जो चीज़ तुम्हें सबसे प्यारी हो, प्यार से यहाँ पर अर्थ है मोह का, आसक्ति का। जिससे तुमने अपनी आसक्ति बैठा ली है, जिससे लिप्त हो गये हो व्यर्थ ही, उसको त्यागना ही बलि है और ये बात ग्रन्थ बार-बार ज़ोर-ज़ोर से, दोहरा-दोहराकर, चिल्लाकर कहते हैं कि बलि की सही परिभाषा ये है। लेकिन इंसान ने बलि के नाम पर जानवरों को काटना शुरू कर दिया, हमसे ज़्यादा बड़ा जानवर कोई है क्या?
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श्रोता२: तो आचार्य जी बलि क्या होती है, दुर्गा सप्तशती के हिसाब से?
आचार्य: बलि की चर्चा तो खूब कर चुके हैं, कैमरे के पीछे थे तुम, तुमने सुना ही होगा। बलि माने क्या है? वो जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है, जो रखने लायक नहीं है उसको त्याग दो, यही बलि है, यही बलि है। अब तुमने पूछ लिया तो एक ऐसी बात का उल्लेख करे देता हूँ, जो अभी आगे आती, पर अभी ही बता देता हूँ।
तो ये जो दोनों जने हैं, इनकी जिज्ञासा से इस पूरे प्रकरण का आरम्भ होता है। कौन हैं? राजा सुरथ और वैश्य है समाधि नाम से। यही दोनों आये हैं, दोनों परेशान हैं, तो इन्हीं की परेशानी दूर करने के लिए ऋषि इनको माँ के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। तो अन्त में ये दोनों साधना करते हैं फिर, माँ की। और सप्तशती कहती है कि साधना में इन्होंने प्रोक्षित बलि में अपने रक्त का उपयोग करा। प्रोक्षितव्य वो होता है जिसकी बलि दी जाती है। तो इन दोनों ने अपने ही शरीर की बलि दी, शरीर की बलि कैसे दी? ग्रन्थ हमें बता रहा है कि दोनों ने खाना-पीना बिलकुल कम कर दिया, ये होती है बलि। ये माँस की बलि है, किसके माँस की बलि दी जा रही है? अपने ही माँस की, काटकर भी नहीं। दोनों ने अपना देहभाव कम करने के लिए अपना खाना-पीना कम कर दिया और इसी को ग्रन्थ कहता है कि दोनों ने ही अपने शरीर की बलि दे दी, दोनों ने अपने माँस की बलि दे दी।







