बलि क्या होती है?

Acharya Prashant

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बलि क्या होती है?
जो चीज़ तुम्हें सबसे प्यारी हो, प्यार से यहाँ पर अर्थ है मोह का, आसक्ति का। जिससे तुमने अपनी आसक्ति बैठा ली है, जिससे लिप्त हो गये हो व्यर्थ ही, उसको त्यागना ही बलि है और ये बात ग्रन्थ बार-बार ज़ोर-ज़ोर से, दोहरा-दोहराकर, चिल्लाकर कहते हैं कि बलि की सही परिभाषा ये है। लेकिन इंसान ने बलि के नाम पर जानवरों को काटना शुरू कर दिया, हमसे ज़्यादा बड़ा जानवर कोई है क्या? यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

श्रोता२: तो आचार्य जी बलि क्या होती है, दुर्गा सप्तशती के हिसाब से?

आचार्य: बलि की चर्चा तो खूब कर चुके हैं, कैमरे के पीछे थे तुम, तुमने सुना ही होगा। बलि माने क्या है? वो जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है, जो रखने लायक नहीं है उसको त्याग दो, यही बलि है, यही बलि है। अब तुमने पूछ लिया तो एक ऐसी बात का उल्लेख करे देता हूँ, जो अभी आगे आती, पर अभी ही बता देता हूँ।

तो ये जो दोनों जने हैं, इनकी जिज्ञासा से इस पूरे प्रकरण का आरम्भ होता है। कौन हैं? राजा सुरथ और वैश्य है समाधि नाम से। यही दोनों आये हैं, दोनों परेशान हैं, तो इन्हीं की परेशानी दूर करने के लिए ऋषि इनको माँ के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। तो अन्त में ये दोनों साधना करते हैं फिर, माँ की। और सप्तशती कहती है कि साधना में इन्होंने प्रोक्षित बलि में अपने रक्त का उपयोग करा। प्रोक्षितव्य वो होता है जिसकी बलि दी जाती है। तो इन दोनों ने अपने ही शरीर की बलि दी, शरीर की बलि कैसे दी? ग्रन्थ हमें बता रहा है कि दोनों ने खाना-पीना बिलकुल कम कर दिया, ये होती है बलि। ये माँस की बलि है, किसके माँस की बलि दी जा रही है? अपने ही माँस की, काटकर भी नहीं। दोनों ने अपना देहभाव कम करने के लिए अपना खाना-पीना कम कर दिया और इसी को ग्रन्थ कहता है कि दोनों ने ही अपने शरीर की बलि दे दी, दोनों ने अपने माँस की बलि दे दी।

ये होती है बलि। जो चीज़ तुम अकारण पकड़े बैठे हो, जिस चीज़ से तुमने बहुत मोह बिठा लिया है लेकिन वो जो वस्तुत: तुम्हारे काम की नहीं है, उसको त्याग दो, इसको बलि कहते हैं। जानवर तुम्हें बहुत प्यारा है क्या? तो जानवर को काटना बलि कैसे कहला सकता है? तुम्हें सबसे प्यारा क्या है? अपना अहंकार। और अहंकार को सबसे प्यारा क्या है? पहली चीज़, तुम्हारा शरीर। तुम यही तो कहते हो, ‘मैं अहंकार हूँ’ और अहंकार कहता है, मैं देह हूँ।’ तुम कहते हो, ‘मैं हूँ अहंकार मेरा, अहम्, अहम्, अहम्। अपना परिचय जब भी देते हो तो शुरूआत “अहम्” शब्द से करते हो न? कि मैं फ़लाना हूँ, तुम्हें सबसे प्यारा है? मैं। और मैं को सबसे प्यारा क्या है? देह। तो बलि देनी है, तो इन दोनों की दो न! अपनी अहंता की या अपने देहभाव की।

इसमें जानवर कहाँ से आ गया बीच में? वो भी नन्हा, बेज़ुबान, उसको पता भी नहीं है, उसकी आँखों की तड़प देखो वो अपने पर फड़फड़ा रहा है, वो जीना चाहता है उसने कुछ नहीं बिगाड़ा था। तुम उसको लाकर के मार रहे हो, उसका खून पी रहे हो, कैसे दरिंदे हो? क्या कर रहे हो?

श्रोता२: ये हमारे अन्दर की राक्षसी वृत्ति है।

आचार्य: बिल्कुल, जो चीज़ तुम्हें सबसे प्यारी हो, प्यार से यहाँ पर अर्थ है मोह का, आसक्ति का। जिससे तुमने अपनी आसक्ति बैठा ली है, जिससे लिप्त हो गये हो व्यर्थ ही, उसको त्यागना ही बलि है और ये बात ग्रन्थ बार-बार ज़ोर-ज़ोर से, दोहरा-दोहराकर, चिल्लाकर कहते हैं कि बलि की सही परिभाषा ये है। लेकिन इंसान ने बलि के नाम पर जानवरों को काटना शुरू कर दिया, हमसे ज़्यादा बड़ा जानवर कोई है क्या? चलो ठीक है।

श्रोता१: जब सबसे पहले दिन आपसे इस विषय में चर्चा शुरू हुई थी, तो मैंने आपसे एक चीज़ पूछी थी कि क्यों ऐसा हुआ कि जब ग्रन्थ इतनी साधारण बात कर रहे हैं, ऐसी बात जो हम सबके जीवन पर लागू होती है, तो लोग ग्रन्थ से दूर क्यों चले गये। तो शायद उसका एक जो वजह है वो ये भी है कि अगर ग्रन्थ ख़ुद ही बता रहा है कि बलि का ये अर्थ है कि जहाँ पर आप अपने ही शरीर को व्रत रखकर गला रहे हैं और वो एक तरह की बलि है, तो उससे आपका सामना न‌ हो।

आचार्य: जानते हो, बहुत सारे लोगों ने वैदिक ऋचाओ को उठाकर के अब ये सिद्ध करने की कोशिश करी है कि वेदों में भी तो माँसाहार का उल्लेख है। एक लगभग एक घंटे की मैंने चर्चा करी थी, अभी दो-तीन महीने पहले ही, वो रिकार्ड भी हुई थी। जिसमें मैंने जितने ग्रन्थ हैं, उनमें से चुन-चुनकर के बताया था कि कैसे स्पष्टतया, ग्रन्थों में उल्लिखित है कि पशुओं को मत मारना, इसका नाम बलि नहीं है। और वास्तविक बलि क्या है ये भी ग्रन्थों से ही उद्धृत करके समझाया था।

इस मामले में गायत्री शक्तिपीठ के श्रीराम शर्मा आचार्य जी हैं उन्होंने एक छोटी सी पुस्तिका है ‘पशुबलि’ नाम से ही, सबसे पहले मैंने वो पढ़ी थी और उससे बड़ी स्पष्टता आयी थी। इसका उल्लेख मैंने उस वीडियो में भी करा है, उसका शीर्षक है, “पशु-हत्या यदि धर्म है, तो अधर्म क्या?” इसी तरह का। ढूॅंढ़ोगे यूट्यूब पर तो मिल जाएगा। तो उस वीडियो को देख लो या ये जो पशुबलि नाम की किताब है इसको पढ़ लो, तो उस वीडियो से भी ज़्यादा उस किताब में तुमको उल्लेख मिलेंगें कि किस-किस तरीक़े से कहाँ-कहाॅं पर हमारे ग्रन्थ जीव-हत्या को निषिद्ध करते हैं और इंसान इतना नालायक हो गया है कि अपनी ज़बान के स्वाद को जायज़ ठहराने के लिए ग्रन्थों का ही सहारा ले रहा है। लोग आजकल निकले हुए हैं बताने के लिए कि देखिए, साहब आप तो ये भी खाते थे, वेदों में ये भी खाया जाता था, वेदों में गाय को खाने का उल्लेख है और ये सारी बातें। अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं, अनुवाद में विकृतियाँ कर रहे हैं, जान-बूझकर के।

तो अब आगे बढ़ते हैं तो अब ख़ुद ये दोनों आ जाते हैं, भाई! शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज़ का संहार हो गया, अब ये दोनों आ जाते हैं। और जैसा होना ही था, दोनों मारे जाते हैं, तो इस पर भी एक पूरा अध्याय ही समर्पित है कि दोनों किस प्रकार से युद्ध करते हैं, कौनसे शस्त्रों का प्रयोग करते हैं, फिर फरसा फेंकते हैं, फिर खड्ग मारते हैं, फिर ये, फिर वो, तो. . . अन्त लेकिन वही होता है, जो होना होता है, दोनों मारे गये। दोनों को मारने के बाद जो बात सप्तशती कहती है वो बड़ी उल्लेखनीय है और बड़ा सुन्दर उसमें प्रतीक है।

कहती है, ‘जैसे ही ये दोनों मरे, नदियाँ साफ़ हो गयीं, सूर्य की प्रभा निखरकर सामने आ गयी, हवा शीतल हो गयी, पहाड़ों की और वनों की जो दुर्दशा थी वो ठीक हो गयी। ये तुम देख रहे हो इशारा किधर को है? ये सीधे-सीधे जो आज जलवायु परिवर्तन है, क्लाइमेट चेंज, उसकी बात नहीं करी जा रही? वही तो है जिसका उल्लेख सप्तशती में है, आज से हज़ारों साल पहले से। कि आज जो आदमी, ये जो आज का इंसान है, जो राक्षस बना हुआ है, इसने हवा ख़राब कर दी है, नदी ख़राब कर दी है, समुद्र ख़राब कर दिया है, सारे जानवर मार दिये, सारे जंगल काट दिये। और इस राक्षस को जब तुम हटा दोगे, तो सूरज की रोशनी भी अच्छी हो जाएगी, चाँद-तारे साफ़ दिखायी देंगे, नदियाँ साफ़ हो जाएँगी, जो नदियाँ विलुप्त हो गयी हैं, वो फिर बहने लगेंगी। जो वन तुमने उजाड़ दिये हैं, वो फिर हरे हो जाएँगे। हाँ, जो प्रजातियाँ विलुप्त हीं हो गयीं जीवों की, अब वो तो वापस नहीं आने की।

लेकिन देख रहे हो कि शुम्भ-निशुम्भ क्या कर रहे थे? उनके जाने के बाद यदि प्रकृति ठीक हो गयी, तो माने वो दोनों राक्षस कर क्या रहे थे? वो प्रकृति ही तो बर्बाद कर रहे थे, तो राक्षस कौन है फिर? जो प्रकृति को बर्बाद करे। ये भी तो कह सकती थी सप्तशती कि ये दोनों मर गये तो देवता हर्षित हो गये? और दुनिया भर के जो मनुष्य थे उन्होंने बड़ा उत्सव मनाया, ये बात नहीं कहती है सप्तशती। सप्तशती कहती है, ‘ये दोनों मरे, तो जंगल ठीक हो गये, जानवर ठीक हो गये, नदियाँ ठीक हो गयीं, पहाड़ ठीक हो गये। पहाड़ों के ऊपर जो बर्फ़ थी, जो बर्बाद हो गई थी, वो बर्फ़ ठीक हो गयी, हवा ठीक हो गयी, जो गन्दगी, प्रदूषण फैला हुआ था, वो प्रदूषण मिट गया।

जैसे आज जो हम पर्यावरण की क्षति कर रहे हैं, वो ऋषियों ने बहुत पहले ही देख लिया हो और जैसे राक्षस की पहचान ही यही हो कि वो पर्यावरण को बर्बाद करेगा, जो पर्यावरण को बर्बाद करे, वही आज का राक्षस है। हम सब राक्षस हैं। फिर क्या होता है? अब ये सब बता दिया मेधा मुनि ने। तो राजा और वैश्य दोनों को बात समझ में आ गयी कि हमारी जो समस्या है, हमें जो दुख और बन्धन हैं, वो माँ के प्रति, माँ माने प्रकृति के प्रति, प्रकृति माने यही जो सबकुछ है (देह की तरफ़ इशारा करते हुए) इसके प्रति अज्ञान के कारण हैं।

तो ये दोनों जाते हैं और फिर साधना करते हैं। माँ की साधना करते हैं। माँ की साधना ही आत्मज्ञान की साधना है, क्योंकि आत्मज्ञान में किसको जाना जाता है? यही अपनी पूरी व्यवस्था को। आत्मज्ञान में आत्मा नहीं जानी जाती, आत्मा तो अज्ञेय होती है, तो माँ की साधना करते हैं, तो तीन वर्ष तक उनकी साधना चलती है, फिर उनसे कहा जाता है, ‘बताओ क्या चाहिए?’ माता कहती हैं। राजा को बात अभी पूरी समझ में आयी नहीं है, वो बोलते हैं, ‘मेरा राज्य छिन गया है, राज्य दिला दो वापस।’ ‘जो चाहोगे मिलेगा, जो मुझसे जो माँगेगा, मैं उसको वो दे देती हूँ।’ ये बात और किसने कही है?

श्रोता१: श्रीकृष्ण ने।

आचार्य: श्रीकृष्ण ने कही है। तो माँ भी यही कहती हैं, ‘तुम जो माँग रहे हो, मैं दे दूँगी।’ राजा को राज्य चाहिए, मिलेगा। वैश्य चतुर खिलाड़ी है, वैश्य को दुनियादारी ज़्यादा पता है। लेन-देन में माहिर हैं न! कौनसी ऊँची चीज़ है, किसका कितना दाम लगाना चाहिए, जानते हैं। दुनियादारी में राजा से आगे हैं। वैश्य बोलते हैं, ‘नहीं भाई, दोबारा उसी दुनिया में दिल नहीं लगाना है, मैं अनासक्त हुआ! मुझे मुक्ति दो माँ, मुझे मुक्ति दो!’ अब माँ यहाँ क्या बोल रही हैं फिर समझना! जैसे एक के बाद एक हीरे-मोती निकलते ही जा रहे हों। खान है बहुमूल्य प्रतीकों की दुर्गा सप्तशती। देवी कहती हैं, ‘ठीक है, तुम्हें मुक्ति चाहिए, तो मैं तुम्हें ज्ञान देती हूँ।’ देवी भी ये नहीं कहती हैं कि तुम्हें मुक्ति चाहिए तो मैं तुम्हें तत्काल मुक्ति दे सकती हूँ वरदान में, देवी भी कहती हैं कि मुक्ति चाहिए तो पहले ज्ञान चाहिए होगा। ‘मैं तुम्हें वो ज्ञान देती हूँ, उससे तुम्हें मुक्ति मिलेगी।’ और फिर वैश्य मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

जो लोग सोचते हैं कि ज्ञान के अतिरिक्त, किसी भी मार्ग से मुक्ति मिल सकती है उनके लिए अन्त में सबक है। आप अपनेआप को मत बोलिए, ज्ञानमार्गी। आप कहिए, ‘मैं तो शाक्त-पंथी हूँ, या मैं तो भक्त हूँ, देवी की भक्ति करता हूँ, ज्ञान का मेरा क्या है?’ देवी भी यही कहेंगी कि मुक्ति तो ज्ञान से ही मिलेगी। मेरे पास भी आओगे तो मुक्ति के लिए तो मैं तुम्हें कहूँगी ज्ञान लो! ज्ञान के अतिरिक्त नहीं मुक्ति। आत्मा का स्वभाव बोध है और जीव का मूलबन्ध झूठा ज्ञान है। जब हमारी मूल पीड़ा ही यही है कि हमने झूठा ज्ञान पकड़ रखा है, तो सच्चे ज्ञान के अतिरिक्त मुक्ति आपको कहाँ से मिल जानी है?

तो इस तरह से करके दुर्गा सप्तशती की समाप्त होती है। आप सबको सच्ची नवदुर्गा की शुभकामनाऍं।

श्रोता१: प्रणाम आचार्य जी।

आचार्य: प्रणाम।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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