मारग चलते जो गिरे, ताको नाही दोस। कहै कबीर बैठा रहे, ता सिर करड़ै कोस॥
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: जो चलते हुए गिरता है उसका दोष नहीं है, जो बैठा रहता है उसके सिर पर कोटिक पाप हैं। क्या कह रहे हैं कबीर?
प्रश्नकर्ता १: कोशिश की बात कर रहे हैं कि जो कोशिश कर रहा है उसको दोष मत दो अगर वो कुछ गलत कर भी देता है। पर जो जानबूझकर कोशिश नहीं कर रहा है और बैठा हुआ है, वो दोषी है।
प्र२: आपने एक बात बोली थी कि दिखता तो सबको है कि अगर मैं एक ही दिन सत्र में आता हूँ तो समझ में कुछ नहीं आ रहा होता है, पर वो अपनी गुलामियों से इतना आसक्त होते हैं कि देखने के बाद भी अनदेखा कर देते हैं। तो जो देखेगा वो तो सत्र के लिए चले गए पर जो अनदेखा करेगा, वो बैठा रहेगा, खुश रहेगा। तो यही यहाँ पर कह रहे हैं कि जो चलता है वो शायद फिसलेगा, उसको दोष मत दो क्योंकि वो चलने की कोशिश तो कर रहा है। उसमें इतनी ईमानदारी तो है कि देखने के बाद चल पाया। लेकिन जो बैठा हुआ है, वो सबसे बेईमान आदमी है। उसके अंदर बेईमानी छुपी हुई है, लालच छुपा हुआ है और इसीलिए वो बैठा हुआ है।
प्र३: एक चीज़ और कह सकते हैं, ‘बैठा है' से अभिप्राय यहाँ पर गलत तरीकों से है, और जब तक आप उसकी अभिव्यक्ति करेंगे नहीं तब तक उस दु:ख का, उन गलतियों का निवारण भी नहीं कर पाएँगे। अगर वो बैठा हुआ है मन के अंदर चोर बनकर तो उसका कुछ कल्याण भी नहीं होना है। और अगर वो अभिव्यक्त हो जाए कि ये समस्या है, या ये गलत हो रहा है, या उसे खुद नही पता है कि ये गलत है पर अगर उसको अभिव्यक्त ना करे तो उसका निवारण भी नहीं होगा। तो चलने से शायद यही तात्पर्य है।







