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भय दूर कैसे हो?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भय, निर्भय और अभयㄧइनमें भेद क्या है?

आचार्य प्रशांत: आप अपनी हालत बताओ। यहाँ पहाड़ पर तीन तरह के पेड़ होते हैं, एक पेड़ का नाम है भय, एक का नाम है निर्भय, एक का नाम है अभय। मैं देने लगूँ जानकारी, तुम्हें क्या मिलेगा? तीन तरह की घाँस भी है, तीन तरह के बादल भी हैं, तीन तरह के ही छोटे-छोटे कीड़े उड़ रहे हैं, ये भी हैं। ये सब तो सामान्य ज्ञान है, इकठ्ठा कर के क्या करोगे? अपनी बात करो न।

प्र: अपनी बात बता रहा हूँ आचार्य जी, खेल के मैदान पर जाता हूँ तो फिर दिक्कत हो जाती है, भय बहुत लगता है। फिर अब अभय को पाना चाहते हैं तो कैसे पाएँ? कहीं भी जाता हूँ, कुछ भी काम करता हूँ तो भय लगता है, तो मैं उस भय को हटाना चाहता हूँ बिलकुल, कैसे हटाऊँ?

आचार्य: भय क्या कहता है?

प्र: कुछ खोने का भय होता है, बस डर लगता है।

आचार्य: जो कुछ भी लगता है इसका विवरण दो ज़रा।

प्र: मैं जूडो का खिलाडी हूँ और मुझे बीस साल हो गए खेलते-खेलते, लेकिन जब भी प्रतिस्पर्धाओं में जाता हूँ तो हार-जीत का भय लगता है।

आचार्य: भय माने क्या? क्या लगता है?

प्र: कि हार जाएँगे।

आचार्य: हाँ ठीक है, हार जाएँगे, तो उससे क्या लगता है? कोई बहुत शीतल कर देने वाली, मीठी कर देने वाली बात होती तो उसकी शिकायत तो नहीं कर रहे होते न? अंततः बुरा क्या लगता है?

प्र: बुरा ये कि आस-पड़ोस वाले बाते बनाएँगे और मुझे कहेंगे।

आचार्य: तो उसमें बुरा क्या लगता है?

प्र: अब यही समझ में नहीं आ रहा मेरे।

आचार्य: जानना पड़ेगा न? उसमें बुरा क्या लगता है? आस-पड़ोस वालों ने कह दिया कि ये हार गया, उसमें बुरा क्या लगा?

प्र: अपने-आपको ऐसा लगता है कि इतने दिनों से जो कर रहें है वो सब व्यर्थ है।

आचार्य: तो आस-पड़ोस वालों ने कहा तो उससे अपने-आपको भी लगने लग जाता है।

प्र: प्रतिस्पर्धा से पहले ही डर लगने लगता है, उसके दौरान नहीं लगता। प्रतिस्पर्धा के पहले सारी चीज़ें मन में आ जाती हैं।

आचार्य: क्या नाम है तुम्हारा?

प्र: सतपाल।

आचार्य: लोकेश, बोलो महिपाल।

(एक श्रोता बोलता है “महिपाल”)

बुरा लगा?

प्र: नहीं।

आचार्य: क्यों? ये भी तो आस-पड़ोस वाला ही है, बिलकुल पड़ोस में ही बैठा है। इसने कुछ बोला तुमको, तुम्हें बुरा क्यों नहीं लगा? और इसने तुम्हें जो बोला, वो तो बहुत घातक बात है, किसी की पहचान छीने ले रहा है।

तो सतपाल का सबकुछ नष्ट हो गया अगर तुम महिपाल हो; फिर तो सतपाल का घर महिपाल का नहीं हो सकता क्योंकि वो घर किसका है? सतपाल का। सतपाल का परिवार भी अब सतपाल का नहीं रहा क्योंकि तुम अब क्या हो? महिपाल। सब कुछ छीन लिया उसने एक झटके में, बुरा क्यों नहीं लगा?

प्र: ये चीज़ बहुत आसान लगी मुझे।

आचार्य: क्यों?

प्र: फर्क ही नहीं पड़ा इससे कुछ।

आचार्य: क्यों? दूसरे कहते हैं फर्क क्यों पड़ता है? यहाँ पर फर्क क्यों नहीं पड़ा?

प्र: यहाँ मुझे ये एहसास हुआ कि मैं तो हूँ ही सतपाल।

आचार्य: आ! ‘मैं हूँ ही सतपाल’, मतलब भरोसा है पूरा?

प्र: नाम पर है।

आचार्य: जिस भी चीज़ पर है, भरोसा है, “मैं तो हूँ ही, तो उसके कहने से क्या फर्क पड़ता है।” मैं तो हूँ ही सतपाल, तो उसके महिपाल कह देने से क्या फर्क पड़ता है। और जब कोई आ कर कह देता है ‘हरन्ता’ तब बुरा क्यों लगता है? किसी ने आ कर कह दिया, ‘हरन्ता है, लूज़र है,’ तब बुरा क्यों लगता है?

क्योंकि तब क्या नहीं है? भरोसा नहीं है। दूसरों की गलती है? दूसरों की गलती होती तो अभी इस पर चढ़ बैठे होते, “तूने महिपाल क्यों बोल दिया?” दूसरों की गलती है क्या?

प्र: नहीं।

आचार्य: तो अभी तो तुमने बोला कि इसने जो बोला मैंने बहुत उसको हल्के में ले लिया। हल्के में क्यों ले लिया इन्होंने?

प्र: क्योंकि भरोसा था।

आचार्य: जब भरोसा होता है किसी चीज़ पर तो दुनिया कुछ भी बोलती रहे, कोई फर्क ही नहीं पड़ता और जब भरोसा ही न हो तो फिर तो कोई कुछ भी बोल दे हालत ख़राब, “अरे! बाप रे बाप!”

दुनिया की गलती है? भरोसा तुममें नहीं है। डर का मूल कारण यही है ‘भरोसे की कमी’। डर तुमसे यही बोलता है “तू गया, कुछ छिना। तू मिटा, तू बँटा, तू लुटा।” यही बोलता है या और भी कुछ बोलता है डर? या डर कान में आ कर बोलता है “जन्नत!” ऐसा होता है?

क्या बोलता है डर? ‘खेल ख़त्म!’ ऐसे ही कोई बोलता है न? वो तो अभी पीछे से बोल सकते हैं “खेल खत्म।” तुम्हारा खेल खत्म हो जाएगा?

प्र: नहीं।

आचार्य: और कोई यहाँ बैठा हो बिलकुल बेहोश, मान लो चढ़ा रखी हो उसने और दुनिया उसकी घूम रही है बिलकुल। उसको लोग आकर बोलें कि “तू यहाँ बिलकुल कोने में बैठा है और गिरने ही वाला है, तेरा खेल खत्म।” कोई भरोसा नहीं वो अब हाय-हाय करके रोने भी लगे। क्योंकि उसको पता ही नहीं है वो कहाँ है।

उसको चूँकि अपना पता नहीं, तो जो भी उससे जो कुछ बोलेगा उसे उस पर विश्वास हो जाएगा। जिसे अपना पता नहीं उसे अपने-आपको दुनिया के माध्यम से देखना पड़ता है।

(प्रश्नकर्ता की ओर इशारा करते हुए) तुम्हारी पीठ पर एक काला निशान है, तुम्हारी जैकेट पर पीछे, पीठ पर काला निशान है।

प्र: मुझे दिख नहीं रहा।

आचार्य: तो क्या करोगे फिर?

प्र: जैकेट उतार कर देखूँगा।

आचार्य: अगर उतार नहीं सकते मान लो, मैं बोलूँ पीठ पर है और आईना नहीं है; पीठ तो नहीं उतार सकते न? तो कैसे देखोगे? क्या करोगे?

प्र: दूसरों से पूछूँगा।

आचार्य: दूसरों से पूछोगे। और दूसरा बुद्धू बना दे तो? जहाँ ये तुमने देखा नहीं वहीं तुम दूसरे पर निर्भर हो गए, जहाँ कहीं तुम्हें होश नहीं वहीं पर तुम याचक हो गए, फिर पूछोगे “कुछ है क्या?”

अब इसमें तो दूसरे की नीयत और सामर्थ्य दोनों की बात है। उसकी नीयत होनी चाहिए तुम्हें सच बताने की और उसमें सामर्थ्य भी तो होनी चाहिए कि उसे भी सच दिखता हो। क्या पता वो भी तुम्हारी ओर पीठ करके खड़ा हो और तुम उससे क्या कह रहे हो? कि, "ज़रा देखना मेरी पीठ पर क्या लगा है।" उसमें सामर्थ्य ही नहीं है, वो अपनी नहीं देख पा रहा, वो तुम्हारी क्या देखेगा?

प्र: इसीलिए तो आपके पास आया हूँ।

आचार्य: तुम्हें ये भी कैसे भरोसा है कि मैं कुछ बता दूँगा जब तुम भरोसे के आदमी ही नहीं? और अगर तुम ये भरोसा कर सकते हो कि मैं कुछ बता दूँगा, तो उसी शक्ति का उपयोग करके अपनी दृष्टि पर भरोसा क्यों नहीं कर लेते?

अभी भी तुम मुझ पर कम और अपने कानों पर ही तो ज्यादा भरोसा कर रहे हो। तुम तक क्या पहुँच रहा है? जो मैंने कहा या जो तुमने सुना? जो तुमने सुना। तो अंततः तुम्हें भरोसा किस पर है? अपने कानों पर। तो भरोसा तो तुम्हें है ही न? इसी भरोसे को जागृत करो, जीवन पर छा जाने दो।

अगर मेरी कही बात को तुम सही-सही समझ सकते हो, तो फिर तुम सबकुछ सही-सही समझ सकते हो। मैं तो फिर भी जटिल हो कर बताता होऊँगा, ज़िंदगी तो और खोल कर बताती है। मैं कोई ज़िंदगी से बड़ा गुरु थोड़े ही हूँ। मुझे तो फिर भी शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, जिंदगी तो यूँ ही बता देती है चलते-फिरते। मुझसे समझ सकते हो तो जिंदगी से भी समझ सकते हो। इधर-उधर याचक बनने की क्या जरूरत है कि, "भाई ज़रा बताना, कि मेरे हाथ पर तिल है कि नहीं?" तुम्हारे हाथ पर तिल है कि नहीं ये कोई और बताएगा?

ये तो फिर भी दूर की बात थी, हम ये तक पूछने निकलते हैं “भाई ज़रा बताना, मुझे दिखाई पड़ रहा है कि नहीं? भाई ज़रा बताना, मुझे सुनाई पड़ रहा है कि नहीं?" हम अपनी आत्मा भी दूसरों से पूछना चाहते हैं। जो बात बिलकुल अंदरूनी, केंद्रीय, गुह्य है, हम वो भी दूसरों से पूछने निकल जाते हैं।

वास्तव में तुमने कुछ बुरा नहीं कर दिया अगर तुमने किसी से ये पूछ लिया कि मेरे पीठ पर दाग तो नहीं लगा है। ये बात बाहरी है, सतही है, त्वचा मात्र की है, पूछ भी लिया तो कोई अपराध नहीं कर दिया। तुम कहीं को जा रहे हो किसी से रास्ता पूछ लिया तो कोई गुनाह थोड़े ही हो गया। लेकिन हम तो दिली बातें भी दूसरों से पूछने निकल पड़ते हैं न। और फिर गड़बड़ हो जाती है।

श्रद्धा बहुत केंद्रीय बात है, वो दूसरों पर आश्रित नहीं होनी चाहिए। तुम्हारी स्थिरता, स्थायित्व केंद्र है तुम्हारा, जड़ है तुम्हारी। दूसरों को ये हक नहीं देना चाहिए कि वो हिला दें तुम्हारी जड़ को।

पेड़ के पास तुम जाओ, तुम उसकी पत्ती ले लो, वो कुछ कहता ही नहीं तुमसे। कहता है “ठीक है, ले जाओ पत्ती, क्या होता है?" तुम उसकी टहनियाँ हिला दो, वो कुछ नहीं कहता, पर तुम उसकी जड़ें हिला कर दिखाओ, बहुत मुश्किल पड़ेगी। है न?

तुम्हें भी ये पता होना चाहिए कि दूसरों को क्या हिलाने का हक देना है और क्या है जो दूसरों की नजर से अछूता रहेगा। पेड़ की जड़े दिखती हैं? पत्तियाँ उसने तुम्हें दी, फूल उसने तुम्हें दिए, फल उसने तुम्हें दिए, टहनी भी दे दी, चलो तना तक दे दिया, जड़ों को वो बिलकुल छुपा कर रखता है। और जो छुपा हुआ है वही ताकतवर है, वही स्थाई है, वही अकम्पित रहता है और वहीं से पोषण मिलता है।

ज़माने के साथ उतना ही नाता रखो जितने का ज़माना पात्र है। दूसरापन ही सतही बात है, तो फिर दूसरों को तुम गहराई में कहाँ प्रवेश दे सकते हो?

कुछ बातों में दूसरों को राय न देनी चाहिए, न दूसरों से राय लेनी चाहिए। समझाने वाले कह गए हैं कि वहाँ या तो आत्मा की सुनो, या गुरु की; ज़माने का वहाँ कोई दखल नहीं।

कोई तुम्हें बता दे कि तुम हार गए, इतना उसका हक है बताने का। लेकिन कोई तुमसे कहे कि तुम हरंते हो, तो वो अपनी सीमा का अतिक्रमण कर रहा है। क्योंकि उसने तुम्हें अब ये बता दिया कि ‘तुम कौन हो’। और तुम कौन हो, ये दुनिया नहीं बता सकती तुमको; ये हक दुनिया को कभी देना ही नहीं।

कुछ ऐसा होना चाहिए तुम्हारे पास जो दूसरों के तो छोड़ दो, तुम्हारे हिलाए न हिले। दूसरों के लिए तो जो असाध्य, अगम हो ही, तुम्हारे लिए भी अज्ञेय हो; तुम्हारे भी हाथ वहाँ तक पहुँचते न हों। हो तुम्हारा ही, पर तुमसे दूर हो। हो तुम्हारा ही, पर ऐसा हो जिसका तुम उपयोग न कर सकते हो। जिसके तुम मालिक न बन सकते हो। जो तुम्हारे ज्ञान में, स्मृति में न समाता हो। अब तुम कैसे खराब करोगे उसे? और चूँकि अब तुम जानते हो कि न तुम खराब कर सकते, न दुनिया खराब कर सकती, इसीलिए उसके खराब होने का शक तुम्हें पैदा ही नहीं होगा।

कुछ ऐसा है जो खराब हो ही नहीं सकता। पूछो क्यों? क्योंकि हम भी नहीं खराब कर सकते उसे। हमने भी पूरी कोशिश कर ली। दुनिया ने हमें बर्बाद करने की कोशिश की, हमने दुनिया से कहा चलो हम साथ देते हैं तुम्हारा। तो दुनिया और हमने मिलकर के अपने आप को बर्बाद करने की कोशिश की, लेकिन कुछ है हममें ऐसा जो बर्बाद होता नहीं।

अब तुम्हें पूरा भरोसा रहेगा कि तुम्हारी बर्बादी असंभव है। अब कोई आकर लाख तुम्हारे कान में चिल्लाए “तू लुट गया, तू कहीं का नहीं रहा।” तुम कहोगे “भाई, यही मैं भी चाहता हूँ, पर मज़बूरी ये है कि ऐसा हो नहीं सकता। कोई ऐसी बला है हमारे भीतर लुटना जिसका काम नहीं। हमारे बस में होता तो हमने कब का अपने-आपको बर्बाद कर ही लिया होता, पर देखो हमारी सारी चालाकियों, सारी कोशिशों के बावजूद भी हममें कुछ ऐसा है, जो हरा भरा है।” आग तो घर को खूब लगाई थी, लेकिन बाग अभी भी हरा भरा है।

तुम्हें भरोसा कैसे नहीं आता? तुम्हारी सारी होशियारियों के बावजूद तुम यहाँ बैठे हो, तुम्हें अभी भी भरोसा नहीं आता कि तुम्हारा कुशल-क्षेम किसी और के हाथों में है? सोचो तुम्हारी चलती तो अब तक तुमने अपना क्या कर डाला होता। तुम्हारी हालत उस बच्चे की तरह है जो सब अंट-शंट खा लेना चाहता है; उसका बस चले तो वो मार ही डाले अपने आप को। पर जिसका बाप खड़ा हुआ है, जो कह रहा है “तू कर ले कोशिश अपने-आपको तबाह करने की, मैं तुझे तबाह होने नहीं दूँगा।”

तुम्हें खुद पर थोड़े ही भरोसा करना है, खुद पर तो तुम पूरा भरोसा करो, यही कि हम भरोसे के लायक नहीं; हमें पूरा भरोसा है कि हम भरोसे के लायक नहीं। लेकिन है कोई और भी न, जो तुम्हारे भरोसे की पकड़ से आगे का है, इसीलिए उस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है।

तुमने उस पर भरोसा किया होता चुनकर, तो वो कब का तुम्हें धोखा दे गया होता। तुमने जिन-जिन पर भरोसा किया, वहाँ क्या पाया? तो अच्छा है कि कोई ऐसा है जिसको तुम जान ही नहीं सकते। जब जान ही नहीं सकते तो तुम्हें भरोसा आएगा नहीं, क्योंकि तुम तो ज्ञान और जान और पहचान पर ही भरोसा करते हो। और वो है ज्ञान से आगे की बात, तो उस पर तुम्हें भरोसा है नहीं। भला है कि तुम्हें भरोसा नहीं है; अब वो भरोसे के काबिल हुआ।

हमारी हालत उस शराबी जैसी है जो गाड़ी में बैठा है और जिसे पूरा भरोसा है कि गाड़ी वही चला रहा है। अगली सीट पर बैठ गया है वो चालक के बगल में, और भरोसा उसे क्या है पूरा? मैं ही चला रहा हूँ। और जितनी बार वो देखता है सामने से ट्रक आते, वो उतनी बार थर-थर काँपता है कि इस बार तो भिड़ ही गए। अपनी ओर से पूरी ताकत से काटता है वो, जाने क्या काट रहा है, कुछ काटता होगा। (श्रोतागण हँसते हैं) और जब काटता है तो देखता है इधर वाली खिड़की से बाहर, उधर दीवार है, कहता है अब भिड़ गए।

तुम चला रहे होते तो ज़रूर भिड़ जाते, तुम्हारे लिए अच्छी खबर ये है, कि तुम्हें इस भरोसे के काबिल माना ही नहीं गया है कि स्टीयरिंग तुम्हारे हाथ में दी जाए। तुम्हारी गाड़ी कोई और चला रहा है। तुमने इतनी पी रखी है कि तुम अपने-आपको कर्ता मानते हो, तुम अपने-आपको चालक मानते हो।

कहते हो न कि जो जग जाते हैं वो करना छोड़ देते हैं; वो करना छोड़ नहीं देते वो जान जाते हैं कि कभी भी, कोई भी, कुछ करता ही नहीं है। हाँ, शराबी को भ्रम है कि वो गाड़ी चला रहा है; उसको भ्रम है कि वो खूब चला रहा है। जो जग गया वो जान जाता है कि, "भाई मैं नहीं चला रहा हूँ, चल ही रही है। मैं क्यों ख़ामख़ाह तनाव लेता हूँ, कँपता हूँ?"

दुनिया के हराने से तो छोड़ दो, तुम अपने हराने से भी हार नहीं जाओगे। जब सब कुछ लुट रहा होगा तुम्हारा, तब भी तुम्हारे पास वो बचा होगा जो कह रहा होगा कि, "मैं लुट गया!" और उसके पीछे भी कोई बैठा होगा जो देखता होगा कि कोई शोर मचाता है “मैं लुट गया।” वो कैसे लूटेगा?

प्र२: आचार्य जी, ये बात दोबारा बताइए।

आचार्य: कोई तुम्हारे घर आए और लूट-पाट के चला जाए और फिर तुम शोर मचाओ “हाय-हाय! सब लूट कर ले गया!” तो तुम सच बोल रहे हो या झूठ? तुम अपने घर में हो रात में, कोई आया और जो कुछ था सब उठाकर ले गया और सुबह उठ कर तुम शोर मचा रहे हो कि हाय-हाय सब लूट कर ले गए। तो तुम सच बोल रहे हो कि झूठ?

प्र: झूठ।

आचार्य: झूठ। क्यों झूठ बोल रहे हो? तुम्हें तो छोड़ गए। “पर हमारी तो कोई कीमत ही नहीं है न। कुर्सी ले गए न। अब कुर्सी के बिना हम क्या हैं? हमें ले जाते, कुर्सी तो छोड़ जाते।” ऐसा तो तुम्हारा तर्क है। तुम्हारी दृष्टि में तुम कुर्सी जितने भी नहीं हो।

तुम्हें फ़र्क ही नहीं पड़ता कि जो लुटता है, जो मिलता है, वो सब बाहर-बाहर का है; केंद्रीय तत्व न मिलता है न लुटता है। तो फिर तो तुम्हें नहाने के बाद भी ज़ोर-ज़ोर से रोना चाहिए “हाय-हाय सब लुट गया, जितना ऊपर मैला था, सब गिर गया।” क्यों? तुम्हारा ही तो था, अभी तो लेकर फिर रहे थे। कहते थे उसी पर हाथ रखकर “ये मेरा हाथ है।” और हाथ किस पर रख रखा था? मैल पर। अब नहा लिया, वो साफ हो गई तो रोओ। और बाल मुंडाने के बाद भी रोओ, “मेरा सर कट गया।” क्यों? सर ही तो है।

कोई तुमसे पूछता है, सर पर हाथ रखो तो कहाँ हाथ रखते हो? रखो, सर पर हाथ रखो ज़रा। (श्रोता अपने बालों पर हाथ रखते हैं) अरे! तो फिर ये सब बाल मुंड जाए तो यही बोलना कि सर कट गया। ऐसी हमारी हालत है। चूँकि हमारी मजबूरी है कि हम सिर्फ खाल से खाल का रिश्ता बना सकते हैं, इसीलिए जब खाल छिनती है तो हमें लगता है कि सारा माल छिन गया। नाखून क्यों काटते हो? तुम कम हो जाओगे।

क्या आत्यंतिक है और क्या नहीं, इसको पहचानो। जो अंदरूनी नहीं है, जो बिलकुल ही साथ का नहीं है, जो एकदम ही अपना नहीं है, उसको वही जगह दो जो परायों को दी जाती है।

ट्रेन में बैठे हो, ट्रेन चली जा रही है, तुमने वहीं घर बन लिया और स्टेशन पर उतरना है; वहाँ हलक फाड़ कर चिल्ला रहे हो कि, "मेरा घर तबाह हो गया, हाय-हाय!" हँस क्यों रहे हैं? और क्या किया हुआ है? ट्रेन के डब्बे में घर बना लिया है और उतरने का जब वक्त आया है, तो शोर मचा रहे हैं कि, "अरे!"

रिश्ता रखो, पर ये विवेक की बात है कि वो रिश्ता कैसा हो। समझो, एक ही है जो तुमसे छिनेगा नहीं, उसके अलावा और किसी को अपना मानोगे तो डर में जीना ही पड़ेगा; क्योंकि ज्ञात है तुम्हें कि ये कभी भी छिन सकता है, अब वो छिन सकता है तो विचार आएगा ही कि गया, कि आज गया, कल गया, परसो गया, मेरे पीछे से गया, मेरे धोखे में गया, कभी भी। उससे रिश्ता बना लो, पर लगातार याद रखो कि इसका जाना तय है।

तो अब कोई तुम्हारा मन नहीं दुखा सकता, अब कोई तुम्हारी बाँह नहीं मरोड़ सकता तुमसे ये कह कर कि चीज़ छिनने वाली है। तुम कहोगे “छिनने वाली है? हम तो तैयार हैं ही, हमने कब कहा कि ये न छिनने वाली चीज़ है? क्योंकि जो न छिनने वाली चीज़ है वो छिन नहीं सकती, हम उसके साथ हैं, हम उसी में जीते हैं।" उसके लिए तुम्हें जीवन फिर उसी अनुसार जीना पड़ेगा न?

जो कुछ मरणधर्मा हो उसकी आसक्ति से ज़रा बचो। जो भी कुछ भौतिक हो, नश्वर हो, उसको देखते हुए याद रखो “इसका अपना भरोसा नहीं, ये आज है, कल नहीं। मैं इसके भरोसे कैसे जी सकता हूँ?”

दुनिया में कोई चीज बता दो जो अमर हो? तो उसकी अपनी ज़िंदगी का जब ठिकाना नहीं, तो तुम उसके भरोसे कैसे जी रहे हो? बोलो। जिसका ठिकाना नहीं उसको तुम अपना ठिकाना मत बना लेना, डरते-डरते जियोगे।

इतना तो हमारे फिल्मों वाले भी समझते हैं, ‘परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना’, क्योंकि? ‘परदेसियों को है एक दिन जाना।’ देखा, अमृतवाणी माँग रहे थे? मैंने कहा, वो तो बरसती ही रहती है। फिल्मों में भी बरस रही है, तुमने पकड़ी नहीं। ‘तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे?’ अमृतवाणी बरस रही है, कान खुले रखो। तुम्हें नहीं पता चलेगा किस मुँह से कौन बोल गया। परमात्मा का अपना कोई मुँह नहीं होता, वो कहीं से भी, कुछ भी, उद्घोषित कर जाता है।

प्र२: जैसा आपने उदाहरण दिया कि कोई बोले कि तुम हार रहे हो, तो वो अलग है और कोई बोले कि तुम हारे हुए हो, वो अलग है। लेकिन अगर कोई हमें बोले कि हम हार गए हैं, लेकिन हमें सुनाई दे कि हम हारे हुए हैं तो क्या करें?

आचार्य: जब मन में जुड़े ही बैठे हो किसी घटना से और उसके अंजाम से और उससे अपनी पहचान का नाता रखा है, तो घटना सिर्फ घटना नहीं रह जाती न? घटना बहुत बड़ी बात हो जाती है। उसके बाद ये नहीं होगा कि तुम हारे—हारना एक घटना है, हरंता होना पहचान है।

घटना घटना मात्र तब रहेगी जब पहचान सही हो। जब पहचान सही नहीं होती तो कोई भी घटना घटना नहीं होती, वो बड़ी बात बन जाती है। फिर कुछ भी यूँ ही नहीं होता, फिर तथाता का कोई मतलब नहीं है, फिर जो कुछ भी होता है वो सार्थ होता है। फिर जो कुछ भी होता है वो मानो हमें बदलने के लिए, हमें प्रभावित करने के लिए, हमें परिभाषित करने के लिए होता है।

कोई यहाँ पानी लेकर के आया, उसने आपको पानी पिलाया मुझे नहीं पूछा, तो ये घटना नहीं है अब मेरे लिए। ये क्या है? ये मेरी अब छवि है, ये मेरी परिभाषा है, ये मेरी हैसियत है, ये घटना नहीं है अब। क्योंकि जो मेरी वास्तविक पहचान है मैं उसमें अडिग नहीं हूँ, तो मेरे लिए हर घटना मेरी पहचान को खोजने का, ढूँढने का ज़रिया बन जाती है।

मैं अच्छा हूँ या बुरा ये खोजना है मुझे, अब मैं कैसे खोजूँ? मैं स्वयं कुछ नहीं जानता, आत्म साक्षात्कार कुछ नहीं है। तो इनकी आँखों में देखूँगा (एक श्रोता की ओर इंगित करते हुए) पूछूँगा “मैं अच्छा हूँ क्या?” और ये कह देंगे अच्छा हूँ, तो मैं कितना प्रफुल्लित। फिर इनसे पूछूँगा (दूसरे श्रोता की ओर इंगित करते हुए) “बुरा हूँ?” और इन्होंने कह दिया “बुरे हो।” तो मन बिलकुल बुझ जाएगा।

देखते हो न क्या हालत होती है, कोई सुबह-सुबह मिलता है, कहते हैं “आज तो बड़े खूबसूरत लग रहे हो।” तो एकदम बाछें खिल गई। और शाम तक किसी ने कहा “क्या हुआ? नहाए नहीं हफ्तों से, कैसी बात है? तबीयत खराब है?” तो खीरे से ककड़ी हो गए।

अपना पता नहीं न? तो फिर दूसरे की बात अब ‘बात’ नहीं है, दूसरे की बात अब ‘बड़ी बात’ है। अपना पता हो तो फिर दूसरे ने कहा, “हाँ, कहा।” फिर सहज होकर स्वीकार कर लेते हो, सुन लेते हो। “तुमने कहा, हमने सुना, ठीक है।” फिर तुम वास्तव में सुन पाते हो क्योंकि अब तुम अपने संकीर्ण मतलब से बंधे हुए नहीं हो। अब तुम दूसरे की बात में अपनी पहचान नहीं तलाश रहे। अब तुम वास्तव में सामने वाले के हृदय में जाकर देख सकते हो कि उसने क्या बोला, कहाँ से बोला।

जब तुम्हें चोट नहीं लगती है तो तुम दूसरे की चोट के प्रति ज़रा संवेदनशील हो जाते हो। जब तुम हिल-डुल नहीं रहे होते हो, तब तुम जान जाते हो कि सामने वाला बड़ा कंपित हो रहा है।

(एक श्रोता को पूछते हुए) कैसे आए? बाइक से?

श्रोता: हाँ।

आचार्य: तो बाइक में रियर व्यू मिरर तो होगा?

श्रोता: हाँ।

आचार्य: सौ से ऊपर कभी चलाई है बाइक?

श्रोता: हाँ।

आचार्य: तब वो जो मिरर है, वो कैसा हो जाता है? काँपता है? खूब काँपता है न। तब उसने कुछ दिखाई पड़ता है?

श्रोता: साफ नहीं आता।

आचार्य: जब तुम ही काँप रहे होते हो, तो तुम्हें कुछ नज़र नहीं आता पीछे का। मन दर्पण है न? सुनते हो न? दर्पण ही जब काँप रहा है तो उसमें क्या दिखाई देगा? और स्थिर हो यदि दर्पण तो? फिर उसमें पीछे का पता चलता है। फिर उसमें ये भी पता चलेगा कि पीछे वाला कहीं काँप तो नहीं रहा।

काँपते दर्पण में पता चलेगा क्या कि पीछे वाला काँप रहा है? वहाँ तो सभी कुछ काँप रहा है। क्या पता चलेगा कौन काँपा, कौन नहीं। तुम स्थिर हो जाओ तो तुम्हें दुनिया की गति का कुछ पता लगने लगता है।

भीतर तुम्हारे सदा एक बिंदु होता है जिसे कभी चोट नहीं लग सकती, तुम उसी बिंदु के पास जियो। और तुममें बहुत कुछ ऐसा है जो चोट खाने के लिए, घायल होने के लिए बहुत तत्पर है, उसे चोट खाने दो, तुम उसके पास मत जाओ।

मैं तुमसे नहीं कह रहा हूँ कि तुम ऐसे हो जाओ जिसे चोट न लगे। ऐसे तो तुम हो ही और वही तुम्हारी असली सत्ता, असली नाम है। पर तुम उसके पास जाते नहीं। तुम चैतन्य जीव हो, तुम्हारे पास विकल्प की, चुनाव की शक्ति है, सही चुनाव करो। जिसे चोट नहीं लगती, चुनो कि उसके पास जीना है। जो चोटिल होता रहता है, घायल होता रहता है, उसके पास जीने में तुम्हारा हित नहीं, तो तुम उसको अस्वीकार करो।

ठीक उस वक्त जब तुम्हें चोट लग रही होती है, एक प्रश्न पूछना अपने आप से। ‘क्या ये ज़रूरी है?’ और दुनिया में इससे कीमती कोई प्रश्न नहीं है। क्या प्रश्न?

प्र: क्या ये ज़रूरी है?

आचार्य: क्या ये ज़रूरी है? आवश्यक है क्या ये? अपरिहार्य है? ये पूछना। क्या ज़रूरी है ये? और अगर तुमने ईमानदारी से पूछा ये सवाल तो तुम्हें हमेशा एक ही उत्तर मिलेगा, ‘न’। यही प्रमाण है इस बात का कि वो बिंदु है तुम्हारे भीतर जो कभी आहत नहीं होता।

तो आहत होना ज़रूरी नहीं है, डरना ज़रूरी नहीं है। हाँ, डरा जा सकता है, वो विकल्प तुम चुन सकते हो। क्या विकल्प? डरने का। और वो तुमने इतनी बार चुना है कि तुम्हें लगता है कि जैसे एक मात्र यही विकल्प होता हो। ऐसा नहीं है, दूसरा विकल्प है।

दूसरा विकल्प है, इसको सत्यापित करने के लिए अपने-आपसे ज़ोर से पूछना कि अभी जो भी मेरी हालत है, ‘क्या ये ज़रूरी है?’ और ईमानदारी से यदि तुमने पूछा है, तो उत्तर गूंजेगा निश्चित। क्या गूंजेगा?

प्र: नहीं।

आचार्य: नहीं, बिलकुल नहीं, बिलकुल भी नहीं। आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी आवश्यक नहीं, सत्य के अतिरिक्त कुछ भी आवश्यक नहीं, शांति के अतिरिक्त कुछ भी अपरिहार्य नहीं। बाकी सब तो यूँ ही है, भ्रम है, तुम्हारा मिथ्या चुनाव है। तुमने चुना इस कारण वो अस्तित्व में है, तुमने न चुना होता, वो मिट जाता।

आत्मा अकेली है जिसे चुनो, न चुनो, वो है। और भ्रम मात्र तब तक ऊर्जा पाता है जब तक उसे तुम्हारे चुनाव का समर्थन है। आत्मा स्वतः संतुष्ट है। आत्मा अपने-आपमें परिपूर्ण है, उसके बाहर कुछ नहीं, उसे तुम्हारी ऊर्जा नहीं चाहिए। पर झूठ को, भ्रम को, चोट को, आलस को, अहंकार को ज़िंदा रहने के लिए तुम्हारा समर्थन चाहिए; तुम उन्हें समर्थन नहीं दो तो वो गिर जाएँगे, चित्त हो जाएँगे, मुर्दा हो जाएँगे। बात आ रही है समझ में?

पृथ्वी गति करती है, इस पर तुम चलो चाहे न चलो, पृथ्वी की गति नहीं प्रभावित होती। तुम्हारी गति से क्या पृथ्वी की गति प्रभावित होती है?

प्र: नहीं।

आचार्य: तो आत्मा पृथ्वी है, आत्मा आधार है। उस आधार पर तुम गति कर भी सकते हो और नहीं भी। आधार की गति तुम्हारे कारण नहीं है। तुम कुछ भी करो पृथ्वी पर, इससे पृथ्वी पर क्या अंतर पड़ता है?

प्र: कुछ नहीं।

आचार्य: और तुम एक साइकल चलाते हो, वो कब तक गति कर रही है?

प्र: जब तक हम पैडल मार रहे हैं।

आचार्य: जब तक तुम पैडल मार रहे हो। आत्मा में और भ्रम में यही मूल अंतर है: आत्मा तुम्हारी गति-अगति से प्रभावित नहीं होती। वो आधार है, उस आधार के ऊपर तुम चलो, न चलो, सोओ, कूदो, लेटो, हँसो, रोओ, आधार को कोई फर्क पड़ता है? और भ्रम ऐसे हैं जो लगता है कि तुम्हें अपने ऊपर अवस्थित किए हुए हैं।

साइकल चलाते एक आदमी की फोटो लो, तो उस फोटो को देख कर तुम्हें ये निश्चित लग सकता है कि ये आदमी साइकल पर ही तो बैठा है, ठीक वैसे ही जैसे कोई दूसरा आदमी पृथ्वी पर बैठा होता है। एक आदमी पृथ्वी पर बैठा है और दूसरा आदमी साइकल पर बैठा है, फोटो को देख कर भ्रम हो जाएगा। चित्र से तुम चूक खा सकते हो।

लेकिन हकीकत क्या है? कि जो वो साइकल है, वो तभी तक है जब तक तुम उसके साथ हो; तुमने साइकल का साथ देना छोड़ दिया, तुमने पैडल मारना रोका, या तुम उतर ही गए साइकल से तो साइकल का क्या बचा? अभी गिरी। बात समझ रहे हो?

लेकिन तुम उसे अगर पैडल मारे ही जाओ, मारे ही जाओ, तो उसका गतिवेग बना रहेगा, और तुम्हें क्या लगेगा?

प्र: कि साइकल चल रही है।

आचार्य: तुम जैसा जीवन जी रहे हो, वो ज़रूरी नहीं है, वो सिर्फ इसलिए है क्योंकि तुम उसे पैडल मारे जा रहे हो, मारे जा रहे हो। तुम उसे पैडल मारना छोड़ो, वो अभी गिर जाएगा। समझो बात को। और जो ज़रूरी है, वो तुम्हारे हिलाए हिलेगा नहीं।

पृथ्वी को तुम लात मार दो, कि तुम चाहे पृथ्वी पर दंडवत लेट जाओ, कि थूक दो, कि माँ मान कर प्रणाम कर लो, खोद डालो, कि उस पर ढेर बना दो, पृथ्वी को कोई अंतर पड़ता है?

प्र: नहीं।

आचार्य: पचास लोग दौड़ पड़े और पचास लोग सो गए। ज़मीन को क्या अंतर पड़ा? पचास ज़मीन पर दौड़े और पचास ही ज़मीन पर सो गए। ज़मीन को क्या अंतर पड़ा?

तुम भी अपने-आपसे पूछना “मेरी ज़िन्दगी में क्या कुछ भी ऐसा है जिसे अगर मैं समर्थन न दूँ तो भी बना रहेगा?" और याद रखना तुम्हारी ज़िन्दगी में जितनी ज़्यादा ऐसी चीज़े हैं जो तुम्हारे ही चलाए चल रही हैं, तुम्हारे ही धक्का दिए चल रही हैं, जो तुम्हारे ही ठेले चल रही हैं, जिन्हें तुम ठेलना बंद करो तो वो रुक ही जाएँ, कि गिर ही जाएँ, जान लेना कि ये स्वभाव विरुद्ध हैं, यही मेरे जीवन का नर्क हैं। आ रही है बात समझ में?

सच्चा सिर्फ वो है जो तुम्हारे रोके रुकता न हो। ऐसी साइकल तुम्हें मिल जाए अगर जिसको तुम पैडल मारना रोक ही न सकते हो, तुम अपने-आपको लाख बोलो “इसको नहीं मारना है पैडल।” पर फिर भी तुम मारे जाओ। या जिसको तुम पैडल मारना रोक भी दो फिर भी वो चलती रहे, तो जान लेना कि मुझे मिल गई सही सवारी; यही है।

प्रेम इसीलिए सच्चा होता है—सच्चे प्रेम की बात कर रहा हूँ, फ़िल्मी प्रेम की नहीं—वहाँ तुम चाहो भी कि छोड़ दें तो तुमसे छूटेगा नहीं, वो पृथ्वी जैसा है। कितना भी उछल-कूद लो, कहाँ उछल-कूद रहे हो? पृथ्वी पर। वो नहीं छूटेगी। सब कुछ छोड़ कर भाग सकते हो, क्या छोड़ के नहीं भाग सकते?

प्र: पृथ्वी।

आचार्य: क्योंकि जहाँ भी जाओगे एक चीज़ तो रहेगी। क्या? ज़मीन। और दूजी भी चीज़, ज़मीन पर तना आकाश। ऐसी होती है आत्मा।

पूछो अपने-आपसे कि क्या है जिसे छोड़ ही नहीं सकता। जो मेरे निर्णय का गुलाम ही नहीं है। जिसे छोड़ भी दिया तो छूटा नहीं, वही सच्चा है।

और वैसा अगर कुछ नहीं ज़िन्दगी में तो तुम बड़े गरीब आदमी हो। क्योंकि फिर तुम्हारी ज़िन्दगी उन चीज़ों से भरी होगी जो तुमने बस पकड़ रखा है ज़बरदस्ती, जिन्हे तुम छोड़ सकते हो।

और जो चीज़ें छूट सकती हैं पर तुमने पकड़ रखी हैं, उन्हें पकड़ने में तुम्हारी बड़ी ऊर्जा लगती होगी। तुम्हारा पूरा दिन उन्हें पकड़ने में ही बीत जाता होगा। वो चीज़ें छूट-छूटकर भागती होंगी, तुम दौड़ते होंगे, “पकड़ लो रे! पकड़ो! पकड़ो! भगी-भगी।” और फिर जब पकड़ लेते होगे, पकड़ने पर उनको दुःख मिलता होगा तो कहते होंगे चीज़ की खराबी है, इसको पकड़ने पर दुःख मिलता है। फिर तुम भूल जाते हो कि उसको पकड़ने पीछे कौन भागा था। पकड़-पकड़ कर खुद ही लाते हो, और फिर गरियाते हो, क्या? कि इस चीज़ के मारे ज़िन्दगी में बड़ा दुःख है। हाँ, बड़ा दुःख है। पकड़ा किसने?

देखो क्या है जो छूट नहीं सकता, देखो क्या है जिसके लिए जान देने को राज़ी हो जाओगे। देखो ऐसा क्या है जो जान दे देने के बाद भी नहीं छूटेगा। हो सकता है कभी उससे इतने परेशान हो जाओ, कहो कि इससे मुक्ति के लिए अब जान दे दूँगा। और पता चला कि तुमने जान दे दी और फिर भी मुक्ति नहीं मिली। ऐसी जो चीज़ हो, वही असली है।

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