जो कुछ भी मानसिक है, वही तो मायावी है। जो कुछ भी मन में आ सकता है, छवि, चित्र, कल्पना के तौर पर, सिद्धांत के तौर पर, वही तो माया है, और क्या है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। तो जैसे कि आज आपने समदर्शिता और समभाव पर बात की है। मैंने पहले भी गीता थोड़ी बहुत पढ़ी है, तो उस टाइम पर भी मैं समभाव करने की कोशिश करती थी, अभी भी करने की कोशिश करती हूँ, पर कुछ ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं, जैसे मृत्यु। कभी किसी की मृत्यु हो जाती है या फिर कुछ भी अच्छा हो जाता है हमारे साथ, तो हम समभाव नहीं कर पाते। हम उसी अच्छे खुशी के भाव में और दुख भाव में आ जाते हैं। चाहे हम कितना भी रोकने की कोशिश करें, तो मुझे अंदर से लगता है कि मैं इस गीता के श्लोक के साथ कभी भी न्याय नहीं कर पाई हूँ। अपने अंदर वो चीज़ नहीं ला पा रही हूँ, मेरे लिए वो चीज़ बहुत कठिन हो रही है।
तो इसके लिए मैं क्या कर सकती हूँ? क्योंकि हुआ है, हम कितना भी कोशिश कर लें, नहीं हो पाता।
आचार्य प्रशांत: मुझे तो ये दिख रहा है, मैं भी कितनी कोशिश कर लूँ लेकिन। नहीं हो पाएगा, होगा भी नहीं। AI171 (एयर इंडिया फ्लाइट 171), मैं उसको देख रहा था। आज सुबह मैंने एक संदेश भी लिखा। ड्रीम लाइनर है, अच्छे मजबूत इंजन हैं, ऐसे टेक ऑफ किया। नाम भी क्या है, ड्रीम लाइनर कहीं और ले जाना चाह रहा है। वेदांत की दृष्टि से देखें, तो उसमें से बड़े संकेत निकलेंगे। जमीन से आसमान की यात्रा बहुतों को साथ लेकर के, जिनको साथ लेकर के उनका सामान, उनका बोझा, बैगेज भी साथ लेकर के। गति नहीं मिली। ऐसा नहीं है कि किसी ने मिसाइल मार दी। ऐसा नहीं हैं कि गति शून्य हो गई थी। शून्य तो गति तब भी नहीं थी जब वो टकराया था।




