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धर्म बदलना नहीं चाहता, पर सहा भी नहीं जाता || आचार्य प्रशांत (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: मैं दलित हूँ! धर्म परिवर्तन के बहुत से अवसर मुझे उपलब्ध हैं पर मैं धर्म परिवर्तन नहीं करना चाहता; साथ-ही-साथ पारंपरिक हिन्दू धर्म मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: दिक्कत सारी यह है कि आपको दो ही विकल्प दिख रहे हैं, कि या तो सनातन धर्म की धारा से अलग हो जाओ या पारंपरिक धर्म निभाओ! इन दो के अलावा आपकी दृष्टि में कोई तीसरा है नहीं, बस यही सारी समस्या है। आप कहते हैं, अगर आपके शब्दों में कहूँ — या तो दूसरे धर्म हैं, पंथ या मज़हब, या पारंपरिक हिन्दू धर्म है जिसमें जातिवाद है; और इसके अलावा कोई तीसरा हो सकता है इसका आपको कोई ख़्याल नहीं। वास्तव में हिन्दू धर्म को तो हम जाति से बिलकुल जोड़ कर ही देखते हैं, जैसे हिन्दू धर्म के केन्द्र में जाति बैठी है। ऐसा नहीं है भाई! बिलकुल भी नहीं है।

मैं पूरी संवेदना रखता हूँ आपके साथ, लेकिन यह भी मैं आपको कहना चाहता हूँ कि सनातन धर्म और जातिवाद एकदूसरे के पर्याय बिलकुल नहीं हैं, बल्कि सनातन धर्म किसी भी तरह के भेद को बर्दाश्त नहीं करता जातिगत भेद तो बहुत दूर की बात है।

किस सनातन धर्म की बात कर रहा हूँ मैं? उसकी नहीं जिसका व्यवहार आप समाज में, मोहल्लों में, सड़कों में देखते हैं, नहीं उसकी नहीं बात कर रहा हूँ। उसमें तो जाति-वाती ख़ूब चलती है और सौ तरह के भेद हैं उसमें, दीवारें हैं, विभाजन हैं, तो निश्चित रूप से मैं उसकी तो नहीं बात कर रहा। मैं किस सनातन धर्म की बात कर रहा हूँ? जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव, विभाजन नहीं स्वीकार किया जाता; मैं वास्तविक सनातन धर्म की बात कर रहा हूँ।

वैदिक धर्म का शीर्ष है वेदांत, और वेदांत की जो शुद्धतम अभिव्यक्ति है वह है 'अद्वैत वेदांत'। अद्वैत कितना प्यारा शब्द है न? कैसा विभाजन? यह तो शब्द ही जैसे विभाजन का गला काटने के लिए खड़ा हुआ हो, 'अद्वैत!' यह भी नहीं बोल रहा कि सत्य एक है, वह कह रहा है जहाँ दो है उसको काट रहा हूँ मैं, ‘अद्वैत’।

तो यह भी नहीं की विभाजन मना किया गया है, पता है कि विभाजन तो होगा क्योंकि इंसान की फ़ितरत ही ऐसी होती है, हमारी जन्मजात वृत्ति ही ऐसी होती है कि हम सौ तरह की ऊँच-नीच वगैरह बनाएँगे ही बनाएँगे। यह अच्छा, यह बुरा, यह बढ़ियाँ, यह ग़लत, ऐसा-वैसा; उन्हीं सब चीज़ों को काटने के लिए है, 'अद्वैत'।

मैं स्वागत करता हूँ, शिविर तक तो आ ही गए हो अब सत्य तक आओ! उपनिषदों से जुड़ो, और फिर बताओ मुझे कि वहाँ कहाँ है किसी भी तरह का भेदभाव? प्रशंसा करता हूँ मैं आपकी कि आपके भीतर जो क्षोभ है जाति व्यवस्था के खिलाफ़, और आपने दुर्वव्यवहार सहा होगा, पक्षपात बर्दाश्त किया होगा, हो सकता है अपमान भी झेलना पड़ा हो जीवन में कुछ अवसरों पर, उन सब पीड़ाओं के बाद भी आपने अपने मन का हाल यहाँ पर खोलकर रख दिया, जीवन में जो कुछ चल रहा है आपने साफ़-साफ़ बताया, मैं आपकी प्रशंसा भी करता हूँ; अब आपको आमंत्रण देता हूँ कि आगे बढ़िए और उपनिषदों में प्रवेश करिए। इतना भरोसा मैं पहले ही दिला दूँ कि वहाँ आपको मनुष्य मात्र की गरिमा मिलेगी; न ऊँच-नीच, न भेदभाव न, न छुआछूत, न किसी तरह की दीवार, न विभाजन।जितने विभाजन हैं वही तो मिथ्या हैं।

अभी कल हम निरालंब उपनिषद का पाठ कर रहे थे और शिष्य ने पूछा ऋषि से कि, जाति क्या है? ऋषि कहते हैं, किसकी जाति? (व्यंगात्मक हँसी) यह तो हम बाद में बताएँगे जाति माने क्या? पहले पूछते हैं जाति किसकी? फँसा दिया उसको, लड़के को। ठीक ऐसा नहीं है श्लोक पर उसका जो मर्म है वह बता रहा हूँ।

तो पूछते हैं शरीर की होती है जाति क्या? शरीर की जाति क्या होगी, शरीर तो पदार्थ है पदार्थ की क्या जाति होती? यह है (हाथ में लिए कप की ओर दिखाते हुए) इसके भीतर है चाय, ठीक है। बता दूँ क्योंकि बहुत लोगों को इसी में उत्सुकता रहती है, क्या पीते हो? चाय पीता हूँ। यह है चाय, इसमें क्या है, इसमें अणु हैं अणु। यह क्या है? यह एक इलेक्ट्रानिक डिवाइस है। इसमें भी क्या है? इसमें भी अणु है। यह क्या है? कागज़ है, यह क्या है (सर की ओर इशारा करते हैं)? खाल है, इनसब में क्या है? यह पदार्थ है, इनकी क्या जात हो सकती है।

इनका तो तथ्य एक है, ठीक है न। इनका तथ्य है अणु-परमाणु, उसके और नीचे अगर चले जाओगे तो क्वार्क्स (प्राथमिक कण), वेव्स (तरंगें), और छोटे-छोटे होते हैं, सबऐटमिकपार्टिकल्स (अवपरमाणुक कण); यह सब मिलेंगे, वहाँ जाति क्या हो सकती है, कौन ऊँचा, कौन नीचा।उसमें तो जितना नीचे जाते जाओगे, जो भी चीज़ है वह टूटती जाएगी, टूटती जाएगी और एकदम फंडामेंटल पार्टिकल्स (मौलिक कण) उसमें निकलते जाते हैं बताओ जाति कहाँ आएगी?

तो ऋषि कहते हैं शरीर की तो कोई जाति होती नहीं, ख़ून की कोई जाति नहीं होती। ख़ून की अगर जाति होती तो ब्लड-बैंक में अलग-अलग जातियों के अलग-अलग ख़ून रखे होते भाई! और ग़लत जाति का ख़ून, ग़लत जाति को चढ़ जाता तो मौत हो जाती। जैसे — आर एच+, आर एच- RH+, RH- होता है, या फ़लाना होता है बी+ B+ और यह सब होता है न, यह होती हैं जातियाँ कि भाई जैसे हमको पता है कि आमतौर पर अब कार्बन का रिएक्शन सीधे-सीधे आयरन से नहीं होगा, ऑक्सीजन का हो जाएगा आयरन से। इसी तरीक़े से फ़लाने आदमी को फ़लाने आदमी का ख़ून चढ़ेगा। लेकिन वह जो ख़ून चढ़ता है वह इस हिसाब से नहीं चढ़ता है कि बाह्मण का ख़ून है, कि वैश्य का ख़ून है, कि दलित का ख़ून है, वह तो बिलकुल दूसरे ही आधारों पर चढ़ता है, तो पदार्थ की ऐसी प्रकृति है।

ऋषि कहते हैं, पदार्थ की तो, माने शरीर की तो होती नहीं जाति। इसी तरीक़े से आत्मा की क्या जाति होगी आत्मा तो अजात है। जाति का तो मतलब ही यह है कि जो चीज़ जन्म के साथ आए। जात माने जिसने जन्म लिया हो, और आत्मा क्या है? अजात है। जाति तो वह चीज़ है जो जन्म के साथ आती है, आत्मा तो अजात है। जैसे, अमर है और अजात, दो बातें है। कहते हैं किसकी जाति? फिर कहते हैं, ‘प्रकट सी बात है न, यह तुम्हारे व्यवहार में प्रयुक्त प्रकल्पना मात्र है, जाति।’

इसी तरीक़े से अन्यत्र भी, अनेक जगहों पर ऋषि जाति वगैरह का पूर्ण खंडन करते हैं। वह न भी खंडन करें तो भी उपनिषदों की पूरी धारा ही तुमको बता रही है कि आत्मा हो तुम, देह नहीं, मन नहीं, भाव नहीं, प्राण नहीं, इंद्रियाँ नहीं, अहम् नहीं, आत्मा मात्र हो तुम।आचार्य शंकर ने “निवार्ण षट्कम” कहा, उसमें देखना ज़रा तुम्हारी किन-किन पहचानों को नकारा गया है; उतनी पहचानों के नकारने के बाद जाति बची रह जाएगी क्या? न तुम पंचभूत हो, न तुम पंचकोष हो, न तुम ज्ञानेंद्रियाँ हो, न तुम कर्मेंद्रियाँ हो, न तुम स्त्री हो, न तुम पुरूष हो, तो कौन जात के हो? (हँसते हैं)

बस तो जाति बची कहाँ? इतिहास का न जाने क्या खेल, कैसी विडंबना कि इतनी तीव्रता से जिस धर्म ने सब भेदों को नकारा, उसी धर्म में जातिप्रथा इतनी गहराई से घुसपैठ कर गई; माया का खेल है, भयानक। जहाँ यह कहा गया की किसी भी तरह का कोई भी भेद सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि सत्य क्या है – अखंड, अकाट्य, अभेद! जब सत्य अभेद है तो भेदों का सत्य में क्या स्थान? भेद अगर तुम कोई खड़े कर रहे हो तो वह चीज़ मिथ्या ही होगी, झूठ ही होगी; जो चीज़ झूठ है, उसको क्या मूल्य क्या सम्मान?

जहाँ इतना ज़्यादा सब तरह के दुराग्रहों को, पक्षपातों को, मतों को नकारा गया, उस राष्ट्र में जात-पात इतना गहरे पैठ गया तो आदमी की वृत्ति ही ख़राब है। समझाने वाले कितना भी समझा लें, कितना भी वह प्रयत्न और बंदोबस्त कर लें, लेकिन हम अपनी ही चलाने की कोई-न-कोई तरक़ीब जुगाड़ ही लेते हैं; तो इस तरह से जात-पात का खेल चलता रहा है।

वेदांती कहो अपने आपको! कोई पूछे, क्या जात है तुम्हारी? कहना, ‘अद्वैत’। कोई पूछे धर्म क्या है तुम्हारा? कहना, ‘वेदांत’। क्या जात है? अद्वैत। धर्म क्या है? वेदांत। जो शांति मिलेगी,जो आनंद मिलेगा, जो पूर्णता मिलेगी, अपूर्व। यह तो छोड़ दो फिर कि कोई तुम्हारे साथ दूसरा आकर भेदभाव करेगा, तुम ऐसे हो जाओगे कि दूसरा कोई कुछ भी कहता रहे, या करता रहे तुम पर कोई फ़र्क पड़ने नहीं वाला।

आत्मा की हम बात कर रहे हैं न,

आत्मा में जैसे कोई भेद, विभाजन, खंड नहीं होते, इसी तरीक़े से आत्मा पर कोई दूसरा आकर के प्रभाव नहीं डाल सकता; आत्मा को चोट नहीं लगती, आत्मा में विकार नहीं आते, कुछ भी हो जाए, कैसी भी स्थितियाँ हो जाएँ, आत्मा में दोष नहीं उत्पन्न होते। तो कोई कुछ भी करता रहेगा तुम्हारे साथ, वेदांत की कृपा से अगर 'आत्मस्थ' हो गए तुम तो तुमपर कोई असर नहीं पड़ेगा।

तो 'वेदांत' है धर्म! 'अद्वैत' है जात! या और कोई अगर पूछ ही रहा हो जात और तुम्हारा थोड़ा सा मन भी हो मज़ाकिया, परिहास करने का तो कहना, ‘हम अजात हैं।’ आत्मा का ही दूसरा नाम होता है अजात। कोई पूछे का जात है? तुम कहना, 'अजात, आत्मा हैं हम, अजात।’

प्रश्न: अगर आत्मा ही मेरी जाति है तो मैं किसी से संबंध किस आधार पर रखूँ? क्योंकि आत्मा तो असंग होती है, आत्मा किसी से संबंध रखती नहीं?

आचार्य: आत्मा तुम्हारी असली जाति है लेकिन तुम्हारा जीवन अभी असली हुआ कहाँ है। आत्मा तुम्हारी सच्चाई है, पर अभी तुम उस सच्चाई में जी नहीं रहे हो न। तुम उस सच्चाई की जगह अभी एक कल्पना में जी रहे हो, जिस कल्पना में तुम एक शरीर हो, तुम्हारे चारों ओर एक जगत है, जिस जगत से उस शरीर को कुछ फ़यादा-नुक़सान हो सकता है; हम इस कल्पना में जी रहे हैं, हम आत्मभाव में कहाँ जीते हैं? नहीं जीते न? तो फिर हमें संगति कैसी करनी चाहिए? जो हमें आत्मभाव की ओर ले जा सके, यही कसौटी है।

संगति उसकी करो जो तुम्हें देहभाव की जगह आत्मभाव की ओर ले जा सके; बस ऐसे करना है। आत्मा असंग होती है, लेकिन तुम अभी आत्मा तो नहीं! आत्मा तुम्हारे लिए थोड़ी दूर की कौड़ी है, आत्मा संभावना है और शरीर और जो तुम्हारी मान्यताएँ, कल्पनाएँ हैं वह तुम्हारा यर्थाथ है। तुम्हें अपने इस झूठे यथार्थ से अपनी सच्ची संभावना की ओर जाना है; जो तुम्हें ले जा सके उसकी संगति कर लो, यह कसौटी है।

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