आत्मा को खा गए, इसलिए परमात्मा बनाना पड़ा || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशांत: परमात्मा वास्तव में आत्मा-मात्र है। चूँकि ‘आत्मा’ शब्द का हमने बहुत दुरुपयोग कर लिया — हम मन को ही आत्मा कहने लग गए, हम जीवात्मा को ही आत्मा कहने लग गए — तो फिर ‘आत्मा’ शब्द को इंगित करने के लिए कहना पड़ा ‘परम आत्मा’; जैसे कि कई तरह की आत्मा होती है, एक छोटी आत्मा और एक परम आत्मा! कई आत्माएँ थोड़े ही होती हैं, आत्मा तो एक ही होती है। तो आत्मा और परमात्मा एक ही हैं।
‘परमात्मा’ शब्द कहाँ से आया, ये साफ़-साफ़ समझ लीजिए। हमने ‘आत्मा’ शब्द को खा लिया, तो फिर ‘परमात्मा’ शब्द का प्रयोग करना पड़ा। ठीक वैसे, जैसे आप अगर नारद भक्तिसूत्र में जाएँगे, तो वहाँ परम प्रेम की बात होती है; कभी वो कहते हैं अपरा-प्रेम, कभी कहते हैं परा-प्रेम। इसी तरह से अपरा-भक्ति और परा-भक्ति की बात होती है।
ये क्यों करना पड़ता है? ये मजबूरी में करना पड़ता है। प्रेम तो एक ही होता है, पर हम अपने साधारण मोह को प्रेम कहना शुरू कर देते हैं। तो फिर ऋषि सिर पकड़ लेते हैं, कहते हैं, ‘अरे! प्रेम शब्द तो अब इन्होंने खा लिया।‘ तो जो असली प्रेम था, उसके लिए एक नए शब्द का निर्माण करना पड़ता है, तो फिर उसे कहते हैं ‘परम प्रेम’; ये जताने के लिए कि तुम जिसको प्रेम समझते हो वो असली नहीं है।
वास्तव में सिर्फ़ एक शब्द होना चाहिए - प्रेम। और हम जिसको प्रेम कहते हैं, उसको हमें मोह कहना चाहिए, धोखा कहना चाहिए, मूर्खता कहना चाहिए; जो भी कहना चाहें। पर हम अपने प्रेम को मूर्खता कहेंगे नहीं, हम उसे कहेंगे ‘प्रेम’; तो फिर असली प्रेम को ऋषियों को कहना पड़ता है ‘परम प्रेम'।
समझ में आ रही है बात?
इसी तरीके से, हम झूठी आत्मा को कहने लग जाते हैं ‘आत्मा’। कैसे? ‘मेरी आत्मा तड़प रही है आज,’ या ‘फलाने मर गए हैं, उनकी आत्मा की शांति के लिए हम सब मिल रहे हैं।’ ये ‘आत्मा’ शब्द का सरासर दुरुपयोग है। आत्मा की शांति क्या, आत्मा अशांत कब हो जाएगी! आत्मा तो परम सत्य है, उसमें अशांति कहाँ से आ गयी बाबा!



