
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आपको सुनते हुए क़रीब डेढ़ साल, उससे ऊपर हो गए हैं। आपको सुनने से पहले जो लाइफ़ स्टाइल थी, जो ज़िंदगी थी, बोल सकती हूँ, बहुत ही औसतन थी। सोच औसतन थी, जो आसपास का माहौल था, आसपास सब औसतन लोग-बाग, रिश्ते, दोस्त, सब कुछ और वो औसत ज़िंदगी के हम आदि हो चुके थे। अब आपको सुनना चालू किया तो समझ में आया, ज़िंदगी सिर्फ़ घिसटने के लिए तो नहीं है। आपकी अगर कोई उच्चतम संभावना है तो आप उस तक जाने के लिए हैं, उसके ऊपर मेहनत करने के लिए हैं, जो कि दिखना चालू हुई है और जो शुरू भी किया है।
पर जैसे इतना लंबा समय, 30 साल, उस औसत ज़िंदगी को जीते हुए आई हूँ, कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे शरीर की जो मसल मेमोरी है, उसमें वो कहीं-न-कहीं आ गई है और अभी भी जो ये नई ज़िंदगी है, उसमें कहीं-न-कहीं वो पुरानी आदतें, वो पुरानी मेमोरी, कभी-कभी बीच-बीच में आती हैं, जो बाधा भी डालती हैं। तो जब वो चीज़ें वापस कभी-कभी आती हैं इस नए सफ़र पर, उसे कैसे देखा जाए और उससे कैसे बचा जाए, जितना हो सके?
आचार्य प्रशांत: वो आएँगी और उनसे मैं बचने का तो नहीं कह सकता। उनका सामना करने का, उनसे डील करने का तरीक़ा यही है, कि अपने पास समय ही कम से कम छोड़ा जाए उन पुरानी वृत्तियों और पुरानी यादों के लिए, और कुछ नहीं कर सकते।
आपने शब्द भी बड़ा अच्छा इस्तेमाल किया है, मसल मेमोरी। जिस चीज़ का अभ्यास कर लिया हो, वो चीज़ शरीर में जैसे घुस जाती है। चेतना के तो वज़न होता नहीं, तो वो तो तत्काल बदल सकती है फिर भी। ठीक है न? आप यहाँ पर कोई गणित का सवाल हल कर रहे हो और आपने एक हल निकाला और आप उसको देख रहे थे और तभी दिखाई दिया कुछ ग़लती है। तो आप वहाँ तुरंत जाएँगे, ऐसे मिटाएँगे और दूसरा लिख देंगे, मिट गया। मिट गया और ये नहीं होगा कि आपके भीतर भी उसका कोई चिन्ह, प्रमाण, अवशेष रह गया है। रह गया क्या? वो मिट गया और आपने लिख दिया और आप मुक्त हैं। जो नया आपने लिखा, आप पूरे तरीक़े से उसके हो गए, कि अब जो सॉल्यूशन लिखा है, मैं अब इसका हूँ। ऐसा होता है न? तो चेतना ऐसी होती है, द्रुतगामी। वहाँ तुरंत अंधेरा भी हो सकता है और उजाला भी हो सकता है।
जैसे घरों में होता है, बल्ब जल गया, बल्ब बुझ गया। इसीलिए समझ ऐसे भी आ सकता है। हुआ है कि कोई बात नहीं समझ में आ रही थी, अचानक आप कहते हो, यूरेका! लो आ गया समझ में। नहीं आ रहा था, नहीं आ रहा था, आ गया।
शरीर में ऐसा नहीं होता है। मसल मेमोरी बढ़िया। वहाँ पर चीज़ें जाकर के बैठ जाती हैं, कारण बहुत सीधा है, शरीर अतीत है। तो अतीत तो वहाँ बैठा ही हुआ है, शरीर अतीत है। आपने जैसी ज़िंदगी जी होती है, वो आपकी देह में घुस जाती है। पहले तो जेनेटिक सामग्री ही है, वो तो घुसी ही हुई है, वो तो शताब्दियों की बात है पुरानी, जो कि अभी भी जी रही है। वो तो है ही है कि बच्चा ही पैदा होता है, तो लाखों साल की यात्रा उसके शरीर में पहले ही मौजूद होती है, वो तो है ही। और उसके बाद भी आप जैसी ज़िंदगी जीते जाते हो, वो आपके शरीर को बदलती जाती है और शरीर तत्क्षण नहीं बदल सकता।
कौन है जो अपना वज़न तुरंत कम कर सकता हो दो किलो भी, कर सकते हैं क्या? हाँ पर अज्ञान 40 किलो का भी हो सकता है, वो तत्क्षण जा सकता है। आपका चेहरा भी बदल जाता है आपके निर्णयों से, आपकी आँखें बदल जाती हैं, आपकी देह बदल जाती है, सब बदल जाता है। आप जिस परिवेश में हो, उसके अनुसार आपका पूरा शरीर बदल जाता है और शरीर सोख लेता है, सचमुच सोख लेता है। मस्तिष्क बदल जाता है।
जिस तरीक़े से यहाँ (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) पर इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स फायर हो रहे होते हैं, वो बदल जाता है। हार्ड वायरिंग बदल जाती है और उसको देखा जा सकता है सचमुच, मशीन पर देखा जा सकता है कि ये व्यक्ति ऐसी जगह पर रहता था तो यहाँ भीतर सर्किट ऐसे बना हुआ था और इसने अपनी जगह बदल ली 6 महीने, साल, दो साल तो अब इसके भीतर बिल्कुल दूसरे तरीक़े से विद्युतीय प्रवाह हो रहा है। सब बदल जाता है और वो सोख लिया है, और वो बदल गया और अब उसको आप जल्दी से वापस पुरानी स्थिति में नहीं ला सकते। तो क्या करें? कुछ नहीं करें, झेलें। और क्या करोगे? क्या करोगे? कुछ हो सकता है क्या?
कभी हुआ है कि चोट लगी है और तत्काल ठीक हो गई है? हुआ है क्या? एक पल की घटना थी, पत्थर आकर लगा आपके यहाँ पर (पाँव की ओर इंगित करते हुए)। वो एक पल की बात थी, पर वो शरीर में घुस गई बात और अब वो रहेगी कम से कम दो महीने तक। वो पत्थर आया एक पल के लिए, उसका और आपके शरीर का संपर्क हुआ, पर वो घुस गया। अब शरीर के अंदर घुस गया है। और अब कब का पीछे छूट गया पत्थर, पर वो चीज़ आपके अब शरीर में रहेगी और ये भी हो सकता है कि जन्म भर के लिए रहे। किस-किस के शरीर पर घाव के निशान हैं?
(लगभग सारे श्रोता हाथ उठाते हैं।)
ये क्या हो गया? देख लो। अब क्या करना है उन घावों के साथ? वो जो निशान हैं, स्कार्स हैं, उनका क्या करना है? कुछ नहीं, जियो, झेलो। हाँ, इतना ज़रूर होता है कि जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे शरीर पर भी जो निशान पड़ा होता है, वो भी हल्का होता जाता है। हाँ, ये है कि पूरी तरह मिट जाए, ऐसा कोई निश्चित नहीं। तो इसीलिए अपने आप को ये मत बताओ कि कुछ था जो छाप छोड़ गया, जो छाप छोड़ जाए, जो पुरानी बातें हों, वो कोई अच्छी बातें तो होती नहीं हैं देखो। जो कुछ भी अच्छा होता है वो तो पुरानी छापों को बल्कि हटाता है, अपनी छाप नहीं छोड़ देता है कि एक घाव की तरह आकर बैठ गया है। वो पुराना है, अब क्या करें कि वो है, है तो है और उसने निशान छोड़ दिए हैं। जियो उनके साथ। और आपको उत्तर देते समय मैंने पहली बात ये कही कि —
ज़िंदगी ऐसी कर लो कि जो कुछ भी अतीत कह रहा है, वो पुरानी आवाज़ें, वो पुराने रंग, पुराने दृश्य — उनके लिए समय ही कम से कम बचे।
पर ये उम्मीद करोगे कि वो सब मिट जाए तो बड़ा मुश्किल है। बड़ा मुश्किल है। कम होता जाएगा, पूरी तरह मिटा पाना बड़ा मुश्किल होगा, वो अगर दुख देता है तो उस दुख के साथ जीना पड़ेगा। ठीक है, ऐसा क्या हो गया? जी लेंगे। कोई समस्या? हाँ, है समस्या, पर कोई बात नहीं। समस्या तो है, पर कोई बात नहीं, “जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये।”
और इसको अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया की विफलता के तौर पर भी मत देखना। ये मत कहना कि अगर हम मुक्त हो गए होते तो ये पुरानी आवाज़ें हमें आज भी क्यों बुलाती हैं। ये विफलता की बात नहीं है, ये माँ की करतूत है। उसने ये शरीर, ये चीज़ ही ऐसी बनाई है, ये सब सोख के रख लेती है अपने अंदर, बिल्कुल सोख के रख लेती है। आपने जो ज़िंदगी जी होती है, वो घुस जाती है। कोई भी पल कभी पूरे तरीक़े से बीत नहीं जाता, अतीत नहीं हो जाता। वो पल यहाँ (शरीर की ओर इंगित करते हुए) पर अपना कुछ छोड़कर चला जाता है। आपके शरीर की गंध तक बदल जाती है, सब बदल जाता है। आपने जो करा होता है, वो चीज़ कहाँ से कैसे निकालोगे? अब वो है, अब लेके चलो उसको। आ रही है बात समझ में?
और ये भी नहीं है कि वो बहुत लंबी अवधि पर है। आपने अपने चेहरे को एक ही दिन में शांत, भोला, मासूम देखा होगा और उसी दिन में एकदम भेड़िए जैसा भी देखा होगा, खिखिया रहे हैं, दाँत दिखा रहे हैं। देखा है? एक ही दिन के अंदर। अभी यहाँ सब बैठे हैं, सब कैसे लग रहे हैं, अरे-रे-रे, गाय हैं बिल्कुल! और अभी दूसरे लोग होंगे, उनसे पूछा जाए, कैसे हैं? ह्म्म्म्! इसीलिए नासमझियाँ करने से और बचना चाहिए, क्योंकि नासमझी कर लोगे उसके बाद चेतना तो उभर लेगी, पर शरीर में दाग रह जाता है। तो धीरे-धीरे जाता है फिर वो, झेलना पड़ेगा।
ये कुछ संतुष्ट कर पाया या कुछ और कहना है?
प्रश्नकर्ता: जी आचार्य जी, वही डाउट आता था बीच-बीच में कि जो अभी मैं कर रही हूँ, क्या वो सही कर पा रही हूँ। वही पुरानी मसल मेमोरी, वही यादें और वो एक पैटर्न जो रहा है उसकी वजह से। पर शायद और ज़्यादा बिज़ी करने से या और ये जो नया रास्ता है, उसमें और आगे बढ़ते-बढ़ते ये कम हो जाए।
आचार्य प्रशांत: ये तो सवाल ही पूछना पड़ेगा। ये पक्का है कि अतीत जो करवा रहा है अगर बिल्कुल वही कर रहे हो तो 99% संभावना है कि मामला गड़बड़ ही होगा। पर कितना सही कर रहे हो वो भी कुछ निश्चित नहीं है। जैसे आप फोर्सेस लेते हो न, वेक्टर्स। अब एक फोर्स आप पर लग ही रहा है। कौन-सा? अतीत का। वो आपको पीछे की तरफ़ खींच रहा है, पीछे की तरफ़ खींच रहा है। है न? जाना आपको किसी और दिशा में था। मान लीजिए आपको ऐसे जाना था, ऐसे इधर जाना था (आगे की ओर इंगित करते हुए), वो उधर को खींच रहा है (पीछे की ओर)। आप इधर को चल दिए (दाईं तरफ़)।
जाना इधर को था, अतीत पीछे को खींच रहा है, पीठ की तरफ़ उधर। आप इधर को चल दिए तो भी आपको यही लगेगा कि मैं अतीत का पालन तो नहीं कर रही। यही लगेगा न? पर हुआ वही है, इसका और इसका (आगे का और पीछे का)।
प्रश्नकर्ता: मिक्सचर।
आचार्य प्रशांत: एक रिज़ल्टेंट जैसा बन गया इधर को (दाईं ओर)। इसका और इसका एक रिज़ल्टेंट बन गया है, तो आप इधर को चल रहे हो। वो तो बस पूछ-पूछ के ही होगा कि मैं अतीत को कितना महत्त्व दे रही हूँ। वो तो रहेगा, हमेशा रहेगा। अब ख़ुद ही से पूछना पड़ेगा, कि जो अचेत सामग्री पड़ी हुई है जैविक भीतर, उसको हम अपने ऊपर कितना हावी होने दे रहे हैं। ये तो बार-बार पूछना ही पड़ेगा और वो कुछ-न-कुछ तो भीतर करतूत करती रहेगी, उससे पूरी तरह से मुक्त हो पाना तो टेढ़ी खीर है।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मुझे चार साल हो गए आपसे जुड़े हुए। तो शुरू में डेढ़-दो साल बाद जब स्वभाव में बहुत चेंज आने लगा धीरे-धीरे, तो परिवार वालों को, दोस्तों को चेंज नज़र आने लगा, बहुत ज़्यादा। लेकिन बीच-बीच में कभी कुछ भौतिक दुख आता था शरीर से रिलेटेड, तो अज्ञान फिर से घर कर जाता था। और बीच में या सेशन नहीं रेगुलर हो पाए या माया ज़्यादा हावी हो गई फिर से, तो वो चीज़ नेचर में फिर जैसे अभी इन्होंने कहा कि मसल मेमोरी है, वो फिर से दिखने लगती थी। तो एक तरह की कन्फ्यूज़न हो जाती थी बाहर के लोगों को।
मुझे समझ में आ रहा था कि क्या हो रहा है मेरे साथ। तो मैं उसको थोड़े टाइम बाद रिकवर कर भी लेती थी। लेकिन बाहर वालों को कन्फ्यूज़न हो जाती थी कि अभी तो ये इतनी ज्ञान की बातें कर रहे थे, कुछ कर रहे थे। लेकिन देखिए, ये फिर से वैसे ही इनका बिहेवियर हो गया है। तो कुछ मेरे दोस्तों ने फिर मुझे कहा कि देखो, बेसिक नेचर तो कभी नहीं बदलता। तो क्या ये जो बेसिक नेचर होता है और ये मसल मेमोरी, क्या ये वो सेम चीज़ ही है?
आचार्य प्रशांत: बाहर दो छवियाँ चलती हैं। एक तो ये कि बेसिक नेचर का मतलब होता है कि फलाना क्रोधी है, फलाने में दया ज़्यादा है, फलाने में डर ज़्यादा है, इसको वो कहते हैं कि ये सब बेसिक नेचर होता है। और दूसरी छवि वो बनाते हैं, कि जब आप किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में होते हो तो आपको फिर उस तरह का बर्ताव करना चाहिए।
प्रश्नकर्ता: एक नैतिकता के तौर पर बाँधने लग जाते हैं
आचार्य प्रशांत: हाँ, साध्वी हैं आप, क्या ये काला क्यों पहन के आई हैं, अच्छा नहीं लग रहा।
प्रश्नकर्ता: हाँ ऐसे कपड़े पहन लिए।
आचार्य प्रशांत: सफेद में चलिए और ऐसे चलिए जैसे आप ज़मीन पे नहीं, बादलों पर चल रही हों। तो ये उनके पास छवियाँ हैं और इन छवियों को खूब दृढ़ किया जाता है लोकधर्म में। और बहुत सारी संस्थाएँ हैं जो विशेषकर महिलाओं को तो ऐसा ही दिखाती हैं, कि अगर वो आध्यात्मिक हो गई है महिला, तो वो बादलों पर ही चलेंगी। बिल्कुल सफेद-सफेद और ऐसे (धीरे-धीरे चलने का अभिनय करते हुए)। मैं इस अखिल जगत की दृष्टा मात्र हूँ।
वो कुछ नहीं है — जंग है, युद्ध है। दो कदम आगे बढ़ोगे तो जिससे लड़ रहे हो, वो चीज़ हल्की नहीं है, वो पलटवार करती है, एक कदम पीछे भी हटना पड़ेगा। युद्ध में योद्धा से ये उम्मीद करना कि वो बादलों पर चलेगा और सब उसके कदम नपे-तुले होंगे, भयानक मूर्खता की बात है।
आध्यात्मिक प्रक्रिया जंग जैसी होती है, गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे।
ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे, हार रहे थे, हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।
कोई देखने जाओगे ऐसा मैच जिसमें एक ही खिलाड़ी शुरू से ही जीत रहा हो, स्कोर ही है — सिक्स-लव, सिक्स-लव, सिक्स-लव। देखोगे? देखोगे क्या? कुछ नहीं है इसमें, क्या रखा है।
तो आप सबको कह रहा हूँ, जिन चीज़ों को आप पीछे छोड़ आए हो, वो बीच-बीच में फिर सर उठाती दिखाई दें तो निराश, क्रोधित मत हो जाइएगा कि अरे, इतनी गीता कर ली, इसके बाद ये चीज़ फिर है, वापस है, बची हुई है। वो सब बड़ी माँ के फ़रमान होते हैं, वो रहते हैं। और अगर मैं बिल्कुल तथ्य कहूँ तो उम्र भर रहते हैं, आख़िरी पल तक रहते हैं। अधिक से अधिक ये होगा कि कम हो जाएँगे, उनके प्रकट होने की आवृत्ति। यही हो सकता है।
लेकिन आपके आसपास वाले जो होंगे, उनके पास दूसरी छवियाँ है। और उन छवियों का इस्तेमाल वो हथियार की तरह करेंगे। वो कहेंगे, “अच्छा, इतना गीता पढ़ती है, तो फिर चिड़चिड़ा क्यों रही है?” हुआ है?
प्रश्नकर्ता: बहुत होता है।
आचार्य प्रशांत: और भी है, पहले तो फिर भी सीधी-साधी थी।
प्रश्नकर्ता: एक्ज़ैक्ट्ली। ये तो सबसे ज़्यादा होता है।
आचार्य प्रशांत: हाँ भाई। पहले रोटी बेलते थे, अब दुश्मन पेलते हैं, तो फ़र्क़ तो दिखेगा ही तुम्हें हमारे व्यवहार में। पहले बेलन सिर्फ़ चलाते थे, अब चलाते हैं। तो फ़र्क़ तो दिखेगा ही व्यवहार में। ये फ़र्क़ है। अवनति नहीं है, अवरोह नहीं है, गति है। अपगति नहीं है।
बिल्कुल हो सकता है, कि पहले आपको क्रोध न आता हो, अब आप ज़्यादा क्रोधी हो गए हों पहले की अपेक्षा। तो परंपरागत अध्यात्म तो कहेगा कि ये बुरा हो गया। “शीतल-चित्त का व्यक्ति था और अब देखो कैसे ये उमड़ता-घुमड़ता है।” हाँ, क्योंकि दब्बू और कायर बनकर नहीं बैठना है। पहले घर की सुरक्षा में थे, एसी में बैठे थे, टीवी देख रहे थे, नेटफ़्लिक्स लगा हुआ था, तो ठीक है चुपचाप बैठे रहते थे। अब उतरे हैं न मैदान में, और मैदान में उतरे हैं, चोट खा रहे हैं, तो हाँ अब दर्द भी आता है और गुस्सा भी उठता है। दिक़्क़त बस ये है, कि तुम्हारे पास वो बादलों में चलने वाली छवि है। तुम्हारे पास वो पुरानी चरित्रगत, आचरणगत, व्यवहारगत सब बातें हैं। सिद्धांत हैं कि जो आध्यात्मिक हो जाता है, वो वैसे बात करता है जैसे सब, किरदार नहीं बात करते थे रामायण-महाभारत जो टीवी सीरियल आता था, कैसे?
“माते।” अरे क्यों ऐसे, मेरी भी माते बैठी हैं यहाँ। “भ्राताश्री, यदि आप आदेश दें, तो दुष्ट का मुंडा अभी काट के ले आऊँ।”
उनके पास यही छवि है, ऐसे ही कि ऐसे बात करो तो आध्यात्मिक हो। और यहाँ बहुत बार होता है, कि भाई बोलते थे, वो चाहते हैं कि भ्राताश्री बोलो। वो ब्रो बन जाता है। और मैं कह रहा हूँ, कोई समस्या नहीं। कहते हैं, ये तो गिर गया, पहले तो फिर भी भाई-भैया बोल देता था, अब ब्रो बोलता है। और देखो, बाबाजी के पास जो आता है वापस आकर के क्या बोलता है? भ्राताश्री।
फिर से समझना क्या है? युद्ध है। योद्धा साफ़-सुथरे कपड़ों में देखा कभी? मिट्टी तो मिट्टी, खून भी लगा होता है। वो निर्मल श्वेत साड़ी, नीले और लाल बॉर्डर वाली, ये वो नहीं चल रहा है। ये बात जब बोली गई है, हज़ारों सैनिकों के बीच बोली गई है और तभी इसकी उपयोगिता है। छोटी-मोटी नहीं, उस समय की सबसे बड़ी लड़ाई थी ये, विश्व युद्ध था ये, वास्तविक वर्ल्ड वॉर वन ये था। भारत भर के जितने छोटे-बड़े थे, सब इकट्ठे होकर के कोई इस तरफ़, कोई उस तरफ़ लग गए थे, राजा, सेनाएँ।
अरे भाई, सिर्फ़ यूरोप की अगर लड़ाई हो तो उसको आप विश्व युद्ध बोल सकते हो। तो सिर्फ़ पूरे भारत की लड़ाई हो तो क्यों नहीं बोल सकते? और उस समय का भारत उस समय के यूरोप से ज़्यादा आबादी रखता था। तो ये विश्व युद्ध क्यों नहीं है? विश्व युद्ध के बीच में गीता उतरी थी। और पगले लोग सोचते हैं कि आप कैसे बात करोगे? बोलिए।
प्रश्नकर्ता: भ्राताश्री, माते।
आचार्य प्रशांत: पतिदेव से आकर बोलेंगी आर्य, आर्य भी नहीं, हे आर्य।
अरे हम जल्दी में हैं, हमारे पास नहीं समय है इतने पानी पी-पी कर बोलने का, बहुत काम बाक़ी है। आपसे कह रहा हूँ, आप सब में वो वृत्ति बहुत बाक़ी है, बहुत-बहुत बाक़ी है। आप सब धार्मिकता का मतलब अभी भी लगाते हो इन सब बातों से, कि कैसे शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है, कैसे कपड़े पहने जा रहे हैं, कैसा आचरण करा जा रहा है। ये बहुत है। और उसका एक मैं आपको परिणाम बता देता हूँ, मैं आपके सामने खुलकर नहीं आ पाता क्योंकि मुझे आप पर…
प्रश्नकर्ता: भरोसा नहीं है।
आचार्य प्रशांत: एक आपको उदाहरण देता हूँ। आज आ रहा था। अब आपको ब्रेक देना है 1:30 बजे और 1:30 से ऊपर हो गया, अभी-अभी देखा। तो अब यहाँ घड़ी तो है नहीं। घड़ी नहीं है तो मैंने ये पहना (डिजिटल घड़ी)। ये आमतौर पर मैं अपने क़दम गिनने के लिए पहनता हूँ, मुझे बोला गया है कि दिन के 12–15,000 क़दम चलो। जब ये पहन रहा था तो सब जो अभी साथ में संस्था के, उन्होंने कहा, अब ये नया इल्ज़ाम लग जाएगा, कि देखो घड़ी पहननी शुरू कर दी। पहले तो कभी नहीं पहनते थे। ये हालत है क्योंकि आपके मन में भी वही छवि है।
आपको सही बता रहा हूँ, जन्माष्टमी है आज और आज मैं किसी पारंपरिक वेशभूषा में आ गया होता तो बहुत लोग गदगद हो जाते। बड़ा अच्छा लगता। अरे छोड़ो, जानता नहीं हूँ क्या? और जिस देश में हूँ, वैसा भेष बनाकर अभी आ जाऊँ बॉक्सर शॉर्ट्स पहन करके, तो “अरे रे, घोर कलियुग है, बाबा जी बिल्कुल ठीक बोलते थे, घोर कलियुग है।”
अब दिन भर भले मैं शॉर्ट्स में रहता हूँ, भले ही मैंने पूरी ये किताब (ट्रुथ विदआउट अपोलॉजी) लिख डाली वही पहन के कैफ़े में बैठकर के, और भले ही वो किताब बिल्कुल किसी ऊँचे ग्रंथ के तुल्य हो, लिख डाली, और वही पहनकर लिख डाली। पर वो पहनकर मैं ग्रंथ तो लिख सकता हूँ, पर आपसे बात नहीं कर सकता। वो कैसे ख़राब हो सकता है वेश अगर उसको पहनकर के मैंने ये लिख डाली तो। और यही कर रहा हूँ मैं। आप क्या सोच रहे हो मैं क्या करने आया हूँ? वहाँ से आया हूँ ताकि कुछ समय मिले, दिखाई न दें चीज़ें तो ये किताब ख़त्म कर पाऊँ, तो ख़त्म कर ली है। पर आपके सामने आ जाऊँ साधारण अपनी टी-शर्ट पहनकर के और शॉर्ट्स पहनकर के। तो अभी हो जाएगा, “ये देखो (मुँह बनाते हुए)।”
ये आपके सामने आ जाऊँ तो फिर भी कम होगा, देखो, ख़ुद ही सामने आ गए थे। वैसा मैं कहीं घूम रहा हूँ और कोई फ़ोटो खींच ले या कि मान लो हम ही ने खींची है, हमारे ही सोशल मीडिया पर है, वो वहाँ से कोई ले जाए, "आचार्य प्रशांत एक्सपोज़्ड।" क्या एक्सपोज़्ड है? टाँगे हैं। क्योंकि आपके मन में भी वो धारणा बनी हुई है न, इसीलिए दूसरे आपका हैंडल घुमा देते हैं।
प्रश्नकर्ता: एक्ज़ैक्टली।
आचार्य प्रशांत: आपकी ही हस्ती पर हुक है, वो उन हुकों में रस्सी फेंक के आपको फिर नचा लेते हैं। क्योंकि ये बात है आपके भीतर अच्छे से है, खूब है।
विशेष किस्म का लहजा, कपड़े। मैं कहूँ कि देखो, वैसे तो मैं व्यवहारिक और सांसारिक बनकर रहता हूँ, पर आज विशेष दिन है। तो आज मैं ये देखो, कंठी माला, तिलक, ये सब धारण करके आया हूँ। अरे देखो, साधु-साधु। हम तो जानते ही थे, आचार्य जी संत हैं, छुपे हुए संत थे। आज उनसे रहा नहीं गया तो उन्होंने अपनी सच्चाई ज़ाहिर कर दी। देखा, बढ़िया! कितने अच्छे लग रहे हैं।
इतना हम में, इतना ज़्यादा हम में ये वेशभूषा और इन बाक़ी बाहरी चीज़ों के लिए आग्रह है, अनुराग है। आपने देखा है? युद्ध में खड़े हुए हैं श्रीकृष्ण, हम उनको भी लंबी-लंबी मालाएँ वहाँ पहना देते हैं। युद्ध में योद्धा ऐसी फूलों की मालाएँ पहन के। तुम पागल हो गए हो। वहाँ सामने खड़े हुए हैं पहलवान दुर्योधन और वहाँ भीष्म खड़े हैं बाणों की धार लेकर के। ये फूल सूंघेंगे इधर?
पर बहुत आग्रह है कि धार्मिक हैं तो कमल-दल तो होना चाहिए ना। फूल नहीं, पुष्प होने चाहिए। गाड़ी नहीं, वाहन होना चाहिए। है न आग्रह? बोलो। है न?
श्रोता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: अरे छोड़ो। अरे मैं आचार्य जी हूँ, मैं खाना खा के हाथ थोड़ी धोता हूँ, मैं हस्त-प्रक्षालन करता हूँ। है न? आप लोग सब भक्तजन हैं, आपका काम हाय-हैलो बोला तो पाप लग जाएगा, नरक में सड़ोगे, आपको तो शतशत नमन बोलना है। और वो भी शतशत नमन बस बोलना नहीं है, दोनों हाथ आपको जोड़ने हैं और ऐसे झुकना है। तब तक झुकना है जब तक चर्र की आवाज़ न आए। और आए तो भी सीधे मत हो जाना, बिछ जाना पूरा। कोई आके ऊपर चादर डाल ही देगा, दुनिया बड़ी लाजवंती है। है न?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बस ये कि सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही था कि जन्माष्टमी वाले दिन गोवा जा रहे हो गीता सत्र के लिए।
आचार्य प्रशांत: अरे-रे-रे!
प्रश्नकर्ता: बिना बच्चे, बिना परिवार।
आचार्य प्रशांत: महापाप!
प्रश्नकर्ता: ये डाइजेस्ट ही नहीं हुआ, न घर वालों को, न कलीग्स वग़ैरह किसी को। “तो अच्छा, बच्चे तो जा रहे होंगे? हस्बैंड तो होगा?” नहीं, कोई नहीं जा रहा।
आचार्य प्रशांत: अरे जन्माष्टमी है, मथुरा जाओ, वृंदावन जाओ। गोवा! “कउन से बीच पे बोलेंगे तुम्हारे आचार्य जी? तो न खाने-पीने का भी इंतज़ाम रखते हैं। गोवा जा रही हो तो खाना तो पता नहीं, पीना तो होगा। देखो बिटिया, कुछ भी करना, चरित्र बचा के लौटना। ये तुम्हारे आचार्य हमें बिल्कुल पता नहीं है इसका, सकल से ही बदमाश लागे है। और कुछ भी कराना, देखो, चरित्र पे दाग़ लगा के ना आना। सो बाबा जी लोग वैसे ही परेशान हैं।”
आधे में रहोगे तो सब आधी-अधूरी बातें भी झेलनी पड़ेगी। आसमान को कोई नहीं नीचे खींच पाया।
हाँ, ऐसे डोर होती है, उसको लगता है मैं भी आसमान में हूँ। वो नीचे खींच जाती है क्योंकि वो बंधी होती है दो तरफ़ से, जमीन से ही। आप भी कहीं बंधे हो, इसीलिए नीचे खींचे जाते हो। दूसरे अपने आग्रह आप पर आरोपित नहीं कर रहे हैं, दूसरे आपके ही पूर्वाग्रहों को उजागर कर रहे हैं। वो आपसे जो बातें कह-कह कर आपको काबू में कर लेते हैं या नीचा दिखा देते हैं, वो बातें वास्तव में उनकी अपनी नहीं हैं। वो बातें वो हैं जिनमें आपका भी अभी विश्वास शेष है। भले ही आंशिक रूप से, पर है।
जब आप उन बातों के पार निकल जाओगे तो दूसरे भी वो बातें करना छोड़ देंगे, उन्हें दिख जाएगा कि आप पर असर नहीं होता। अभी आप पर असर होता है, इसलिए वो ऐसी बातें करते हैं। देखिए न आप बिल्कुल झुंझला गई हैं, आप तिलमिला गई हैं। आप जब तक तिलमिलाते रहोगे, वो आप पर तीर चलाते रहेंगे। आ रही है बात, समझ में?
कभी कोई कुछ कह करके, विशेषकर गीता सत्रों को कहकर लेकर के कुछ कहे और आपको नीचा दिखाए, तो उसकी गलती बाद में जानिएगा, पहले अपनी। आए दिन कम्युनिटी पर सबका ये रहता है कि मुझसे फलाने ने ऐसा कह दिया कि अब तो तुम्हें इतने दिन हो गए इन सत्रों में, तुम्हारे आचार्य ने यही सिखाया है।
अभी तो आप लोग मसल मेमोरी की बात कर रहे थे। मसल मेमोरी का क्या मतलब होता है? बीस साल से जो सोख रहे हो, वो मौजूद है। और आचार्य जी के पास हुए हैं तुम्हारे दो साल। तुम अपने बीस साल का हिसाब कब दोगे? और 30 साल और 40 साल, तुमने जो मेरे शरीर में बात बैठा दी, उसका हिसाब कब दोगे?
ये लगभग ऐसी सी बात है, कि कोई आपका कपड़ा खूब गंदा करे। खूब गंदा करे। एकदम इतना गंदा कर दे कि रंग रेशे-रेशे में घुस जाए, इतना गंदा कर दे। और फिर आपके कपड़े धोने की जब प्रक्रिया चल रही हो, तो व्यंग किया जाए कि अरे, ये देखो, ये सफ़ाई कर रहे हैं। और ये व्यंग कौन कर रहा है? जिसने गंदा करा है। पहले जवाब तुम दो कि तुमने इतना गंदा क्यों कराया कि जो साफ़ भी कर रहा है, वो दो साल से मेहनत कर रहा है, तब भी अभी गंदगी बाक़ी है। पहला जवाब तुम दो। पर वो चाहते हैं कि आपके भीतर बात बैठा दें कि जो साफ़ कर रहा है, उसी ने गंदा करा है, कि गंदगी का जिम्मेदार साफ़ करने वाला है। और आप इस बात में आ भी जाते हो पूरी तरह से नहीं, तो आंशिक तरह से आप आ भी जाते हो।
उथल-पुथल होगी, उठोगे भी, गिरोगे भी, मैदान मत छोड़ना।
ठीक है, सब होता है — महाभारत है। सोचो, चल रहा है गदा युद्ध, गिरते भी हैं बीच-बीच में वो गिर गया एक बार, तो कहे, अब मैं तो गिर गया, मैं इतना गिरा हुआ हूँ। और वहीं पड़ जाए। अगर गिर गए हो, तो स्प्रिंग की तरह उछलो। फिर खड़े हो जाओ, वहाँ पड़े रहे तो अभी सर फोड़ देगा तुम्हारा कोई। गिरने को हार मत मान लेना, कोई अपमान की बात नहीं हो गई गिर गए तो, फिर खड़े हो जाओ जल्दी से और जल्दी खड़े हो। उठते रहो, पिटते रहो।