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बुद्धि नहीं, बुद्धि का संचालक महत्वपूर्ण है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: बुद्धि परा प्रकृति है। तो अब यह कैसे जानें कि इस समय जो हम सुन या समझ रहे हैं तो मेरी बुद्धि किस दिशा में है? इस समय स्थिति ऐसी है कि डर भी लग रहा है, आगे कुछ ज़्यादा समझ नहीं आ रहा है और बेचैनी भी रहती है।

आचार्य प्रशांत: बुद्धि भी प्रकृति के ही अंतर्गत आती है, इससे बुद्धि की उपयोगिता कम थोड़े ही हो गई। कृष्ण कह रहे हैं, अपरा प्रकृति है और परा प्रकृति है। फिर आप चौंक जाते हैं जब वो इन्हीं दोनों प्रकृतियों में बुद्धि को भी, अहंकार को भी शामिल कर लेते हैं, क्योंकि आमतौर पर हमारा मानना यह होता है कि हम तो प्रकृति से कुछ आगे के हैं, अपने-आपको 'पुरुष' कहलाना चाहते हैं।

कृष्ण झटका दे देते हैं, वो कहते हैं, “नहीं, साहब, जैसे नदी, पेड़, पानी, जड़-चेतन, सब जीव हैं, वैसे ही दुनिया में हर जगह भौतिक खेल ही चल रहा है, रसायनों की ही क्रिया-प्रतिक्रिया मात्र है, उसी तरीके से बुद्धि भी है। ये तो आप सोच ही न लें कि बुद्धि चैतन्य है; बुद्धि भी जड़ पदार्थों का एक रुप ही है बस।”

अब यह बात अहंकार को बड़ी चोट देती है, क्योंकि आदमी अपनी बुद्धि के साथ बड़ा तादात्म्य रखता है। बुद्धिमान कहलाना गौरव की बात होती है न? किसी को बोल दो कि तुम बदसूरत हो और किसी को तुम बोल दो कि तुम बेवकूफ़ हो, ज़्यादा बुरा कौन मानता है? क्योंकि हमारा बुद्धि के साथ बड़ा तादात्म्य रहता है।

ये तो यही है कि तुम किसी को बोल दो कि तुम बेईमान हो, उसको थोड़ा बुरा लगेगा और किसी को बोल दो कि बेवकूफ़ हो, तो उसको ज़्यादा बुरा लगेगा, क्योंकि बुद्धि के साथ हमारा बड़ा गौरव जुड़ा है, ईमान के साथ कहाँ उतना! अक्लमंद होना बड़ी बात होती है।

कृष्ण सीधे अक्लमंदी पर ही प्रहार कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि यह जो तुम्हारी अक्ल है, यह भी प्रकृति के तीन गुणों का ही खेल है। तभी तो देखते नहीं हो कि क्या खाते हो, क्या पीते हो, किस माहौल में मौजूद हो, दिन है, कि रात है, और कैसी संगति है, इससे तुम्हारी अक्ल-बुद्धि बिल्कुल ही फिर जाती है।

तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा कि तुम शराब पी लेते हो, और शराब क्या है? रसायन ही तो है न? इथाइल अल्कोहल है, और क्या है? और बुद्धि कैसी घूम जाती है, घूमती है कि नहीं घूमती है? अब रसायन का प्रभाव तो किसी अन्य रसायन पर ही हो सकता है। तो शराब पीकर अगर बुद्धि घूम जाती है तो इसका मतलब है कि बुद्धि भी रसायन मात्र है।

ल्यो! बड़ी चोट लगी। लग रहा है किसी ने थप्पड़ मार दिया। हम तो सोचते थे कि बुद्धि कुछ रोशनी की तरह है, प्रकाश की तरह है, ईश्वर का अनुपम उपहार है मनुष्य को जो किसी और जीव को मिली नहीं है। जानवरों को हम नीची नज़र से देखते थे, कहते थे कि इनमें बुद्धि नहीं है, अक्ल नहीं है। और अब हमें पता चल रहा है कि हमारी भी ये जो बुद्धि है, ये कुछ और नहीं है — खाए-पिए का खेल है सारा, तीन गुणों का संयोग भर है। तो तुम्हें तकलीफ़ हुई है।

कह रहे हैं, “अब क्या करें?” बुद्धि को ही श्रीकृष्ण ने धक्का मार दिया, अपमानित कर दिया। हम तो उसे सिर पर चढ़ाए घूमते थे, बात-बात में अक्ल लगाते थे, जहाँ देखो वहाँ अपनी होशियारी घुसेड़ देते थे। जब तक बैठ करके उसमें खोपड़ा न लगा दें, तब तक लगता ही नहीं था कि इंसान हैं। कोई भी मसला हो, उसमें खोपड़ा ज़रूर लगाना है।

श्रीकृष्ण बड़ा बुरा कर गए हमारे साथ। ज़रा-भी हमारी कोमल-कोमल भावनाओं की परवाह ही नहीं करी। 'अ' (प्रश्नकर्ता) को बुलाया और बोले, “ये जो तेरी बुद्धि है, ये लकड़ी है, और पानी है, और भाप है, और पत्थर है और घास है; वही सब कुछ है प्रकृति जिसको तू अपने चारों ओर देखता है, वही प्रकृति भीतर बुद्धि, मन, अहंकार भी बनकर बैठी हुई है। वही प्रकृति जिसको तुम चारों ओर देखते हो और कहते हो प्रकृति मात्र तो है, वही प्रकृति भीतर की बुद्धि भी है।”

हमें उतना बुरा नहीं लगता अगर कोई हमसे कह दे कि ये जो हमारी माँस है, ये घास है। हम कहते हैं, “यह बात तो हमें समझ में आती है क्योंकि घास हम खाते हैं, वही घास भीतर जा करके बन जाती होगी माँस, तो उसे मानने में हमें बहुत तकलीफ़ नहीं होती है। मान ही लेते हैं।”

गाय ने खायी घास और हमने पिया गाय का दूध, तो ये बात थोड़ी-सी हमको तार्किक लगती है कि ये जो माँस है हमारा, और ये जो बाल हैं, और ये हड्डियाँ हैं, और खून है, ये सब भी किसी-न-किसी तरीके से घास का ही रूप हैं। लेकिन कोई बोल दे कि अक्ल घास चरने गई है तो हाय राम! घड़ों पानी पड़ जाता है।

मैं तुमको बोल दूँ कि तुम्हारा माँस है घास तो तुम कहोगे, “जी।” और मैं बोल दूँ कि अक्ल घास चरने गई है? तो तुम कहोगे, “देखिए, कुछ भी करिए, बेइज़्ज़त मत करिएगा। ये कोई तरीका है बात करने का? अक्ल घास चरने गई है?” मैं कहूँगा कि थोड़ा गीता खोलकर पढ़ लो, उसमें तो कृष्ण यही बता रहे हैं कि अक्ल है ही घास। बड़ा बुरा लगा।

ये सब राम-कृष्ण, इन सबके साथ अगर बड़ी-बड़ी उपमाएँ न जुड़ी होती, इनके साथ बड़ा इतिहास न जुड़ा होता, बड़े हमारे संस्कार न इनसे जुड़े होते तो हम इन्हें कब का ख़ारिज़ कर देते, क्योंकि ये लोग बातें ही ऐसी करते हैं कि बड़ी चोट लगती है। जब तक इनकी मूरत पूज लो, जब तक इनके किस्से सुन लो, तब तक तो ये बड़े भले लगते हैं, बड़े मीठे लगते हैं, “आहाहाहा, क्या बात कही थी!”

फिर कृष्ण क्या बोले यशोदा मैया से? और फिर कोई गायक है उसने आकर गा दिया, “यशोमती मैया से बोले नंदलाला”। आहाहा, बड़ा अच्छा लगा! श्री कृष्ण को छोटा-सा लड्डू-गोपाल बना लो, उसको अपने छाती से चिपकाए-चिपकाए घूमो, उसको दुद्धू पिला दो। बड़ा भला लगा, कितने भले हैं कृष्ण!

पर जहाँ गीता खोलते हो, पट से चाटा पड़ता है। कहते हो कि ये क्या हो गया। अभी तक तो बड़े भले थे। गोपियों के साथ नाच रहे थे और ग्वालों के साथ गैया चराने गए थे। मैया मैंने चराई गइया! बिल्कुल अपने से लगते थे, क्योंकि हम भी वही हैं, घास चराने वाले।

लेकिन जैसे ही गीता खोलते हो और दार्शनिक कृष्ण से मिलते हो, कृष्ण द फिलॉसफ़र से मुलाकात होती है तो छुपने को जगह नहीं मिलती, भागते फिरते हो और लगता है अरे! ये कौन सामने आ गया? बाँसुरी कहाँ हैं? अठ्ठारह अध्याय बीत गए और बाँसुरी तो बजी ही नहीं और हमें तो बस मोह है उनकी बाँसुरी से। और मोर पंख कहाँ है? और वो नृत्य कहाँ है जमुना के तट पर? और सुदामा कहाँ छुप गया?

वो सब बातें भली लगती हैं। पर जब गीता अपने प्रचंड रूप में सामने आती है तो हमारी सब पुरानी धारणाओं को, अपने बारे में और दुनिया के बारे में हमारे विश्वासों को, झकझोरती ही नहीं है, उखाड़कर फेंक देती है। इतनी गहराई और इतना दम है गीता में, श्रीकृष्ण के वक्तव्य में। इसीलिए तो हम आमतौर पर गीता से दूरी बनाए रखते हैं। उसको पूज लेंगे, उसको पढ़ेंगे नहीं।

तो प्रश्नकर्ता की तकलीफ़ यह है कि अगर हमारी बुद्धि भी घास ही है तो जियें कैसे? भरोसा किस पर करें? क्योंकि हम तो चलते ही हैं, कदम-कदम बुद्धि से नापकर ही उठाते हैं। हम करें क्या?

अरे भइया, ये भी क्या है? (अपने सामने रखे माइक की ओर इशारा करते हुए) चेतन तो नहीं है न? पदार्थ मात्र है। लेकिन क्या इसका कोई मूल्य नहीं? दिक्कत तब हो जाएगी जब इससे (वक्ता से) आप तक जो बात आ रही है, उसको आप सोचने लग जाए कि वो बात इससे (माइक से) आ रही है। इसका (माइक का) मूल्य है, इसके बिना आप तक मेरी बात नहीं पहुँचेगी।

जब तक आपको पता हो कि यह यंत्र मात्र है, उपकरण मात्र है, तब तक कोई समस्या नहीं। समस्या तब हो जाती है जब इंसान सोचने लग जाता है कि उस तक जो आवाज़ आ रही है, वो इसकी (माइक की) पैदाइश है, इसी से पैदा हुई है। तब दिक्कत हो जाती है।

बुद्धि का जो सही और सम्यक इस्तेमाल है, वो करो। जैसे इस माइक का सही इस्तेमाल करना जानते हो। सही इस्तेमाल जानने का मतलब होता है यह जानना कि कहाँ पर जा करके उसका इस्तेमाल ख़त्म हो जाता है, उसके आगे उसकी कोई उपयोगिता नहीं। जब तक मैं (इस शिविर कक्ष में) बैठा हूँ, इस माइक की उपयोगिता है, मैं नहीं तो इस माइक की कोई उपयोगिता है?

इसी तरह यह बुद्धि है। ऐसा नहीं कि यह अनुपयोगी है, ऐसा नहीं कि यह व्यर्थ है, पर इसका महत्व, इसकी उपयोगिता सिर्फ़ तभी तक है जब इसके पीछे 'वो' (परमात्मा) बैठा हो। वो बैठा है, बुद्धि के माध्यम से वो बोल रहा है—बुद्धि माध्यम मात्र है—बात उसकी है तो बुद्धि शुभ है। पर जिस दिन ऐसा हो गया कि बुद्धि ही बढ़-चढ़कर बैठ गई कुर्सी पर। कुर्सी पर कौन बैठा हुआ है? माइक बाबा और माइक ही बज रहा है, उस दिन समझो कि महा अशुभ हो गया।

हमारी ज़िन्दगी ऐसी ही है। वो जिसको बोलना चाहिए, उससे हमने दूरी बना ली है। और बोल कौन रहा है? ससुरा माइक! ये तो हमारी ज़िन्दगी है। यही बजता रहता है भनभन-भनभन। सुना है न? बहुत बार होता है।

मैं हट भी जाऊँ यहाँ से और यहाँ कक्ष में पंखा वग़ैरह कुछ तेज कर दो, तो ये माइक ख़ूब बजेगा। ख़ासतौर पर अगर घटिया किस्म का माइक हो। क्या बढ़िया आवाज मारता है, कान में उंगली देनी पड़ती है ऐसी आवाज़ आती है माइक से। सुनी है? कैसी आवाज़ आती है? कर्कश। जैसे ब्लैकबोर्ड होता था बचपन में और उस पर ले जा करके लकड़ी का डस्टर घिस दो। कभी घिसा है? डस्टर में थोड़ा कपड़ा लगा रहता था और वो कपड़ा जाता था घिस, वो ख़त्म हो जाता था। उसके बाद आप जाओ ब्लैकबोर्ड को साफ़ करने तो लकड़ी भर बचती थी और लकड़ी जब बोर्ड में घिसती थी तो कितना संगीत उत्पन्न होता था? याद है कुछ? कुछ याद आ रहा है?

हाँ, तो वैसा ही संगीत हमारे जीवन में फैला हुआ है क्योंकि बुद्धि बोल रही है, बुद्धि के पीछे जिसे बोलना चाहिए, वो नहीं बोल रहा। उसकी तो हम बात ही नहीं सुनना चाहते। बुद्धि की बात सुनना चाहते हैं और ये अपना कुछ-न-कुछ बोलती रहती है। हर उपकरण की, हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की अपनी कुछ नॉइस होती है, सिस्टमिक नॉइस , हम उस पर जी रहे हैं। उसके पीछे बोलने वाला कोई नहीं है।

बुद्धि का प्रयोग करना आना चाहिए, भाई, लेकिन यह तो बताओ कि प्रयोगकर्ता कौन है? नहीं समझे? प्रयोग करने वाला कौन है? ये तो बताओ। बुद्धि तो अब माइक है। उसमें जो भी बोल देगा, उसी की आवाज़ को वो गुंजित कर देगी। थोड़ा-सा ज़्यादा विकसित माइक समझ लो। ऐसा भी हो सकता है कि जिसमें तुम बोलो हिंदी में और उसके भीतर एक अनुवादक बैठा हुआ है, तो स्पीकर में सुनाई दे अंग्रेज़ी में। जानते हो न ऐसे आते हैं उपकरण? तुम उनमें एक भाषा में बोलो, वो दस भाषाओं में ख़ुद ही अनुवाद करके सबको सुना देंगे।

तो बुद्धि यह सब कर लेती है। काफ़ी विकसित क़िस्म का उपकरण है बुद्धि। उसमें एक बात बोलो, उसमें वो दस बातें जोड़ देगी, ये कर देगी, वो कर देगी, अलंकरण कर देगी, भाव विन्यास, वाक्य विन्यास कर देगी, बहुत कुछ कर देगी। लेकिन जो मूल बात है, वो कभी बुद्धि की नहीं होगी। मूल बात तो बोलने वाले की ही होगी। वो बोलने वाला कौन है? बुद्धि का इस्तेमाल करने वाला कौन है, ये बताओ न? या तुमने यह इजाज़त दे दी है बुद्धि को कि वो स्वयंभू हो जाए, ख़ुद ही राजा हो जाए। माइक अपनी बात बोल रहा है, ‘तस्मै श्री गुरुवे नमः’। यही हो गया है गुरु? (माइक की ओर इशारा करते हुए)

आपकी बुद्धि को संचालित कौन कर रहा है? छोटा-सा प्रश्न है ये मेरा। बताइए, कौन कर रहा है? बुद्धि तो रिक्शा है, कि चाकू है, कि टोपी है? किसके सिर पर टोपी है, ये तो बताओ? किसको टोपी पहना रहे हो? तुम्हारी बुद्धि को चला कौन रहा है? मुझे बताओ।

बुद्धि न अच्छी होती है, न बुरी होती है। बुद्धि जिसकी होती है, वो तुम्हारे लिए अच्छा होता है या तुम्हारे लिए बुरा होता है। बुद्धि को अपने हाथों में रखोगे तो वही बुद्धि प्रलय लेकर आ जाएगी, जैसा आज-कल हो रहा है। ऊपर तो अब कोई बचा नहीं, उसको तो साफ़ कर दिया। इंसान ख़ुद ही ऊपर वाला है, तो अपनी बुद्धि को वही चला रहा है। तो अब दुनिया का हाल क्या है, वो भी देख रहे हो।

और बुद्धि तुम्हारी किसी और की अनुगामिनी रहेगी, किसी और की माने पड़ोस के गुल्लू चाचा की नहीं। कहा कि आचार्य जी ने ही तो बोला था कि बुद्धि किसी और की अनुगामिनी होनी चाहिए तो हमने अपनी बुद्धि सौंप दी है अपनी कट्टो को। वो (बुद्धि) उसी के पीछे-पीछे चलती है अब।

बुद्धि किसी और की अनुगामिनी होनी चाहिए, माने किसी ऐसे की जो तुम्हारे तल का बिल्कुल न हो, जमीन का न हो। बुद्धि आसमान के पीछे-पीछे चले। बुद्धि आसमान के पीछे-पीछे चलेगी तो तुम्हें भी आसमानों जैसी ऊँचाई दे देगी और बुद्धि नहीं चलेगी आसमान के पीछे-पीछे तो तुमको मिट्टी में ही लोटाती रहेगी।

इस बात को समझिएगा। आज-कल यह भी बड़ा प्रचलन हो रहा है, फैशन , कि देखिए, साहब, अध्यात्म में तो दिमाग़ का इस्तेमाल करना ही नहीं चाहिए। बुद्धि, और तर्क और विचार, ये तो व्यर्थ की बातें हैं। सुनते हो न? कहते हैं कि कुछ बातें तो दिल से होती हैं, दिल से; सोचना नहीं चाहिए। ये पागलपन है। बेशक सोचना चाहिए। विचार बहुत-बहुत महत्वपूर्ण हैं। और बच के रहिएगा ऐसे लोगों से जो सोचते नहीं हैं — वो जानवर हैं।

प्रश्न यह है कि तुम्हारी सोच के केंद्र पर कौन बैठा है? और कौन बैठा है तुम्हारी सोच के केंद्र पर, यह मैं ऐसे ही कोई आसमानी जुमला नहीं उछाल रहा हूँ। प्रयोग करके साफ़-साफ़ तुम जान सकते हो, पता कर सकते हो कि तुम्हारे चिंतन के केंद्र पर कौन बैठा हुआ है। पूछो, कैसे? देख लो कि तुम्हारा चिंतन पहुँचना किस तक चाहता है? जिस तक तुम्हारा चिंतन पहुँचना चाहता है, उसी से तुम्हारा चिंतन शुरू हुआ है।

उदाहरण के लिए, अगर तुम सोचते ही यही हो कि क्या तरीका निकालूँ कि शांति बनी रहे, शांति मिल जाए तो साफ़ समझ लो कि तुम्हारे चिंतन को अनुप्रेरित भी कर रही है शांति। जहाँ से आएगा, उसी तक वापस जाने के लिए आतुर रहेगा। और अगर तुम्हारा चिंतन यह है कि कैसे थोड़ा और माल बना लिया जाए, कैसे फलानी ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया जाए, कैसे किसी को प्रभावित कर दें, कैसे किसी को ले भागें, तो समझ लो कि तुम जिसको ले भागने की योजना बना रहे हो, उस योजना का आरंभ भी उसी से हुआ है। जहाँ तुम्हारे चिंतन का अंत हो रहा है, तुम्हारे चिंतन का आरंभ भी वहीं से हो रहा है। यह सिद्धांत समझ में कुछ आ रहा है?

अब मान लो तुम्हारा सारा चिंतन इसी बात पर केंद्रित रहता है कि कैसे मैं अपने बीवी-बच्चों को ख़ुश रख सकूँ। बहुत साधारण-सी चीज़, है न? तो समझ लो कि ये चिंतन भी तुम्हारा फिर ऊपर वाले से नहीं आ रहा है, घरवाली से ही आ रहा है, और क्योंकि घरवाली से ही आ रहा है इसीलिए जा भी रहा है सिर्फ़ घरवाली तक। ऊपर वाले से आया होता तो जाता भी लौट करके ऊपरवाले तक। पर चूँकि तुम्हारा सारा चिंतन आ ही रहा है घरवाली से, उसी का प्रभाव है तुम्हारे दिमाग़ पर कि तुम्हारी सारी सोच अब उसी के इर्द-गिर्द घूम रही है। आ ही रही है तुम्हारी सोच उससे तो तुम्हारी सोच फिर जा भी रही है सिर्फ़ उसी तक। जहाँ से आएगी, उसी को जाएगी।

ख़ूब ख्याल रखो कि बुद्धि के केंद्र पर कौन बैठा है, और यह जानना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि हमने किसको बैठा लिया। बस यह देख लो कि बुद्धि बार-बार किस लक्ष्य की चाह रख रही है। तुम जिस लक्ष्य की चाह रख रहे हो, समझ लो तुमने उसी को अपना भगवान बना लिया है।

और भगवान क्या होता है? जिसको चाहो वही भगवान हो गया तुम्हारा। बात बहुत सीधी है न? कोई इसमें पेंच नहीं। तुम जिसको भी बिल्कुल दिलो-जान से टूटकर चाहने लग गए, वही तो ईश्वर हो गया तुम्हारा। तो उसी तक पहुँचने की कोशिश करोगे क्योंकि उसी को चाह रहे हो। जिसको चाह रहे हो, समझ लो कि उसी के प्रभाव में आ करके उसको चाह रहे हो तुम। मामला बिल्कुल गोल है।

हम सोचते हैं कि हमारी स्वतंत्र सत्ता है और इस स्वतंत्र सत्ता के चलते हम किसी को चाह रहे हैं। नहीं, बात बिल्कुल ग़लत है। आप जब किसी के अधीन हो जाते हैं, तब उसको चाहने लग जाते हैं। पहले अधीनता आती है, फिर चाहत आती है अधीनता से।

कुछ ग़लतफ़हमियाँ शायरों के लिए छोड़ देनी चाहिए। उनको लगता है कि वो अपने-आपमें बड़े आज़ाद तबीयत हैं और वो अपनी आज़ादी का इस्तेमाल करके कहते हैं, “तेरा तसव्वुर अब दिन-रात आँखों में है और जहाँ-जहाँ होता हो, जिस्म में हर जगह है। तेरा ही तसव्वुर! तेरा ही तसव्वुर!” इन बेचारों को यह पता ही नहीं कि वो आज़ाद हैं ही नहीं किसी का तसव्वुर करने के लिए। तसव्वुर माने कल्पना। वो आज़ाद हैं ही नहीं किसी की कल्पना करने के लिए।

आप जिसकी कल्पना कर रहे हो, वो पहले ही आपको ग़ुलाम बना चुका है, इसीलिए तो आप उसकी कल्पना कर रहे हो। अब गुलाम को हक क्या है अपने मुताबिक कल्पना करने का? उसकी तो कल्पना भी ग़ुलामी में है। वो तो उसी की कल्पना करेगा जिसकी कल्पना करने के लिए उसको आदेश मिल गया है, बाध्य हो गया है वो, वही करेगा वो।

तो बुद्धि उपकरण है। बस यह देख लो कि बुद्धि को, उस उपकरण को कौन निर्देशित और संचालित कर रहा है। इतनी जल्दी मत कह दिया करो कि मेरी बुद्धि ऐसा कह रही है। अरे! बुद्धि तुम्हारी है कहाँ? सौ जनों का तो हमारी बुद्धि पर क़ब्ज़ा रहता है, हमारी बुद्धि हमारी है कहाँ? इसीलिए आप जिसको आई.क्यू. कहते हैं, उसकी बहुत अहमियत नहीं है, वो बहुत ख़तरनाक भी हो सकता है। प्रश्न यह है कि आई.क्यू. किसके हाथ में पड़ गया है? आई.क्यू. तो बहुत है। आई.क्यू. ऐसा जैसे *एके-47*। चलाने वाला कौन है, भाई? कौन है चलाने वाला? वो बुद्धि किसके हाथ में पड़ गई है? संचालित कौन कर रहा है उसको?

इसीलिए जानने वालों ने हिंदुस्तान में कभी आपको ये आशीर्वाद नहीं दिया कि जाओ, वत्स, बुद्धिमान हो जाओ। उन्होंने आपको बुद्धि का नहीं, बोध का आशीर्वाद दिया है। वो समझ गए थे कि ये बुद्धि तो गड़बड़ चीज़ है। ये उतनी ही अच्छी है जितना अच्छा इसका प्रयोगकर्ता है। प्रयोगकर्ता अच्छा है तो बुद्धि अच्छी है। प्रयोगकर्ता ही अगर गड़बड़ है तो बुद्धि तो अपना ही गला रेतने वाला चाकू बन जाएगी न?

बुद्धि का पूरा-पूरा इस्तेमाल कीजिए। मुझे बड़ा अफ़सोस होता है जब मैं अध्यात्म को बुद्धिहीनों का अड्डा बनते हुए देखता हूँ। बड़ा लोगों को सुकून मिलता है सत्संग इत्यादि में जा करके। वो कहते हैं, “वैसे और कहीं जाते तो दिमाग़ लगाना पड़ता और मुँह खोलकर बताना भी पड़ता कि भैया, बात क्या समझ में आई है। कुछ अपनी मौलिक बात भी रखनी होती। भजन-कीर्तन, सत्संग में बढ़िया रहता है। चुपचाप सुनते रहो, या फिर जो कहा जा रहा है या गाया जा रहा है, उसको दोहराते रहो। ये बढ़िया है, ये सही है, यहाँ सम्मान बचा रहता है। यहाँ सब एक बराबर होते हैं। यहाँ पर कोई बड़े-से-बड़ा वैज्ञानिक भी आकर बैठ जाए तो उसे कहा जाएगा चुप हो जा और सुन। तो हममें और उसमें कोई अंतर नहीं रहा न। चलो एक जगह तो ऐसी मिली, यहाँ ऊँचे-से-ऊँचा आदमी भी हमारे ही तल पर आ गया।”

अध्यात्म बुद्धिहीनों का अड्डा नहीं होना चाहिए। अध्यात्म ऊँची-से-ऊँची बुद्धि के लोगों के लिए है। और ऊँची-से-ऊँची बुद्धि वो जिसके केंद्र पर बैठा हुआ है बोध।

बुद्धि जब आगे बढ़ती है, आगे बढ़ती है, जानते हैं कि उसे क्या पता चलता है? उसे अपनी सीमाओं के बारे में पता चलता है। बुद्धिमान वो जो बुद्धि को ही समझता हो। बुद्धिमान वो नहीं जो बुद्धि के माध्यम से दुनिया को समझने लग जाए, बुद्धिमान वो नहीं जो बुद्धि के माध्यम से दुनिया का विश्लेषण करने लग जाए। बुद्धिमानी सबसे पहले इसमें है कि आप बुद्धि की ही पूरी प्रक्रिया को समझें। बुद्धि चीज़ क्या है? बुद्धि के माध्यम से दुनिया को मत देखिए, सर्वप्रथम बुद्धि को ही देखिए कि यह बुद्धि क्या है। हम कहते हैं जिसको अपना चिंतन, अपनी विचारणा, अपने भाव, अपनी धारणा, उनमें हमारा है कितना?

तर्क भी अगर आप पढ़ेंगे, तर्कशास्त्र में अगर आप जाएँगे, तो आपको पता चलेगा कि पूरा तर्कशास्त्र भी कुछ सैद्धांतिक बुनियादों पर खड़ा होता है। हर तर्क के पीछे एक धारणा होती है।

आप जब तर्क भी करते हैं न, हो सकता है आपका तर्क बड़ा तीखा हो, लेकिन आपका तर्क बिल्कुल फ़िजूल है अगर आपको नहीं पता कि आपके तर्क के नीचे धारणा क्या है, असम्पशन क्या है, हाइपोथेसिस क्या है। वो बिना पता हुए अगर आप तर्क के तीर छोड़े जा रहे हैं तो बिल्कुल अंधे आदमी की तरह है, जो न ख़ुद को जानता है, न अपने लक्ष्य को जानता है, वो बस गोलियाँ और तीर चलाना जानता है।

उसे यह पता ही नहीं कि वो जो कर रहा है, वह क्यों कर रहा है। उसे पता ही नहीं कि उसके ऊपर किसका साया है, क्या प्रभाव है। उसको पता ही नहीं कि वो वास्तव में कौन है। वो बस करे जा रहा है। क्यों करे जा रहा है? सुन लिया, देख लिया। और यह मानना तो, भाई, अपमान की बात है कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, उसका हमें कुछ पता नहीं है वास्तव में।

कुछ काम हमसे हमारा जिस्म करा देता है और कुछ काम हमसे वो प्रभाव करा देते हैं जो हम पर बचपन से पड़े हैं, समाज से पड़े हैं। इन दोनों प्रभावों का जो योग होता है, उसको हम कह देते हैं, 'मेरा जीवन’, ‘मेरी बुद्धि’, ‘मेरे विचार’, ‘मेरी धारणाएँ'। इनके लिए जान दिए दे रहे हो?

बुद्धि का पूरा-पूरा इस्तेमाल करो लेकिन बार-बार देखो कि बुद्धि कहीं अहंकार की रक्षा के लिए तो नहीं चल रही।

उदाहरण दूँ? मान लो किसी से बहस हो गई हो, देखा है बहस करते हुए दिमाग़ कितना तेजी से चलने लगता है? जितना तेजी से मुँह चलता है, उतनी ही तेजी से दिमाग़ चलता है क्योंकि जल्दी ही उस पर अगला राउंड फायर करना है न। ये देखा है कि नहीं देखा है? आपको पता है कि उसका तर्क आ रहा है, आपको पता है कि उसका तर्क पूरा हुआ और जवाब देने में अगर पाँच सेकंड भी अतिरिक्त लगा दिए तो साबित हो जाएगा कि आप हारे। वो इंतज़ार ही इसी बात का कर रहा है कि तुम किसी तरीके से ज़रा-सा चुप हो और वो कहे, “मैं जीता।”

तो तर्क में तो बहुत ज़रूरी होता है कि उसकी गोलियाँ ख़त्म हो, उससे पहले आपकी गोलियाँ शुरू हो जाएँ। जब बुद्धि इतनी तेजी से चल रही हो, तो उसी समय उसे पकड़ लो और उससे पूछो, “इरादा क्या है?” जो उसका इरादा है, वही उसकी उत्पत्ति है। इस सिद्धांत को थोड़ी देर पहले भी कह चुके थे। “जहाँ पहुँचने का इरादा है, वहीं से तो चले हो। जिसको बचा रहे हो, उसी से तो पैदा हुए हो।”

बुद्धि किसको बचा रही है बहस के दौरान? जब बहस में लगे हुए हो किसी से तो सारी अक्ल किसको बचाने के लिए तत्पर है? बताओ जल्दी। अहंकार को। तो समझ लो कि यह सारा अभी जो बुद्धि में मसाला आ रहा है, वो आ भी अहंकार से रहा है। अहंकार से ही आ रहा है इसीलिए तो अहंकार को बचाना चाहता है। उसी वक्त रुक जाओ।

जिसको ठीक बहस के बीचो-बीच यह बात समझ में आ गई, वो बहस से उठ जाएगा। वो कहेगा, "न, ये ग़लत हो रहा है। इसमें शिरकत करना अपने आपको गिराना है, क्योंकि मैं सच को जानने के लिए तो तर्क दे ही नहीं रहा हूँ, भाई। मुझे सच तक पहुँचना ही नहीं है। ये जो मैं पूरी बयानबाजी कर रहा हूँ, बहसबाज़ी कर रहा हूँ, इसका उद्देश्य सिर्फ़ एक है। क्या? अहंकार की रक्षा। वो मैं क्यों करूँ?”

इसका मतलब यह नहीं है कि तर्क ग़लत है, इसका मतलब है कि आप तर्क का इस्तेमाल ग़लत लक्ष्य के लिए कर रहे हैं। तर्क बहुत अच्छी बात है। फिर कह रहा हूँ, कृपा करके यह न कह दीजिएगा कि अध्यात्म में आए हैं, यहाँ तर्क का क्या काम? अध्यात्म में तर्क का बिल्कुल-बिल्कुल काम है। अध्यात्म अतार्किक लोगों के लिए नहीं है, अध्यात्म कुतर्की लोगों के लिए भी नहीं है। अध्यात्म में तर्क का गहरा काम है। बिना तर्क के कैसा अध्यात्म? बिना दर्शन के कोई अध्यात्म हो सकता है क्या?

हिंदुस्तान ने तो पश्चिम में जो शब्द चलता था फिलॉसफी , उससे ज़्यादा गहरा शब्द दिया है, क्या? दर्शन। दर्शन के बिना कौन-सा अध्यात्म और तर्क के बिना कैसा दर्शनशास्त्र? बुद्धि प्रवीण होनी चाहिए, बुद्धि तेजी से चले, अकाट्य बुद्धि हो, रेज़र शार्प , लेकिन वो बुद्धि अहंकार की रक्षा के लिए नहीं चाहिए।

बहस करो, बात करो लेकिन लगातार अपने-आपसे पूछते रहो कि यह जो मैं कर रहा हूँ, कहीं अपने पुराने ढर्रों को, अपने पुराने व्यक्तित्व को, अपनी पुरानी मान्यताओं को बचाने के लिए तो नहीं कर रहा। सच तक पहुँचने के लिए अगर तुम तर्क में उलझ रहे हो, बहस कर रहे हो तो स्वागत है, ख़ूब करो। लेकिन सच जानने के लिए करो, सच जानने के लिए उत्सुक हो।

भले ही वो सच को जान करके मुझे चोट लगती हो, लेकिन सच तो जानना है। भले ही वो सच ऐसा हो कि जान लिया तो मुझे तार-तार कर दे, लेकिन सच जानना है। उसके लिए फिर तर्क की अगर ज़रूरत है तो हम तर्क करेंगे, साहब, ख़ूब करेंगे, खुलकर करेंगे। एक-से-एक सवाल उठाएँगे, किसी की भी बात मान ही नहीं लेंगे, और सामने चाहे कोई बैठा हो हमारा—बाप बैठा हो, गुरु बैठा हो, पीर बैठा हो, पैगंबर बैठा हो—सवाल तो करूँगा।

अगर बाप हो आप मेरे और बच्चा हूँ मैं, तो आपके लिए तो यह ख़ुशी की बात होनी चाहिए न कि मैं सच की तरफ बढ़ रहा हूँ। मुझे तर्क करने से रोकते क्यों हो? हाँ, मुझे रोको अगर आपको यह दिखाई दे कि मैं तर्क सिर्फ़ अपने पूर्वाग्रहों की रक्षा के लिए कर रहा हूँ, फिर मुझको बेशक रोको। लेकिन अगर आप अपने-आपको मेरा गुरु बताते हो तो आपको तो मुझे प्रेरित करना चाहिए, “पूछो, और पूछो। और तुम्हें किसी बात में कोई झोल दिखाई दे, कहीं पर तुमको कोई उलझन, पेंच दिखाई दे, तो उस बारे में दस बार सवाल करो। यूँ ही मान मत लो।”

सवाल करना न अभद्रता होती है, न बदतमीज़ी होती है। और मीठे-से-मीठा सवाल भी गुनाह है अगर वो पूछा गया है सिर्फ़ अपने-आपको बचाने के लिए।

हमने क्या कहा? हमने कहा बेशक चलाइए खोपड़ा; खोपड़ा चलाने के लिए ही है। इस माइक का इस्तेमाल बोलने के लिए नहीं किया तो क्या करोगे इसका? पूजा घर में पूजोगे? और किसलिए है ये? खोपड़ा चलाने के लिए ही है, एक दिन तो उसको भसम हो ही जाना है, तो उसके पहले चला लो उसे, भाई। साथ लेकर जाओगे क्या कि ये मस्तिष्क है हमारा हम लेकर आए हैं मौत के बाद?

चलाओ, ख़ूब चलाओ उसको। बल्कि जितना चलाओगे, ये जो तुम्हारा हथियार है, ये जो तुम्हारा औजार है, ये उतना ज़्यादा मंजेगा।

अच्छी बात है, बुद्धि चलाओ। लेकिन देखना है कि बुद्धि को चलाने वाला कौन है, माइक के पीछे कौन बैठा हुआ है। तो फिर हम कैसे पता करेंगे कि बुद्धि को चलाने वाला कौन है? जहाँ को बुद्धि जाना चाहती है, जिसको बुद्धि पाना चाहती है, समझ लो वही बुद्धि के पीछे बैठा है, वही बुद्धि का नियंता है।

प्र: आचार्य जी, प्रणाम। जैसा कि आपने बोला कि बुद्धि जहाँ से आ रही है, वहीं को जा रही है। तो एक चक्र जैसी है बुद्धि, और साथ में ये भी पता चलता है कि बुद्धि सीमित है। यह जानकर बुद्धि पर जो एक भरोसा है, वो तो ख़त्म होने लगता है, तो इस पर थोड़ा-सा प्रकाश डालिए।

आचार्य: तो यह तो अच्छी बात है। इस पर क्यों भरोसा कर रहे हो? शायद तुमको निराशा इसलिए हो रही है क्योंकि अभी तक तुम इस पर भरोसा कर रहे थे और यह उपलब्ध रहता था। जो पीछे बैठा है बुद्धि के, उसको चुनना पूरे तरीके से तुम्हारे अधिकार में है। अब बताओ निराश क्यों हो रहे हो?

बुद्धि के पीछे कौन है? ये बिल्कुल तुम्हारे इख़्तियार की बात है, निराशा किस बात की, भाई? तुम बिल्कुल तय कर सकते हो कि तुम्हारी बुद्धि का संचालक कौन होगा? पूछो तो, कैसे तय करेंगे? अरे, देख लो कि बुद्धि को ले कहाँ जा रहे हो। बुद्धि को अगर सही जगह ले जा रहे हो तो बुद्धि के जो पीछे बैठा है, वो अपने-आप सही है। जो बुद्धि के पीछे बैठा है, वो चाहता ही यही है कि तुम सही जगह ले जाओ।

“अब पता कैसे चले, आचार्य जी, कि सही जगह जा रही है बुद्धि? हम तो जहाँ जाते हैं, वह जगह हमें सही ही लगती है। पहुँच कर पता चलता है कि ये तो तीन-तेरह हो गया। अपनी तरफ़ से तो हम जो भी करते हैं, सही-सही ही करते हैं। राज़ तो बाद में खुलते हैं।”

बस ये जाँचते चलो कि जिधर को बढ़ रहे हो, उधर बढ़ने में भ्रम कट रहे हैं कि नहीं, कुछ चीजें साफ़-साफ़ पहले की अपेक्षा में समझ आ रही हैं कि नहीं, पहले से ज़्यादा खुले दिल के हो पा रहे हो कि नहीं, दिल से द्वेष-नफ़रत कम हो रहे हैं कि नहीं, और द्वेष-नफ़रत ही नहीं, मोह भी और आसक्ति भी कम हो रहे हैं कि नहीं। पूरी हस्ती में एक खुलापन आ जाता है और डर बिल्कुल कम हो जाता है।

तुम सही दिशा में बढ़ रहे हो, शायद इसका इससे ज़्यादा स्पष्ट प्रमाण, लक्षण या इंडिकेटर और कुछ होता ही नहीं कि तुम्हारे मन से डर मिटना शुरू हो जाता है। एक मासूमियत आ जाती है हस्ती में। मासूमियत और डर साथ-साथ नहीं चलते।

और अगर जिधर को बढ़ रहे हो, उधर बढ़ने के कारण भीतर मोह, मद, आसक्ति या द्वेष, क्लेश, नफ़रत बढ़ते ही जा रहे हैं, तो बेटा, ग़लत तरफ़ जा रहे हो।

सारा अध्यात्म और अभी भी ये जो सारी बातचीत हो रही है, वो किसके लिए है? वो इसीलिए हो रही है न कि जो कष्ट और बेचैनी हम आमतौर पर भुगत रहे होते हैं, ज़रा उसकी छानबीन करें कि ज़रूरी है भी या फालतू ही अपने आपको इतनी पीड़ा दे रहे हैं। अध्यात्म इसीलिए है न? न हो कष्ट तो अध्यात्म की कोई ज़रूरत? कोई ज़रूरत ही नहीं है।

तो जिधर को बढ़ रहे हो, उधर बढ़ने से अगर कष्ट कम हो रहा है तो सही जा रहे हो, बढ़ते जाओ। और जिधर को जा रहे हो, उधर बढ़ने के कारण जीवन में जटिलताएँ आ रही हैं, आँखों के जाले और सघन हो रहे हैं, तो थम। अगली गली से बाएँ हो जा। सीधे मत जा, ग़लत जा रहा है। वो कहते हैं न मुंबई में, 'निकल, पहली फ़ुर्सत में निकल'।

बहुत आसान है, बहुत आसान है। किधर को जा रहे हो, क्या काम कर रहे हो, किसकी संगति में हो, ये सब तुम्हारे लिए ठीक है या नहीं, यह जाँचना बहुत आसान है। बस यही देख लिया करो कि असर क्या पड़ रहा है तुम्हारे ऊपर, कैसे होते जा रहे हो। चेहरे पर एक कोमलता आ रही है या चेहरा पथरीला हुआ जा रहा है। और कोमलता माने कमज़ोरी नहीं, कोमलता माने जीवन। सुन पाने की, समझ पाने की शक्ति बढ़ रही है या बहरे हुए जा रहे हो, या कुछ सुनाई ही नहीं देता? एक अंतर्दृष्टि, इनसाइट पैदा हो रही है या आँखों वाले अंधे हो?

इनसाइट समझते हो? कि जो देखा, उसको गहराई तक देख लिया। और गहराई तक देख लिया, इसका यह मतलब नहीं है कि जो देखा, उसको देखकर दस कल्पनाएँ कर ली, कि एक चीज़ देखी और दस रच मारी दिमाग़ में। ये तो सब कर लेते हैं। देखा कुछ नहीं पर उन्हें लगता है कि सब देख आए।

सही दिशा में जा रहे हो इसका बड़ा द्योतक होती है इनसाइट , अंतर्दृष्टि। बहुत सारी चीज़ें साफ़ दिखाई देने लगती हैं, चीज़ों के अंतर्संबंध प्रकट होने लग जाते हैं। जो चीज़ें पहले अलग-अलग लगती थीं, अब तुम्हें उनके इंटरलिंकेजेज़ (अन्तर्सम्बन्ध) दिखाई देने लग जाते हैं। तुम कहते हो, “अच्छा, ऐसी बात है, इसलिए ऐसी बात है। अच्छा, समाज ऐसा है इसलिए अर्थव्यवस्था ऐसी है। अभी तक तो हम समझ रहे थे कि अर्थव्यवस्था और समाज दो अलग-अलग आयाम हैं। अब कुछ आयी बात समझ में।”

“अच्छा, हमारी मान्यताएँ ऐसी हैं इसलिए हमारी सड़क ऐसी है। हम तो सोचते थे मान्यता घर के अंदर की बात है और सड़क घर से बाहर होती है। न, अभी समझ में आ गया कि ये जो सड़क है घर के बाहर, इसकी टूट-फूट वास्तव में बस द्योतक है इस मोहल्ले की मानसिक टूट-फूट का। ये मोहल्ला मानसिक रूप से टूटा-फूटा है इसलिए इस मोहल्ले की सड़क टूटी-फूटी है। आ गयी बात समझ में।”

मैं ये नहीं कह रहा कि अनिवार्य रूप से ऐसा कोई संबंध दिखाई ही देगा और यही बोलना शुरू कर दो बाहर घर के। मैं सिर्फ़ उदाहरण दे रहा हूँ कि ऐसी बातें खुलने लग जाती हैं। ये सब हो रहा हो जीवन में, तो तुम्हारी बुद्धि तुम्हें सही दिशा में ले जा रही है। नहीं हो रहा है जीवन में या इसका विपरीत हो रहा है, तो सावधान हो जाओ।

आमतौर पर जिन लोगों में बोध बढ़ता है, उनकी ये प्रवृत्ति कम होने लगती है कि वो चीजों को खाँचों में बाँटकर देखें। उनके लिए बायनरी में ऑपरेट करना बड़ा मुश्किल हो जाता है, ये अच्छा, ये बुरा; क्योंकि उन्हें दिखने लगता है कि सब चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं। जब सब चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं तो मैं एक चीज़ को अच्छा और एक चीज़ को बुरा कैसे कह दूँ? जो बुरी चीज़ है वो भी कहीं-न-कहीं अच्छी चीज़ से जुड़ी हुई है, और जो अच्छी चीज़ है, उसका भी संबंध है उस चीज़ से जिसको मैं बुरा बोल रहा हूँ। तो मैं किसी एक चीज़ को कैसे पूर्णतया अच्छा और कैसे किसी एक चीज़ को पूर्णतया बुरा कह दूँ?

और जो आदमी आध्यात्मिक नहीं होता, तुम उसमें बड़ी सघन प्रवृत्ति पाओगे कि वो कहेगा मेरा पड़ोसी कमीना है और मैं तो साधु आदमी हूँ। उसमें ये बड़ी सघन प्रवृत्ति मिलेगी, बायनरी * । वो बगल में क्या है? * ज़ीरो (शून्य)। और यहाँ पर क्या है? वन (एक)। जो कुछ अच्छा-अच्छा था, वो इधर है और जो कुछ बुरा-बुरा था, वो मेरे पड़ोसी में है।

जिस आदमी का बोध गहराएगा, वो कहेगा कि कैसे कह दूँ। बहुत कुछ तेरा है जो मुझमें है और बहुत कुछ मेरा है जो तुझमें है। मैं ये नहीं कह रहा कि मैं और तू बिल्कुल एक ही हैं, मैं ये नहीं कह रहा कि मैं और तू बिल्कुल बराबर हैं, लेकिन साझा तो बहुत कुछ रखते ही हैं। और अस्तित्व में कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी भी दूसरी चीज़ से कुछ साझा न रखता हो। जानने वालों ने यही तो कहा है कि ये सब कुछ है ही क्या? प्रकृति के तीन गुणों का संगम है। तीन धाराएँ हैं, कभी कोई धारा मोटी हो जाती है, कभी कोई धारा विरल और कभी कुछ, कभी कुछ।

ये कर लेने के बाद जीवन में जन्म होता है अहिंसा का। हिंसक आप हो ही तभी सकते हैं जब आप कहें, “मैं सही हूँ, तू ग़लत है।” हिंसक होने के लिए बहुत ज़रूरी है कि अध्यात्म से आपका कोई ताल्लुक ही न हो। ज्यों ही आपको दिखाई देने लगेगा कि जो ग़लत है, उसका नाता सही से है, जो सही है, उसका नाता ग़लत से है, तो क्या सही और क्या ग़लत? और जो वास्तव में सही है, वो सही ग़लत की परिभाषा के पार का है, वो तो कहीं और का है।

हम जहाँ सही-ग़लत ख़ोज रहे हैं, वहाँ सही कुछ हो नहीं सकता पूरे तरीके से और ग़लत कुछ हो नहीं सकता पूरे तरीके से। इसीलिए आप पाएँगे जो सबसे अहिंसक धारा उठी भारत से उसकी अहिंसा के मूल में बैठा हुआ था अनेकांतवाद – जैन दर्शन। हम जैनों के बारे में इतना तो जानते हैं कि वो अहिंसक होते हैं, पर थोड़ा और गहराई से कम ही लोग पता करते हैं।

उनकी अहिंसा आ रही है स्यादवाद से। वो कहते हैं कि इस दुनिया में किसी भी चीज़ को ले करके कैसे पूर्णतया निश्चित हुआ जा सकता है। यहाँ तो कुछ पूर्ण है ही नहीं। पूर्ण जहाँ कुछ होगा तो होगा, उसकी कोई बात ही नहीं। जैन धर्म उसको बिल्कुल नकारता है, पूर्ण को हटाओ। हमें तो ये पता है कि इस जगत में जो कुछ भी है, वो अपूर्ण है, पहली बात। और दूसरी बात, हमें इंद्रियों के माध्यम से मिल रहा है तो हमें क्या पता इन माध्यमों ने बीच में क्या गड़बड़ कर दी।

आपको इस दीवार का क्या पता अगर आपके पास आँख न हो। और आपको कैसे पता कि आपकी आँखें ये जो बीच में बैठी हुई हैं मीडिएटर (मध्यस्थ) बनकर, गड़बड़ नहीं कर रही हैं? आपको क्या कुछ भी पता है डायरेक्टली (सीधे)? या तो सुना है, या देखा है, या छुआ है, या चखा है या सूँघा है। जो कुछ भी आपने करा है, वो करने में बीच में कोई बैठा हुआ है मध्यस्थ। अब मध्यस्थ का क्या भरोसा? हमने तो ये मध्यस्थ चुना नहीं था। कितने लोगों ने अपनी आँखें चुनी हैं भाई?

ज्यों ही आपको अंतर्दृष्टि मिलती है, त्यों ही आप अतिवादी होना बंद कर देते हैं, एक्सट्रीम्स (अतियों) में अब आप नहीं जी सकते। आप ये नहीं कह सकते कि अच्छा-अच्छा इधर, मीठा-मीठा इधर और कड़वा-कड़वा सब उधर। आप ये कर ही नहीं पाएँगे।

जीवन में ये दृष्टि उतर रही है तो जानिएगा कि आपका अध्यात्म गहरा रहा है। नहीं उतर रही हो, नफ़रत में, द्वेष में, घृणा में आपका बड़ा यकीन हो, तो जान लीजिएगा अध्यात्म से और दूर और दूर होते जा रहे हैं। सत्य से और दूर होते जा रहे हैं और जीवन को और ज़्यादा अँधेरे में डुबाते जा रहे हैं।

तो इतना भी मुश्किल नहीं है पता करना कि बुद्धि को संचालित कौन कर रहा है। आसानी से पता हो जाता है, बशर्ते नीयत हो पता करने की। नीयत नहीं है तो फिर छोड़ो।

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