प्रेम तो होश की बात होती है, हम तुम्हें छुएँगे भी सिर्फ़ तब जब तुम अपने पूरे होशो-हवास में हो और प्रेम का क्षण है। नहीं तो इंसान कैसा है, जो किसी बेहोश इंसान को छू भी सकता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आज के विषय से ही मुझे एक पिछले हफ़्ते की घटना याद आई, जिसमें एक हाई कोर्ट के जज साहब ने एक लाइन अपने जजमेंट में लिखी कि, "शी इनवाइटेड द ट्रबल फॉर हरसेल्फ।"
तो कानूनन दृष्टि से तो शायद इसको ठीक नहीं मान सकता, क्योंकि कानून में तो एक क्राइम की डेफ़िनिशन होती है, और उस डेफ़िनिशन में कोई ऐक्ट फिट हो जाता है, तो क्राइम 'यस' या 'नो' होता है और उसकी सज़ा मिलती है। और जो लुटेरा है, जो रेपिस्ट है या जो भी है, उसकी भी तरफ़दारी नहीं की जानी चाहिए, ये भी हम मानते हैं।
लेकिन इसमें जो आध्यात्मिक दृष्टिकोण है, और क्योंकि आपसे ये सीखा है कि हर घटना के हर पहलू को देखना चाहिए, और आप स्वयं भी हर घटना का रेशा-रेशा अलग कर देते हैं। तो आज हमने बात शुरू की थी कि "बेहोशी विध्वंस को आमंत्रण देती है।" और अगर हम होश में नहीं हैं, तो बाहर के लुटेरे को पहले देखें या अपनी बेहोशी दूर करें?
तो मैंने इस घटना को थोड़ा डीपली समझा। तो एक




