भगवद्गीता में श्रीकृष्ण को बोलना पड़ता है, “अर्जुन! ये सीधा-सीधा श्लोक है बिल्कुल इन्हीं शब्दों में है; अर्जुन! जब तक तुम वेदों की सकाम ऋचाओं से ऊपर नहीं उठते, जब तक जो काम्य कर्म हैं तुम उनसे बँधे हुए हो, तब तक तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आएगी।” उपनिषदों में कामनाओं की बात नहीं है, पर मंत्रों में है, वहाँ सब कुछ कामनागत ही है। सब प्राकृतिक देवी, देवताओं से कहा जा रहा है हमारी ये कामना पूरी कर दो वो कामना, और कामनाएँ सारी वही हैं पुरानी कामनाएँ — बेटा दे दो, ज़मीन दे दो, हमारे पशुओं के ज़्यादा दूध आए और हमारे शत्रुओं को आग लगाकर के मार दो, यही हैं। ये लोकधर्म है। और वास्तविक धर्म — निष्कामता।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।
आचार्य प्रशांत: हाँ।
प्रश्नकर्ता: लोकधर्म क्या है? और जो लोकधर्म प्रचलित चलता है उसका कोई महत्व भी है या बस उसका नुकसान ही है? और आप इसके इतने विरोध में क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: धर्म माने वो दिशा जो अहंकार को लेनी चाहिए अपने आचरण में, अपने विचार में, अपनी पहचान में। लोकधर्म का अर्थ है वो दिशा जो मैं परंपरा से लेता रहा हूँ। बैठ जाइए। (प्रश्नकर्ता से कहते हुए) जो मैं परंपरा से लेता रहा हूँ, और इसीलिए आगे भी लेना चाहता हूँ क्योंकि परंपरा में सुरक्षा है। लोकधर्म का अर्थ है ये कहना कि जो मेरी पुरानी आदत है वही मेरा अध्यात्म है। उसकी ओर अहंकार ज़्यादा आकर्षित होता है क्योंकि वो सब कर चुकने के पश्चात अहंकार आज तक शेष है न!




