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ध्यान क्या है? || (2017)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: ध्यान क्या है?

आचार्य प्रशांत: ध्यान अपने आप में कुछ भी नहीं है। ध्यान को जब भी कुछ बनाया जाएगा, वो ध्यान के साथ दुर्व्यवहार ही हो जाएगा। हमारा स्वभाव है ध्यान। ध्यान कोई करने की बात नहीं है। ध्यान को ऐसा ही समझ लो कि बेहोशी में ना रहना।

अ-ध्यान से आसक्त ना होना ही ध्यान है।

ध्यान करने की कोशिश तुम्हें अ-ध्यान में ले जाएगी। ध्यान का नाम भी तुम्हें ध्यान से विचलित कर देगा। ध्यान स्वभाव है, और स्वभाव को अगर पाने की चेष्टा करोगे तो हाथ सिर्फ चेष्टा रह जाएगी। ध्यान का अर्थ है ‘उसको’ अपने सामने, अपने भीतर, अपने आधार में, मौजूद पाना – जो सच है, जो है। ( अटेंशन- टू अटेंड टू ) अटेंडेंट कौन होता है? सेवक।

तो ध्यान का मतलब हुआ निरंतर तुम्हारे मन में अपने से किसी के ऊपर होने का भाव मौजूद रहे। मन कभी इतना दुराग्रही ना हो जाए कि अपने-आप को सेवक से ऊपर कुछ और समझ ले। मन हमेशा किसी एक के सामने झुका हुआ रहे। और वो जो कोई एक है वो मन की कोई कल्पित वस्तु, विचार नहीं हो सकता। क्योंकि अगर मन अपनी ही किसी कल्पित इकाई के सामने झुका, तो फिर अपने ही सामने झुका यानि कि झुका ही नहीं। तो मन को यदि झुकना है तो मन को किसी बाहर वाले के सामने झुकना पड़ेगा – इस का नाम ध्यान है।

मन निरन्तर झुका हुआ रहे, ध्यान और श्रद्धा एक है। ध्यान मार्ग, भक्ति मार्ग जिनको दो अलग-अलग कह कर के खूब बातें करी गयी हैं; एक हैं।

प्र: वो है कौन जिसके सामने झुका रहे मन?

आचार्य: अगर इसका उत्तर दे दिया तो इसको ग्रहण कौन करेगा?

प्र: मन।

आचार्य: अगर मन ने ग्रहण किया तो जिसके सामने झुका वो कौन हुआ?

प्र: मन का ही अंश।

आचार्य: तो इसलिए ये सवाल ही एक दुःसाहस है, एक दुश्चेष्टा है, कि, "किसका ध्यान करें?" क्योंकि ज्यों ही पूछोगे कि किसका ध्यान करें तो फिर पूछोगे कि, "इस देवता का किस विधि से ध्यान करें?" क्योंकि अगर एक का ध्यान हो सकता है तो फिर कोई दूसरा भी हो सकता है जिसका ध्यान हो सके, फिर तीसरा भी।

जब अलग-अलग निकलेंगे तो फिर उनके अलग-अलग रंग रूप और चुनाव होंगे।

ध्यान का अर्थ है – हम नहीं जानते कि किसका ध्यान करना है, क्योंकि उसे जाना ही नहीं जा सकता, अज्ञेय है वो। और चूँकि उसे जाना नहीं जा सकता, यही ध्यान हुआ। मन निरन्तर इस भावना में जीता है कि, "मैं जान लूँगा।" सब कुछ ज्ञान के दायरे में आता है। मन ने ज्यों ही माना कि कुछ है जो ज्ञान के दायरे में नहीं आता अर्थात मेरे द्वारा नहीं जाना जा सकता- मन ध्यान में लीन हो गया।

ध्यान के नाम पर आप जितना कुछ होता देख रहे हैं, वो ध्यान नहीं है। वो बस इतना ही है कि मन अपने ही भीतर की किसी वस्तु पर केंद्रित हो रहा है।

प्र: शून्य पर ध्यान?

आचार्य: ध्यान में शून्य जैसा शब्द भी कुछ नहीं रह जाता। आप तो शून्य कहोगे, एक प्रयोग कर के देख लो - आप शून्य अभी कहो आपके मन में कोई-न-कोई छवि ज़रूर उठेगी। मैंने कहा 'शून्य', देखा मन में क्या उठा? तो शून्य तो बहुत कुछ है। ये जो शून्य है, ये तो बहुत बड़ा शून्य है। ज्यों ही आपने कुछ भी कह दिया कि पूर्ण का ध्यान करना है कि शून्य का ध्यान करना है, आपने ध्यान से मुँह मोड़ लिया। जब आप ध्यान की बात ही करना छोड़ दें, ये जान कर के कि ये बात तो करने वाली है ही नहीं, तब ध्यान हुआ। तब सर झुका, सर का झुकना ही ध्यान है। ध्यान का मतलब ये नहीं है कि आप किसी महत्त सत्ता के विषय में सोचने जा रहे हैं। ध्यान का अर्थ है कि जिसके विषय में सोचना हो सोचिए, पर दिल तो कहीं और लगा हुआ है। ख्यालों को जहाँ जाना हो जाने दीजिए, हृदय में कोई और ही स्थापित है – ये ध्यान है। सत्य की ओर लगातार उन्मुख रहते हुए जीवन जैसे जीना हो जियो, अब तुम ध्यानस्थ जीवन जी रहे हो। लेकिन समझिएगा, कि जो अभी मैंने सत्य शब्द का भी प्रयोग किया वो शून्य से अलग नहीं है। सत्य कहो कि शून्य कहो, ध्यान दोनों ही स्थितियों में हटा। तो सत्य भी कुछ नहीं है। असल में देखिए न, जैसे भी आप कुछ भी बनाते हैं ध्यान का विषय, ध्यान का केंद्र, आप एकाग्र होने लगते हैं किसपर? जिसको ‘आपने’ कोई केंद्र बनाया। और आप कोई केंद्र बना नहीं सकते, बिना उसकी छवि बनाए। छवि तो सत्य होती नहीं। नाम, रूप, आकार तो सत्य होते नहीं, वो तो सीमित होते हैं। और जो कुछ सीमित है, उसके साथ गड़बड़ बस ये है कि वो आपको शान्ति नहीं दे पाएगा। क्योंकि सीमित चीज़ें तो आपके पास पहले ही बहुत हैं। घर सीमित है, परिवार सीमित है, विचार सीमित हैं, आमदनी सीमित है। जो कुछ सीमित है, वो आज तक चैन कहाँ दे पाया?

जो कुछ भी आप शब्दों में पकड़ेंगे, वो सीमित ही होगा, उससे शांति मिलेगी नहीं, उससे चैन मिलेगा नहीं। ध्यान का मतलब है ये विनम्रता कि कुछ ऐसा है जिसके बारे में बात करना भी बदतमीज़ी है। कुछ ऐसा है जिसके बारे में चर्चा छेड़ना दुःसाहस है। कुछ ऐसा जो मुझे छू कर गन्दा नहीं करना चाहिए, यही ध्यान है। कुछ ऐसा जिसे मैं नहीं छू सकता, पर जो मुझे लगातार छुए हुए है। जिसे मैं गन्दा करने की कोशिश ना करूँ, क्योंकि वही अकेला है जो मेरी सफ़ाई करने का साधन ह – ये ध्यान है।

प्र: सर, राईट-फुल लिविंग माने क्या?

आचार्य: राईट-फुल लिविंग ध्यान की निष्पत्ति है, फल है ध्यान का। मन ध्यानस्थ रहेगा तो जीवन उचित रहेगा।

प्र: हम अपनी दिनचर्या जारी रखते हुए कैसे अपनी कंडीशनिंग से बाहर आ सकते हैं?

आचार्य: तो तुम तुले हुए हो कि तुम्हें काम वही करने हैं जो करते हो दिन भर?

प्र: वो तो धीरे-धीरे छूट ही जाएँगे।

आचार्य: तुम्हें कैसे पता कि छूट ही जाएँगे? ये तो तुमने पहले ही अनुमान लगा लिया, इसका मतलब है कि जानते हो कि कुछ है जीवन में जो छूट जाएगा, अगर सत्य की ओर गए। तो डरे हुए हो?

प्र: वो तो आपने पहले कहा ही है।

आचार्य: मैंने कहा था कि अगर घटिया होगा तो छूटेगा। तुम कह रहे हो कि, "मेरा छूट जाएगा", मतलब तुम क्या जानते हो?

प्र: घटिया है।

आचार्य: मत कहो कि, "मैं जो करता हूँ, वो करते हुए भी ध्यानस्थ कैसे रहूँ।" ध्यान पहले आता है, तो ध्यान को निर्धारित करने दो कि अब दिन कैसा बीतेगा। ये मत कहो कि, "दिन तो मुझे वैसा ही बिताना है जैसा मैं बिताता हूँ, और ऐसे ही दिन में मेरा ध्यान भी लगा रहे।" ध्यान पहले आता है, तुम्हारी दिनचर्या पहले नहीं आती। प्रथम कौन है, ये समझो। इसी का नाम ध्यान है, ध्यान माने जानना कि ऊँचा कौन है। ( टू व्होम टू अटेंड ) – प्रथम कौन है। तुम ध्यान में रहो, उसके बाद ध्यान तय कर देगा कि दिनचर्या में क्या बचना चाहिए, क्या नहीं। हो सकता है कुछ भी ना बदलना पड़े। हो सकता है दिन बिलकुल वैसा ही चले जैसा अभी चलता है, पर फिर भी सब कुछ बदल गया हो। और ये भी हो सकता है कि सब कुछ बदल जाए। बिलकुल कहा नहीं जा सकता कि ध्यान के साथ ज़िन्दगी कैसी होगी। ये बातें अनुमान लगाने की होती ही नहीं हैं। अनुमान लगाने का मतलब ही ये हुआ कि हम कुछ बचाने पर उतारूँ हैं। हमें कुछ नहीं बचाना। जो बचाने लायक है, वो तो सिर्फ ध्यान है। ध्यान से ऊँचा कुछ है ही नहीं जिसे बचाया जाए। तो आप ध्यान में रहिए, और जो बचना हो बचे, जो जाता हो जाए। फ़िक़्र क्या? जो असली चीज़ थी वो तो मिल गयी न, तो जो बचता हो बचे, और जो नहीं बचा वो गया।

ये मत कहो कि ज़िन्दगी वैसे ही चले जैसे चलनी थी, क्योंकि अगर ये कह रहे हो तो तुम्हारी प्राथमिकता हुई ‘ज़िन्दगी’। वही तुम्हारे लिए सर्वोच्च है। अगर ज़िन्दगी तुम्हारी प्राथमिकता है और उसे वैसे ही चलाना है जैसे चला रहे हो तो फिर ध्यान क्यों माँग रहे हो? जिन्हें ज़िन्दगी बदलनी हो वो उतरे न ध्यान में। तुम कह रहे हो कि, "गाड़ी मैकेनिक के पास ले जाऊँ पर चलनी वैसी ही चाहिए जैसी चल रही थी।" तो ले ही क्यों जा रहे हो? तुम ये कहो कि गाड़ी सुधर जाए, फिर जैसी भी चलेगी बेहतर चलेगी।

प्र: सर, आनंद पहले आता है और काम बाद में?

आचार्य: हाँ, आनंदित हो करके काम करें। आनंदित हैं, अब जो काम होता हो वो होगा। अब जो भी काम होगा वो आनंद के अनूकूल होगा। वो आनंद के विरोध में नहीं होगा, वो आनंद को नष्ट करने वाला नहीं होगा।

प्र: बी पॉजिटिव (सकारात्मक रहे)?

आचार्य: आनंद ये है कि कुछ सकारात्मक हो तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, मौज है आनंद। सकारात्मकता तो व्यापार है। नकारात्मक, सकारात्मक अब कोई कीमत नहीं रख रहे, ये आनंद है। अगर सकारात्मक कीमत रख रहा है, ये तो धंधे की बात है न; ये आध्यात्मिकता थोड़े ही है। पर ये खूब होता है न, आनंद के नाम पर सकारात्मकता। यही होता है अगर सत्य के नाम पर धंधा होता है, दुनिया ऐसी ही बन जाती है जैसी दिख रही है।

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