
प्रश्नकर्ता: फ़र्स्टली, थैंक यू सो मच फॉर डूइंग व्हाट यू आर डूइंग। आई मीन, इट इज़ एन्लाइटनिंग सो मेनी ऑफ अस, हू हैज़ बीन सर्चिंग फॉर द राइट आंसर्स रिलेटेड टू गीता।
जब आप बोलते हैं कि मान्यता नहीं होनी चाहिए, हम उसमें विश्वास रखते हैं। अगर मान्यता नहीं होगी और एकदम सेल्फलेस हो जाएँ, लेकिन फिर हम इस वर्ल्डली दुनिया में रहते हैं और फिर अपने आप को अर्थों से कैसे जोड़ेंगे? जैसे इस कॉलेज में एडमिशन लेना है या ये जीवन-यापन के लिए करना है। फिर तो सब चीज़ों से काफ़ी डिटैचमेंट ही हो जाता है। तो वो कहाँ, वो राइट बैलेंस होगा और उसके लिए कैसे अपने आप को एस्पायर करना है?
आचार्य प्रशांत: वो जो चीज़ है जो आपको डरा सी रही है कि डिटैचमेंट हो जाएगा, ये सब हो जाएगा। वो हुआ है?
प्रश्नकर्ता: हुआ है, सर।
आचार्य प्रशांत: तो जब हुआ तो डरावना लगा?
प्रश्नकर्ता: मतलब उसके बाद लगता है कि एक तो वही पेंडुलम की तरह घूमते रहते हैं न, डिटैचमेंट हो गई, किसी चीज़ का कोई अर्थ नहीं है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, पेंडुलम डिटैच्ड कहाँ है, वो तो सेंटर से अटैच्ड होता है।
प्रश्नकर्ता: हाँ, आप ये कह सकते हैं फिर वापस उस पर आ जाता है।
आचार्य प्रशांत: इसीलिए वापस आ जाता है।
प्रश्नकर्ता: अच्छा समझे।
आचार्य प्रशांत: एक सेंटर से आप दूर चले गए, इसका मतलब डिटैचमेंट नहीं है। इसका मतलब ये है कि सेंटर पर तो अभी भी टंगे हुए हो। उसी सेंटर पर टंगे-टंगे ऐसे गए, तो लौटोगे भी पक्का। तो आप जिसको डिटैचमेंट कह रहे हो वो डिटैचमेंट है नहीं और इसीलिए वो आपको भयानक लग रहा है। नहीं तो डिटैचमेंट तो बड़ी प्यारी चीज़ होती है और बहुत उससे अच्छे, बढ़िया, ऊँचे, प्यारे काम होते हैं। अपने लिए भी, दूसरों के लिए भी।
देखिए इन सवालों में न, सबको कह रहा हूँ, एक आपके सवाल को आधार बना के जनरल बात, जो भी अच्छी ऊँची बातें हैं ख़ासकर जो अध्यात्म में आपके सामने आती हैं, उनके साथ कभी “इफ, अगर” मत लगाया करिए। जब भी आप उनके साथ “इफ” लगाएँगे, “अगर” लगाएँगे, यदि लगाएँगे तो जान लीजिएगा ये अहंकार की चाल है, सच्चाई को पहले ही वीटो कर देने की, इंटरप्ट कर देने की। इससे पहले कि वो हो, “बट, इफ आइ वर टू बी सेल्फलेस, वोंट आइ रिसीव हर्ट?” दिस क्वेशन इज़ एन अटेम्प्ट बाई द ईगो टू इंटरप्ट एनी सेल्फलेसनेस दैट माइट बी अराइजिंग।*
इससे पहले कि सेल्फलेसनेस आए उसका पत्ता काट लो, उसका पत्ता काटने की साज़िश होते हैं ये सवाल। बात समझ में आ रही है? और ऐसे सवाल आएँगे। “नहीं, पर अगर हमको किसी ने कुछ दिया और हम ग्रैटिट्यूड रखेंगे तो हम एक्सप्लॉइट नहीं हो जाएँगे?” ये सवाल ही इसीलिए आया है ताकि ग्रैटिट्यूड रखने की रिस्पॉन्सिबिलिटी से बचा जा सके। ये सवाल बेवजह नहीं उठा है, ये सवाल चाल है, एक अंदरूनी साज़िश है। और कुतर्क है इसमें, क्योंकि आप जिसके साथ “इफ” लगा रहे हो, उसको आप जानते नहीं हो, तभी तो “इफ” लगाया है।
“अगर प्रेम हो गया तो मैं लुट नहीं जाऊँगी?” हुआ है? जिसको जानते नहीं, उसके बारे में तुक्का क्यों मारा? ये तुक्का है कि नहीं? ये तुक्केबाज़ी है कि नहीं? और अगर तुक्केबाज़ी है तो मैं पूछ रहा हूँ, तुक्केबाज़ी आप बताना, दूसरी दिशा में क्यों नहीं गई? तुक्केबाज़ी तो ये भी हो सकती थी, “आचार्य जी, अगर मुझे प्रेम हो गया तो सचमुच ज़िंदगी में बहार आ जाएगी?” पर ये सवाल तो नहीं कभी पूछते।
पहली बात, तुक्केबाज़ी है। और सारे तुक्के जाते एक ही दिशा में है। किस दिशा में? सच से विपरीत दिशा में, या ये कह दो, अहंकार के पोषण की दिशा में जाते हैं हमारे सारे तुक्के। आप अपने अज़ंप्शन्स को परखिएगा, आपका कोई भी अज़ंप्शन ऐसा नहीं होता जो आपको तोड़ दे। आपके सारे अज़ंप्शन्स वही होते हैं जो आपके अहंकार को पोषण देंगे।
उदाहरण के लिए: ये जो यहाँ पर खड़े हुए हैं नीचे, ठीक है? कल रात मेरी इनसे बहुत ज़ोर की लड़ाई हो गई। क्यों? क्योंकि मेरी कोई बिलीफ़ थी जो ये मान नहीं रहे थे, इनकी अपनी बिलीफ़ है, मैं नहीं मान रहा था, तो लड़ाई हो गई; ईगो वर्सेस ईगो हो गया। अब ये मेरी बात मानता नहीं है तो मेरी नज़र में आदमी कैसा है? बुरा है। अब इसको मैंने तो वहाँ दूर से देखा, सौ मीटर से, बहुत तेज़ी से मेरी ओर आ रहा है। तुरंत अज़ंप्शन क्या आएगा?
श्रोता: मारने आ रहा है।
आचार्य प्रशांत: मारने आ रहा है। अब ये असंप्शन क्या करेगा, मेरी बिलीफ़ को?
श्रोता: स्ट्रॉंग कर देगा।*
आचार्य प्रशांत: और स्ट्रॉंग कर देगा। आपका हर अज़ंप्शन आपको भीतरी तौर पर और ज़्यादा वो बना देता है जो आप पहले से ही हो। अज़ंप्शन्स ऐसे ही नहीं उठते, हर अज़ंप्शन के पीछे कम्फ़र्ट, कन्वीनिएन्स भीतरी, वही होता है। जब भी कोई बोले न, “नो, बट आई अज़्यूम्ड।” हँसने लग जाइए, ये अज़ंप्शन नहीं है ये साज़िश है। ऑल अज़ंप्शन्स आर कॉनस्पिरेसी।
छोटा बच्चा होता है। स्कूल नहीं गया, टीचर ने पूछा अगले दिन, “क्यों नहीं आए?”
“इट वज़ रेनिंग, सो आई अज़्यूम्ड देयर वुड बी नो क्लासेस।”
अज़ंप्शन इसी दिशा में क्यों गया? अज़ंप्शन तो ये भी हो सकता था कि “इट्स रेनिंग, सो माई टीचर विल ऑर्गनाइज़ एन एडिशनल फ़न एक्टिविटी फ़ॉर मी, ‘लेट्स डांस इन द रेन।’” इस दिशा में क्यों नहीं गया अज़ंप्शन? अज़ंप्शन तो ये भी हो सकता था। अज़ंप्शन तो खुला आकाश है, कुछ भी अज़्यूम करते, यही अज़्यूम क्यों किया? क्योंकि इस अज़ंप्शन में तुम्हें कन्वीनिएन्स है। अब इस अज़ंप्शन में घर पर बैठ के दिन भर कार्टून शो देखोगे।
वैसे ही हमारे सारे अज़ंप्शन्स होते हैं। कोई भी बिलीफ़ यूँ ही नहीं होती, रीज़नलैस नहीं होती। हर बिलीफ़, हर अज़ंप्शन के पीछे सिर्फ़ एक औचित्य होता है, एक उद्देश्य, एक पर्पज़, क्या? अहंकार की रक्षा और उसको सुदृढ़ करना।
श्रोता: सेल्फ-प्रिज़र्वेशन।
आचार्य प्रशांत: नॉट जस्ट सेल्फ-प्रिज़र्वेशन; सेल्फ-फोर्टिफिकेशन। तो आपके भीतर ही हमेशा तर्क उठेगा, नहीं, ये जो बात बोल रहे हैं; ये आज नहीं, मैं आज से पंद्रह साल पहले कॉलेज में हूँ, “यदि आपकी बात मानकर सब बुद्ध हो गए तो दुनिया कैसे चलेगी?”
न तुम बुद्ध हो, न तुम एक भी बुद्ध को जानते पर तुमने तुक्का मारा है ब्रह्मांड के छोर तक का। कह रहे हो, “सब बुद्ध हो गए।” तुम अभी किसी चौथाई बुद्ध से भी नहीं मिले। ठीक? अंगुलिमाल भी नहीं हो पाए तुम ठीक से, लेकिन तुक्का तुमने देखो एकदम गगनभेदी मारा है। कह रहे हो, “अगर दुनिया में सब बुद्ध हो गए तो दुनिया कैसे चलेगी?” ये क्या सवाल है? और ये सवाल नहीं है भूलना नहीं, ये साज़िश है। ये सवाल नहीं है, ये साज़िश है। सवालों के उत्तर हो सकते हैं, जिज्ञासाओं के समाधान हो सकते हैं। साज़िशों का क्या करें? वहाँ तो नीयत ही ख़राब है, ये बदनीयती से पूछे गए सवाल होते हैं। आपको नहीं कह रहा *(प्रश्नकर्ता)।*और ये हमारे भीतर उठते हैं। ज़रूरी नहीं आप मुझसे ही पूछें, ये हमारे भीतर उठते हैं, “नहीं, उनकी बात ठीक है, पर अगर ये बात मान ली तो…?”
अरे तुम्हें कैसे पता तो? जो अभी चल रहा है उसका तो तुम्हें पता नहीं है तो, पर बिल्कुल भविष्यद्रष्टा हो गए तुम तो। “अगर इनकी बात मान ली तो ऐसा-ऐसा हो जाएगा तो।” क्या?
एक ने पूछा, “अगर ऐसे तो सब एक-दूसरे से प्यार करने लग गए तो इन्श्योरेंस कौन ख़रीदेगा? फिर पूरी इंडस्ट्री का क्या होगा? आप अनएम्प्लॉइमेंट बढ़ाने वाला काम कर रहे हैं।” कितनी दूर तुमने छलाँग मारी है, अपने पाँव के नीचे की ज़मीन का तुमको पता नहीं और कितनी दूर तुमने छलाँग मारी है!
“आचार्य जी, आपकी बात सुन ली लोगों ने।”
हाँ तो?
“तो बच्चे नहीं होंगे।”
हाँ तो?
“तो उपनिषद् कौन पढ़ेगा? आचार्य जी, आप अपनी बात बदल लीजिए।”
क्यों?
“देखिए, आप ही बोलते हैं न संख्याबल ज़रूरी है। ये सब जवान लड़के-लड़कियाँ हैं, ये बच्चे नहीं करेंगे तो संख्याबल कैसे बढ़ेगा? आपका मिशन ही नहीं आगे बढ़ेगा, अपने मिशन को आगे बढ़ाना है तो अपनी बात बदल लीजिए और सबसे बोलिए कि ‘छह-छह और कल-परसों तक ही। और प्रूफ़ लाकर दिखाया करो, सेशन में लाया करो।’”
ये सवाल है? ये क्या है? ये कुछ नहीं, ऐसी ही हवस।
अब इसका मैं थोड़ा अकैडेमिक जवाब भी दे देता हूँ, बहुत बार दिया है, अभी हाल में ही दो-तीन बार दिया है, फिर दिए देता हूँ। ये (दिमाग) और ये (एक कोई बाहरी इकाई) साथ चलते हैं न, ये (दिमाग) और ये (बाहर की एक इकाई)। अभी ये (दिमाग) गड़बड़ है तो ये (बाहर की एक इकाई) भी गड़बड़ है, ठीक। बाहर कुछ नया आएगा तो इसको भी नया होना पड़ेगा। ये ए (दिमाग) और बी (बाहर की इकाई) साथ चल रहे हैं। ए और बी साथ चल रहे हैं। ठीक है न?
और बी होता ही हमेशा उस तरह का है कि ए को सपोर्ट दे, सुरक्षा दे, रिइन्फोर्स करे। यही होता है न? जैसे आप भीतर होते हो, वैसे ही आप अपनी बाहरी दुनिया कर लेते हो, और बाहरी दुनिया आपको प्रमाण दे देती है कि भीतर आपने जो भी सोच रखा है, वो बिल्कुल दुरुस्त है। यही होता है न?
ए, बी: और ये जो ए है, ये कह रहा है, अगर बी’ आ गया तो बड़ी प्रॉब्लम हो जाएगी। ये ए है, इस ए के कॉरेस्पॉन्डिंग, इस ए का ही जो डुअलिस्टिक पार्टनर है, बी है। या इसकी ही जो इमेज है, इसका ही जो रिफ्लेक्शन है, वो बी है। इसका जो जोड़ीदार है, दोस्त है, यार है, वो बी है।
अब ये सवाल कह रहा है ए, कि अगर बी’ आ गया तो बड़ी प्रॉब्लम हो जाएगी। आचार्य जी आप कह रहे हो ऐसे करो। पहली बात तो मैं कुछ करने के लिए बोलता नहीं, ठीक है न? कर्म के तल पर तो नहीं कहता कुछ, पर चलो माना। आप कह रहे हो बी’ लाओ। बी' आया तो बड़ी प्रॉब्लम हो जाएगी। तो आपको तुरंत क्या देखना होगा, प्रॉब्लम किसको हो जाएगी?
श्रोता: ए को।
आचार्य प्रशांत: बाबा, बी’ अगर हुआ तो भीतर भी तो फिर क्या होगा, ए’ होगा। ये डरने वाला कौन है? ए है। ये ए बचेगा ही नहीं। और जो ए’ आएगा, वो बी’ के साथ कंफर्टेबल होगा, तभी तो आएगा।
ए का कंफर्ट किसके साथ है? बी के साथ। ए’ का किसके साथ होगा? बी’। पर बी’ से ए?
बी’ की बात करोगे, इमेजिन करोगे, तुक्का मारोगे, कल्पना करोगे, तो ये जो बी’ है, इससे ए क्या करता है? डरता है, अनकंफर्टेबल हो जाता है, और बार-बार यही कहेगा, “पर अगर मैंने ऐसा कर लिया तो फिर तो मेरे साथ कुछ गलत हो जाएगा न।”
ये ए है जो बी’ के ख़िलाफ़ बात कर रहा है। पर भाई साहब, जब बी’ आएगा तो ए भी तो नहीं बचेगा। वो भी तो ए’ हो जाएगा, और उस ए’ को डर नहीं लगता।
ये ऐसी-सी बात है कि आप अभी सेकंड क्लास में हो, और आप चिल्ला करके अपनी मम्मी से कह रहे हो कि “वादा करो कि ये जो बड़ी-बड़ी, मोटी-मोटी किताबें हैं टेंथ की, ये मुझे कभी नहीं दोगे।”
“क्यों?”
“मेरे पास एक प्रूफ़ है।”
“क्या?”
“मैंने इन किताबों को अभी पढ़ने की कोशिश की तो मुझे समझ में?”
श्रोता: “नहीं आया।”
आचार्य प्रशांत: बाबा, क्योंकि तुम जो हो, उसे टेंथ की नहीं समझ में आएगी। टेंथ क्या है? बी’। तुम ये नहीं समझ रहे हो, कि जब टेंथ की किताबें आएँगी, तब तुम भी तो इस लायक हो जाओगे कि उन किताबों को समझ सको। यहाँ पर है ये सेकंड का बच्चा, सेकंड की किताब पर ये यहीं रहे-रहे इसी तल पर, ये टेंथ की किताब को लेकर के आपत्ति करता है। “आचार्य जी, *इफ दिस कम्स टू माई लाइफ़, देन आई विल बी डिवास्टेटेड।”
*सर, व्हेन दिस विल कम टू योर लाइफ़, यू टू वुड बी हियर (साथ के लेवल पर)। और डिवास्टेशन नहीं होगा फिर, जॉय होता है।
आप भविष्य को लेकर के बहुत डरे हुए हो। हमारी पूरी कम्युनिटी डरी रहती है। “बातें तो इनकी ठीक हैं, पर अगर मान लिया तो तबाही पक्की है, बोल रहा हूँ मैं।” ये सेकंड का बच्चा है जो कह रहा है कि किताबें तो टेंथ की बहुत सही हैं, पर अगर पढ़ने बैठ गए तो तबाही पक्की है।
बेटा, जब वो किताब आएगी तुम्हारी ज़िंदगी में, तो तुम्हें भी उठा देगी। क्योंकि ये दोनों हमेशा कैसे चलते हैं? (साथ)। तुम उस किताब को आने तो दो ज़िंदगी में, तुम भी वो नहीं रहोगे जो आज डर रहा है। तुम वो हो जाओगे जो नहीं डरता। तुम मान के बैठे हो कि सेल्फ एक चीज़ है, सेल्फ एक चीज़ नहीं है। ये जो सेल्फ है, ये दुनिया से जुड़ी हुई चीज़ है। तो इसीलिए सेल्फ लगातार बदल रहा है, बदल जाएगा। पर अहंकार अपने आप को क्या मानता है? आत्मा। और आत्मा क्या होती है? नित्य। नित्य माने, बदलती नहीं।
तो अहंकार ये मानता है कि जैसा मैं सेकंड क्लास में हूँ, वैसा ही मैं टेंथ में रहूँगा। क्योंकि अपने आप को आत्मा मान रखा है न उसने, और आत्मा तो नहीं बदलेगी, तो कहता है, “मैं भी नहीं बदलूँगा, इसका मतलब।”
श्रोता: यहाँ पर एक सजीव उदाहरण है आपका। सर, आपकी एक बात सुनी थी न कि आपके पापा खूब सारी फ़ाइल लेके आए थे। और आप पाँच साल के थे। तो ये सजीव उदाहरण है कि आप उस समय बहुत रोए थे और। वो याद आ गया।
आचार्य प्रशांत: बिल्कुल। मेरी जान सूख गई थी, इतनी सारी फ़ाइलें मुझे भी करनी पड़ेंगी।”
श्रोता: और आज आप।
आचार्य प्रशांत: मैं इधर-उधर जा के छुप रहा हूँ, मम्मी से बोल रहा हूँ, पूछ रहीं, “रो क्यों रहे हो?” शाम को घर आए पापा तो इतना सारा काम घर लेके आए थे, इतनी फ़ाइलें। मैंने देख लिया। “ये तो मेरे ऊपर आने वाला है सब।” पाँच साल का था, लगा रोने, वो भी छुप के। पकड़ा गया, “क्यों?” बोले, ये सब मुझे भी तो करना पड़ेगा।
ये सबकी हालत है, पूरी कम्युनिटी की। कईयों को तो बड़ी समस्या ये है कि ये जो रास्ता दिखा रहे हैं इनका, तो इस रास्ते पर चल के इन्हीं जैसा हो जाएँगे शायद हम। और इनकी जो तबाही है ज़िंदगी की, वो हमें चाहिए नहीं। “हम कुछ भी बर्दाश्त कर सकते हैं, इस आदमी जैसी बर्बाद ज़िंदगी थोड़ी बर्दाश्त करेंगे।” क्या है इसके पास, है क्या? रात को 3 बजे बैठ के कलम घिस रहा होता है। ये भी नहीं समझते कि अगर मुझे बर्बाद कह रहे हो, तो अपने बारे में क्या कह रहे हो। कहते, “देखो, अपनी सारी मेहनत बर्बाद करता रहता है दिन भर।” ये वक्तव्य मेरे बारे में है, या आपके बारे में है?
मेरे जैसे नहीं हो जाओगे, डरो मत। अपने जैसे हो जाओगे। कोई किसी जैसा नहीं हो जाता। डर बहुत है आप लोगों में। आपने भी जब सवाल पूछा था, उसमें आपने एक शब्द का इस्तेमाल किया था, बैलेंस कैसे रखें? किया था न? बैलेंस।
बैलेंस से आपका ही मतलब था कि “आचार्य जी, अपने आप बता दो, आपका कितना परसेंट लेना है, 0.1%? 0.2%? बैलेंस ज़िंदगी होनी चाहिए न। बैलेंस का मतलब ही है, 99.8% तो फूफी की सुननी है। आप अपना बता दो आचार्य जी, 0.1% आपका लेना है, 0.2% लेना है? बैलेंस बताओ, बैलेंस! ग़ज़ब का बैलेंस! “सब्जी तो हम खानदानी ही बनाएँगे, थोड़ा उसमें मेथी-धनिया-पुदीना आचार्य जी के हिसाब से डाल देंगे ऊपर से।”