रसगुल्ले पर वापस जाओ। अभी कैसे बोल दोगे कि, “रसगुल्ला नित्य है, सत्य है, सनातन है, शाश्वत है।” बोल सकते हो? ये तो पता है अभी है और हम खाएँ, चाहे न खाएँ 10 दिन में सड़ जाएगा। कोई रसगुल्ला है जो इससे ज़्यादा चला है? कितना भी तुम उसको बचा लो।

तो अब वो ये कह रहे हैं कि “हाँ, हमने माना।” अब मैं ज़मीन की भाषा में ये सब कर रहा हूँ। ये बड़े लोग हैं, विद्वान हैं ये ऊँची-ऊँची भाषा में वो छोटी बात करते हैं। ठीक है? तो मैं छोटी बात को बिल्कुल छोटे स्तर पर गिरा के बता रहा हूँ।

अब ये कह रहे हैं कि “देखो आचार्य जी, आपने बिल्कुल समझा दिया और साबित कर दिया कि रसगुल्ला आज है और कल…। और रसगुल्ले को भी जब महत्त्व दे रहा हूँ, तभी तक दे रहा हूँ जब तक मुझे भूख लगी है, ठीक है। और तभी तक महत्त्व दे रहा हूँ, जब तक मुझे किसी ने ये नहीं बता दिया कि उस रसगुल्ले में कुछ ऐसा मिला है जो मेरा धर्म वर्जित करता है। या तभी तक महत्त्व दे रहा हूँ जब तक मेरा पेट गुड़गुड़ नहीं करने लग गया। बहुत स्वादिष्ट रसगुल्ला रखा है पर पेचिश लगी है तो रसगुल्ला एकदम हरा 45.00 जाएगा। या तभी तक महत्त्व दे रहा हूँ, जब रसगुल्ले को उठाने के लिए ऐसे गया, झुका और पाया कि वहाँ बढ़िया पाँच मक्खी तैर रही हैं।”

तो ये तो माना कि उसका महत्त्व जो है, निरंतर नहीं है और ये भी माना कि जीवन में जो कुछ भी कामना बन के आता है उसका महत्त्व निरंतर नहीं होता। एक ऐसे चोटी की तरह होता है, अचानक से जैसे कुछ खड़ा हो गया हो जैसे भूमि ने अचानक एक शिखर ले लिया हो, स्पाइक। ऐसे ही आती है ना कामना? ऐसे आई और ऐसे जैसे ऊँची कोई लहर खड़ी हो गई हो, बहुत उसने ऊँचाई ले ली लेकिन थोड़ी देर में धराशायी। ऐसे ही आती है ना कामना?

बोले “हाँ, हमने माना कि जो है, उसका महत्त्व थोड़ी देर के लिए — चाहे वो नींद हो, चाहे वासना हो, चाहे कोई विषय हो, चाहे क्रोध हो, चाहे कुछ हो उसका महत्त्व थोड़ी देर को है।” इतना हमने आपकी बात मान ली, नागार्जुन साहब। लेकिन हम फिर भी कह रहे हैं कि थोड़ी भी देर को है, तो है तो।

अब ये है, कि माना कि थोड़ी देर को है, लेकिन पल भर के लिए। अब माना कि पल भर का प्यार है, पर है तो सही झूठा ही सही, ये कुल मिला के तर्क है। अब ये समझाने के बाद और क्या बताऊँ, जब तर्क ही ऐसा है तो उस तर्क की काट की ज़रूरत बची कोई।

“साहब एक पल को आई थी, पर ज़िंदगी तो रोशन हो गई ना, एक पल में। बिजली थी, बिजली कतई जैसे आसमान में कड़की थी एक पल के लिए, पर वो रात तो रोशन हो गई।” पूरी रात तो नहीं रोशन हुई, पूरी रात तो नहीं कड़क रही थी —“एक पल को तो हुआ ना।” वो कड़की नहीं है, तेरे भेजे पे गिरी है, एकदम फुक गया है कुछ समझने को तैयार नहीं है। देखो कैसा कुतर्क कर रहा है "पाँच ही सेकंड को आया, मज़ा आया कि नहीं आया?" ये है तर्क।

और 5 सेकंड की नींद ले लें, भले ही बाद में पाँच जूते खाएँ नींद के मज़े आए कि नहीं आए? पाँच ही सेकंड को मौज आई — बोलो, आई कि नहीं आई? अभी तक जितनी बातें हो रही थीं, किसी बात पे हँसी आई थी? मौज तो इसी बात पे आई है। हाँ तो बस, हम नागार्जुन के साथ नहीं हैं। हम हैं तो इसी कुतरकी के साथ, क्योंकि मौज तो इसी में आती है।

एक बार मुझसे किसी ने बोला कि "अच्छा जी, अब आप बताते हैं नित्यता होनी चाहिए। जहाँ नित्यता है, वहीं शुद्धता है। और वो जो आप गाने सुनते रहते हैं, गुनगुनाते भी हैं, और कई बार शेयर भी कर देते हैं, वो क्या था 'ज़िंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है,' ये तो आपको बड़ा पसंद है।”

'ज़िंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है। ताज हो, तख़्त हो या दौलत हो ज़माने भर की, कौन सी चीज़ मोहब्बत से बड़ी होती है?'

उसमें उनको यही था कि “ये जो प्यार की दो-चार घड़ी"आपने भी बोला था ना? इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि दो-चार घड़ी की भी चीज़ है, पर मौज तो आई ना। रसगुल्ला इधर लाइए, हाथ हटाइए। दो-चार घड़ी की भी चीज़ है तो मौज करने में समस्या क्या है?”

मैंने कहा वहाँ लिखा है "प्यार," वहाँ "भोग" नहीं लिखा है। "ज़िंदगी अय्याशी की दो-चार घड़ी होती है," ये नहीं गाता हूँ। "ज़िंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है," वो ठीक है फिर। और

जब ज़िंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है — तो भोग करा नहीं जाता, भोग टूट जाता है।

"ताज हो, तख़्त हो या दौलत हो ज़माने भर की कौन सी चीज़ उल्फ़त से बड़ी होती है?" वहाँ भोग छोड़ा जा रहा है, ये प्यार है। ताज भी छोड़ा जा रहा है, तख़्त भी छोड़ा जा रहा है, दुनिया भर की दौलत भी छोड़ी जा रही है, ये प्यार है। और तुम रसगुल्ला भोगने की बात कर रहे हो, और उल्टे तुम मेरे ही गाने का उदाहरण दे रहे हो। ये सचमुच हुआ था, बोले "नित्य नित्य कुछ नहीं होता। डांस पे डांस कर लो, जहाँ जो मिले उड़ा लो। यही अध्यात्म कुल, और यही गुरुओं की सीख है, मौक़ा मिला नहीं...।" मैंने कहा "तुम में और जो मोहल्ले की चोटी बिल्ली होती है उसमें अंतर क्या है?" वो भी यही करती है, जिसके घर का दरवाज़ा खुला देखा, वहाँ घुसी दूध पिया भागी वहाँ से, यही तो करती है।

कुत्ते सब जो होते हैं मोहल्ले के, वो सड़क पर होते हैं। बिल्लियाँ सड़क पर होती हैं कभी, बिल्लियाँ कहाँ पाई जाती हैं? अरे, इधर से उधर से घुसेगी और आवाज़ नहीं करती वो। बिल्ली को भौंकते सुना है? दबे पाँव आएगी, एक पल की मौज करेगी और निकल लेगी। समझ में आ रही है बात?

अरे, वो बस यूँ ही है — धूमकेतु। धूमकेतु समझते हो क्या? शूटिंग स्टार, टूटता तारा, मिटियोराइट, एक पल के लिए वो आकाश को जगमगा देता है। किस-किस ने देखा है? ऐसा लगता है, बाप रे बाप! पूरे आकाश में सबसे प्रभावशाली अभी यही वस्तु है, एक पल के लिए फिर कुछ नहीं। वही हम, वही अमावस। बात समझ में आ रही है?

कोई और नहीं चाहिए तुलना करने के लिए, किसी और को आदर्श बना के नहीं कहना है कि — "बुद्ध ने राजपाट छोड़ा था, क्या मैं रसगुल्ला नहीं छोड़ सकता?" नहीं, ज़रूरत है। ख़ुद से ही पूछ लो, “5 मिनट बाद ये रसगुल्ला इतना ही प्यारा लगेगा क्या?” मुझे ही किसी और को नहीं, बुद्ध की बात नहीं कर रहे, अपनी ही बात कर रहे हैं। 5 मिनट बाद मैं ही इस रसगुल्ले पर थूकूँ नहीं। माने इसका जो मूल्य है, वो मेरी वर्तमान अंतःस्थिति पर आश्रित है, निर्भर है। मतलब वो मुझसे स्वतंत्र नहीं है मतलब वो मेरे ही जैसा है, जब मेरे ही जैसा है तो काहे को उसको पाने के लिए ज़िंदगी ख़राब करूँ।

चलो ना, कुछ ऐसा ढूँढते हैं जो हमारे जैसा बिल्कुल नहीं है। तो अध्यात्म उसी की खोज है, वो जो हमारे जैसा बिल्कुल नहीं है।

अध्यात्म इसी का नाम है — वो हो जाना जो आज हम बिल्कुल भी नहीं हैं। मात्र रूपांतरण ही नहीं, पूर्ण विगलन।

कुछ भी अपने जैसा अपने जीवन में प्रविष्ट मत कराओ — ये गुरुओं की सीख है। जो कुछ भी तुम्हारे ही जैसा हो, तुम्हारी कामनाओं के जैसा हो, उसको जोड़ना पाप तो नहीं पर मूर्खता ज़रूर है, और इस अर्थ में पाप भी है कि जो कुछ तुम्हारा दुख बढ़ाए उसको ही पाप बोलते हैं। समझ में आ रही हैं बातें?

तो जो कुतर्क है उसका उत्तर कैसे दे रहे हैं यहाँ पर। कह रहे हैं कि "देखो, जो तुम बोल रहे हो, कि “जो अभी महत्त्वपूर्ण लग रहा है, थोड़ी देर में वही तो है जो महत्त्वपूर्ण नहीं लगेगा पर वो बना रहेगा।" ये तुम्हारी बात कुतर्क है, इसका कोई प्रमाण नहीं, इसको कोई सिद्ध नहीं कर सकता। तुम तो थोड़ी देर में उस विषय को पूरी तरह भुला भी दोगे जिस विषय के लिए कल जान देने को तैयार थे।

आपके जीवन में ऐसे विषय नहीं रहे हैं क्या? जिन मुद्दों पर आप कल तक जान लेने और देने को तैयार थे, आज आपके सामने पड़े तो आप उन्हें तिरछी नज़र से भी ना देखें। है ना? बोले "नहीं, कुछ नहीं। ऐसा नहीं है कि कोई वस्तु है जिसके भाव की, जिसके होने की, जिसके अस्तित्व की कंटिन्यूटी है निरंतरता है, कुछ भी नहीं है।”

निरंतरता अगर है भी किसी बात की तो अज्ञान की, इसको ही तुम कह सकते हो — शून्यता की निरंतरता है। बाक़ी तो सब ऐसा ही है। अज्ञान का काला आसमान है उसमें कभी बिजली कड़क जाती है, कभी तारा टूट जाता है, कभी कुछ हो जाता है और हम उसको लपकने को आतुर हो जाते हैं। उससे आकाश की कालिमा घट नहीं जाती।

याद भी तो नहीं रखते कि जिस चीज़ को लपकने को आज दौड़े, औंधे मुँह गिरे, जबड़ा फोड़ लिया, दाँत तोड़ लिया, उसी वस्तु को लपकने के लिए तुम तीन साल पहले भी दौड़े थे। अंतर बस ये है कि आज अगवाड़ा तुड़वाया है, तब पिछवाड़ा तुड़वाया था, और तुम्हारे तर्क में ये समता नहीं भेद है। तुम कहते "देखा, वस्तु निश्चित रूप से अलग है, आप क्यों कह रहे हो कि यहाँ जो कुछ है वो सब कुछ तुम्हारे ही जैसा है?"

वो जो पिछली वस्तु थी, उसमें क्या टूटा था? पिछवाड़ा। इस बार क्या टूटा? अगवाड़ा, तो इससे सिद्ध होता है कि जीवन में कुछ नया हुआ है। ये तो तर्क है, इसका क्या जवाब दिया जाए। आचार्य जी ने बताया कि "जीवन में कुछ नवीन, मौलिक लेकर के आओ।" बहुत ख़ुशी-ख़ुशी आया झुन्नु, बोला "आज तक दाएँ गाल पर खाता था, आज कुछ नया करा है।"

तन के खड़ा हो गया बिल्कुल। “मैंने कहा, सुन मारने वाले बहुत मार लिया तूने दाएँ गाल पर, आज बाँया।" ये हमारी ज़िंदगी में नवीनता है — नई बातें, नए अनुभव है, रोमांच है, रोचकता है। मन के चले साल भर पहले भी थे, छ: महीने पहले भी थे, आज भी थे। तब भी टूटफूट हुई थी, आज भी टूटफूट है, लेकिन हर बार माया ये झाँसा दे जाती है कि इस बार अब कुछ नया होने जा रहा है।

कैसे नया होगा?

हमारी छाया की दिशा और लंबाई दोनों लगातार बदलती रहती है, पर ना तो उसमें कुछ नया है, ना स्वतंत्र है। और छाया बदलती लगातार रहती है, हर तरीक़े से आपकी छाया बदल सकती है, जितने तरीक़े संभव हैं एक द्विआयामी ज्योमेट्री में हर तरीक़े से छाया बदल सकती है।

कभी ये भी हो सकता है, कि आपकी छाया पानी पर पड़ रही हो और एक नया उसके बदलने का तरीक़ा खड़ा हो जाएगा। कभी ये भी हो सकता है कि आप किसी क्लिफ़ पर खड़े हो जाएँ, किसी मुहाने पर किसी पहाड़ी के, और वहाँ नीचे खाई में आपकी छाया पड़े, वो एकदम ही अलग तरह की पड़ेगी। पर ना तो कोई भी छाया नई होती है, ना स्वतंत्र होती है आपसे। छाया जब भी पड़ी है एक शर्त तो अनिवार्यता रही है — आप होंगे तभी छाया है। तो कैसे स्वतंत्र हो गई छाया? यही बात विषयों पर और कामना पर भी लागू होती है। बात समझ में आ रही है?

ये जीवन नीरस करने के सूत्र नहीं हैं, जीवन तो बहुत ऊँची, बहुत आनंदपूर्ण चीज़ हो सकता है। ये सूत्र हैं, उस आनंद को बचाने के। हमारी संभावना को हमारी ही नज़र लग जाती है, अध्यात्म — काला टीका है। वो है ना बहुत बढ़िया, कि कहीं तुम्हें तुम्हारी नज़र ना लग जाए। बढ़िया-बढ़िया इस पर गाने हैं, उनको पता भी नहीं था वो जो लिख रहे हैं, उसका गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ है।

हमें हमारी ही नज़र लग जाती है। अध्यात्म इसलिए है, ताकि हम ख़ुद को ही ना खा जाएँ।

जीवन जो कुछ हो सकता है थोड़ा उसके आसपास तो आ जाएँ, नहीं तो मुँह, दाँत, पीठ तुड़वाने के तरीक़े और मौके तो अनंत हैं। पिटने-टूटने की श्रृंखला तब तक चल सकती है जब तक ये जो शरीर है, ये चैतन्य है, तब तक चल सकती है। आख़िरी साँस भी पिटी हुई साँस बिल्कुल हो सकती है — दुख — जिसको मैं पिटाई कह रहा हूँ वही दुख है। वही वो समस्या है, जिसको सब बुद्धों ने संबोधित करा है। अन्यथा उनके पास बोलने का और कोई कारण नहीं था, उन्हें अपना ज्ञान नहीं झाड़ना था।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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