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डर से निडरता की ओर कैसे जाएँ? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन में कई तरह के भय उठते हैं, तो हम भय से अभय की ओर कैसे आयें?

आचार्य प्रशांत: भय तुमको है। तुम पहले हो, भय बाद में है। तुमने भय का ‘चुनाव' करा है। तुम्हारी हालत ऐसी है, तुम्हारी नीयत ऐसी है, तुम्हारी आत्म-परिभाषा ऐसी है, तुम्हारे इरादे और तुम्हारी ज़िद ऐसी है कि तुम्हें भय को पकड़कर रखना है। तो तुम्हारा प्रश्न ही ग़लत है कि हम भय से अभय की ओर कैसे आयें। तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे भय ज़बरदस्ती आकर के तुमसे चिपक गया है।

जहाँ लालच है वहाँ भय है, जहाँ झूठ है वहाँ भय है, जहाँ अन्धेरा है वहाँ भय है। भय पीछे आता है, पहले कामना आती है। जिसको लालच नहीं, उसे डर होगा क्या? जो झूठ नहीं बोल रहा, वो किससे डरेगा? अब अभय तो चाहिए लेकिन लालच नहीं छोड़ने हैं, कामनाएँ नहीं छोड़नी, ज़िन्दगी के हसीन सपने नहीं छोड़ने। ज़िन्दगी के हसीन सपने पालते ही रहोगे तो साथ में भय मिलता ही रहेगा। अभय कहाँ से आ जाएगा? हम असम्भव माँग करते हैं, हम कहते हैं, 'ज़िन्दगी में जो कुछ मुझे अच्छा लगता है, ज़िन्दगी में जो चीज़ें मुझे पसन्द हैं वो सब तो मिली ही रहें और आगे भी और मिलती जाएँ, बस डर न लगे!'

प्र: जैसे एंटी एन्ज़ायटी पिल‌। (घबराहट से बचाने वाली दवा की गोली)

आचार्य: हॉं, ये सब कर सकते हो। वो फिर वैसा ही है कि जैसे कोई गोली एंटी एन्ज़ायटी पिल की तरह ही ईजाद हो जाए कि तुम खाना तो खाओगे पर मल त्याग नहीं करोगे। भोजन करना और मल त्याग करना साथ-साथ चलता है न? तुम ये नहीं कह सकते कि सुगन्धित खाना खाया है तो अब ये दुर्गन्धयुक्त मल क्यों निकल रहा है। जिसको तुम सुगन्धित खाना कहते हो, उसको दुर्गन्ध वाले मल में बदल जाना है।

पर ग़लत जीवन जीते हुए भी तुम एंटी एन्ज़ायटी पिल्स का इस्तेमाल कर लेते हो कि ज़िन्दगी तो ग़लत जिये पर भय और तनाव तब भी न हो। वो वैसा ही है कि खाते तो जा रहे हैं और गोली ऐसी ले ली है कि मल न आये। अब मल नहीं आएगा, तो फिर देख लो! ‘मलामाल’ हो जाओगे। (सभी श्रोता हँसते हुए) सेठ जी बिलकुल फूलते जा रहे हैं, मलामाल हो गये हैं।

प्र: कुछ है जो हमारे जीवन से जुड़ा हुआ होता है जैसे जीविकोपार्जन है, या नौकरी है, या पैसा है तो उसको खोने का जो भय होता है वो स्वाभाविक तौर पर होता है?

आचार्य: नहीं भाई! कोई स्वाभाविक नहीं होता। इसको अगर स्वाभाविक बोलोगे तो फिर जो लोग तुमसे भय दिखाकर के काम कराये जाते हैं, वो काम कराये ही जाएँगे।

जीविका जीवन से बड़ी थोड़े ही हो गयी, कि हो गया? मुक्ति स्वभाव है, आनन्द स्वभाव है। और तुमने कह दिया कि जीविका खोने का भय स्वाभाविक होता है। भय कब से स्वभाव हो गया भाई? तुम चाहो तो मजबूरियों का रोना रो सकते हो, तुम चाहो तो मुझे व्यावहारिकता का पाठ पढ़ा सकते हो कि घर पर इतने लोग हैं, मुझपर आश्रित हैं, आठ बच्चे हैं उनको पढ़ाना है, छ: बहनों की शादी करनी है।

अस्सी के दशक में जैसी हिन्दी फ़िल्में बनती थीं, भावुकता से ओत-प्रोत, उस तरीक़े के कई तुम मुझे भावुक तर्क दे सकते हो कि आचार्य जी आप क्या जानें, आप तो बैरागी-संन्यासी हैं। आपको क्या पता कि गृहस्थों को क्या-क्या झेलना पड़ता है। दे लो तर्क। तुम तर्क दे लो, मैं कहूँगा, ठीक है। तुम्हारी ज़िन्दगी तुम जानो भाई! तुम्हें अगर इन्हीं तर्कों पर चलना है तो चलो फिर, निर्भयता की बात ही मत करो।

बेकार की नौकरियों में पड़े रहने के पक्ष में, तुम यही सब तो तर्क देते हो न कि बड़ी ज़िम्मेदारियाँ हैं। अरे! ज़िम्मेदारियाँ हैं तो कुछ पुरुषार्थ भी तुम में है या नहीं है? आगे बढ़ो! आय का वैकल्पिक कोई तरीक़ा ढूॅंढो। जितना खून जलाते हो बेकार नौकरी को बर्दाश्त करने में, उसका चौथाई खून जलाकर के कोई बेहतर नौकरी ढूॅंढ लो, कि नहीं?

प्र: वो डर इसके आड़े भी आ जाता है कि ये भी हाथ से जाएगी, आगे पता नहीं मिलना नहीं मिलना। जो चल रहा है इसी को चलाये चलो।

आचार्य: अरे! तो बुद्धि किसलिए है? बुद्धिबल, बाहुबल इन सबका ज़रा इस्तेमाल करो न। इनका प्रयोग करोगे तो ही ये जाग्रत होंगे और बढ़ेंगे। आत्मबल चाहिए इस संकल्प के लिए कि ग़लत काम में नहीं फॅंसे रहना है, बुद्धिबल चाहिए सही काम ढूॅंढने के लिए, बाहुबल चाहिए सही काम करने के लिए।

प्र: हमारी जब तक मानसिक स्थिति नहीं बदलेगी तो यदि हम अपना भी कुछ करते हैं तो वहाँ भी दूसरे से भय रहेगा। हमारे व्यवसाय या हमारी नौकरी छूटने का भी डर रहेगा तो ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए?

आचार्य: बिलकुल रहेगा। लेकिन जो तुम फ़िलहाल जीवन बिता रहे हो, भय तो उसमें भी है। डर जब ग़लत जीवन बिताने में भी लगता हो और सही ज़िन्दगी बिताने में भी, तो कम-से-कम सही डर का चयन करो। आदमी को शान्ति प्यारी होती है, उसको बचाने के लिए वो डरता है। पर जिसको बचाने के लिए तुम डर रहे हो, वो डर-डरकर बच भी रही है? दिनभर अशान्त हो, तो फिर तुमने डरकर बचा किसको लिया? दिनभर डरे हो कि कुछ खो न जाए और ये देखा ही नहीं कि जिसको बचाना चाहते हो खोने से, उसको तो लगातार खोते ही जा रहे हो। तो तुम तो दोनों तरफ़ से मारे गये न? डर भी खूब झेला और जिसकी ख़ातिर डर झेला उससे भी हाथ धोया।

और ऐसा नहीं है कि दुनिया तुम्हारी लेज़ीनेस (आलस) बर्दाश्त कर लेती है। सच पूछो तो आलस तुम बस एक दिशा में दिखा पाते हो, जो सही काम है वो करने की दिशा में। वरना तो तुम जहाँ भी काम करते हो, वो मालिक तुम्हें आलसी रहने देता है क्या? दिन के बारह घंटे दौड़ाता है। तो अगर तुम ये भी कहोगे कि मैं मुक्ति की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाता हूँ क्योंकि मैं आलसी हूँ। आलस भी हमें बस एक दिशा में आता है। जो दिशा हमारे लिए वाक़ई लाभप्रद है उस दिशा में काम करने में हम आलसी हो जाते हैं। "भजन करे को आलसी, खाने को तैयार।"

कबीरा यह मन लालची समझे नहीं गँवार। भजन करे को आलसी, खाने को तैयार।।

~ कबीर साहब

मुझे बताओ न, जहाँ नौकरियाँ करते हो वहाँ तुम्हारा बॉस तुम्हारा आलस बर्दाश्त कर लेता है क्या? रगड़-रगड़कर एक-एक सेकेंड का हिसाब लेता है। एक-एक रुपया जो तुमको देता है उसके बदले में पचास रुपये का तुमसे काम वसूलता है। तो ऐसा भी नहीं है कि सत्य न मिला तो कोई बात नहीं, कम-से-कम आराम से अलसाये तो बैठे रहे। तुम्हें ऐसा कोई आराम का जीवन भी नसीब नहीं हो रहा है।

अभी कह दिया जाए कि शिविर चलेगा तीन दिन और, खर्चा-पानी कुछ नहीं बस रुक जाओ। आराम से रुक जाओ, बस पड़े रहना धूप में, गंगा किनारे। तो भी तुममें से बहुत लोग रुक नहीं पाएँगे क्योंकि दूर कोई चाबुक फटकार रहा है कि घोड़े जल्दी वापस आ तुझे काम पर लगना है। आलस भी तुम्हें कहाँ उपलब्ध है? मुझे बताओ!

अष्टावक्र मज़ाक करते हुए कहते हैं कि आध्यात्मिक आदमी तो परम आलसी हो जाता है। जो ऊँची-से-ऊँची चीज़ है वो उसने पा ली है, बाक़ी सब पाने की उसको कोई आकांक्षा ही नहीं, अजगर समान हो जाता है। एक पूरी गीता ही है ‘आजगर गीता'। पर तुम्हें आलस भी कौन करने दे रहा है? बताओ कौन करने दे रहा है आलस?

दफ़्तर–तो–दफ़्तर, तुम घर में आलस नहीं कर सकते! एक चाबुक फटकारा जाता है दफ़्तर में, उससे तगड़ा चाबुक चलेगा घर में। ‘कर क्या रहे हो तुम? चलो उठो पालक लेकर आओ।’ हाँ! जब तुम्हारी मुक्ति का मुद्दा छिड़ता है तो तुम कहते हो आलस बहुत आ रहा है। अपने बॉस से बोलकर देखना आलस आ रहा है! हम कैसे लोग हैं? हम दूसरे के स्वार्थों की ख़ातिर मेहनत कर ले जाते हैं, अपने परमहित के लिए न हमारे पास मेहनत है, न वक़्त है।

प्र: आचार्य जी, सांसारिक जीवन में तो आलस नहीं कर पाते पर मुक्ति की जहाँ बात आती है तो आलस आता है। यदि हम दो आदमियों को देखें जिनमें से एक तो मुक्ति की दिशा में क़दम बढ़ा लेता है और दूसरा आलस के मारे रह जाता है तो इसमें अन्तर कहाँ आ रहा है? क्या ग्रेस (अनुकम्पा) अलग से आ गयी है?

आचार्य: कुछ नहीं है! इतना उलझाओ नहीं बात को। तुम्हारे चुनाव की बात है। दूसरे को कुछ ख़ास नहीं मिला हुआ है, न ग्रेस मिली हुई है, न उसकी कोई विशिष्ट बुद्धि है, न उसके ऊपर किसी परछाई का वरदान है। बात सीधी है, बिलकुल सीधी रखो। तुम्हारा चुनाव है, ग़लत चुनाव है। तुम्हें अपने वास्तविक हित की कोई फ़िक्र ही नहीं है।

प्र: लेकिन हम अन्दर से तो शान्ति चाहते ही हैं, तड़प भी हो रही है।

आचार्य: ये अन्दर-बाहर का मामला कुछ नहीं होता। जो तुम चुनाव करो वो तुम हो। भकाभक-भकाभक पकवान खाये जा रहे हो और कह रहे हो, ‘अन्दर से तो हम व्रत में हैं।’ ये अन्दर-बाहर क्या होता है? ये अन्दर की बात कर-करके जितने कुकर्म हैं हम सब कर डालते हैं। एक घूँसा मारा सामने वाले की नाक पर और कहा, ‘अन्दर से तो बहुत चाहते हैं तुझे।’ (श्रोतागण हँसते हुए)

जो तुम कर रहे हो, वो तुम हो। ये अन्दर-बाहर बिलकुल झूठी बात, मिथ्या विभाजन है। ये बिलकुल मत कहना कि चाहते तो हम कुछ और हैं पर मजबूर हैं इसीलिए कर कुछ और रहे हैं। जो तुम कर रहे हो वही तुम चाहते हो, वही चुनाव है तुम्हारा, एक बात! ख़ुद को धोखा मत दो। और इस तर्क का इस्तेमाल हम सब करते हैं लगातार, बखूबी करते हैं, करते हैं कि नहीं?

'आचार्य जी! शिविर में आने की इच्छा तो बहुत है अन्दर से, लेकिन साढ़ू की शादी में जा रहा हूँ।' अब साढ़ू और फूफा और जीजा शिविर पर भारी पड़ रहे हैं और तर्क दिया जा रहा है अन्दर का, 'अन्दर से हम ब्रह्मचारी भी हैं, व्रती भी हैं।' और तभी अन्दर से निकली एक ज़बरदस्त डकार!

(गंगा किनारे कुछ लोग ऊँची आवाज़ में भोजपुरी संगीत बजा रहे हैं, उस पर कहते हैं) वो देखिए! उसके अन्दर से क्या निकल रहा है? (श्रोतागण हँसते हुए) वो भी यही कहेगा कि हम अन्दर से मौन हैं, ये सारा शोर बाहर-बाहर है।

हम कैसे लोग हैं भाई कि जो अन्दर है वो बाहर नहीं आ सकता? हिम्मत की कमी है? नपुंसक हैं हम? हम कैसे हैं? समस्या क्या है? जिसको देखो वही शायरी ठेल रहा है कि अन्दर-ही-अन्दर से तो जानेमन आशिक़ हम तुम्हारे थे, बाहर-बाहर फेरे कहीं और ले आये। सबकी ज़िन्दगी का आलम बिलकुल यही है। ये अन्दर-बाहर का भेद बताओ, ये क्या है? ये किन मजबूरियों का रोना रो रहे हो? सीधे-सीधे स्वीकार क्यों नहीं करते कि बेईमानी है ये। जो कर रहे हो वही तुम्हारी चाहत, वही तुम्हारा चुनाव है, बात ख़त्म! कुछ और चाहते होते तो कुछ और कर रहे होते।

कई लोगों को मेरी इस बात से बहुत तकलीफ़ हो जाती है, वो कहते हैं, ‘आप जज़्बात तो समझते ही नहीं। ये गुरुजी फीलिंग्स (भावनाओं) की क़द्र नहीं करते।’ ठीक है भाई! तुम खनकाओ फीलिंग्स।

मुझसे पूछोगे कि तुम कौन हो तो मैं बस एक जवाब दूँगा — जैसी तुम्हारी ज़िन्दगी है, वो हो तुम। अपने बारे में किसी ग़लत-फ़हमी में तो रहना ही मत। बिलकुल मिथ्या-भाषण मत करना। बिलकुल आध्यात्मिक तर्कों का उपयोग करके अपनेआप को सही और जायज़ साबित मत करना। कौन हो तुम? सुबह से जो किया तुमने आज, वही हो तुम। अभी कौन हो तुम? अभी जो कर रहे हो, वो हो तुम।

तुम्हारा कर्म, तुम्हारा जीवन ही एकमात्र और आख़िरी कसौटी है। बाक़ी सब छल, प्रवंचना, झूठ, कपट है। तुम्हारी नीयत, तुम्हारे इरादे अगर तुम्हारे जीवन से मेल नहीं खा रहे, तो तुम्हारी नीयत और तुम्हारे इरादे सब झूठी बातें हैं।

जिसको देखो वही मजबूरी का रोना रो रहा है। हमें तो किसी ग्रन्थ में ‘मजबूरी-खंड' मिला नहीं और तुम्हारे लिए सबसे बड़ी शक्ति, सबसे बड़ी देवी ‘मजबूरी देवी' ही हैं कि मजबूरी की बात है ऐसी ज़िन्दगी जी रहे हैं। बहुत लोग होंगे अभी, ये लाइव (सत्र) जा रहा है, उसको देखकर कह रहे होंगे, बड़ा गम्भीर चेहरा बनाकर, ‘नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है, तमन्ना ही नहीं होती, मजबूरियाँ भी होती हैं।’ (श्रोतागण हँसते हुए) पाँच-सात ने तो कमेंट भी भेज दिये होंगे कि ये बाबा क्या जाने दुनियादारों का दर्द? अरे! हमारी बीवी है, बच्चे हैं, तुम्हें क्या पता?

(श्रोता से कहते हैं) हँस क्या रहे हो? अब यहाँ आकर के बैठ गये हो, शुरुआत तो तुममें से कइयों ने ऐसे ही की होगी। ज़्यादातर लोगों का शुभारम्भ ऐसे ही होता है। वीडियो देखेंगे, गरियाएँगे! फिर दो-चार दिन बाद भीतर कुछ सुकपुकी होगी तो जाकर के फिर देखेंगे। ऐसे जब पाँच-दस बार देख लेते हैं तो फिर मन बदलने लगता है। पर आरम्भ तो सभी का ऐसे ही होता है, परिचय तो सभी का ऐसे ही होता है, ‘कुछ सन्तुलन की बात करिए, श्रीमन्!’

जैसे धूमिल कहते हैं न कि आम आदमी की तमन्ना होती है कि कोई ऐसा तरीक़ा मिल जाए कि क्रान्ति में हाथ भी उठ जाए, मुट्ठी भी भिंच जाए और काँख (बगल) भी न दिखायी दे। क्रान्ति तो करनी है पर इज़्ज़त बचा-बचाकर। ऐसे ही तुम कोई विधि माँगते हो, ‘कोई तरीक़ा बताइए कि हसीन सपने भी बचे रहें और अभयता भी प्राप्त हो जाए!’

प्र: आचार्य जी, एक डर और है, नाम और पहचान का।

आचार्य: उससे तुम्हें क्या मिल रहा है कि उसके खो जाने से परेशान हो तुम?

प्र: जैसे हम लोग अगर कुछ काम कर रहे हैं तो उस नाम और पहचान से हमारा काम चल रहा है।

आचार्य: उस काम से तुम्हें मिल क्या रहा है?

प्र: जो मूलभूत ज़रूरतें हैं हमारी।

आचार्य: वह कितनी ज़्यादा हैं?

प्र: अब जैसे अगर खाना चाहिए।

आचार्य: कितना खाते हो?

प्र: जीने के लिए जितनी ज़रूरत है।

आचार्य: उतना तुम्हें मिलेगा नहीं?

प्र: यही तो सबसे बड़ा सवाल है कि मिलेगा कि नहीं मिलेगा?

आचार्य: यहाँ एक भेड़ घूम रही है उसको भी मिल रहा है। अभी यहाँ एक भेड़ घूम रही थी, देखा? ये चिड़िया चहचहा रही है, देखी? जिनको तुम जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ कहते हो, वो तो पशुओं और पक्षियों की भी पूरी हो जाती हैं बेटा! तुम्हारी ही नहीं होंगी क्या?

प्र: हम एक व्यवस्था में रह रहे हैं और जानवर जंगल में रहते हैं।

आचार्य: अरे! मूलभूत आवश्यकता की बात हो रही है। तुम्हारी कौनसी मूलभूत आवश्यकता है जो इतनी बड़ी है कि उसकी ख़ातिर ज़िन्दगी बर्बाद कर रहे हो?

प्र: आचार्य जी, हमें अपनी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कोई तो काम करना पड़ेगा, क्या यह बात दो तरफ़ा नहीं हो गयी?

आचार्य: दो तरफ़ा क्यों रहना पड़ेगा? तुमसे किसने कह दिया कि सार्थक काम करके तुम तन ढँकने का भी इंतज़ाम नहीं कर सकते? तुम कौनसी तस्वीर खींच रहे हो? तुम कह रहे हो, 'अगर रोटी भी कमानी है तो घटिया काम ही करना पड़ेगा!' ये तो तुमने बड़ा तीर चला दिया। तुम अगर ये कहते कि महल बनवाने के लिए बेईमानी ज़रूरी है तो मैं समझता भी। पर तुम तो कह रहे हो कि दो जून का रोटी-पानी चलाने के लिए और सिर पर छत रखने के लिए भी घटिया काम करना, मन को मारना और बेईमानी करना ज़रूरी है। ये बात ग़लत है और बिलकुल झूठ है।

प्र: शायद हमें अपनी सारी ज़रूरतों को उस तल पर लेकर आना पड़ेगा, जिसमें हमें सिर्फ़ वही चीज़ें चाहिए जो हमारी ज़रूरत की हैं।

आचार्य: बेटा! अभी भी तुम्हें कौनसा बहुत ज़्यादा मिला जा रहा है? कौन से तुम महल, दो महले के स्वामी हो? तुम्हें दिख नहीं रहा है कि तुम्हारा शोषण पूरा हो रहा है और बदले में तुम्हें मिल रहा है बिलकुल एक न्यूनतम जीवन? कौन तुम पर हीरे-मोती लुटाये दे रहा है? एक बहुत साधारण मध्यम वर्गीय ज़िन्दगी ही तो जी रहे हो? इतनी सी प्राप्ति के लिए तुम्हें ज़िन्दगी बेच देने की ज़रूरत क्या है? अगर तुम्हें इतना ही पाना है जितना तुम पा रहे हो, तो उतना तो तुम कोई सार्थक काम करके भी पा सकते हो। बस उस दिशा में ज़रा सोचो और ज़रा प्रयत्न तो करो!

तुम ये कहते कि तुम्हें बादशाहत कोई मिली हुई है और वो बादशाहत तभी क़ायम रहेगी जब तुम तमाम तरह के दुराचार करो, तो मैं समझता कि भाई बहुत बड़ी चीज़ मिली हुई है बादशाहत और बन्दा उसके ख़ातिर ईमान बेच रहा है। पर अभी तुम्हें मिला क्या हुआ है जिसके ख़ातिर तुम बिके जा रहे हो? अभी तुम कह रहे थे हम एक सामाजिक व्यवस्था में रहते हैं, उससे तुम्हें मिल क्या रहा है? जिस भी सामाजिक व्यवस्था में रह रहे हो, तुम्हें उसको क़ायम रखने में रुचि क्या है? उससे तुम्हें क्या मिल रहा है ये तो पूछो। व्यवस्था चल रही होगी, तुम्हें उससे क्या लाभ? या है बहुत बड़ा लाभ?

प्र: हमने ग़लत मान रखा है? जो भी है हमारे पास हमने उसको अपनी बादशाहत मान रखी है, ऐसा है?

आचार्य: तुमने बादशाहत भी अगर मान रखा होता, अपने फटे चीथड़ों को, तो भी ठीक रहता क्योंकि अगर तुम ये मानते ही होते कि तुम बादशाह हो, तो तुम्हें एक तृप्ति रहती, एक सन्तुष्टि रहती। पर ये भी तुम झूठ बोल रहे हो कि तुमने अपनी रूखी-सूखी और अपने फटे चीथड़े को बादशाहत मान रखा है, बिलकुल नहीं मान रखा है। तुममें तो घोर अतृप्ति है, है कि नहीं? तुम बिलकुल भी ये नहीं मानते हो कि तुम बादशाह हो, मानते हो क्या? तुम तो जहाँ किसी को ज़रा सा आगे देखते हो, तुममें हीनभावना आ जाती है, कहाँ है बादशाहत?

तो तुम अच्छी तरह से जानते हो कि इस व्यवस्था का अंग बनकर तुम्हें कुछ मिल नहीं रहा है लेकिन फिर भी ‘सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं!’ अमिताभ बच्चन ‘कुली' बना तो उसको करोड़ों मिले, तुम्हें क्या मिल रहा है कुली बनकर?

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