बड़ा कौन: कर्म या किस्मत? श्रम या भाग्य? || आचार्य प्रशांत कार्यशाला (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, फ्री विल (मुक्त इच्छा) कहीं नहीं है। सब अपने गुण व धर्म के अनुसार चल रहे हैं; मैं भी। और अहम् का यानी मेरा कोई चुनाव नहीं है। जैसे नदी की धारा एक साल तक बहकर कहाँ पहुँचेगी यह हम अभी तय कर सकते हैं — अगर थोड़ा-बहुत जान हो तो — तो इसका मतलब यह तो भाग्य वाली बात हो गयी। तो मेरे चुनाव का या मैं क्या चूज़(चुनना) करती हूँ, क्या निर्णय लेती हूँ इसका क्या ही मतलब है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, इसका मतलब यह है कि जब मैंने बोला था कि जिसको आप फ्री विल बोलते हो उसमें कोई फ्रीडम है नहीं। आप झूठमूठ ही उसको कह देते हो कि यह मेरी फ्री विल है, मुक्तेच्छा है, और मैंने सोच-समझ के अपनी मर्ज़ी से फ़लाना चुनाव करा है। वो हमको ऐसा लगता है कि हमने चुनाव करा है; हमने चुनाव करा नहीं होता वो चुनाव हमसे हो गया होता है।
अहम् का काम है अपनेआप को कर्ता मानना — 'मैंने करा है।' जो उसने करा भी नहीं, जो उससे बस हो गया, उसको वो बोल देता है, 'मैंने करा है।' ठीक वैसे जैसे एक आदमी सो रहा है और सोते समय वो करवट ले ले और बाद में उसको उसकी रिकॉर्डिंग दिखायी जाए — तुम सो रहे थे, तुमने करवट ली — तो वो कहेगा तो यही कि मैंने करवट ली और इस भाषा से पता क्या चलता है, जैसे? जैसे करवट लेने में उसका कोई होशपूर्ण चुनाव शामिल रहा हो।
अब यहाँ तो बहुत स्पष्ट है, क्योंकि आँखें बंद हैं, और वो पड़ा हुआ है बिस्तर पर। तब तो आप देख रहे हो साफ़-साफ़ कि करवट लेना आपका चुनाव नहीं था, आपसे हो गया। इट हैपेंड टू यू, यू डिन्ट डू इट (आपके साथ ऐसा हुआ, आपने ऐसा किया नहीं) यह दो बहुत अलग-अलग बाते हैं। लेकिन अहंकार के पास इतना आत्मज्ञान होता ही नहीं कि यह जान पाए कि अपनी पूरी ज़िन्दगी कुछ नहीं करा इसने; इसके साथ घटनाएँ घटी हैं।



