
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आज के विषय से ही मुझे एक पिछले हफ़्ते की घटना याद आई, जिसमें एक हाई कोर्ट के जज साहब ने एक लाइन अपने जजमेंट में लिखी कि, "शी इनवाइटेड द ट्रबल फॉर हरसेल्फ।"
तो कानूनन दृष्टि से तो शायद इसको ठीक नहीं मान सकता, क्योंकि कानून में तो एक क्राइम की डेफ़िनिशन होती है, और उस डेफ़िनिशन में कोई ऐक्ट फिट हो जाता है, तो क्राइम 'यस' या 'नो' होता है और उसकी सज़ा मिलती है। और जो लुटेरा है, जो रेपिस्ट है या जो भी है, उसकी भी तरफ़दारी नहीं की जानी चाहिए, ये भी हम मानते हैं।
लेकिन इसमें जो आध्यात्मिक दृष्टिकोण है, और क्योंकि आपसे ये सीखा है कि हर घटना के हर पहलू को देखना चाहिए, और आप स्वयं भी हर घटना का रेशा-रेशा अलग कर देते हैं। तो आज हमने बात शुरू की थी कि "बेहोशी विध्वंस को आमंत्रण देती है।" और अगर हम होश में नहीं हैं, तो बाहर के लुटेरे को पहले देखें या अपनी बेहोशी दूर करें?
तो मैंने इस घटना को थोड़ा डीपली समझा। तो एक लाइन मुझे मिली, जो विक्टिम स्वयं कह रही है, कि "शी वाज़ इन अ बैड कंडीशन ड्यू टू एक्सेसिव कंज़म्पशन ऑफ अल्कोहल एंड शी नीडेड सपोर्ट।" तो मुझे यही आत्मज्ञान और अध्यात्म का जो तत्व है वो मिल गया, कि अगर शायद यह बेहोशी न होती तो कुछ संभावना है कि लुटेरा नहीं लूट पाता।
तो क्या इसको इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए? और अगर इस दृष्टि से देखा जाना चाहिए, तो जो जज साहब ने बात कही, शायद वो कुछ लाभकारी हो सकती है समाज के लिए।
आचार्य प्रशांत: कोई बात लाभकारी नहीं होती, लाभकारी बात तो वो होती है जो आत्मज्ञान से आई हो। जो बात कही गई है वो तो लोकधर्म भी रोज़ यही बोलता है, कि "तुम्हारा बलात्कार हो रहा है, तो तुम ही ज़िम्मेदार हो। तुम बुर्का डाले क्यों नहीं निकलीं।" रोकोगे कहाँ पर इस बात को, ये बात कहाँ तक जाकर रुकेगी।
वो लड़की कह रही है, कि "हाँ, मैं नशे में थी और मुझे सपोर्ट चाहिए था।" तो आपने कहा, "फिर ठीक है, वो ज़िम्मेदार है लड़की।" कोई दूसरी लड़की इसलिए ज़िम्मेदार हो सकती है क्योंकि उसने कपड़े छोटे पहन रखे थे, तो उसके शरीर का कुछ हिस्सा दिख रहा था – 35% हिस्सा। फिर अगली ज़िम्मेदार हो सकती है – उसका 30% दिख रहा था। कहाँ पर आप सीमा खींचोगे।
किसी को तुम पूरा ही तंबू में डाल दो, उसकी उंगली का नाखून दिख रहा था उससे किसी को उत्तेजना हो गई, कहाँ पर रोकोगे। फिर तो ज़िम्मेदारी हमेशा लड़की के ऊपर ही आएगी, कहाँ पर रोकोगे। और अभी हम बात कर रहे हैं उस "तर्क" की, जो तर्क दिया गया। लड़की सामने बैठी हो, तो उससे अलग बात करेंगे, कि तू कितनी पगलाई हुई है कि तुझे ज़िंदगी में पता नहीं कि क्या करना है, क्या नहीं करना है। कौन सा नशा छाया हुआ है, कि तू किसी की भी गाड़ी में बैठ के चल देती है। कौन सी कामनाएँ हैं? क्या समस्या है तेरी? वो अलग है।
पर ये जो तर्क होता है कि, "तुमने ख़ुद ही अपने ऊपर आफ़त बुलाई है," इस तर्क का कोई अंत नहीं है ना। विक्टोरियन समय में कुर्सियों की टांगों को भी कपड़ा पहनाया जाता था। बताओ क्यों? क्योंकि लेग्स हैं ना, लेग्स ढकी हुई होनी चाहिए। अंत कहाँ पर करोगे इस मूर्खता का? फिर तो किसी की आँख भी दिख रही है, तुम्हें उत्तेजना हो सकती है, “यू नो शी आस्क्ड फॉर इट।" क्यों नहीं हो सकती, सारे शायरों ने तो नैनम-नैनम ही करा है। “तेरी हसीन आँखें और तेरी पलकें।” और बाल लंबे होते हैं, कोई एक-आध बाल भी बाहर से दिख गया, तो कोई बिल्कुल उत्तेजित हो सकता है। बोल दो, "नो, शी आस्क्ड फॉर इट।" कहाँ पर रोकोगे इसको?
हम ये सब कुछ लड़की को बेगुनाह बताने के लिए नहीं कर रहे हैं, उसने जो किया उसकी उससे अलग बात करेंगे। ठीक है? कोई जा रही है पब में बैठ रही है, वहाँ यू आर पासिंग आउट, तुम्हें पता भी नहीं है तुम किसके साथ बैठ रही हो, क्या कर रही हो, ये लड़की होने के नाते नहीं इंसान होने के नाते एक विक्षिप्तता प्रदर्शित करती है ये बात। ये काम लड़की नहीं, लड़का करे तो भी ग़लत है। तो उससे हम अलग बात कर लेंगे।
पर पहली बात हम उनसे करना चाहते हैं, जो बलात्कार वग़ैरह के मामलों में ये तर्क ले आते हैं कि "भाई, देखो नुकसान तुम्हारा है तो बचना भी तुम्हें होगा। तुम सड़क पर निकली और बलात्कार हुआ है, तो बॉयज़ विल बी बॉयज़।" और ये जो लोकधर्मी मन होता है ना, उसमें ये तर्क खट से उठता है।
कितने लोगों को मैंने देखा है, न्यू ईयर सेलिब्रेशन हो रहा था किसी साल में, किसी जगह पर। अब ये ऐसे घूम रही हैं रात में 12:00 बजे, ठंड भी है कोहरा हो रहा है, अब इनमें दो-चार का रेप हो जाए, तो बताओ। क्या बताएँ? क्यों हो जाए?
और वो अगर मूर्ख हैं लड़कियाँ तो एक अलग मुद्दा, अलग बात कर लेंगे, पर रेप करने की अनुमति मिल गई क्या उनकी मूर्खता से। तो ऐसी-सी बात है, कि ये देखो, ये मुर्गा है ये ज़्यादा भाग नहीं पा रहा है, अब हम पकड़ के खा लें, तो बताओ। भाई, सामने वाला पकड़े जाने की हालत में है, तो क्या तुम उसको पकड़ के उसका भोग कर लोगे।
और मैं फिर बोल रहा हूँ, लड़की से अलग बात करेंगे, कि तू इंसान कैसी है कि तू अपनी ज़िंदगी में ये सब कुछ कर रही है, पर इन दोनों मुद्दों को आप एक करके नहीं देख सकते हो, ये दोनों मुद्दे एक नहीं हैं। कभी भी यह मत कह देना कि, "तूने ये करा, तो अब तो ये होना ही था।" कोई बच्चे होते हैं, वो जाकर के कोई जायज़ बात भी कर लें टीचर से, और टीचर कई बार बिदक जाते हैं। फिर वो बच्चे घर पे आकर बताएँगे कि, "हमनें टीचर को ये बोला, टीचर बिदक गया, टीचर ने थप्पड़ मार दिया।" तो पेरेंट्स बोलेंगे, "तुमने ये बात टीचर को बोली ही क्यों, तुम्हें बोलनी नहीं चाहिए थी।"
नहीं! देखिए, ऐसे नहीं। टीचर को कोई हक़ नहीं है उसे थप्पड़ मार देने का। उसने बात अगर ग़लत बोली है, या अशिष्ट तरीक़े से बोली या जो करा है, उसकी अलग सुनवाई होगी वो अलग मुद्दा है। हम उसको निरपराध नहीं छोड़ रहे, हम निर्दोष घोषित करके ये नहीं कह रहे कि "जा, तू बढ़िया है।" ना-ना! तुझे अलग से पकड़ेंगे, अलग से बात करेंगे।
लेकिन लड़की अगर पूरी भी बेहोश हो, एकदम बेसुध पड़ी हो ज़मीन पर एकदम, और पूरी नंगी भी पड़ी हो तो भी इससे क्या बलात्कार करने का हक़ मिल गया? नहीं, 1% भी नहीं। और सज़ा उतनी ही होनी चाहिए।
तो ये दो मुद्दे मिलाया मत करिए, इन दोनों मुद्दों को ना हम कॉन्फ्लिक्ट बहुत कर देते हैं। और जैसे-जैसे लड़कियाँ पुरानी वर्जनाओं को चुनौती दे रही हैं, वैसे-वैसे ये कहना और आसान होता जा रहा है कि "जैसी करनी, वैसी भरनी। बहुत आज़ाद चिड़िया बनोगी तो पकड़ी भी जाओगी, लूटी भी जाओगी। हमारे साथ रहती, हमारे घर में रहती, बढ़िया दीवारों के बीच सुरक्षित रखते, अब तक तुम्हें ब्याह दिए होते, तो तुम्हारे साथ कुछ बुरा ना होता। देखा, बहुत फुदक रही थी जाकर के बंबई, कि अपनी नौकरी करेंगे, अपने हिसाब से जिएँगे, कुछ आज़माएँगे, कुछ देखेंगे, हो गया ना रेप। ये रेप तुम्हारा हुआ ही इसीलिए है, बहुत निकली थी कि "वहाँ जाकर के पढ़ाई और करेंगे, काम करेंगे और अलग तरह की संस्कृति चाहिए थी, तो देखा हो गया ना रेप।"
ये बहुत चल रहा है, ये नहीं! बिल्कुल नहीं!
और पाँचवीं बार बोल रहा हूँ, इसमें हम ये नहीं कह रहे हैं कि लड़की पागल नहीं है, कि लड़की को डाँट की ज़रूरत नहीं है या लड़की को सज़ा की ज़रूरत नहीं है, बिल्कुल हो सकती है लेकिन वो मुद्दा अलग है, उससे अलग से बात होगी। उसने जो कुछ भी करा, उसका हवाला देकर के लड़के के दोष को कम नहीं ठहराया जा सकता।
वैसे एक बात बताओ यार, वो आदमी कैसा होगा? ख़्याल आया, इसलिए पूछ रहा हूँ। सेक्स कोई जानवरों वाली बात तो होती नहीं है। तुम जो हो, तुम्हारे जो मूल्य हैं, वो सेक्स में भी अभिव्यक्त होते हैं, ऐसे ही थोड़ी तुम किसी के शरीर से इतना निकट पहुँच जाओगे। ये आदमी कैसा होगा कि सामने कोई बेहोश है। अभी तो आया है — वेंटिलेटर पर थी कोई, कहीं की एयर होस्टेज थी वो वेंटिलेटर पर थी और जाकर के उसको रेप वग़ैरह करा या प्रयास करा कुछ। ये आदमी कैसा होगा?
आदमी तो वो है ना जो कहे कि –
"प्रेम तो होश की बात होती है, हम तुम्हें छुएँगे भी सिर्फ़ तब जब तुम अपने पूरे होशो-हवास में हो और प्रेम का क्षण है।" नहीं तो इंसान कैसा है, जो किसी बेहोश इंसान को छू भी सकता है।
वही व्यक्ति है, वो होश में हो तो फिर भी उसके शरीर को शायद छू लें, पर अगर वो बेहोश है तब तो उसको बिल्कुल ही नहीं छू सकते ना, कैसे छू लेंगे।
उल्टा कर रहे हो, कह रहे हो "बेहोश था इसलिए हमने उसको छू लिया।" तुम आदमी कैसे हो? ये वही लोग हैं फिर जाकर के जो लाशों से भी संभोग करते हैं, क्या बोलते हैं उसको नेक्रो (नेक्रोफिलिया)। और ऐसा आए दिन मामले आते रहते हैं, मुर्दा घर में जवान लड़की की लाश पड़ी है, कोई जाकर के उसका रेप कर रहा है, कब्रें खोद-खोद के कर रहे हैं।
पाकिस्तान में ये बड़ी बीमारी चली है, वो आउटरेज है वहाँ बहुत। जवान लड़कियाँ मर जाती हैं, तो उनकी कब्र बहुत ठोस बनाई जाती है और उसकी सुरक्षा करनी पड़ती है, नहीं तो हवशी आकर के वहाँ से जवान लाश निकाल लेते हैं। ताबूत में होती है ना जलाते नहीं, उसको निकाल लेते हैं। ये आदमी कैसा है?
किसी के साथ शरीर से जुड़ना, वो प्रेम का क्षण होता है ना। बेहोश आदमी तुम्हें क्या प्रेम दे रहा है, तो तुमने उसके शरीर से अपना शरीर जोड़ा कैसे जब वो तुम्हें प्रेम दे ही नहीं सकता तो। एक औरत है वो बेहोश पड़ी हुई है, वो तुम्हें प्रेम तो नहीं कर रही, तो तुम उसे छू कैसे सकते हो। तुम्हें उत्तेजना भी कैसे होगी, पर हो जाती है, लोग कर रहे हैं।
ये दो तरह के लोग हैं। एक कहता है, बिकॉज़ यू वर कॉम्प्रोमाइज़्ड, सो आई टच्ड योर बॉडी। दूसरा कहता है, एक्ज़ैक्टली बिकॉज़ यू वर कॉम्प्रोमाइज़्ड, सो आई कुड नॉट टच योर बॉडी। वैसे शायद तुम्हें छू भी लेता, लेकिन जो अभी हाँ-ना बोलने की स्थिति में ही नहीं है तुम उसे छू कैसे सकते हो, तुम्हारे भीतर वो भाव ही कैसे आएगा।"
सामने कोई पड़ा है, मुँह से शराब की बदबू आ रही है, आँख बंद है, इधर-उधर लुड़क-पुड़क रहा है, तुम क्या करोगे। वो तो अभी बीमार है, पेशेंट है, उसको तो ले जाओगे बिस्तर पर डाल दोगे, चादर उड़ा दोगे, चार गाली और दो उसको चादर उड़ा के। बगल में नींबू रख दो कि उठ जाना तो चाट लेना, होश में आ जाना। रेप थोड़ी करोगे।
हाँ जब वो होश में आ जाए, फिर भले ही उसको चाँटा लगाना है चाँटा लगा लो, डाँट लगानी है डाँट लगा लो, जो करना है करो। होश में तो आने दो उसको।