प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। पिछले शिविर में जब आपसे वार्तालाप हुई थी तब, तब से थोड़ा ज़्यादा पता चला कि आप जो अहम्-अहम् कहते रहते हैं, उसका क्या मतलब है। मतलब वह मैं उससे ही चिपक जाता हूँ और मैं उसको ही केंद्र में रखकर कार्य करता हूँ।
तो ये इसके पहले वाला प्रश्न था, उससे ही एक उदाहरण मुझे याद आ रहा है। अभी कुछ परिस्थिति ऐसी हुई, जहाँ पर मैं बहुत ही उदास हो गया, एकदम डिप्रेस्ड हो गया क्योंकि फिर जब मैंने पीछे जाकर रेट्रोस्पेक्ट (पुनरावलोकन) किया तो अपने ध्यान से देखा, आपसे जो सुना है मैंने कि जो मेरा ऐक्शन (कार्रवाई) था, वो अहम् से था।
इन्कम्प्लीटनेस (अपूर्णता) से मैं यह सारी चीज़ें कर रहा था और वहाँ पर वो व्यक्ति से मैं जो चाह रहा था वह मिला नहीं, तो फिर मैं डिप्रेस्ड हो गया। तो ये तो बातें बाद में पता चलती हैं जब सब काम- धाम ख़त्म हो गया होता है।
पहले तो लग रहा है कि सब सही ही है। तो जैसे आपने बताया कि वो पहले से ही छुपा बैठा है पर संयोगवश कुछ परिस्थिति आयी, तब वो जाकर सामने आया, बट (परन्तु) जब वह स्थिति होती है तब तो वही लगता है कि वो मैं ही हूँ। इसीलिए तो आप उसको अहम् कहते हैं। तो फिर उसका कैसे उपचार करें?
आचार्य प्रशांत: उपचार करने से पहले अनुग्रह करो। अनुग्रह क्या, आभार। उपचार से पहले, आभार। कहो, ‘क्यों? चाह क्या रहे हो?’ जिसको चाह रहे हो, उसको शास्त्रीय तौर पर नाम दिया गया है सच। है न।
हम सब यहाँ बैठे हैं, हम सब क्यों बैठे हैं, इसलिए कि जितने झूठों में हम जी रहे हैं वो और पुख्ता हो जाएँ? हम यहाँ इसलिए बैठे हैं न कि मन का, जीवन का, सच पता चले।




