भारत में हर साल 40 लाख बलात्कार? दिल दहला देने वाला सच!

Acharya Prashant

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भारत में हर साल 40 लाख बलात्कार? दिल दहला देने वाला सच!
जबकि ये जानी-समझी बात है कि स्मृति में जो कुछ लिखा है, उसे श्रुति-सम्मत होना चाहिए, और स्मृति अगर श्रुति का उल्लंघन कर रही है तो स्मृति को हटा दो, श्रुति की बात मानी जाएगी, क्योंकि श्रुति वो देती है जो कालातीत सत्य है। और स्मृति वो बातें कहती है जो उस समय के समाज में प्रचलित हैं। उस समय समाज में जो प्रचलित है, उन चीज़ों को माध्यम बनाकर, सहारा बनाकर, उन चीज़ों को भी सम्मान देकर किसी तरह से धर्म को अशिक्षित लोगों तक भी पहुँचा सको, इसके लिए स्मृति थी। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: मेरा नाम सूरज है। वेस्ट बंगाल के दुर्गापुर में अभी एक घटना हुई है, उससे संबंधित सवाल है मेरा। वहाँ मेरे पिताजी का घर है और वहाँ पर दुर्गापुर में अभी एक छात्रा के साथ एक गैंगरेप की घटना सामने आई है और उस घटना में पुलिस रिपोर्ट के अनुसार आरोपी जो है, वो कथित तौर पर उनका मित्र या जानकार था। सवाल ये है कि जो पीड़िता हैं, उनके जो जानकार हैं उनके साथ इस तरह की घटना हो रही है, तो ये हमारे समाज में इस तरह के रिश्तों के बारे में क्या बताता है? हमारे रिश्तों का स्तर अब क्या हो चुका है? और दूसरा सवाल ये है कि सरकार इस बारे में क्या कर सकती है।

आचार्य प्रशांत: रिश्तों के बारे में?

प्रश्नकर्ता: इस तरह की घटनाओं के बारे में?

आचार्य प्रशांत: पूरी जो बात है न, उसको पहले अपने तल पर अच्छे से समझा करिए, ठीक है? और फिर जहाँ तक आप ख़ुद ही पहुँच जाएँ, वहाँ पहले पहुँच जाइए और फिर आप मेरे पास लेकर के आइए, है न। तो उसमें मैं आसानी से फिर आपको समझा पाऊँ।

देखिए, बलात्कार कोई आज की चीज़ नहीं है, हज़ारों सालों से हो रहे हैं, होते आए हैं। और न कोई वो बंगाल की या भारत की चीज़ है, वो विदेशों में भी होते हैं। यहाँ तक कि कम होता है, पर पशुओं की भी कुछ प्रजातियाँ हैं जिनमें भी माना जाता है या देखा गया है कि बलात्कार जैसी कुछ घटना घटती है। बहुत कम होता है पशुओं में ऐसा, पर वहाँ भी होता है।

पर भारत में उसकी जो प्रकृति है वो बहुत अलग है, आज के भारत की आप बात कर रहे हैं तो। चीज़ को गहराई में ले जाना पड़ेगा। नहीं तो, बंगाल में अभी हुआ है, पिछले साल वो आर.जी.कर वाला मामला हुआ था, तब भी आपने सवाल पूछा था, आपने नहीं माने और ने। तब भी मैंने कुछ बोला था। ऐसे मामले एक के बाद एक आते रहेंगे, हम उसकी जड़ तक पहुँचे बिना यूँ ही सतही सवाल-जवाब करते रह जाएँगे, इसलिए थोड़ा गहरे जाना ज़रूरी होता है।

विदेशों में भी बलात्कार होते हैं, पर वो वहाँ पर एक व्यक्ति के खिलाफ़ की गई चीज़ है, वो जेंडर वायलेंस है। सामने एक व्यक्ति है जो एक स्त्री है, और दूसरा व्यक्ति है जो पुरुष है, और वो उस पर बल प्रयोग कर रहा है वासना-पूर्ति के लिए। जब विदेशों में बलात्कार होता है, तो ज़्यादातर उसकी प्रकृति ये होती है, ठीक है न? एक स्त्री है, युवा स्त्री है, और शारीरिक दृष्टि से आकर्षक हो सकती है, और मुझे किसी कारण के चलते उस पर बल प्रयोग का मौक़ा मिल गया है तो मैं करूँगा और उससे मेरी मैं वासना पूरी करूँगा। ऐसा होता है वहाँ पर।

बलात्कार ऐसा भी नहीं है कि भारत में ही बहुत ज़्यादा होता है, विदेशों में भी बहुत ज़्यादा होते हैं। और कई सूचकांकों की मानें तो उनमें तो ऐसा निकलकर आता है, जैसे विदेशों में ही ज़्यादा होते हैं। पर अंतर है, विदेशों में भी जब सोशल सर्वेज़ किए जाते हैं और वहाँ पूछा जाता है, कि “क्या आपके ऊपर कभी सेक्सुअल असॉल्ट या रेप हुआ है?” तो वो जितने मामले निकलकर के आते हैं, वो आधिकारिक तौर पर दर्ज मामलों से कई ज़्यादा होते हैं, कई-कई गुना ज़्यादा होते हैं। ये विदेशों में भी होता है। और भारत में उसका जो अनुपात है, कि कितने मामले दर्ज होते हैं और कितने बलात्कार वास्तव में हो रहे हैं, वो कितना है। हम बात करेंगे। अगर मुझे याद रहा तो मैं आपको बोलूँगा, भूल जाऊँ तो याद दिला दीजिएगा।

तो चलिए यहीं से शुरू कर लेते हैं। हम इस पूरे मुद्दे को ही समझना चाह रहे हैं, किसी एक मामले को नहीं, क्योंकि मामले तो एक के बाद एक आते रहते हैं। हमें दुख देते हैं, चोट देते हैं। हम कुछ दिनों तक उस पर हम कुछ आग्रह भी कर लेते हैं, हम आक्रोश व्यक्त कर लेते हैं, और फिर वो मामला ठंडा पड़ जाता है। तो हम इस पूरे मुद्दे को ही समझ लेते हैं।

आधिकारिक आँकड़े ये हैं, ऑफिशियल रिकॉर्ड्स, कि भारत में हर साल लगभग 30,000–35,000 बलात्कार दर्ज होते हैं (सोर्स: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो, मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स)। ये दर्ज हो रहे हैं। तो उसके आधार पर हम कह देते हैं कई बार, कि देखो, भारत में स्थिति इतनी ख़राब है कि प्रतिदिन लगभग 100 बलात्कार के मामले सामने आते हैं, और ये आँकड़ा ही हमें बहुत भयानक लगता है। भयानक है भी, प्रतिदिन 100 मामले।

पर अगर हमें भारत में बलात्कार की प्रकृति को समझना है, तो हमें ऑफ़िशियल डेटा से नहीं, कहीं और से शुरुआत करनी पड़ेगी। ठीक है? अच्छे से समझो। और वो शुरुआत हमें करनी पड़ेगी जो एन.एफ़.एच.एस. डेटा है उससे, (नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे)। तो ये होता है कुछ-कुछ सालों में हर बार। हमारे पास जो डेटा है अभी आख़िरी, वो 20-21 का है, और उसके बाद एक सर्वे और हो चुका है, उसका डेटा अब आ रहा है धीरे-धीरे। तो उससे हमें पता चलता है जब महिलाओं से बात की जाती है, महिलाओं, लड़कियों से, 15 साल से ऊपर वाली, तो वो कह रही हैं कि 6.3% महिलाएँ कह रही हैं कि हमारे ऊपर कभी-न-कभी बलात्कार हुआ है (सोर्स: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019–21)। तो ये कितना बैठ गया अब थोड़ा समझते हैं।

145–150 करोड़ भारत की आबादी है, 70 करोड़ से ऊपर महिलाएँ हो गईं। आज भारत में 70 करोड़ से ऊपर महिलाएँ हैं, आधी होनी चाहिए थीं आधी नहीं हैं, आधी से लगभग चार-पाँच करोड़ कम हैं। किस वजह से कम हैं? भ्रूणहत्या वग़ैरह से कम हैं। पाँच करोड़ महिलाएँ भारत की आबादी से ग़ायब हैं, भ्रूणहत्या कर दी गई है उनकी। तो फिर भी 70–72 करोड़ महिलाएँ होनी चाहिए। इनमें से जो 15 साल से ऊपर की हैं, जिनसे ये पूछा जा सकता है कि “सेक्सुअल असॉल्ट हुआ कि नहीं हुआ?” वो करीब 50 करोड़ हैं।

70–72 करोड़ महिलाएँ उसमें से 50 करोड़ ऐसी जो 15 साल से ऊपर की हैं। इनमें से 6.3% ऐसी बैठती हैं, जो ख़ुद कह रही हैं अपने मुँह से, जब उनसे एकांत में पूछा जाता है, थाने में नहीं, पुलिस रिकॉर्ड्स के माध्यम से नहीं, कि “बस टिक कर दो कि तुम्हारे ऊपर कभी…?” तो टिक कर दो बस। तो टिक कर देती हैं, वो 6.3% आती हैं। और फिर उनसे और भी कुछ लिए जाते हैं, आगे डिटेलस्। तो ये कितना हो गया? 3 करोड़। पर ये 3 करोड़ का आँकड़ा वो निकला जिनपर उनकी पूरी ज़िंदगी में कभी-न-कभी बलात्कार की घटना घटी है। तो प्रतिवर्ष पर कैसे आएँ?

तो प्रतिवर्ष का भारत से कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। पर विदेशों में जब सर्वे हुआ है, तो उसमें ये निकलकर आया है कि जो ये 6% हैं इन्होंने ऐसा नहीं बोला हुआ है कि “ हम पर जीवन में एक बार भी आघात हुआ था।” और जिसपर आमतौर पर बलात्कार हुआ है उसका कई बार भी हुआ होता है। कारण क्या है, वो अभी आगे स्पष्ट होगा आपको। तो ये निकलकर आया कि जिन्होंने भी कहा कि “रेप उनके ऊपर हुआ है,” तो 10–20% ऐसे हैं जिनपर किसी भी एक वर्ष में, ये जो पूरी तादात निकलेगी इसका 10–20% ले लो, ये वो संख्या होगी जिनपर किसी भी एक वर्ष में बलात्कार हुआ है। बात समझ रहे हैं?

भाई आपने जो 3 करोड़ बोला, 6.3% लेकर के 50 करोड़ का, 3 करोड़ से थोड़ा ज़्यादा आएगा। वो तो है कि उसकी जो पूरी रिप्रोडक्टिव लाइफ़ थी, उसमें कितनों पर हुआ है। अब उसमें से हमें पर ईयर डेटा पर आना है। तो उसका जो पर ईयर आता है, अगर हम दूसरे देशों से स्टैंडर्ड्स लें तो, वो आता है 10–20%। तो ये जो 3 करोड़ से थोड़ा ऊपर है, इसके 10–20% के बीच में महिलाएँ हैं जिनका भारत में प्रति वर्ष रेप होता है।

अब 10–20% का आप कुछ ले लीजिए, 15% ले लीजिए, तो 3 करोड़ का 15% कितना बैठा?

श्रोता: 45 लाख।

आचार्य प्रशांत: 45 लाख। आप 40 लाख ले लीजिए, चलिए। हालाँकि 45 लाख से भी ऊपर होगा क्योंकि 3 करोड़ से भी वो थोड़ा ऊपर था। ठीक है? और हो सकता है कि 10–20% बाहर रहा है। भारत में 15 न हो, 22 हो, ये भी हो सकता है, ज़्यादा संभावना उसी की है। पर हम बिल्कुल एकदम कंज़र्वेटिव लेकर के चलते हैं कि स्थिति क्या है, ये जानने के लिए।

तो 40 लाख महिलाओं का प्रति वर्ष भारत में बलात्कार होता है! 40 लाख महिलाओं का! और ऑफ़िशियल रिकॉर्ड्स कहते हैं 30–31 हज़ार। माने जितनी महिलाओं का बलात्कार होता है, उसमें से 1% भी जाकर के दर्ज नहीं कराती हैं! 1% भी नहीं कराती हैं! तो इसका कारण समझने की कोशिश की गई। तो उसमें से कारण ये निकलकर आया कि वो दर्ज करा ही नहीं सकती हैं, क्योंकि ज़्यादातर जो बलात्कार होता है, वो भारत में अपराध माना ही नहीं जाता। तो उसकी रिपोर्ट कैसे दर्ज करा दोगे? ज़्यादातर जो भारत में बलात्कार होता है, वो अपराध क़ानूनन है ही नहीं। तो उसकी रिपोर्ट कैसे दर्ज करा दोगे?

भारत में जो रेप होता है, वो 70–90% मेरिटल रेप है। आप बलात्कार की पूरी प्रकृति समझना चाहते हैं न? तो सिर्फ़ तब मत उग्र हो जाया करिए जब कोई एक मामला सामने आए, क्योंकि ये एक एंडेमिक बीमारी है। ये लगातार हर जगह है, हर गली-मोहल्ले में चल रहा है।

31,000 पर कितना बैठ रहा था? हम कह रहे थे लगभग 100 प्रतिदिन। ठीक? तो 40 लाख पर कितना बैठ गया? 10,000 से ज़्यादा प्रतिदिन, 12,000 प्रतिदिन। 100 प्रतिदिन पर हम कह रहे थे, “अरे! अरे! कितना ज़्यादा है।” ये 10–12 हज़ार है प्रतिदिन। लेकिन ये कहीं दर्ज नहीं हो सकता क्योंकि 70 से 90% मामले जो हैं, वो मेरिटल रेप के हैं।

मेरिटल रेप समझते हैं क्या होता है? जहाँ पति ही पत्नी का बलात्कार कर रहा है। और भारतीय क़ानून इसको बलात्कार मानता ही नहीं, क्योंकि परंपरा, जिसको हम कई बार कह देते हैं कि धर्मशास्त्र का समर्थन प्राप्त है, वो पत्नी को पति की संपत्ति मानती है। संपत्ति, व्यक्ति नहीं: संपत्ति। चीज़ है, जैसे भी इस्तेमाल करें। पति की चीज़ है, कैसे भी इस्तेमाल करें। वो व्यक्ति नहीं है, इंडिविजुअल नहीं है, वो एक चीज़ है। वो एक प्रॉपर्टी है। तो उसका कैसे भी इस्तेमाल हो सकता है। तो आप जाकर के इस पर किसी भी तरीके की रिपोर्ट नहीं दर्ज करा सकते। हाँ, इस प्रक्रिया में आपको मारपीट दिया हो, आपके ख़ून वग़ैरह निकल आया हो, हड्डी ही तोड़ दी, तो आप जाकर के रिपोर्ट दर्ज करा सकते हैं। सामान्यतः आप नहीं कह सकते कि “मेरे पति ने रेप किया है मेरा, तो मैं जाकर के इसमें रिपोर्ट दर्ज करा रही हूँ।”

फिर पुरुषों पर भी सर्वे हुआ, तो इस बात की पुष्टि हुई। वो प्रतिशत कितना है, वो आप खोज के निकालिएगा, जहाँ पर पुरुषों ने ख़ुद ही स्वीकार किया है, कि “हाँ, पत्नी की कंसेंट हो न हो, हम” इतने प्रतिशत पुरुष कह रहे हैं कि “हाँ, पत्नी की कंसेंट के बिना भी हम इंटरकोर्स करते हैं।”* समझ में आ रही है बात ये?

तो रेप चीज़ दूसरी है। आप उसको जो समझ रहे हो, रेप उससे बहुत आगे की बात है। आप रेप के सिर्फ़ वो मामले देख रहे हो जो पुलिस रिकॉर्ड में जा रहे हैं और प्रेस में आ रहे हैं। आप रेप वो देख ही नहीं पा रहे जो घर-घर में है।

अब आगे की और समझिए। तो ये जो 40 लाख मामले हैं, इसमें से लगभग 30 लाख मामले वो हैं जो मेरिटल रेप के हैं और इनकी कोई गिनती ही नहीं हो सकती, इनकी कोई अकाउंटिंग नहीं हो सकती। कोर्ट अगर चाहता भी है कि इस पर हम नियम बनाएँ, तो सरकार आड़े आकर खड़ी हो जाती है। सरकार कहती है, “नहीं, नहीं, नहीं, ये हम नहीं होने देंगे।” और कई बार तो कोर्ट्स ने, जजेस ने भी जो रुख लिया है, वो ऐसा लगता है जैसे समर्थन किया जा रहा हो कि हाँ, पत्नी के तो सीमित अधिकार ही होंगे दांपत्य रिश्ते में।

समझ में आ रही है बात ये?

अभी हमने कहा कि 40 में से लगभग 30 लाख तो ये हो गए जो *मेरिटल रेप के ही मामले हैं, तो 10 लाख तो अभी भी बचता है। लेकिन सरकार के पास तो 31,000 मामले ही दर्ज हैं। तो ये 10 लाख क्या हैं? ये जो 10 लाख मामले हैं, इसमें से लगभग 7–8 लाख मामले हैं कास्ट-बेस्ड रेप के। कास्ट-बेस्ड रेप के ज़्यादातर मामले वो हैं जहाँ पर जो रेपिस्ट है, वो ऊँची जाति का है तथाकथित, और जो पीड़िता है, वो दलित वर्ग से है। तो इसीलिए ज़बरदस्त दोनों में पावर एसमिट्री है; पैसे को लेकर भी, रुतबे को लेकर भी, जात को लेकर के भी, पहचान को लेकर भी। और पीड़िता को या तो डरा-धमका के चुप कर दिया जाता है, या ख़रीद लिया जाता है, या कि उसके घरवाले ही इज़्ज़त का, पवित्रता का, प्योरिटी एंड ऑनर का हवाला देकर के उसका मुँह बंद कर देते हैं।

या कि अगर वो पुलिस स्टेशन चली भी जाती है, तो पुलिस वाले ही उसका मज़ाक बनाकर उसको भगा देते हैं। ऐसे भी मामले आए हैं। आप पढ़िएगा “मथुरा केस” 1972 का, जहाँ पर पीड़िता पुलिस स्टेशन गई है और वहाँ पर पुलिसवालों ने ही उसका शोषण कर दिया है, रेप ही कर दिया है। बहुत मामले हैं ऐसे। तो ये भी जो साढ़े सात लाख मामले हैं, ये भी ज़्यादातर कभी रोशनी में आते ही नहीं, कम ही आते हैं इनमें से।

अब बचे लगभग ढाई लाख मामले। इन ढाई लाख मामलों में से तीस एक हज़ार दर्ज हो जाते हैं। इन ढाई लाख मामलों में भी ज़्यादातर दर्ज नहीं होते, क्योंकि बात वही आ जाती है कि “तुझसे शादी कौन करेगा?” अगर ये बात ज़ाहिर हो गई कि तू बलात्कृत हो चुकी है, तो तुझसे शादी कौन करेगा? तो ये बात बाहर नहीं जानी चाहिए। तो ये सिर्फ़ तीन लाख मामले हैं। इनमें से कुछ हिस्सा जाकर के इसकी एफआईआर वग़ैरह हो जाती है, ये है रेप। रेप वो नहीं है जो आप यदा-कदा पढ़ लेते हो अख़बार में।

भारत में रेप में दो एंगलस् हैं जो बहुत-बहुत बड़े हैं, एक है पेट्रियार्की और एक है कास्ट।

100 मामले हैं अगर रेप के, तो उसमें 70–80 मामलों में तो पति ही रेपिस्ट है। अब क्या करना है, बोलो? और अरेंजड मैरिज के साथ ये मामला और भी रोचक हो जाता है क्योंकि ये जो पति है, ये एक अपरिचित व्यक्ति है। जो कि अब बाक़ायदा विधि अनुसार, धर्मानुसार, समाज अनुसार, क़ानून अनुसार पत्नी के साथ ज़बरन संभोग कर सकता है। इसको अब मान्यता मिल गई है क्योंकि अब पत्नी इसको सौंप दी गई है, “ले जा भाई।” ये है रेप!

पर आपकी सारी आउटरेज ठंडी पड़ जाती है जैसे ही कोई एक मामला ठंडा पड़ता है। आप नहीं देख रहे हो कि वो जो पूरा हमने अनादर करा है श्रुति का, उपनिषदों का, उसका परिणाम है बलात्कार। भारत का बलात्कार पश्चिम के बलात्कार से अलग है भाई। पश्चिम में उसमें ये नहीं होता है कि पति चढ़ बैठा है, या कि जाति देखकर उसका शोषण किया जा रहा है। बहुत बड़ी संख्या में जो पीड़िताएँ होती हैं, वो दलित और आदिवासी होती हैं, और कई बार तो बलात्कार “सबक सिखाने” के लिए किया जाता है। न सिर्फ़ लड़की को बल्कि उसके पूरे समुदाय को, कि ये देखो, वो जो शरीर है लड़की का, वो लड़की का ही शरीर नहीं है, वो माध्यम है जिसके द्वारा उसके पूरे समुदाय को आतंकित किया जाता है।

और फिर धर्मगुरु आकर बोलेंगे कि लड़की का शरीर पवित्र होना चाहिए; बार-बार, बार-बार पवित्रता को उसके शरीर से जोड़ दो, ताकि बलात्कृत होने के बाद बलात्कारी शान से कह सके कि “ ये देखो, हटा दी इसकी पवित्रता मैंने। एक एसेट था इसके पास, वर्जिनिटी, वो छीन ली मैंने।”

समझ में आ रही है बात?

उसके साथ एक काल्पनिक एसेट जोड़ दो उसके शरीर के साथ। क्या? पवित्रता। जबकि पवित्रता का रिश्ता शरीर से हो नहीं सकता, उसका रिश्ता चेतना से है।

पवित्रता का रिश्ता उसके यौनांग से जोड़ दो। ये काम किसने किया? बाबा जी ने करा। बोल दो, पवित्र होना चाहिए, शरीर पवित्र होना चाहिए। और जैसे ही तुमने पवित्रता का रिश्ता उसके शरीर से जोड़ा, उसके पूरे समुदाय को दंड देने का, मज़ा चखाने का एक तरीका मिल गया किसी रेपिस्ट को। कि “लो, तुम्हारे क़बीले की लड़की मैंने ख़राब कर दी।” सुना है इस तरह की भाषा? “ये लो, मैंने तुम्हारे पूरे क़बीले को ही नीचा दिखा दिया, तुम्हारी लड़की ख़राब कर दी मैंने, अब जो कर सकते हो करो। और अब एक बार वायलेशन कर दिया तो सदा के लिए वायलेशन हो गया, टूटी हुई चीज़ तुम जोड़ थोड़ी पाओगे, लो।”

तो भारत में रेप अलग बात है।

जिस दिन हमने धर्म का अर्थ उपनिषद् से हटाकर के स्मृति करा था, उस दिन समझिए कि ये सब शुरू हो गया था।

जबकि ये जानी-समझी बात है कि स्मृति में जो कुछ लिखा है, उसे श्रुति-सम्मत होना चाहिए, और स्मृति अगर श्रुति का उल्लंघन कर रही है तो स्मृति को हटा दो, श्रुति की बात मानी जाएगी, क्योंकि श्रुति वो देती है जो कालातीत सत्य है। और स्मृति वो बातें कहती है जो उस समय के समाज में प्रचलित हैं। उस समय समाज में जो प्रचलित है, उन चीज़ों को माध्यम बनाकर, सहारा बनाकर, उन चीज़ों को भी सम्मान देकर किसी तरह से धर्म को अशिक्षित लोगों तक भी पहुँचा सको, इसके लिए स्मृति थी।

लेकिन भारत में धर्म का मतलब ही बन गया स्मृति। और उसी स्मृति को भारत जी रहा है। और ये बहुत बड़ी सफलता हो गई ऐसे ग्रंथों की, जिनको वो महत्त्व कभी मिलना ही नहीं चाहिए था जो उन्हें मिल गया। और इसके कारण उपनिषदों और गीता को वो महत्त्व नहीं मिलने पाया जिसके वो अधिकारी थे। आप जी रहे हैं उनको, आपको पता भी नहीं है। आपका चाल-चलन, बोल-बातचीत, व्यवहार; सब उन्हीं से निर्धारित हो रहा है। मैं आपसे कहूँ, आप स्तंभ धर्मसूत्र या गौतम धर्मसूत्र या बौद्धायन धर्मसूत्र, आपने न पढ़ा होगा, सुना ही न होगा नाम, पर आप जैसे जी रहे हो न, आप उन्हीं से जी रहे।

आप जब पढ़ोगे तो आपको झटका लग जाएगा। आप कहोगे, इसमें तो वही सब बातें लिखी हैं जो हम करते हैं, पर ये चीज़ तो हमने कभी पढ़ी ही नहीं थी क्योंकि वो सब हवाओं में आ गया। वो चीज़ शास्त्र से उठकर के संस्कृति बन गई। जबकि उनमें जो बातें लिखी हुई थीं, वो बातें सिर्फ़ इसलिए थीं कि जो लोग समझ ही नहीं पा रहे उपनिषद् को, उनको कुछ ऊपर-ऊपर से अपने व्यवहार को रेग्युलेट करने की, नियंत्रित करने की चीज़ें दे दो एक ख़ास काल में, उस काल के बाद उनकी कोई अहमियत ही नहीं है।

आप लोगों को मनुस्मृति से संबंधित जब विकल्प वग़ैरह आते हैं परीक्षा में, तो आप में से कई लोगों ने लिखा है, कि “अरे, ये सब तो बिल्कुल हमारे घर में ही हो रहा था, पर हमें पता ही नहीं था कि ये मनुस्मृति से आया है।”

स्मृतियों की अपनी उपयोगिता थी। उनकी क्या उपयोगिता थी? कि भाई, कृषि-प्रधान देश था, बहुत लोग पढ़े-लिखे नहीं थे, तो उन तक कथाओं के माध्यम से अच्छाई पहुँचाना था। ये आदर्श रूप में स्मृति का उद्देश्य था। माना ये गया था कि इन लोगों का आंतरिक केंद्र सक्रिय ही नहीं होगा कभी। एक जनसंख्या का बड़ा वर्ग है जिसका आंतरिक सच्चाई का केंद्र कभी सक्रिय नहीं होगा, तो इनको ऊपर-ऊपर से बता दो कि तुम ऐसे रहोगे, तुम्हारे ये दायित्व हैं, ये कर्तव्य हैं, राज-धर्म ये होता है, पति-धर्म ये होता है, पत्नी-धर्म ये होता है, ब्राह्मण ये, शूद्र ये। तो ये सब करके उस समय की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार कुछ बातें दे दी गई थीं। हमने उसी को धर्म मान लिया।

और उसके बाद एक ग़ज़ब और हुआ। वेदांत, जो अद्वैत के अलावा कुछ है ही नहीं, उसकी द्वैतात्मक व्याख्याएँ कर दी गईं। जब द्वैतात्मक व्याख्या होती है न, तो इधर जीव खड़ा हो जाता है और उधर खड़ा कर दिया जाता है एक रचयिता ईश्वर को; क्रिएटर गॉड को, नाउ इट इज़ गॉड एंड मैन। और जो कुछ भी परंपराएँ चल रही थीं समाज की, उनको मिथोलॉजी में डाल दिया गया, माने ये कह दिया गया कि वो परंपरा गॉड से आ रही है। अब और ग़ज़ब हो गया। अब आप उस चीज़ को एकदम ही नहीं तोड़ सकते।

आपकी जो परंपरा है, एक बार आपने वेदांत की जो द्वैतात्मक व्याख्या है वो कर दी, जो कि हो ही नहीं सकती, जो कि एकदम ग़लत है; आपने कर दी, तो उसके बाद आपने क्या खड़ा कर दिया? कि ये क्रिएटर गॉड है, और फिर आपकी अपनी जितनी सामाजिक मान्यताएँ और पूर्वाग्रह थे, उनको आपने क्या कर दिया? सेक्रेड बना दिया। कैसे सेक्रेड बना दिया? ये कह के, कि “ये तो भगवान ने दिए हैं, मैंने थोड़ी दिए हैं। तू स्त्री है, पति को परमेश्वर मानना और उसकी सब आज्ञाओं का पालन करना ही तेरा धर्म है।” और ये बात मैं नहीं बोल रहा, ये बात भगवान ने बोली है।

उपनिषदों का अपमान होता गया, होता गया। हमने कभी पूछा नहीं, कि “भाई, मेरा तो श्रुति-धर्म है। वेदांत कहाँ है इसमें? ये सब जो तुम बता रहे हो।”

तो भारत में आप रेप समझना चाहते हैं, तो आपको समझना पड़ेगा कि मामला पीछे से क्या चल रहा है।

साउथ अफ़्रीका में भी उदाहरण के लिए रेप एक बड़ी समस्या है, पर वहाँ रेप की प्रकृति बंगाल में जो रेप हो रहा है उससे अलग है, या कि यूपी के किसी गाँव में जो रेप हो रहा है किसी दलित लड़की के ऊपर, उससे अलग है। या कि जो मेरिटल रेप हो रहा है, जिसको वो स्त्री ये सोच रही है कि ये तो मैं गृहस्थ हूँ, मैं पत्नी हूँ, तो मुझे तो ये बर्दाश्त करना ही पड़ेगा, ये चीज़ अलग है।

छोटे-छोटे सर्वेज़ हुए हैं जहाँ पूछा गया है महिलाओं से, “रेप होता है तुम्हारा घर में?” कहती हैं, “हाँ।” ये भी पूछा गया कि “क्या गलत है ये? क्या बुरा लगता है?” तो कहती हैं, “नहीं, ठीक है, उसका हक़ है।” क्या है उसका? “हक़ है।” ये तो रेप है। जो सीधी-सीधी पिटाई होती है, उसको लेकर के भी बहुत महिलाओं ने बहुत *सर्वेज़*में बोला है, कि “हक़ है उसका, पति है, मार लेगा तो इसमें क्या है ऐसा?” आ रही है बात समझ में?

इसके मूल कारण को समझने की जगह जो हमारे संस्कारवादी लोग हैं, वे कहते हैं, “इसका मूल कारण ये है कि भारत में पाश्चात्य संस्कृति हावी हो गई है। लड़कियाँ छोटे कपड़े पहन रही हैं और लड़कों के ऊपर भी वेस्टर्न कल्चर हावी हो रहा है, तो वो सेक्सुअली अराउज़ ज़्यादा होते हैं, इसलिए रेप हो रहा है।”

तुम कितने बेईमान आदमी हो! फिर ऐसे लोग कहते हैं कि “लड़कों को ब्रह्मचर्य सिखाओ तो फिर रेप कम हो जाएगा।” तुम कितने बेईमान आदमी हो! तुमने जो संस्कृति चला रखी है, रेप उसका परिणाम है, पाश्चात्य संस्कृति से नहीं आ रहा है रेप। जब 70–80% रेप घर में ही हो रहा है और रिश्तेदारों द्वारा ही हो रहा है, ख़ासकर पति द्वारा, तो पश्चिम से कहाँ से आ गया? वो तो फिर हमेशा से हो रहा था। अब तो रिपोर्टिंग बढ़ी है, महिला थोड़ी जगने लगी है, तो जो रिपोर्टिंग है रेप की, वो पिछले 20 सालों में लगभग दोगुनी हो गई है।

तो इसको प्रमाण की तरह कहा जाता है कि “देखो, इंडिया पर वेस्टर्न कल्चर छा रहा है, इसलिए रेप बढ़ रहा है।” रेप नहीं बढ़ रहा, पहली बार रेप की रिपोर्टिंग बढ़ रही है। लड़की को इतना साहस आया है कि वो बाहर खुल के बता भी पा रही है कि रेप है, वो भी 1% लड़की। 99% अभी भी बोल भी नहीं पातीं कि रेप हो गया।

आधी आबादी को अपाहिज कर दोगे, वो तो गूँगा कर दोगे, उसकी ज़ुबान काट लोगे, उसको पिंजरे में डाल दोगे, उसके मन में ये बात डाल दोगे कि “तेरा जो सबमिशन है, वो तो डिवाइनली ऑर्डेन्ड है, वो तो भगवान की मर्ज़ी है।” तो राष्ट्र आगे बढ़ेगा फिर कभी? आधी आबादी। और ये आधी आबादी सिर्फ़ बच्चे ही पैदा करने को नहीं होती है। हिटलर करता था ये काम, वो मेडल्स देता था। वो कहता था, “ये आर्यन रेस को दुनिया पर छाना है, चलो आबादी बढ़ाएँ।” तो वो ब्रॉन्ज़ मेडल देता था अगर पाँच बच्चे पैदा कर दिए, सिल्वर मेडल देता था अगर सात बच्चे पैदा कर दिए, और गोल्ड मेडल देता था अगर आठ–दस बच्चे पैदा कर दिए (सोर्स: यूनाइटेड स्टेट्स होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम)।

आप जिस तरीके से अपनी बेटियों को बड़ा करते हो कि “पराया धन है, किसी के घर जाएगी, उसके बच्चे पैदा करेगी।” उसका परिणाम है ये जो आप बात अभी कर रहे हो, वो बात।

और दूसरी चीज़, कास्ट। जो स्मृति-ग्रंथ हैं, उनमें अगर कोई ऊपर के वर्ण का नीचे के वर्ण की स्त्री का बलात्कार कर दे, तो उसको बहुत कम सज़ा है। लेकिन अगर कोई शूद्र जाकर के किसी तथाकथित उच्च वर्ण की लड़की का बलात्कार कर दे या महिला का, तो उसे मृत्युदंड भी दिया जा सकता है (मनुस्मृति: 8.379 – 8.380)।

तो रेप के बहुत ज़बरदस्त कास्ट डायमेंशन्स हैं। और एक बात सुनो, ज़्यादातर जो मामले आते हैं न बलात्कार के सुर्खियों में, वो सुर्खियाँ दलित लड़कियों को तो बेचारियों को नसीब भी नहीं होतीं। उनका बलात्कार हो जाता है, तो बहुत हेडलाइन्स नहीं बनने पातीं, क्योंकि मीडिया भी कुछ मामलों को तवज्जो देता है, कुछ मामलों को तवज्जो नहीं देता।

भारत राष्ट्र का जो हर तरीके से पतन हुआ: कला में, विज्ञान में, युद्ध में, सामरिक क्षेत्र में, लडाइयों में सब में, टेक्नॉलॉजी में, साहित्य में, वजह बहुत सीधी है। 50% आबादी को दबाकर रखोगे तो कहाँ से राष्ट्र आगे बढ़ेगा? और बाक़ी जो 50% आबादी है, उसकी बहुत सारी ऊर्जा लग रही है इस 50% को दबाने में। उसका आधा ध्यान इसी पर है कि लड़की कहीं किसी तरीके से ज़रा आज़ाद न निकल जाए। हरिशंकर परसाई ने कहा था न, “इस राष्ट्र की आधी ऊर्जा तो लड़कियों की डोली उठवाने में जा रही है।” तो ये राष्ट्र तरक़्क़ी कहाँ से करेगा?

यूँ ही मैं आपसे नहीं वेदांत की बात करता, और वेदांत माने सिर्फ़ अद्वैत होता है, और वो अकेला है, अकेला है जो शिखर पर है बैठकर के, वहाँ से चिल्ला रहा है कि “मूर्खों, देह तुम हो ही नहीं, तो देह के आधार पर ये भेदभाव कैसे कर रहे हो?” पर हमने ग़ज़ब करा, नारी को चेतना तो माना ही नहीं, हमने देह तक नहीं माना। हमने उसको वस्तु बनाया, प्रॉपर्टी, चीज़। जो मैं आपसे बोला करता हूँ न, कि महिला का शरीर नहीं, मनुष्य की चेतना हैं आप। सच्चाई उससे नीचे की है, आपको कोई महिला का शरीर भी नहीं मानता, आपको प्रॉपर्टी माना जाता है। चेतना होती है। चेतना से नीचे देह, और देह से नीचे संपत्ति; चीज़, वस्तु। तो स्त्री-धन, पशुधन इस तरह से गिना जाता था पहले। वो शब्द अब नहीं हैं, पर मानसिकता अभी भी वही है।

और यही वजह है कि जैसे-जैसे स्त्री साक्षर, सशक्त, सक्षम होती जाती है, वैसे-वैसे प्रजनन दर कम होती जाती है, क्योंकि अब वो अपने ऊपर पति को ज़बरदस्ती चढ़ने नहीं देती। वो अपने अधिकार जान जाती है। एक तरह से कहिए तो वो अपना बलात्कार कम होने देती है। जो बड़े से बड़ी नाइंसाफ़ी हम धर्म के साथ कर सकते थे, धर्म को तो बहुत बर्बाद किया हमने, वो ये था कि हमने अपनी ही परंपराओं को, मान्यताओं को, स्वार्थों को, पूर्वाग्रहों को ग्रंथों में ये लिखकर दिखा दिया कि “ये सब तो ऊपर से आ रहा है, ये सब तो उसने चाहा है।” ये उसने नहीं चाहा है, ये तुम्हारी चाह है कि तुम ये सब वहाँ लिखे दे रहे हो।

और एक बार तुमने स्त्री को एक नीचा नागरिक बना दिया या संपत्ति बना दिया, तो अब अगर वो सर उठाएगी तो पुरुष को बुरा तो लगेगा न। तो फिर उसे उसकी औक़ात दिखाने का एक तरीका भी होता है, बलात्कार। “बहुत सर उठा रही थी, ले। बहुत मुँह खुलता है न तेरा, ले, रेप। टू कीप यू इन योर प्लेस।” ये भी वो क्यों कर रहा है? क्योंकि उस पुरुष के भीतर ये बात बैठा दी गई है कि ऊपर वाले ने ही स्त्री को बनाया है पुरुष की सेवा के लिए। तो ये इतना क्यों उठ रही है? और इतना उठ रही है तो फिर सज़ा देना जायज़ है न? तो मैंने इसको जायज़ सज़ा दी है।

अब समझ में आ रहा है कि क्यों ये सब बोलते हैं, “अच्छा, इसका रेप हुआ है तो इसी की गलती होगी। क्योंकि जब ऊपर वाले ने ही तेरे लिए नियम बना दिया कि ज़रा दब के चल, ज़रा ढक के चल, तो तू क्यों इतना उड़ रही थी? अब तू उड़ रही थी तो बॉयज़ विल बी बॉयज़, उन्होंने तेरा रेप कर दिया, तो ये कोई बहुत बड़ा अपराध नहीं हो गया। चलो छोड़ो, थोड़ी-सी माइनर पनिशमेंट दे दो और छोड़ दो।”

मैं इसलिए आपको आपके वास्तविक धर्मग्रंथों के पास ले जा रहा हूँ ताकि वो सब कुछ जो आप यूँ ही धर्म के नाम पर पकड़े हुए हैं, वो छोड़ दें। जाइए, देखिए वास्तव में कितने ऊँचे हैं आपके उपनिषद् और कितनी खुली बातें कह रहे हैं, कितने उदार हैं।

पश्चिम में जो फ़ेमिनिस्ट्स हुए, उन्होंने कहा, कई तरीकों से कहा है पर उनका कहने का तरीका ये था, कि लड़की वैसे तो पैदा होती है पर उसको जो वुमन बना दिया जाता है, उसको जो जेंडर दे दिया जाता है, सेक्स नहीं, जेंडर, वो समाज देता है। भारत ने इससे भी आगे की चाल चली। भारत ने कहा, “वो हम नहीं दे रहे, वो ऊपर से आ रहा है। देखो, धार्मिक किताबों में लिखा हुआ है।” जिन किताबों में ऐसा लिखा हुआ है, वो धार्मिक हैं ही नहीं। और आपकी जो धार्मिक किताबें हैं, वो मैं आपके पास लेकर आ रहा हूँ। उनमें कहीं लिखा है? गीता में लिखा है कहीं? अष्टावक्र बोल रहे हैं ऐसा? रिभु बोल रहे हैं ऐसा?

संतों के इतने दोहे मैंने आपको पढ़ा दिए, और इतने भजन, इतनी चौपाइयाँ बताई हैं। है कहीं पर? और जिन्होंने ऐसा कह दिया हो अपने दोहों चौपाइयों में, तो याद रखिए, संतों की बातें भी स्मृतियाँ हैं। उसमें से वही लेना है जो बात ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्वमसि’ से मेल खाएगी, जो कुछ नहीं मेल खा रही, ठुकरा देंगे। यही है हमारा वास्तविक धर्म; ऊँचे से ऊँचा। और हमने उसको क्या बना डाला? कि विदेशों से जब महिलाएँ आती हैं भारत भ्रमण में टूरिस्ट बनकर, तो कई देश हैं जो कई बार उनको अडवाइजरी देते हैं कि “भारत तो जा रही हो, पर बचकर रहना इन-इन जगहों पर, इस-इस समय पर, ऐसे-ऐसे लोगों से, इन-इन शहरों में बहुत रेप होता है।”

ये बना डाला हमने भारत को!

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसी संदर्भ में सिर्फ़ एक बात और मैं पूछना चाह रहा हूँ, कि बंगाल में जो तीन घटनाएँ घटी हाल में, आर.जी.कर लास्ट ही हुआ था। उसके बाद ही, कुछ दिन बाद एक साउथ लॉ कॉलेज है साउथ कोलकाता में, वहाँ पर एक लड़की गई थी एडमिशन के लिए। एडमिशन के दौरान ही उसके संग रेप हुआ। और थोड़े दिन पहले ही फिर दुर्गापुर मेडिकल कॉलेज में एक लड़की अपने ही एक मित्र के साथ कैंपस के बाहर निकली, वहाँ फिर उसका गैंगरेप हुआ।

जिसमें आपने अभी जो ज़िक्र किया, उसकी गहराई में घुसकर कि रेप कहाँ से आता है, तो एक ये चीज़ बार-बार जो नज़र में आ रही है, वो ये है कि इंस्टीट्यूशन्स के भीतर भी, और विशेष करके एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स के भीतर भी, ये घटनाएँ घट रही हैं।

आचार्य प्रशांत: और जोड़िए इसमें, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स में भी जो हाई अथॉरिटी है, अगर वो वुमन हो, तो वो भी प्रिजुडिस्ट होगी।

प्रश्नकर्ता: हाँ, वही तो मज़े की बात है। जो लॉ कॉलेज में जो प्रिंसिपल है, उन्होंने भी इसी रेप को समर्थन ही किया एक तरीके से। और बहुत दुख की बात है, या जो भी कुछ हो रहा है, वो बहुत शर्मनाक है।

आचार्य प्रशांत: क्योंकि हमें पता ही नहीं है कि हमारा स्टेटमेंट कहाँ से आ रहा है, वो हवाओं में है। मैं पूछ तो रहा हूँ, स्तंभ धर्मसूत्र आप में से कितनों ने पढ़ा है? नाम भी कितनों ने सुना था, आज से पहले? कितनों ने सुना था? लो। और ये वो धर्मसूत्र हैं जिनसे फिर उनकी रचना हुई, जिनको नाम दिया था *धर्मशास्त्र: जिसमें मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और पाराशर स्मृति ये सब आते हैं। आपने नहीं सुना न? आपने तो मनुस्मृति ही नहीं पढ़ी है, तो आपने ऊपर के धर्मसूत्र तो क्या ही पढ़े होंगे। पर आप उनको जी रहे हो, इसी तरीक़े से ये सब जो व्यक्ति हैं, इनको पता ही नहीं है कि जिसको जी रहे हैं, वो बात किस प्रभाव से आ रही है। हवाओं में है वो सब कुछ, हवाओं में है।

आप उसको सोख लेते हो। और महिला तो और ज़्यादा सोख लेती है, क्योंकि प्रकृति ने ही उसको थोड़ा ऐसा बनाया है कि विश्वास वो ज़्यादा कर लेती है। एक तरह से उसकी विवशता है, क्योंकि जंगल से ही तो हम सब निकल के आ रहे हैं न। जंगल में वो बहुत समय तक पड़ी रहती थी, असहाय, प्रेग्नेंट। तो उस वक़्त उसको विश्वास करना ही पड़ता था बहुत बातों पर। जब आपका बस नहीं चलता, तो फिर विश्वास के अलावा कोई सहारा नहीं बचता।

तो महिलाएँ और ज़्यादा वो सब पुरानी बातों पर और पुरानी कथाओं पर विश्वास कर लेती हैं, जबकि महिलाओं को और ज़्यादा इन्क्विज़िटिव होना चाहिए, “नहीं, ये जो तुम बोल रहे हो, या ये जो तुम्हारा नज़रिया है, रुख है, बिहेवियर, एटीट्यूड है, ये कहाँ से आ रहा है? बताओ, बताओ।” पर नहीं, “मैं तो पापा की परी हूँ, अच्छी बच्ची हूँ, पापा ने बोला है तो। क्योंकि पापा मेरे इतने अच्छे हैं।” और पापा की परी को भले ही न पता हो कि पापा ने कोशिश भरपूर कर ली थी उसका भी अबॉर्शन कराने की, पैदा हो गई वो दुर्घटना से।

भाई, सब जो अटेम्प्ट्स होते हैं अबॉर्शन के, वो सफल भी नहीं हो जाते। और कई बार तो आप चाह रहे हो तो अबॉर्शन करा दें, करा नहीं सकते क्योंकि प्रेग्नेंसी एडवांस्ड हो गई है। तो सोचो कि अगर पाँच करोड़ मारी गई हैं लड़कियाँ, ये तो एक्चुअल डेथ्स हैं, तो डिज़ायर्ड डेथ्स कितनी रही होंगी? पाँच करोड़ को तो सफलतापूर्वक मार दिया गया। और ऐसी कितनी होंगी जिनको चाहा गया हो कि मार दें, पर वो दुर्घटना से पैदा हो गईं। या कि वो पैदा सिर्फ़ इसलिए हो गईं क्योंकि लग रहा था, “इस बार लड़का हो जाए शायद,” और वो लड़की एक के बाद एक आती गई, वो पैदा हो गई।

वो धूमिल की पंक्तियाँ हैं न, बड़ी प्यारी पंक्तियाँ हैं, कोई मुझे लाकर के अभी दे दे, कि “ओ प्यारी भाभियों, नटखट बहनों, आईने को घूरना छोड़ दो। श्रृंगार दान को छुट्टी दे दो।” कोई देगा मुझे?

आप लोगों को यही बोल रहा हूँ, श्रृंगार दान को छुट्टी दे दो। आपको बात समझ में नहीं आ रही है। आप बहुत ज़्यादा विश्वासी हो।

क्योंकि न पढ़ने-लिखने के कारण आपको पता ही नहीं है कि आज जो हवाओं में है, वो आ कहाँ से रहा है, कि जिस पर आप यकीन कर रहे हो, वो कहीं काल तो नहीं है आपका। और ये मैं कोई महिलाओं को भड़का नहीं रहा हूँ, मैं पुरुषों को उनकी ज़िम्मेदारी याद दिला रहा हूँ। चैन से जीना चाहते हो तो तुम्हारे आसपास जो भी महिलाएँ हैं, उनको आज़ादी दो, चैन दो। नहीं तो ज़िंदगी का नियम है, जो शोषण करेगा, उसे शोषण बर्दाश्त भी करना पड़ेगा।

ओबीडिएंट, सबमिसिव। पागल हो गई हो? ट्रेडिशनल। तुम्हारे लिए क्या है ट्रेडिशन में, जो ट्रेडिशन का पालन किए जा रही हो, बताओ तो? तुम्हारे लिए क्या है ट्रेडिशन में? तुम्हें क्या मिलेगा ट्रेडिशन का पालन करके? कोई और मौज़ मार रहा है, कोई और मक्खन छान रहा है, तुम्हें क्या मिल रहा है ट्रेडिशन से? लेकिन सबसे ज़्यादा, अभी करवाचौथ है। कई सालों तक मैं कुछ न कुछ बोल दिया करता था, अब मुझसे बोला भी नहीं जाता। कुछ नहीं बोला मैंने।

ये याद है न, एक लड़की को समर्पित उन्होंने कविता लिखी थी, मैंने खोजा बहुत, पर और कुछ ऐतिहासिक बहुत उसमें मुझे दस्तावेज़ मिला नहीं, जहाँ से पता चले कि वो लड़की ठीक-ठीक कौन थी। पर ऐसा लग रहा है जैसे कि ईरानी क्रांति की बात कर रहे हैं वो, जहाँ पर कोई लड़की थी, जो पेट में बारूद बाँध कर के सीधे टैंक के नीचे घुस गई थी टैंक को उड़ाने के लिए। तो उसके लिए लिखी थी, उसमें से उद्धरण है:

ओ प्यारी भाभियों ओ नटखट बहिनों सिंगार दान को छुट्टी दे दो आईने से कहो कुछ देर अपना अकेलापन घूरता रहे कंघी के झड़े हुए बालों की याद में गुनगुनाने दो रिबन को फ़ेंक दो बाडिज अलगनी पर यह चोटी करने का वक्त नहीं और न बाजार का बालों को ऐंठकर जूड़ा बांध लो और सब के सब मेरे पास आओ **देखो, मैं एक नयी और तजा खबर के साथ घर की दहलीज़ पर खड़ा हूँ ओह! जैसा मैंने पहले कहा है– बीस सेवों की मिठास से भरा हुआ योवन जब भी फटता है, तो न सिर्फ टैंक टूटता है बल्कि खून के छींटे जहाँ जहाँ पड़ते हैं बंजर धरती पर आजादी के कल्ले फूटते है और ओ प्यारी लड़की! कल तू जहाँ आतिश के अनार की तरह फूट कर बिखर गयी है ठीक वहीं से हम आज़ादी की वर्ष गांठ का जश्न शुरू करते है

~ सुदामा पांडे ‘धूमिल’

जहाँ सबसे ज़्यादा पिछड़ी बातें हो रही होंगी, सबसे ज़्यादा रिग्रैसिव बातें, सबसे ज़्यादा महिला-दमन करने वाली बातें, वहाँ सबसे ज़्यादा महिलाओं की भीड़ होगी; समर्थन में ताली बजा रही होंगी, नाच रही होंगी।

सोके न महिला तो इसलिए उसको बता दिया गया कि तुम्हारे लिए सोचने का मार्ग है ही नहीं। तुम तो बस मानो, और ऐसी-ऐसी “यहाँ पर केला रख दो, यहाँ पे नारियल रख दो और ऐसा कर लो और धागा बाँध लो, और ये लटका लो, और इससे बस तुम्हारा हो जाएगा।”

आप जिसको बोलते हो न कि “इंडियन मेंटैलिटी,” ये पता तो करो वो इंडियन मेंटैलिटी कहाँ से आ रही है। आप जिसको बोलते हो न कि “मम्मी लोग तो सब ऐसे ही सोचती हैं,” तुम सोचो तो कैसे सोचती हैं? अच्छा, एक बात बताओ, इंसान तो सब हैं। कोई जर्मनी में पैदा हुई है लड़की, कोई भारत में पैदा हुई है लड़की, जीन्स तो एक बराबर ही हैं। अरे, इतना होता है अंतर, लाख में एक अंश का अंतर होगा कि उसकी आँखें चलो नीली हैं, तुम्हारी काली हैं, उसका कद तुमसे दो इंच ऊपर होगा, इतना ही अंतर होगा। बाक़ी तो भारत की महिला हो कि जर्मनी की महिला हो, एक ही है। एक ही है कि नहीं है?

तो ऐसा कैसे होता है, कि भारत की मम्मी और जर्मनी की मम्मी में इतना अंतर दिखाई देता है? ये जेनेटिक तो नहीं है, ये हवाओं में है जो तुम्हारे भीतर घुस रहा है, तुम्हें दिखाई क्यों नहीं दे रहा? और फिर तुम बोलती हो, “हमारी तो मम्मियाँ होती ही ऐसी हैं।” वो मम्मी ऐसी हैं नहीं, उसको बना डाला इस समाज ने ऐसा। वो पैदा नहीं हुई थी ऐसी।

“नहीं, जर्मन वूमन वो अच्छी नहीं होती है, गंदी होती है, ऐसे छोटे कपड़े पहनती है और कई बार तो डिवोर्स भी दे देती है। इंडियन वूमन होती है चैस्टिटी की प्रतिमूर्ति, पति की वफ़ादार, वेरी लॉयल इंडियन वूमन।”

कैसे? जीन्स अलग हैं? कैसे? और जिसको तुम वफ़ादारी बोल रहे हो, वो वफ़ादारी है या कुछ और है? वफ़ा का अर्थ भी समझते हो?

पहली वफ़ा निभाई जाती है सच्चाई से। जो सच्चाई के लिए वफ़ादार नहीं है, वो किसी और का वफ़ादार कैसे हो जाएगा?

धर्म है आपका जो सत्य को सबसे ऊपर रखता है। “सत्यं सत्यं पुनः पुनः।” एक बार नहीं, सौ बार सत्य के पास लौट-लौट कर आऊँगा। माया खींचेगी, खींचती रहे; मैं लौटूँगा, मैं लौटूँगा। मैं लौटूँगी, मैं लौटूँगी। मेरी भी भाषा देखो बायस्ड हो गई। और ये सब में कोई इसलिए नहीं कह रहा कि मैं स्त्री-समर्थक वग़ैरह हूँ, मैं नहीं स्त्री-समर्थक हूँ। जो तुमने अपनी हालत बना रखी है, कोई पसंद करेगा? हालत देखो अपनी। पर इंसान हूँ और स्त्री-पुरुष सब इंसान हैं, और ये बात मेरी गरिमा पर कीचड़ डालती है कि इन इंसानों ने अपनी ये हालत कर ली है। और इंसान सब एक बराबर होते हैं, पोटेंशियली। वही संभावना स्त्री में है जो पुरुष में है, वही संभावना सब में एक बराबर है।

लेकिन वही संभावना होते हुए भी कोई अपने आप को बिल्कुल सर्कस की कैद का जानवर बना दे और रोज़ तमाशा करे, तो ये बात डिग्निटी की तो नहीं है न? कैरिकेचर्स इन द फीमेल फ़ॉर्म, क्या हो सकती थी, क्या बन गई। और आत्मविश्वास भरपूर है, “हम आंटी हैं, मोरल अपर हैंड, आई एम द वर्चुअस आंटी।” तू अपनी भी ज़िंदगी ख़राब कर चुकी है। तू अपनी बेटी की, अपने बेटे की भी ज़िंदगी ख़राब कर रही है। लेकिन तुझे कॉन्फिडेंस पूरा है कि तू कुछ है। आता-जाता तुझे कुछ नहीं, पर विश्वास पूरा है। क्यों? मैंने वो सारे काम किए हैं जो समाज में नैतिक माने जाते हैं, तो अब तुम मेरी इज़्ज़त करो। मैंने वो सारे काम करे हैं जो समाज में नैतिक माने जाते हैं, तो अब तुम मेरी इज़्ज़त करो, मैं आंटी हूँ।

अभी हम जो नया बैच बना रहे हैं, प्रयोग कर रहे हैं, बाक़ी आप लोगों के ऊपर है, आप जानो आप उसमें क्या करने वाले हो। कि लाओ सब महिलाओं को, गृहणियों को लाओ, कामकाजी महिलाओं को लाओ। तो उनसे सबसे अभी कहा है कि बताओ लोगों को कैसे बताओगे कि गीता समागम में क्या होता है, सत्रों में क्या होता है, उन्हें कैसे बताओगे? तो ये भी है ऐसे, “देखो बेटा, पाप लगेगा।” ऐसे बताओगे? “देखो बेटा, पाप लगेगा। आचार्य जी सब भगवान जी की बातें बताते हैं, ध्यान से सुनना और अच्छे नंबरों से पास होना। दही चाट के माखन-मिश्री बगल में रख के गीता सत्रों में बैठा करो।” नहीं कहा नहीं है, पर थोड़ी सी ढील दे दूँ तो ये भी कह दिया जाए।

एक तरह से न, पुरुष होने के नाते मुझे शिकायत है। ‘शिकायत’ हल्का शब्द है, खुंदक है इस समाज से: तू ढंग की लड़कियाँ क्यों नहीं पैदा कर पाया? क्योंकि मेरा भी स्वार्थ है न। वही भाव, “मैं अबला हूँ, मैं तो पैदा ही अबला की गई हूँ।” और जब आप अपने आप को अबला घोषित कर देते हो न, तो आप बहुत हिंसक हो जाते हो। क्योंकि अगर मैं अबला हूँ, तो अब मैं अपने दुर्बल होने का बदला निकालूँगी। जिसने मुझे दबा कर रखा, जिसने मुझे शोषित किया, उसकी हर जगह शिकायत करूँगी और अपने आप को मैं पूरी दुनिया में विक्टिम बनाकर पेश करूँगी।

बड़े से बड़ा गुनाह होता है, भीतर अपने आप को दुर्बल बना लेना या दुर्बल मान लेना। अब आप सिर्फ़ शिकायतें, शिकायतें, शिकायतें। और वही घरेलू खुरपेंच, साज़िशें, देवरानी-जेठानी, पीछे से उसकी रस्सी खींचना, आगे से उसका पल्लू खींचना, घर को नरक बनाना। ये सब दुर्बलता के बायप्रॉडक्ट्स होते हैं। आपसे किसने कह दिया आप दुर्बल हो? आप अपने लिए ये घरेलू खटपट क्यों चुन रहे हो? आप अपने लिए जीवन के बड़े रणक्षेत्र क्यों नहीं चुन रहीं? बस वही, कि “गुस्सा आ गया न तो मैं बेलन मार दूँगी।” अरे, बेलन क्यों मारना है? जाओ सीधे टैंक चलाओ।

संघर्ष भी किससे हो रहा है? जेठानी से। अरे दुनिया में इतनी बड़ी-बड़ी समस्याएँ हैं, मैं कह रहा हूँ, आमंत्रित कर रहा हूँ, आओ जूझो उनसे, छोड़ो जेठानी को। पड़ोसन की बिचिंग। और वही फिर सब आप जो टीवी सीरियल देखते हो, उसमें सब सामने आता है। आता है कि नहीं? यही तो होता है उसमें लगातार।

ये क्या अपनी हालत बना ली है? क्या कर लिया ये? और ऊपर से कॉन्फिडेंस भरपूर, “मैं आंटी हूँ, तुम मेरी सुनोगे। नो बेटा नो, गिरी चीज़ नहीं उठाते।”* तो आपको भी नहीं उठाऊँगा फिर कभी। आधी तो कुपोषित हैं, अरे ठीक है चलो, बचपन में जो भी हो गया, थोड़ा खाना-पीना, दौड़ना, खेलना-कूदना, जिम जाना शुरू करो। अब तो तुम्हारे पास एआई है, चैटजीपीटी से ही पूछ लो कि क्या मेरे लिए अच्छी खुराक़ होगी?

क्यों भारतीय संस्कार के नाम पर कार्ब्स खाए जा रहे हो, खाए जा रहे हो? और घर वालों को भी खिला रहे हो। दाल, चावल, रोटी, सब्जी; इसमें क्या है कार्बोहाइड्रेट्स के अलावा? और सब्ज़ी के नाम पर भी आलू। यही बना रहे हो, यही खा रहे हो, यही खिला रहे हो। और ये सब कुछ वहीं से आ रहा है, हवाओं से आ रहा है। तुमको पता भी नहीं है कि तुम्हारा पूरा जो व्यवहार है, वो निर्धारित कौन कर रहा है।

देखो, शुरू मैंने रेप से करा था, आ थाली पर गया हूँ, पर एक सूत्र है साझा। शरीर को भी मजबूत नहीं बनाना है, मन से भी अबला रहना है, तन से भी अबला रहना है। ऐसा कोई सर्वे हुआ नहीं है, पर होना चाहिए। जो रेप सर्वाइवर्स हैं, रेप विक्टिम्स हैं। अगर उनकी कद-काठी नापी जाएगी तो वो औसत से कम निकलेगी। भारत में महिलाओं की जो औसत कद-काठी है, वो वैसे ही कम होती है। पर जो रेप विक्टिम्स हैं, उनका और कम निकलेगा। ये हाइपोथेसिस है मेरा, इसको अभी जाँचा जाना बाक़ी है, पर ये हाइपोथेसिस है मेरा।

जितना कमज़ोर बनोगे, दुनिया उतना चढ़ेगी तुम्हारे ऊपर भाई। और मोरालिटी कोई तरीका नहीं होता है ताक़तवर बनने का, कि मेरे पास कुछ नहीं है; न भीतरी ताक़त, न बाहरी ताक़त, पर मेरे पास, “मैं आंटी हूँ, तुम मेरी सुनोगे।” कोई नहीं सुनेगा। ऊपर-ऊपर से “हाँ जी, हाँ जी, आंटी।” पीछे आकर हँसते हैं तुम्हारे ऊपर, “हाँ जी आंटी, हाँ जी आंटी।” और फिर पीछे हँसते हैं, “आंटी को बेवकूफ़ बनाया, मूर्ख है। आंटी छोड़ दो, मम्मी का भी यही होता है। नहीं जानते क्या? लड़का ज़रा-सा बड़ा हुआ नहीं तुम्हारा, 15 साल का, वो तुम्हें बेवकूफ़ बनाना शुरू कर देता है। क्यों?

मोबाइल चलाना तक तो ठीक से जानते नहीं, तो उसके लिए भी चौदह-तेरह साल का लड़का होगा, उसके पीछे जाते हो, “मोबाइल चला दे,” अब वो इज़्ज़त करेगा तुम्हारी। पर अबला बनकर रहना है, अबला। “मैं नीर भरी दुख की गठरी।”

दुनिया की, अगर मुझे सही याद है, तो शायद 30% या 50% एनीमिक महिलाएँ भारत में हैं। हमारी आबादी दुनिया की 16% है, यहाँ महिलाओं में ख़ून ही नहीं होता। और ख़ून है तो उसमें आयरन नहीं होता। क्यों? उसमें भी मोरालिटी है, “मैं तो इतना-सा ही खाती हूँ, पारंपरिक धार्मिक महिला हूँ, सबको खिलाकर थोड़ा-सा जो बच जाता है वो खा लेती हूँ।” पागल हो गई है। दिमाग भी ख़राब हो जाता है। चीज़ों की भीतर कमी हो न, तो दिमाग भी उल्टा-सीधा चलता है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, अभी आपने मेंशन किया कि अगर एक स्टडी होती अगर सेक्स, रेप विक्टिम्स पर, तो *एक्चुअली मैंने अभी जस्ट गूगल किया, तो एक फ़ॉरेन स्टडी है, “इम्पैक्ट: लेसन्स फ़्रॉम अ मल्टीजनरेशनल लॉन्गिट्यूडिनल रिसर्च स्टडी।”

ईयर-लॉन्ग स्टडी है, और उसमें वो सारे डोमेन्स: आपने जो डेवलपमेंटल, प्यूबर्टी पहले आ गई तो हाइट, ग्रोथ वग़ैरह अफ़ेक्टेड होगा। तो वो सारे डोमेन्स को एडवर्सली अफ़ेक्ट करता है। डिप्रेशन हो गया।

आचार्य प्रशांत: दिस इज़ आफ़्टर सेक्सुअल अब्यूज़?

प्रश्नकर्ता: हाँ, सेक्सुअल अब्यूज़ का 23 ईयर पर..

आचार्य प्रशांत: असर क्या है। हाँ, ये तो है ही इंपॉर्टेंट कि असर जो है, वो बहुत एडवर्स होता है, ये तो है ही इंपॉर्टेंट। मैं कुछ इससे भी आगे का कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ, जिनका अभी एक्स्प्लिसिट सेक्सुअल अब्यूज़ नहीं भी हुआ है, उनकी देखो। समझ में आ रही है बात? और ये तो है कि सेक्सुअल अब्यूज़ के बाद क्या हुआ है। मैं कह रहा हूँ, जिनका हुआ है, उनका कद-काठी कितना था अब्यूज़ से पहले भी, वो देखो। मैं कह रहा हूँ, कि बीइंग वीक इज़ इनविटेशन टू एक्स्प्लॉइटेशन। आप वीक थे, इसीलिए ज़्यादा संभावना हुई कि आपका रेप होगा। ये कह रहा हूँ।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। अभी हम रेप के बारे में बात कर रहे थे, तो मैं थोड़ा-सा डायरेक्शन को चेंज करके, एक क्वेश्चन आया था मेरे मन में, वो पूछना चाह रही हूँ। रेप को बोला जाता है सबसे हीनस क्राइम है हमारी सोसाइटी में। पर वो तो देह के स्तर पर है। कोई मर्डर करता है, कोई किसी को धोखा देता है या चोरी करके चला जाता है, व्हाय इज़न्ट दैट?

आचार्य प्रशांत: नहीं, पवित्रता तो जेनिटल्स से बाँधी गई है न, इसलिए।

प्रश्नकर्ता: तो वो क्यों है?

आचार्य प्रशांत: वो इसलिए, क्योंकि बाबा जी ने ऐसा करा है, और किसी वजह से नहीं है। भाई, पवित्रता का संबंध किससे होता है? चेतना से। और पवित्रता को यौनांग से बाँध दिया, तो चेतना भी अब किससे बाँध दी? यौनांग से। तो माने, अगर आपका यौनांग का अतिक्रमण हो गया, तो आपकी चेतना भी मार दी गई है; ये कहा जा रहा है बाबा जी द्वारा।

पवित्र और अपवित्र क्या हो सकता है? चेतना। ठीक है? तो प्योरिटी वर्ड चेतना के साथ ही असोसिएट होगा। पर उसको आपके जेनिटल के साथ जोड़ दिया गया। तो माने, कॉन्शियसनेस अब कहाँ घुसेड़ दी गई है? जेनिटल्स की दिशा। तो आपका जेनिटल अगर वायलेट हुआ है, तो उसको कह दिया जाता है कि आपकी कॉन्शियसनेस वायलेट हो गई। तो ये तो हो गया न बड़ा क्राइम। क्योंकि द ह्यूमन बीइंग इज़ अ कॉन्शियस एंटिटी। तो अगर आपकी कॉन्शियसनेस वायलेट हो रही है, तो बड़ा क्राइम है। और आपकी कॉन्शियसनेस कहाँ मान ली गई है, कहाँ पर है? वो जेनिटल में है।

तो इसलिए स्त्री की कॉन्शियसनेस यहाँ नहीं है (दिमाग), उसको माना गया है कि वो उसके जेनिटल में है। तो इसलिए इतना बड़ा हवा हो जाता है कि…। और फिर वो कभी ख़ुद सुसाइड भी कर लेती है, कभी उसके घरवाले मार देते हैं, ऑनर किलिंग में मार देते हैं कि इसका रेप हो गया है, अब ये किसी लायक नहीं है, इसको मार ही दो, या छुपा दो इस बात को या कुछ और कर दो।

कई जगह तो ऐसा भी है कि जो रेपिस्ट है, उसी से शादी कर दी जाती है। भारत में वैसा नहीं है, पर पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान में ऐसा भी होता है कि रेपिस्ट को सज़ा ही ये दी जाती है कि अब तू इससे शादी करेगा।

प्रश्नकर्ता: ये मेल्स के साथ नहीं होता क्योंकि रेप तो मेल्स के साथ भी होता है। गे कम्युनिटी में बहुत ज़्यादा होता है, पर उनको इतना हाइलाइट नहीं किया।

आचार्य प्रशांत: क्योंकि जब वो सब परंपराएँ बनी थीं, उस समय पर होमोसेक्सुअलिटी उतनी ज़्यादा थी नहीं। अगर होती तो उससे संबंधित भी वहाँ कुछ न कुछ होता।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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