धर्म की आलोचना, मौत की सज़ा? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: अभी हाल ही में, न्यूयॉर्क में एक संवाद सत्र के लिए, जो एक मशहूर लेखक हैं सलमान रुश्दी जी, वो गए थे और वहाँ पर उनके ऊपर हमला हुआ। उस बात की यदि हम जड़ों में जाएँ, तो चौंतीस साल पहले उनके लिए जो एक फ़तवा निकाला गया था, वो व्यक्ति वहाँ से प्रेरित था जिसने ये हमला किया। इस पर ये प्रश्न बनता था कि क्या कभी भी, किसी धर्म या मज़हब की निंदा करना सही है या ग़लत? इस पर आप क्या कहेंगे?
आचार्य प्रशांत: क्यों नहीं होनी चाहिए, बिलकुल होनी चाहिए। वास्तविक धर्म तो जिज्ञासा से ही आगे बढ़ता है। वास्तविक धर्म तो चाहता है कि तुम उसको ठोको-बजाओ, उसकी परख करो। धर्म वास्तविक है या नहीं, इसका पता ही इसी बात से चलता है कि वो तुमको सवाल-जवाब, निंदा-आलोचना की कितनी अनुमति दे रहा है।
लेकिन दुनिया भर के सब सम्प्रदायों में, तथाकथित धर्मों में, मज़हबों में, ये सी-असहिष्णुता, पहले भी रही है और हम पा रहे हैं कि अब और ज़्यादा बढ़ती जा रही है, 'हमें कुछ कह मत देना'। क्यों भई! तुम इतने कमज़ोर हो क्या कि तुम्हें कुछ कह दें तो तुम्हें चोट लग जाती है? गर्दनें काट दी जाती हैं, आक्रमण हो जाते हैं। ज़रा-ज़रा सी बात पर लोग कोर्ट में चले जाते हैं कि, 'हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस लग रही है।'
किसी किताब में आप कुछ लिख दीजिये, जो ज़रा भी किसी समुदाय के ख़िलाफ़ हो; वो पहले तो किताब चौराहों पर जलाई जाएगी, फिर जिन भी बुक स्टोर्स पर वो किताब रखी होगी उसके शीशे तोड़ दिए जाएँगे। उसके बाद सरकार खुद ही उस किताब पर प्रतिबन्ध लगा देगी, अगर तब तक कोर्ट ने उसको छोड़ दिया है तो। नहीं तो फिर कोर्ट कर देगा।
ये बात किताबों पर ही नहीं, फिल्मों पर भी होती है। अभिव्यक्ति के जितने माध्यम हैं, सब पर अंकुश लगाया जा रहा है। बोलने वालों के मुँह में कपड़ा ठूसा जा रहा है; तुम बोल नहीं सकते। बोलने वालों से मैं हमेशा कहता हूँ, बोलने से पहले सौ बार सोचो। तुम जो बात बोल रहे हो क्या वो बोलने लायक भी है? तमाम मौकों पर मैंने उन लोगों की बड़ी भर्त्सना करी है, जो धर्म की भर्त्सना करते हैं। जो दिन-रात धर्म की निंदा करने में ही लगे रहते हैं। बहुत सारे ऐसे पेशेवर लोग हैं, जिनका एक ही काम है–धर्म की निंदा करो।









