प्रश्नकर्ता: कोई तरीका है क्या रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में भय से मुक्त रहने का?
आचार्य प्रशांत: बहुत तरीके हैं।
दिल में अगर सच्चाई के लिए श्रद्धा है, तो अनगिनत तरीके हैं। हर तरीका उसी क्षण की पैदाइश होता है जिस क्षण भय आघात करता है। मैं कोशिश करूँगा कुछ तरीके सुझाने की, सारे तरीके नहीं सुझा पाऊँगा, क्योंकि अनगिनत हैं!
भय आए, तो पूछिए अपने आपसे कि, "भय जो कुछ भी मुझे कह रहा है, जो भी कहानी सुना रहा है, वो कहानी अगर वास्तव में सच्ची है भी, तो भी क्या?"
भय ने कहा, "ये ये नुक़सान हो जाएगा", और हो सकता है कि हो भी जाए। हम नहीं कह रहे हैं कि नहीं होगा। मान ली तुम्हारी बात कि हो सकता है आज शाम तक हमें फलाना नुक़सान हो जाए, हाँ, हो गया! तो भी क्या?
हाँ, हो गया, ठीक है, तो भी क्या?
अरे! क्या बिगड़ जाएगा?
और कितना? भय कहेगा, "ये बिगड़ जाएगा, वो बिगड़ जाएगा।"




