अतीत शरीर में बैठा हुआ है; उसका मिटना बड़ा मुश्किल है। आपने जैसी ज़िंदगी जी होती है, वो आपकी देह में घुस जाती है। कोई भी पल कभी पूरे तरीक़े से बीत नहीं जाता, वो शरीर पर अपना निशान छोड़ जाता है। जिन चीज़ों को आप पीछे छोड़ आए हो, वो बीच-बीच में फिर सर उठाती दिखाई दें तो निराश मत हो जाना। आध्यात्मिक प्रक्रिया जंग जैसी होती है; उठोगे–गिरोगे, पर मैदान मत छोड़ना। ज़िंदगी ऐसी कर लो कि जो कुछ भी अतीत कह रहा है, उनके लिए समय ही कम से कम बचे।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आपको सुनते हुए क़रीब डेढ़ साल, उससे ऊपर हो गए हैं। आपको सुनने से पहले जो लाइफ़ स्टाइल थी, जो ज़िंदगी थी, बोल सकती हूँ, बहुत ही औसतन थी। सोच औसतन थी, जो आसपास का माहौल था, आसपास सब औसतन लोग-बाग, रिश्ते, दोस्त, सब कुछ और वो औसत ज़िंदगी के हम आदि हो चुके थे। अब आपको सुनना चालू किया तो समझ में आया, ज़िंदगी सिर्फ़ घिसटने के लिए तो नहीं है। आपकी अगर कोई उच्चतम संभावना है तो आप उस तक जाने के लिए हैं, उसके ऊपर मेहनत करने के लिए हैं, जो कि दिखना चालू हुई है और जो शुरू भी किया है।
पर जैसे इतना लंबा समय, 30 साल, उस औसत ज़िंदगी को जीते हुए आई हूँ, कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे शरीर की जो मसल मेमोरी है, उसमें वो कहीं-न-कहीं आ गई है और अभी भी जो ये नई ज़िंदगी है, उसमें कहीं-न-कहीं वो पुरानी आदतें, वो पुरानी मेमोरी, कभी-कभी बीच-बीच में आती हैं, जो बाधा भी डालती हैं। तो जब वो चीज़ें वापस कभी-कभी आती हैं इस नए सफ़र पर, उसे कैसे देखा जाए और उससे कैसे बचा जाए, जितना हो सके?
आचार्य प्रशांत: वो आएँगी और उनसे मैं बचने का तो नहीं कह सकता। उनका सामना करने का, उनसे डील करने का तरीक़ा यही है, कि अपने पास समय ही कम से कम छोड़ा जाए उन पुरानी वृत्तियों और पुरानी यादों के लिए, और कुछ नहीं कर सकते।




