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छोटे कद को लेकर हीनभावना? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी दिल्ली महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आइआइटी रुड़की से आर्किटेक्चर (वास्तुकला) पढ़ रहा हूँ, सेकेंड इयर। मेरा प्रश्न ऐसा है कि मुझे जीवन में साहस की कमी महसूस होती है। मन पर डर छाया रहता है। मैं जिन व्यक्तियों से अच्छे सम्बन्ध बनाना चाहता हूँ, उनसे मैं खुल कर बात नहीं कर पाता। जैसे कोई गेदरिंग (सभा), मीटिंग या पार्टी टाइप भी हो तो उसमें मैं चुपचाप सा ही रहता हूँ, ज़्यादा इनवाल्व (सम्मिलित) नहीं होता, अपना प्रजेंस (उपस्थिति) नहीं दिखा पाता। और इसका कारण मुझे यह लगता है कि — जितना मैंने आत्म अवलोकन किया है — उसका कारण मुझे यह लगता है कि मैं कई बार अपने छोटे कद की वजह से हीनभावना महसूस करता हूँ। मेरा मतलब बहुत पहले से सपना था कि मैं आर्मी ज्वॉइन करूँ और उसके लिए, मतलब दसवीं में मैंने यह सोचा था कि एन.डी.ए. के प्रिपरेशन के लिए मैं एक आर्मी स्कूल में जाऊँगा। पर हाइट क्राइटेरिया (मानक कद) के वजह से मैं वो कर नहीं पाया। तो मैंने मतलब घंटों एक्सरसाइज किये, दवाइयाँ लीं, बहुत नुस्ख़े भी अपनाये, पर कुछ फ़ायदा नहीं हुआ। फिर हताश होकर फिर मेडिकल चेक-अप (चिकित्सीय जाँच) भी करवाया। तो रिपोर्ट ऐसी आयी कि बोन डेवलपमेंट (हड्डी का पूर्ण विकास) हो गया तो अभी कोई फ़ायदा नहीं है, हाइट (लंबाई) नहीं बढ़ेगी। तो मतलब मैं बहुत हताश हो गया था उसकी वजह से। काफ़ी रोया भी था। तो शायद मुझे ऐसा लगता है कि उस घटना की वजह से ये देहभाव मेरे अंदर काफ़ी गहरा भर गया है। और जैसे मैं ये भी पूछना चाहता था, और मेरे इसके ऊपर दो प्रश्न थे — पहला, मैं इस देहभाव से कैसे निकलूँ? और दूसरा, जैसे मैं अपने आदर्शों को देखता हूँ, आपको देखता हूँ, विवेकानन्द जी को देखता हूँ तो मुझे ऐसा महसूस होता है और प्रश्न ऐसा आता है कि क्या एक सुडौल शरीर, एक हट्टा-कट्टा शरीर एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के लिए ज़रूरी है या फिर मात्र कुछ उसमें कंट्रीब्यूशन (योगदान) करता है?

ऐसा नहीं है कि मैं आपके पास या विवेकानन्द जी के पास आपका शरीर देख कर आता हूँ। पर एक मन में ये हीनभावना अपने प्रति उठती है तो मैं आपका इस विषय पर मार्गदर्शन चाहूँगा। मतलब बाई नेचर (स्वभाव से) मैं इंट्रोवर्ट (अंर्तमुखी) ही हूँ। वैसे ही ज़्यादा लोगों से इंटरैक्ट (सहभागिता) करना मुझे इतना पसंद नहीं है। पर मैं ये चाहता हूँ कि अगर मैं किसी से बात न करने का सोच रहा हूँ या फिर ज़्यादा इनवाल्व न होने की सोच रहा हूँ तो उसका कारण मेरा डर न हो, मेरी ख़ुद की काँशियस चॉइस (बोधपूर्ण चुनाव) हो। तो मैं इस बात पर आपका मार्गदर्शन चाहूँगा।

आचार्य प्रशांत: माइक अपने पास ही रखना, शायद तुमसे और बात करूँगा।

डर की बात करी और कद की बात करी। शरीर के कद की।

शरीर क्या है? आत्मा के ऊपर बहुत सारी मिट्टी पड़ी हुई है, उसको शरीर कहते हैं। आत्मा पर प्रकृति के विक्षेप को देह कहते हैं। बहुत सारी मिट्टी डालकर के क्या करना चाहते हो? कि मिट्टी अभी कम है, और बढ़ानी है? क्या कर लोगे?

समस्या सारी तब आती है जब आत्मा पर मिट्टी भारी हो जाती है। महत्व सारा मिट्टी का हो गया। जब मिट्टी का महत्व हो गया तो मिट्टी को ही चमकाना है, मिट्टी को ही नापना है। सुडौल होनी चाहिए मिट्टी, लंबी होनी चाहिए मिट्टी, चिकनी होनी चाहिए मिट्टी। जिनको तुम मानते हो कि सुडौलों में अव्वल हैं और बड़े लंबे कद के भी हैं, उनका लंबा कद कितने दिन चलता है ये तो बताओ। छः फुट का बंदा पाँच फुट दो इंच का होकर रह जाता है, साठ-सत्तर साल की उमर पार करके। देखा है? झुक-झुक कर चल रहा है, कूबड़ निकल आया है।

तुम ऐसी चीज़ को अपने आत्मसम्मान से जोड़े बैठे हो? देह? कोई डर हो दुनिया का, उसके मूल में देहभाव ही होता है। और इसलिए निर्भय होने का एकमात्र तरीक़ा होता है 'देहभाव से मुक्ति।' देहभाव का अर्थ होता है — भोगभाव, भूतभाव। भूत माने? भूत-प्रेत नहीं, भूत माने भौतिकता, मटेरियलिज्म (भौतिकवाद)। आप जितना ज़्यादा बाहरी पदार्थ को अहमियत दोगे, उतना ज़्यादा इस पदार्थ (अपने शरीर को इंगित करते हुए) को भी अहमियत दोगे। जिसको ये बहुत कीमती चीज़ (मेज़ पर रखी एक वस्तु को इंगित करते हुए) लगती है, उसको ये भी (अपने शरीर को इंगित करते हुए) बहुत कीमती चीज़ लगेगी। जो देहवादी है उसे अनिवार्यतः भोगवादी भी होना पड़ेगा। जहाँ देह है, जहाँ भोग है वहाँ भय भी है।

मान लो तुम्हारा कद लंबा होता न, तो भी तुम्हें डर बना रहता। तुम कहते कि — अभी शरीर छोटा है, शरीर माने पदार्थ, फिर तुम्हें किसी दूसरे तरह का पदार्थ छोटा या कम लग रहा होता — तुम कहते अभी मेरा बैंक अकाउंट छोटा है। क्या आप समझ पा रहे हैं कि कद का छोटा होना और बैंक अकाउंट का छोटा होना, कहीं-न-कहीं एक ही तल की बात है? दोनों ही में आप किसको नाप रहे हो? पदार्थ को। 'मेरी गाड़ी छोटी है। मेरा घर छोटा है, तीन ही कमरे का है। मेरे दोस्त का, मेरे ममेरे भाई का पाँच कमरों का घर हो गया।' छोटा है न?

जहाँ कहीं भी तुमने अपने आत्मसम्मान को, अपनी आत्म छवि को पदार्थ के साथ जोड़ दिया, तुमको छुटपन का भाव आएगा ही आएगा। कारण स्पष्ट है — पदार्थ तो हमेशा छोटा ही रहता है।

मुझे बताओ कौनसा पदार्थ हैसियत रखता है बड़े हो जाने की? हवाई जहाज से नीचे देखा है कभी? बड़ी-से-बड़ी इमारत कैसी लगती है? और जो लंबी-से-लंबी गाड़ी होती है, वो कैसी लगती है? जैसे सड़क पर चींटियाँ रेंग रही हैं। और वो सड़क भी कैसी लगती है? कैसी लगती है? जैसे किसी ने सुदूर नक्शे पर धागे बिछा दिये हों। पदार्थ कभी बड़ा हो सकता है क्या?

तो जो पदार्थ से ही अपनेआप को जोड़ कर जिएगा, उसको सज़ा ये मिलेगी कि उसे यही लगता रहेगा कि अभी सब कुछ बहुत-बहुत कम है, छोटा है। कभी उसे लगेगा, 'मेरी देह कम है।' कभी उसे लगेगा, 'उसके साथी की देह कम है।' क्योंकि सोचो न, तुम अगर अपनी ऊँचाई को लेकर परेशान हो तो तुम्हारे जो दोस्त-यार, मित्र-बंधु बनेंगे या किसी लड़की को तुम अपने जीवन में लाओगे, उसको भी तुम कैसे नापोगे? जब तुम स्वयं को अपनी आत्मा से, अपने गुण, अपने ज्ञान, अपने चरित्र और धर्म से नहीं नाप पाते तो तुम अपने दोस्तों-यारों, अपनी प्रियतमा को भी कैसे नापोगे? यही नापोगे कि उसका शरीर कितना ऊँचा है, कितना नीचा है, कितना सुडौल है, कितना गोल है। यही नापते रहोगे। तो सज़ा क्या मिलेगी तुम्हें? कि तुम्हारी जो संगत है पूरी, वो बहुत ही ग़लत आधार पर हो जाएगी। तुम अपने जीवन में आकर्षक लोगों को बैठा लोगे, उपयोगी लोगों को नहीं। बात समझ में आ रही है?

और जब देहभाव इतना प्रगाढ़ है तो तुम पूरी दुनिया को भी बस एक देह की तरह ही तो देखोगे? कोई तुमको दिख गया लंबा-चौड़ा, तुम तत्काल दंडवत हो जाओगे कि 'लंबा-चौड़ा, लंबा-चौड़ा, मज़ा आ गया, मज़ा आ गया।' और कोई तुमको दिख गया जो मान लो तुम्हारे ही कद का है, तुम उसका सम्मान कैसे कर पाओगे जब तुम अपना ही सम्मान नहीं कर पा रहे हो! कल को मुझे कुछ हो जाए, मुझे लकवा मार जाए तो तुम्हारे लिए तो मुझे सुनना फिर कठिन हो जाएगा। 'यहाँ बैठे हुए हैं, हाथ नहीं चल रहा, मुँह टेढ़ा हो गया है। दिखने में भद्दे लग रहे हैं। कौन इनको सुने!'

कुछ आ रही है बात समझ में?

मिट्टी को इतना मोल नहीं दिया करते। प्रकृति ने सबको बस प्राकृतिक बनाया है। सुंदर और असुंदर का भेद व्यक्ति के चेहरे को, उसके कद को, शरीर को देख कर नहीं किया जाता। सत्य सुंदर है। शिव सुंदर है। सत्यम् शिवम् सुंदरम्। मुँह नहीं सुंदर होता। तुम मुँह देख रहे हो कि बड़ा सुंदर है। मुँह में शिवत्व हो तो सौंदर्य होता है। और मुँह में शिवत्व नहीं है तो वो प्राकृतिक तौर पर आकर्षक तो हो सकता है, सुंदर नहीं हो सकता। सुंदर होना चाहते हो या आकर्षक?

आकर्षक तो प्रकृति में बहुत चीज़ें होती हैं। जानते हो, साँप जितना ज़हरीला होता है उतना ही वो तड़कीला-भड़कीला भी होता है? किसी साँप में कितना ज़हर है ये इससे भी भाँपा जा सकता है कि उसके ऊपर रंग कितने हैं, वो आकर्षक कितना दिख रहा है। लाल-पीले सब रंग होते हैं, एकदम चमकीले। ब्लैक मांबा (साँप की एक प्रजाति) देखा है? वो एकदम चमकता हुआ काला।

आकर्षण पर मरना है या सौंदर्य के कद्रदान हो?

(प्रश्नकर्ता की ओर से कोई जवाब नहीं आता)

कोई जवाब नहीं? आकर्षण के ही खिलाड़ी हो? तो सौंदर्य तो शिवत्व में है; सौंदर्य मिट्टी में थोड़े ही है! मिट्टी को तो एक दिन मिट्टी हो जाना है। और रोज़ मिट्टी होती भी रहती है। इस मिट्टी (अपने शरीर को इंगित करते हुए) की सफ़ाई न करो फिर देखो कि क्या हाल होता है इसका। साधारण मिट्टी फिर भी बढ़िया होती है, अपना वो पड़ी हुई है ज़मीन पर, घास उगती है। साफ़-सुथरी मिट्टी है। ये जो मिट्टी (अपने शरीर को इंगित करते हुए) है, ये तो बड़ी ज़लील मिट्टी है, बदबूदार। तभी तो रोज़ नहाना पड़ता है। साफ़-सफाई, शुचिता न रखो तो कीड़े पड़ जाएँ इस मिट्टी में।

और तुम इस मिट्टी को लेकर परेशान हो, 'कोई छः फुट का है, अरे! मैं पीछे रह गया।' तुम पीछे भी कितने रह गये? छः इंच पीछे रह गये, आठ इंच पीछे रह गये? करोगे क्या छः इंच का? खपच्ची लगा लो। थोड़ा ऊँचा होकर कर चलने लगो। महिलाएँ करती हैं। वो इतनी ऊँची-ऊँची हील पहनती हैं। मैं कहता हूँ, 'इनके दर्द नहीं हो रहा, पाँव में? बेचारी!' लेकिन उसको किसी ने बता दिया है। वो देखती हैं मिस यूनिवर्स वग़ैरह बनती हैं ये लंबी! तो कहती हैं, 'हमें भी लंबी होना है।' तुम भी वैसे ही कर रहे हो।

तुम विवेकानन्द जी की बात कर रहे हो। रमण महर्षि कितने आकर्षक थे दिखने में? कितने थे? उन लोगों को ऐसे नहीं देखा जाता। तुम संत को पहलवान की नज़र से देखोगे क्या? और दुनिया में ऐसे लोगों की कोई कमी रही है जिनका कद छोटा रहा है, काम बहुत बड़े रहे हैं? गाँधी से लेकर नेपोलियन तक, ऐसे लोगों की कमी है? तो तुम किस बात को लेकर इतने हैरान हो?

पर डरे तुम हमेशा रहोगे, जब तक तुम आत्मा में जीना शुरू नहीं करते। क्योंकि आख़िरी डर तो मौत का होता है। जो देह में जी रहा है वो जानता है कि देह मरती है; तो वो डरेगा, ज़रूर डरेगा। और उसको डराया जा सकता है। निडर तो सिर्फ़ वही हो सकता है, पूरे तरीक़े से, जो देह को खिलवाड़ मान ले; जिसको लगातार दिखता रहे कि — मर रही है, मर रही है। ज़िंदा है नहीं, मर रही है। ये जीवन नहीं घटित हो रहा, ये मृत्यु घटित हो रही है। घड़ी उल्टी चल रही है। काउंट-डाउन (उल्टी गिनती) चल रहा है।

तुमने इसको इतनी हैसियत दे दी? ये चीज़ क्या है? और ये चीज़ न सिर्फ़ क्षुद्र है बल्कि धोखेबाज़ है। कोई भरोसा नहीं है आप यहाँ बैठे हुए हो पाँच-सात सौ लोग, दो-चार को कैंसर हो, उनको पता भी न हो। ये इतनी धोखेबाज़ चीज़ है! तुम इसको दिल से लगाए बैठे हो? ऐसी बेवफ़ा चीज़ के साथ तुमने इतना नाता जोड़ दिया? ये तो बहुत संभावना है कि तुमको बताए बिना एक दिन विदा हो जाएगी। ये तो छोड़ो किसी और को नहीं पता चला, तुम्हें नहीं पता चले। सोते-सोते मर गये। दुनिया के कितने लोग सोते-सोते ही मर जाते हैं। ये इतनी बेवफ़ा चीज़ है; ग़ायब!

कबीर साहब का है ‘उड़ जाएगा हँस अकेला’। गाना, आज ख़ूब ज़ोर-ज़ोर से गाना। उसमें वो बड़ा सजीव विवरण देते हैं कि जब मरते हो तो क्या होता है। जब देह जाती है न — ‘फूँक दियो जस होरी’ — जैसे होली जलायी जाती है, वैसे इसको जला देते हैं और कोई इसके पास नहीं रुकना चाहता। जिनको तुम अपना बहुत प्यारा मानते थे क्योंकि उनसे देह का ही रिश्ता था, जिनसे तुम्हारा देह का रिश्ता होता है, वो ही तुम्हारे देह को ले जाते हैं और कहीं पर जाकर फूँक आते हैं। और कहते हैं कि चार दिन तक भाई रोता है, तेरह दिन तक पत्नी रोती है और छः मास तक माँ रोती है। उसके बाद कोई रोता भी नहीं है तुम्हारी देह के लिए। कुछ आ रही है बात समझ में? देह को आ रही है बात समझ में? तुम्हें आ रही है न? तो तुम अलग हो।

प्र: आचार्य जी, जबसे आपको सुनने लगा हूँ तो ये देहभाव भी कम महसूस करता हूँ। पर जैसे ही मैं लोगों के साथ बात करता हूँ, इंटरैक्ट (सहभागिता) करता हूँ तो बार-बार, पता नहीं क्यों ये चीज़ छा जाती है। आख़िर बाहर आने लग जाती है। मैं नहीं भी चाहूँ पर मन में ये गति अपनेआप होने लग जाती है। जैसे मैं अपने आसपास भी लोगों को देखता हूँ…

आचार्य: नहीं! क्यों देखते हो? तुम ऐसे लोगों के सानिध्य में रहते क्यों हो जिनकी सबसे बड़ी पूँजी देह बस है? उनके साथ रहोगे तो वो तो तुमको देह ही दिखा-दिखाकर प्रभावित करेंगे। और देह से मतलब है — सकल पदार्थ। अगर कोई तुमको अपना नया मोबाइल भी दिखाकर के प्रभावित, इंप्रेस कर रहा है, तो वो एक तरह से देह का ही प्रदर्शन कर रहा है। देह माने — पदार्थ, मटेरियल , जो कुछ भी भौतिक है। ऐसों के साथ क्यों रहते हो? इसलिए तो संगत सबसे बड़ी चीज़ है न।

जानने वालों ने समझाया है, हर दिन जाकर के उसकी संगत कर लो जो संगत करने लायक़ है। हर दिन नहीं कर सकते तो सप्ताह में एक बार कर लो। सप्ताह में नहीं कर सकते, पखवाड़े में चले जाओ। पखवाड़े में नहीं जा सकते, महीने में चले जाओ। महीने में नहीं जा सकते तो दो-चार महीने में चले जाओ। दो-चार महीने में एक बार भी संगत नहीं कर सकते — तो मरो! तुमसे कोई बात नहीं की जा सकती फिर। और तुम जा करके उल्टे-पुल्टों के साथ बैठो, कोई तुमको कोई मटेरियल चीज़ दिखाकर के लुभा रहा है, दबा रहा है, कोई कुछ कर रहा है।

प्र: तो आचार्य जी मैं ये पूछना चाहता हूँ कि मैं व्यवहारिक तौर पर कैसे इस देहभाव का खंडन करूँ और कैसे इसके बाहर निकल पाऊँ? मतलब मैं क्या प्रैक्टिकल स्टेप्स (उपयोगी कदम) लूँ इसके लिए?

आचार्य: देह को छोटा जानना सीखो। देह को तुम जितना छोटा करते जाओगे, छोटा महत्व में, उतना वो फिर तुम्हारे लिए कम अर्थ रखेगी। जितना तुम देह को अपने लिए बड़ा करते जाओगे, महत्व में, उतना तुम्हें 'देह-देह-देह', यही लगता रहेगा। देह बोले 'सोना है', तुम जानते हो अभी उठना ज़रूरी है, उठ जाओ! देह बोले, 'मुझे सजाओ, संवारो, ये करो', तुम बोलो, 'चुप!' मुँह धोओ, कंघी करो, आगे बढ़ो।

देह ललचा रही है किसी चीज़ के लिए, खाने के लिए, पीने के लिए, तुम्हारी उम्र में किसी विपरीत लिंगी के लिए। ठीक? देह ललचा रही होगी, हम नहीं ललच रहे। अपनेआप को देह से भिन्न घोषित करना शुरू करो। देह को सुनाओ, देह को जताओ — तू 'मैं' नहीं है। मैं तुझसे भिन्न हूँ। तू अलग, मैं अलग। हमारा तुम्हारा साथ है, एकत्व नहीं है।

किसी के साथ रहना एक बात है और उससे अभिन्न हो जाना बिलकुल दूसरी बात है न। हम भिन्न हैं। एक अन्यता का भाव स्थापित करो। अनन्यता सिर्फ़ आत्मा के साथ होनी चाहिए। वो मैं हूँ। उससे अनन्य हूँ। अनन्य माने अलग नहीं। वो मैं हूँ — आत्मा। बाक़ी तो सब अन्य हैं, पराये हैं। ये (अपने शरीर को इंगित करते हुए) क्या है? ये पिंजड़ा है। ‘उड़ जाएगा हँस अकेला’। तुम पिंजड़े को घर मानते हो और पिंजड़े को लेकर दुखी हो कि मेरा पिंजड़ा बहुत आकर्षक नहीं है। ये कहाँ की बुद्धि है? तुम वो नहीं हो जो तुम दिख रहे हो। यहाँ कुछ भी वो नहीं है जैसा वो दिखता है। आँखें दिखाती नहीं हैं, छुपाती हैं। इंद्रियों का काम सत्य का प्रदर्शन नहीं होता; इंद्रियों का काम होता है — सत्य पर आवरण डालना।

ये सांसारिक और आध्यात्मिक बुद्धि का भेद होता है। संसारी सोचता है आँखें दिखाती हैं। आध्यात्मिक आदमी जानता है कि आँखें छुपाती हैं। समझ में आ रही है बात? हाँ, होगा कोई साढ़े पाँच फीट का, वो तुम नहीं हो। वो कोई और है। तुम जो हो, उसका कोई कद नहीं होता। तुम जो हो, उसका कोई नाम नहीं होता। उसे नापा नहीं जा सकता। उसकी तुलना नहीं की जा सकती। किससे उसकी तुलना करोगे? तुम अद्वैत हो। तुम्हारे अतिरिक्त कोई दूसरा है ही नहीं। तुलना कहाँ करने जाओगे?

ये जो दुनिया है न, इसको थोड़ा सा जूते की नोक पर रखा करो। हमें घर-परिवार, संसार, शिक्षा ने दबने का बड़ा प्रशिक्षण दे दिया है। सिर जो झुकना चाहिए न, वो सिर्फ़ सच्चाई के सामने झुकना चाहिए। दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है कि 'जी-जी' करते फिरो और तलवे चाट रहे हो। मैं नहीं कह रहा कि बड़बोले हो जाओ और धौंस जमाओ। पर जो चीज़ जिस हैसियत की है, उसको तो जानोगे न। या मल को कमल बना लोगे और सूंघने लगोगे कि फूल तो है? ये मल है, ये दुनिया। ठीक है इससे कामचलाऊ रिश्ता रखना है लेकिन इसको सिर पर नहीं चढ़ा लेना है। जब भी लगे कि कोई भी चीज़ दुनिया की बहुत सिर पर चढ़ रही है, ऐसे करो (कंधे उचकाते हुए) श्रग इट ऑफ (झटक दो)।

एक सीमा होनी चाहिए — लक्ष्मण रेखा, थ्रेशोल्ड (सीमा), कट ऑफ (सीमा)। इससे ज़्यादा हम किसी को भाव देते ही नहीं हैं। तुम होगे कहीं के बादशाह, सिर पर थोड़े ही तुम्हें बैठा लेंगे! और ये बात इसको (अपने शरीर को इंगित करते हुए) भी बोलनी है। ये (देह) बोल रही है — 'आह! सिरदर्द हो रहा है, सिरदर्द हो रहा है, बुख़ार हो रहा है, घुटने में दर्द हो रहा है।' तो बादशाह थोड़े ही बना लेना है इसको? 'चल हट! क्या घुटने में दर्द हो रहा है; दौड़ लगा।' किसको बोला करो? इसको (अपने शरीर को इंगित करते हुए)। 'चल दौड़! (क्या बकवास कर रही है कि) घुटने में दर्द हो रहा है।'

जब जलेगा घुटना, तब नहीं दर्द होगा? तब अपने ही आकर के डंडा लेकर के सिर फोड़ते हैं। तब नहीं दर्द होगा? 'घुटने में दर्द हो रहा है, उठ!'

आ रही है बात समझ में?

हाँ, प्रेम बहुत ऊँची चीज़ है और जो बहुत ऊँचा है, सिर्फ़ उससे किया जाता है। ये दुनिया की कीचड़ से और अपने शरीर की कीचड़ से प्रेम नहीं किया जाता। इनके साथ बस उपयोगिता का रिश्ता रखा जाता है। ये अगर उपयोगी हैं तो इनसे एक सम्बन्ध रख लिया। और उपयोगिता भी इनकी किस दिशा में हो सकती है मात्र? कि ये तुमको जो उच्चतम है, उस तक लेकर जाएँ। इसको (अपने शरीर को इंगित करते हुए) सहलाने के लिए नहीं है ज़िंदगी कि इसको बैठ कर एलोवेरा मल रहे हैं।

'पैदा काहे के लिए हुए थे?' 'फेशियल कराने के लिए।' हैं?

प्र: समझ गया, आचार्य जी।

आचार्य: हाँ।

प्र: धन्यवाद।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=0rdmRI66qLc

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