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धर्म - सभी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान || आत्मबोध पर (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी सत्य के मार्ग पर चलना शुरू ही किया है और समस्याएँ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही हैं।

आचार्य प्रशांत: तो ठीक है, आगे तो बढ़ो थोड़ा। अभी तो बड़े मज़े में बखान कर रहे हो कि समस्याएँ आ रही हैं। थोड़ा पिटो। अभी तो फ़ैशन जैसा लग रहा है कि “मुझे भी, मुझे भी हो रहा है, मुझे भी हो रहा है।” जैसा नए-नए पीने वालों को होता है, कहते हैं, “हाँ, हाँ, हमें भी चढ़ रहा है, हमें भी चढ़ रहा है।" अरे, अभी तुम्हें चढ़ी नहीं है। जब चढ़ जाती है, तो कोई कहता नहीं कि चढ़ी हुई है। फिर ज़माना कहता है, चढ़ी हुई है, तुम अलग रहते हो।

प्र२: नमन, आचार्य जी। जब भी मैं किसी बच्चे का शोषण होते हुए देखती हूँ, चाहे ख़बरों में सुनूँ, चाहे सड़क पर देखूँ, या किसी दुकान में, मेरा मन बुरी तरह बेचैन हो उठता है। यथासंभव मदद करने की कोशिश भी करती हूँ, पर यही सोचती हूँ कि इसमें इन बच्चों का क्या कसूर है। जानती हूँ कि ज़्यादा कुछ कर नहीं सकती, बस परमात्मा से प्रार्थना करती हूँ कि सबको सद्बुद्धि मिले। क्या ये उन बच्चों के कर्मों का फल है? मैं उस तड़प से बाहर कैसे निकलूँ? मार्ग दिखाने के लिए धन्यवाद, आचार्य जी।

आचार्य: सब हम जुड़े हुए हैं, कुछ अलग अलग नहीं है मामला। उन बच्चों की जो स्थिति है, वो समाज की व्यापक स्थिति को दर्शाती है। बच्चों की हालत बिलकुल वही है जो समाज की हालत है। बस बच्चे ज़रा कमज़ोर हैं, तो उनकी दुर्दशा दिख जाती है। समाज बीमार तो है, लेकिन उसके साथ ही साथ कुटिल भी ख़ूब है, तो वो अपनी ख़राब हालत को छुपा ले जाता है।

आपको क्या लगता है दु:खी सिर्फ़ वो होता है जिसका शोषण हो रहा है? दुःखी बराबर का वो भी है जो शोषण कर रहा है। पर जो शोषण कर रहा है वो कुटिल है इसीलिए तो शोषण कर रहा है। चूँकि वो कुटिल है इसीलिए शोषण कर रहा है और चूँकि वो कुटिल है तो वो ये छुपा भी ले जाएगा कि वो कितना दुःखी है। बच्चे का दुःख दिख जाता है।

इसमें दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं है, इसमें दोष हम सबकी साझी मान्यताओं और धारणाओं का है। दोष उस बुनियाद का ही है जिस पर हमारा समाज खड़ा हुआ है। समाज अच्छा होता तो ये थोड़े ही हो पाता कि अपवादस्वरुप चार-पाँच बच्चों का शोषण चल रहा है कहीं पर। बच्चों का शोषण होता रहता है पूरे समाज के समर्थन और स्वीकृति से न।

भाई, आप जाते हैं, देखते हैं कि ढाबे पर कोई आठ साल का लड़का काम कर रहा है—अब कम हो गया है, पहले और ज़्यादा होता था—पर आप जाते हैं और देखते हैं ढाबे पर आठ साल का छोटू काम कर रहा है, उसको चवन्नी-चवन्नी कहकर बुला रहे हैं। आप कहते हैं, ढाबे वाले की बड़ी ग़लती, ढाबे वाले की बड़ी ग़लती! और वो जो छोटू है, वो चाय पिला किसको रहा है? जिनको पिला रहा है, वो मज़े में पी भी तो रहे हैं, पी ही नहीं रहे हैं, वो ढाबे वाले को पैसे भी दे रहे हैं उस चाय के। तो बात सिर्फ़ ढाबे वाले की है क्या?

समाज में इस बात को एक आम सम्मति मिली हुई है कि चलता है, कोई बात नहीं, चलता है। न चलता होता तो ढाबे वाले की हिम्मत ही नहीं होती कि वो आठ साल के लड़के को बर्तन धोने पर लगाए। और हम वैसे तो बड़े ममतामयी रहते हैं अपने बच्चों के प्रति, पर घर में काम वाली के साथ उसकी दस साल की लड़की अगर आ जाती है काम करने के लिए, तो हमें कोई आपत्ति नहीं होती। बल्कि अगर कभी काम वाली ये कह दे कि मैं अगले तीन दिन नहीं आ पाऊँगी, तीन दिन ये लड़की आ करके झाड़ू-पोछा कर दिया करेगी।

तो हम कहते हैं, “कोई बात नहीं, तूने अपनी बदली ही तो लगाई है, तू नहीं आ सकती थी तो तूने अपना विकल्प, सब्स्टीट्यूट लगा दिया। ठीक है, ये लड़की आकर करेगी।” तब हम नहीं कहते, “कोई बात नहीं, तीन दिन तू नहीं आएगी, हम ही कर लेंगे, पर इसको बच्चे को मत भेज। ये और बता दे कि ये स्कूल जाती है या नहीं जाती है। और अगर ये स्कूल नहीं जाती तो सौ-पाँच सौ हमसे ले-ले, पर स्कूल भेज दिया कर इसको।”

मैं नहीं कह रहा, ऐसा कोई नहीं कहता। बहुत लोग हैं, बहुत परिवार हैं, जहाँ पर ज़रा अब नज़र साफ़ हो रही है, मन बदल रहा है। लेकिन अभी भी ये बातें अगर चलती हैं तो सर्वसामान्य के समर्थन से चलती हैं।

हमें ये बुरा लगता ही नहीं, अजीब लगता ही नहीं कि अगर मॉल से आप खा-पीकर के निकले और बाहर दस-बारह साल वाले बच्चे गुब्बारा इत्यादि बेच रहे हैं। अब बात को ज़रा और गहरे ले जाओ, ऐसा हो क्यों रहा है कि एक मॉल जो पूँजी का अड्डा है, उसके आगे कुछ बच्चे इतने ग़रीब खड़े हैं कि उनको रात के ग्यारह बारह बजे भी, ठण्ड में भी, और कई बार तपती दोपहर में भी गुब्बारे बेचने पड़ रहे हैं? ज़रूर इसका कोई ढाँचागत कारण होगा, कोई स्ट्रक्चरल रीज़न होगा न।

हमारी अर्थव्यवस्था जिस तरीक़े से बनी है, हमारा समाज जिस आधार पर खड़ा है, ज़रूर उसी में कोई ऐसी बात है कि एक मॉल जो पूँजी का अड्डा होता है, जो उपभोक्तावाद का गढ़ होता है, जहाँ रोज़ कई कई लाख बल्कि करोड़ों का लेन देन होता है, बड़े ट्रांज़ैक्शन (लेन-देन) होते हैं, उसके सामने दस रूपए के लिए भी एक बच्चा फटे हाल गुब्बारे बेच रहा है। ज़रूर कोई बात होगी जिस तरीक़े से हमने अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है। पर हम इन बातों में जाना नहीं चाहते।

हाँ, हमारा दिल बहुत काँपता है, बहुत पिघलता है, तो हम उस बच्चे को सौ का नोट निकाल कर दे देंगे, कहेंगे, “आज हम बड़े विशाल हृदय हैं। बच्चे, आज तेरा दिन अच्छा है, गुब्बारा भी नहीं चाहिए, ले ये सौ का नोट रख।" और बच्चा भी ये सोचता है कि बहुत बढ़िया हो गया। हम ये नहीं देख रहे हैं कि बच्चे को सौ का नोट देकर हमने कोई बड़ा काम नहीं कर दिया, क्योंकि हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं ऐसे हज़ारों बच्चे पैदा करने के लिए। ऐसी अर्थव्यवस्था हमने ही रची है।

जहाँ कहीं भी पूँजी का केन्द्रीकरण होगा, जहाँ कहीं भी पूँजी का संचय होगा सिर्फ़ कुछ हाथों में, वहाँ एक बहुत बड़ा वर्ग होगा जो सड़क पर गुब्बारा बेचने को बाध्य हो जाएगा। लेकिन हम उस बात का विरोध कैसे कर सकते हैं, जब हम ख़ुद ही उन चंद लोगों में शामिल होना चाहते हैं जो पूँजीपति हैं?

समझना। हमारी जो व्यवस्था है उसमें ये आवश्यक हो गया है, उसका ढाँचा ही ऐसा है कि पूँजी का केन्द्रीयकरण होगा ही होगा। एक कंपनी है उसमें काम करते हों पाँच हज़ार कर्मचारी वो पाँच हज़ार कर्मचारी मिल करके जो मुनाफ़ा कमाते हैं, वो मुनाफ़ा किसका है? चंद शेयर होल्डर्स का ही तो है न, उन्हीं शेयर होल्डर्स का है न? ये बात उस कंपनी के विधान में लिखी होती है, आर्टिकल्स ऑफ़ एसोसिएशन में लिखी होती है। काम भले दस हज़ार लोग करें, लेकिन जो पूरा मुनाफ़ा है, वो अगर चार शेयर होल्डर्स हैं तो उन्हीं के हाथ में जाना है।

लेकिन ये सब कर्मचारी मज़े में काम करते रहते हैं, बल्कि उन कंपनियों में अगर हमारी नौकरी लग जाए तो हम ख़ुशी मनाते हैं। आप ख़ुशी वास्तव में इस बात पर मना रहे हो कि अब और ज़्यादा पूँजीगत सत्ता चंद हाथों में केंद्रित होने जा रही है। और अगर और ज़्यादा पूँजी चंद हाथों में जा रही है, तो और लोग अगर पूँजी से अनछुए रह जाएँ, और लोग अगर पूँजी के प्यासे ही रह जाएँ, तो इसमें ताज्जुब क्या है?

हम स्वयं भी चाहते हैं कि एक दिन ऐसा आए कि हम ख़ुद शेयरहोल्डर कहलाएँ। हम स्वयं भी चाहते हैं कि एक दिन ऐसा आए जब हमारे लिए दस हज़ार लोग काम करें। दस हज़ार नहीं तो चलो दस ही सही, पर हमारे लिए काम कर रहे हैं, उनकी मेहनत से जो सरप्लस (आधिक्य) पैदा हो रहा है, वो हमारी जेब में आ रहा है। इस पूरे विज़न (दृष्टि) में सड़क पर जो बच्चा गुब्बारा बेच रहा है, उसके लिए क्या जगह है? कोई जगह है? है क्या कोई जगह?

मैं नहीं कहता कि जगह हो नहीं सकती या किसी भी शेयर होल्डर या एंटरप्रेन्योर (उद्यमी) के मन में जगह होती नहीं है ऐसी, पर अधिकांशतः मुझे बताओ तो। नहीं तो ये बात ही बड़ी बचकानी है, जो देखे उसी को ताज्जुब होगा कि मॉल से तो एक-एक करके बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ निकल रही हैं। एक-एक करके बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ और अंदर सब इंटरनेशनल ब्रांड के शोरूम हैं। मान लो दक्षिणी दिल्ली की कोई मॉल है, या गुड़गांव की कोई बड़ी मॉल है। और वहाँ सब क्या हैं? इंटरनेशनल ब्रांड्स हैं और गाड़ियाँ भी वहाँ से इंटरनेशनल ही निकल रही हैं सब। वो बाहर गाड़ियाँ निकलती हैं तो कहाँ जा कर रूकती हैं? फटेहाल दस रूपए का गुब्बारा बेचते बच्चे के बगल में।

ये माजरा क्या है? इतना पैसा एक तरफ़ और इतनी ग़रीबी एक तरफ़, आमने ही सामने, बिलकुल आमने सामने खड़े हैं, ऐसा हो कैसे गया? इस प्रश्न पर हम विचार नहीं करना चाहते, बल्कि वो ग़रीबी हमें दिखे तो अपना अपराध बोध, अपनी गिल्ट मिटाने के लिए हम उस बच्चे को सौ रूपए दे देंगे। इतने से काम नहीं चलेगा, ये पूरी तस्वीर बदलेगी तब बात बनेगी।

और ये तस्वीर तब बदलेगी जब आदमी का मन बदलेगा, क्योंकि आदमी के मन में जब तक ये वासना है कि मैं संसार के ऊपर चढ़कर बैठ जाऊँ, मैं भी दुनिया का टॉप व्यापारी, बिजनेसमैन , एंटरप्रेन्योर कहलाऊँ, तब तक पूँजी का सेंट्रलाइसेशन (केन्द्रीकरण) होता ही रहेगा, क्योंकि यही तो सपना हमें बचपन से सिखाया जाता है न, “बेटा, तुम सबसे आगे निकल जाना।” सबसे आगे निकलने का मतलब क्या हुआ? सबसे ज़्यादा बटोरकर तुम अपने पास कर लेना और सबसे ज़्यादा बटोरकर तुमनें अपने पास कर लिया, तो दूसरों के लिए बचा क्या? आदमी का मन बदलेगा, ये तस्वीर बदलेगी।

प्र२: इसे रिवोल्यूशन या धर्मयुद्ध कह सकते हैं?

आचार्य: बिलकुल, बिलकुल, इट नीड्स अ स्पिरिचुअल रिवोल्यूशन (एक आध्यात्मिक क्रांति की आवश्यकता है)। जब तक आम आदमी को ये समझ में नहीं आता कि जिन आधारों पर वो ज़िन्दगी जी रहा है वो घातक हैं, दूसरों के लिए ही नहीं, अरे उसके अपने लिए, तुम्हारे अपने लिए, तुम्हारे बच्चे के लिए घातक हैं जिन आधारों पर तुम जी रहे हो। तुमनें भविष्य के जैसे सपने बनाएं हैं वो सपने ज़हरीले हैं, भले ही तुम्हें कितने मीठे लगते हों। जब तक आम आदमी को ये नहीं समझ में आएगा, तब तक सब कुछ रहेगा, ग़रीबी रहेगी, शोषण रहेगा, जितनी बातों की आप यहाँ चर्चा कर रही हैं वो सब रहेंगी।

इस समय की बड़ी घातक बात ये है कि धर्म बिलकुल पीछे छूटता जा रहा है। लोगों ने कहना शुरू कर दिया है *दिस इज़ पोस्ट रिलिजन एज*। अब हम उस युग में प्रवेश कर चुके हैं जिस युग में कोई धर्म नहीं है, धर्म की बात पुरानी हुई।

श्रोता: पैसा ही धर्म है अब।

आचार्य: कल मैं इससे कह रहा था, धर्म क्या है? सेल्फ़ी धर्म है, पैसा तो फिर भी आपने बहुत सुसंस्कृत बात कर दी। धर्म वो जिसको तुम धारण करो। तो कल यहाँ आते वक़्त रास्ते में एक जगह रुका, वहाँ जितने थे सब सेल्फ़ी धारण कर रहे थे, मैंने कहा यही धर्म है। जिसको देखो वही ये धारण कर रहा है। तो यही धर्म है, और तो कोई धर्म बचा नहीं है।

पहले कहा गया कि गॉड इस डेड (भगवान मर चुका है) और जब कह दिया गया कि गॉड इस डेड तो धर्म काहे का? धर्म का तो अर्थ ही था उस तक पहुँचना। जब तुमने उसी को ख़त्म कर दिया तो कौनसा धर्म? तो अब कोई धर्म नहीं है। यही धर्म है कि पैसा ख़ूब कमा लो, सुख प्लेज़र किसी तरीक़े से मिल जाए, भले उससे तुम्हारे भीतर कितना ज़हर बढ़ता रहे। तो हम ख़त्म भी हो रहे हैं, दूसरों को भी ख़त्म कर रहे हैं।

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