
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं पूछना चाहती हूँ कि आज आपने सत्र में शुरुआत में दायरे की बात की थी। तो उस दायरे से जहाँ तक मैंने समझा है कि आपने नीम लड्डू किताब में भी ये बोला कि हम ही अधिकार देते हैं लोगों को कि कितनी सीमा तक अधिकार देना है, कितनी सीमा तक नहीं देना है। नीम लड्डू किताब में भी आपने ये मेंशन किया है।
लेकिन कई बार क्या होता है, कि लोग प्रेम और लगाव का नाम लेकर अपना ही स्वार्थ सिद्ध करते हैं। हम उनके लिए उनकी अपेक्षाएँ पूरी करने की कोशिश करते हैं, बहुत हद तक कर भी पाते हैं। जहाँ नहीं कर पाते, वहाँ वो कहते हैं कि हमारी बातें पूरी नहीं हो रही हैं, तुम नहीं कर पा रहे हो, हम उनके प्यार के लायक नहीं हैं, ज़रा भी हम आवाज़ उठाते हैं तो। ऐसी स्थिति में हम क्या करें? हम तेज़ आवाज़ उठाते हैं तो हम ग़लत साबित हो जाते हैं।
ऐसी सिचुएशन में हम गीता को अपने जीवन में कैसे उतारें? ख़ुद को शांत रखना सही है या बोलना सही है? नहीं समझ आ रहा।
आचार्य प्रशांत: देखिए, गीता को जीवन में उतारने का मतलब होता है पहले कचरे को सिर से उतारना। “नेति-नेति” ही तो विधि है, और तो कुछ है ही नहीं। मामला बड़ा सरल है। वहाँ पर पचास विधियाँ तो वेदान्त बताता ही नहीं। वेदान्त का काम है हर चीज़ को सरल करके एक कर देना। वो इतना सरल है कि लोगों से उसकी सरलता बर्दाश्त नहीं होती। लोग कहते हैं कि मामला थोड़ा जटिल करो, थोड़ा फैलाओ रायता, कुछ तो लगे कि कुछ ख़ास हो रहा है। यहाँ कुछ है ही नहीं, यहाँ तो बस।
ये सब रखिए आप अपने जीवन में जो आपने कहा, प्यार रखिए, उम्मीदें रखिए, उम्मीदें पूरी करने का जज़्बा रखिए, सब रखिए। पर उसको उच्चतम से जोड़ दीजिए बस। सब रखो, कुछ नहीं हटाना है। ममत्व भी रख सकते हो, अगर बच्चों की बात आप कर रही हैं तो, ममत्व भी रख सकते हो। सब रख सकते हो, उसको वहाँ से जोड़ दीजिए — आसमान से। आसमान ऐसी चीज़ है कि उससे जो जुड़ गया, वही उड़ने लग जाता है। बात समझ रही हैं, क्या बोलना चाह रहा हूँ?
वो रिश्ते हैं, “हमारी उम्मीदें पूरी करो।” उम्मीदें नहीं पूरी कर रहे तो आप कह रही हैं, कि “तुम हमारे प्यार के लायक नहीं हो।” पहली उम्मीद याद रखनी है न। पहली उम्मीद क्या है? मैं अपने जीवन को सार्थक कर पाऊँगी। तुम्हारी उम्मीद बेशक पूरी करूँगी, बशर्ते तुम्हारी जो उम्मीद है मुझसे, वो मेरे जीवन की सार्थकता से मेल भी तो खाती हो। मैं आपसे यहाँ बात कर रहा हूँ, ठीक है न? तो यहाँ है श्रीमद्भगवद्गीता। अब वो वहाँ बैठा है एक चुन्नू चूहा उधर। अब वो कह रहा है, कि “मेरी उम्मीद ये है कि तुम मेरे साथ खेलो।” तो ये उम्मीद मैं थोड़ी पूरी करूँगा, बल्कि तुम्हारे लिए भी ये अच्छा है कि मैं जो कर रहा हूँ, तुम उसमें मेरे साथ शामिल हो जाओ।
प्रश्नकर्ता: मैंने, आचार्य जी, ये बोल कर देखा है कि ये सब चीज़ें करो। ये सब चीज़ें अच्छी हैं लाइफ़ में, उन्हीं चीज़ों में मत फंस जाओ जो कर रहे हो, जीवन बर्बाद हो रहा है। तो कहते हैं, “चक्रव्यूह है ये जिसमें तुम फंस रही हो, इन सब से बाहर निकलो। घूमती रह जाओगी यहीं पर ही।”
आचार्य प्रशांत: तो आप कुछ मत कहिए। जो मेरी बात नहीं सुनना चाहते, मैं उन पर प्रयास करता हूँ बहुत पर ज़बरदस्ती थोड़ी ही कर पाता हूँ और न ही करना चाहता हूँ।
और अगर बार-बार मुझे लगता है कि मुझे फिर भी किसी को खींच-खींच कर ही लाना है, तो मेरा कर्तव्य ये है कि मैं पूछूँ, उसकी ख़ातिर या अपनी ख़ातिर। दूसरे पर आप प्रयास करते हो, एक प्रयास तो होता है निस्वार्थ, निष्काम, उसकी ख़ातिर। और आप पाओ कि दूसरे के ऊपर जो मेहनत कर रहे हो वही आपका बंधन बन रहा है। तो ये पूछना पड़ेगा, कि “मैं ये दूसरे की मदद के लिए उसको यहाँ ला रहा हूँ या दूसरे से मेरा कुछ स्वार्थ जुड़ा हुआ है?” अपना स्वार्थ लेकर आप दूसरे की मदद करोगे तो दूसरा भी दुनियादारी में पारंगत है। वो भी सूंघ लेता है, कि मेरी मदद नहीं करने आ रहे, या मदद करने आ भी रहे हो तो उसमें तुम्हारा भी कुछ है।
ये बड़ी ग़ज़ब बात है। पर वास्तव में आप किसी की मदद तभी कर सकते हो जब उसकी मदद करके आपको कुछ न हासिल होता हो। पति को अगर ये लगता है या पत्नी को, कि आप उनको गीता के पास ला रहे हैं ताकि उनके व्यवहार में आपकी कामना अनुसार कोई बदलाव आ जाए, तो वो कभी नहीं आएँगे। वो कहेंगे, “हमें फँसाया जा रहा है। ये बोला करती थी कि मुझे ऐसे काम करने हैं, वैसे काम करने हैं कई। मैं अनुमति तो देता नहीं था, मुझे ठीक नहीं लगता कि तू ये सब करेगी, जो भी बात है। तो अब ये गीता की आड़ लेकर के मुझसे अपनी इच्छाएँ पूरी करवाएगी। मुझे ये गीता में ला रही है ताकि मैं अपना व्यवहार इसके हिसाब से बदल दूँ।” तो वो नहीं आएगा। वो कहेगा, “बुद्धू बनाया।”
तो किसी पर बहुत प्रयास करना भी कई बार विपरीत परिणाम ला सकता है, काउंटर प्रोडक्टिव हो सकता है। दुनिया ऐसी है, किसी के पीछे बहुत जाओगे तो जान जाती है कि तुम्हारा स्वार्थ है वहाँ पर, और स्वार्थ अक्सर होता भी है। और जब स्वार्थ नहीं होता, तो आप फिर किसी के पीछे उतना ही जाते हो जितना सही है, ज़रूरी है। उसके बाद भी वो नहीं सुन रहा तो छोड़ देते हो। क्या करना है भाई? ज़बरदस्ती का खेल थोड़ी है। बाँध-बाँध कर हाथ-पाँव और बोरे में डाल कर थोड़े ही तुम्हें मुक्ति दिलाएँगे। ऐसे करें कि अपहरण करके इनको मुक्ति दिलाई जाए चलो।
और ये दुनिया है। इसमें जब आप किसी के लिए बहुत ज़्यादा प्रयास करो, तो संभावना यही है कि वहाँ आपका स्वार्थ है, और वो स्वार्थ दूसरा व्यक्ति सूंघ लेता है। वो फिर नहीं सुनेगा। अपने स्वार्थ हटा दीजिए, और वो फिर अपने आप आपके पीछे आएँगे। आना होगा तो आएँगे, नहीं तो फिर दुनिया है, हर तरह के, हर दिशा के लोग हैं।
हाँ, मैं जानता हूँ, एक टीस, कसक-सी रह जाती है कि मुझे कुछ अच्छा मिला है, वो मैं अपने ही प्रिय लोगों तक क्यों नहीं पहुँचा पा रही। तो वो जो रह जाती है, वही आपको याद दिलाएगी कि माया ही जीती हुई है। देखो, ये माया कैसी है कि मुझे यदि श्रीकृष्ण भी मिले तो उनको मैं अपने ही पति तक नहीं पहुँचा पा रही।
वही जो हार है, उसी की जो कसक है, फिर वो आपको लगातार युद्धरत रखेगी। माया ये बड़ी से बड़ी चोट देती है।
हम लोग तो हम ही हैं। बड़े से बड़े ज्ञानी भी अक्सर पाते हैं कि दुनिया को समझा लिया, घर वालों को नहीं बता पाते। और यही जो चोट है, ये उनको लगातार याद दिलाती रहती है कि अभी जंग जारी है। और ऐसा उसने तमाचा मारा है, कि तिलमिलाहट बनी रहती है। तो तिलमिलाहट अच्छी है एक तरह से।
तो पहली बात कह रहा हूँ, किसी के पास पास भी जाइए उसे गीता में लाने हेतु, तो अपना कोई स्वार्थ रखकर मत जाइए। कि जा रहे हैं और किराने की दुकान वाले को एनरोल करा दिया, कि अब इससे उधारी लंबी खींचेगी। वहाँ पर एनरोल करा दिया, उसके बाद वो कह रहा है, “अच्छा, अभी अब पंद्रह दिन का आपका बकाया है,” तो कह रहे हैं, “आया है सो जाएगा, राजा, रंक, फकीर। गीता पढ़ रहा है, उसके बाद भी तू हिसाब-किताब रखता है।”
देख लीजिए कि जिसको लाना चाह रहे हो यहाँ, उससे कोई स्वार्थ तो नहीं है न? क्योंकि दुनिया वैसे तो मूर्ख है, पर कुछ चीज़ों में बड़ी प्रवीण होती है। दुनिया माने जो दुनियादारी के विशेषज्ञ हैं सब, हमने कहा, वो सूंघ लेते हैं। तो आप उनके पास जा रहे हो, आपकी आँखों में देख लेते हैं कि स्वार्थ है। क्योंकि उन्होंने ज़िंदगी भर खेल ही यही खेला है, स्वार्थ का। वो बिल्कुल ताड़ लेते हैं।
एक साधारण-सा भी जो विक्रेता होता है, माने जो दुकान पर ही नहीं बैठता, ये जो गली-मोहल्लों में कई बार बेचने के लिए आ जाते हैं या कि ठेले वाले भाई लोग या रिक्शे वाले, ये तक मनोविज्ञान में पारंगत होते हैं। ये भी जानते हैं कि, या कि जो छोटे-मोटे बाज़ार होते हैं जहाँ पर आप जाते हैं तो किसी चीज़ की कीमत पूछते हैं और ₹2500 से शुरू होती है और ₹250 तक आ जाती है। ऐसा थोड़ी है कि वो ₹2500 यूँ ही बोल देते हैं। ढाई हज़ार में कई लोगों को वो माल बेच भी लेते हैं।
ये दुनिया है। ये लालच, स्वार्थ, बेईमानी, अनाड़ीपन, इनको पढ़ना खूब जानती है। आप ये सब चीज़ें लेकर किसी के पास जाओगे तो भले ही उसको गीता दिखाओ, वो हंसेगा, कहेगा, “गीता दिखा कर कुछ और हासिल करने आई है तू।” तो ये पहली बात कही। और दूसरी क्या कही? ज़रूरी नहीं है कि सबको आना ही हो। हार मिलेगी। हार मिलेगी, क्या करें? उसका दंश रहेगा, जैसे शूल एक छाती में घुसा हुआ हो। क्या करेंगे? कि जिनके साथ एक ही घर में रह रहे हैं, खा रहे हैं, पी रहे हैं वो। उनको उस चीज़ की ख़बर ही नहीं जो हमारा दिल बन चुकी है, जिसके आगे हम बिक गए अब, जो धड़कन हो गया हमारी, उसकी ख़बर हम उस तक पहुँचा ही नहीं पा रहे। जिससे सबसे क़रीबी सांसारिक रिश्ता है।
ये बड़ी वेदना की बात होती है, ये जो बगल में ही बैठा हुआ है, उसको अपने दिल का हाल नहीं बता सकते। उस वेदना के साथ जिएँ। हार है, इस हार को याद रखें। क्या होगा याद रखने से? कम से कम दूसरों को बचा पाएँगे।
प्रयास निसंदेह करें, और मैं कह रहा हूँ पहली बात, निस्वार्थ प्रयास करें। निस्वार्थ होता है प्रयास तो सफलता की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन कितनी भी बढ़ जाए सफलता की संभावना, ज़्यादातर मामलों में सफलता नहीं मिलेगी। जब न मिले, तो अंधाधुंध प्रयास मत करते रहिए।
अंधाधुंध प्रयास का अर्थ जानती हैं क्या होगा? थोड़ा समझिएगा। मेरे पति हैं, या मेरा बच्चा है, या मेरे पिता हैं, या कोई मेरी बहन है, दोस्त है, कोई है, इनको तो मैं गीता तक लाकर ही मानूँगी। बताइए, इसके पीछे आपकी मान्यता क्या है?
श्रोता: ये मेरे अपने हैं।
आचार्य प्रशांत: ये तो है कि मेरे अपने हैं। ये है। मान्यता क्या है?
श्रोता: ये मेरे क़ाबिलियत है कि मैं ला सकता हूँ उनको।
आचार्य प्रशांत: मैं इतनी बड़ी मूर्ख नहीं थी कि मैंने बिल्कुल ही कचरा भर लिया हो चारों ओर। और जबकि ये सत्य ये है कि रिश्ते तो हमने (हाथ जोड़कर सिर झुकाने का अभिनय करते हुए) और वे मानना ही नहीं चाहते। मानना ही नहीं चाहते, कि कार की जगह साइकिल ले आए हैं घर में। और अब जान लगाकर कोशिश कर रहे हैं कि इसको भी बीएस5 बना दें। साइकिल में एसी फिट करने की कोशिश चल रही है, लाद भी दिया है पीछे कैरियर पर। ये प्रयास बंद करो। चुपचाप सिर झुका के, विनम्रता से माँग लो न कि ज़िंदगी में कार समझ के साइकिल ले आए हो।
वो तब तो बोले थे, “हाय, क्या बड़े-बड़े पहिए हैं इसके। दो-दो कार के इतने थोड़ी होते हैं बड़े।” अब उस पर बेतहाशा प्रयास करने से क्या होगा? कुछ होगा क्या? कुछ होगा?
तो प्रयास पूरा करो, पर एक बिंदु पर आकर ये समझ जाओ कि इस जीव को कितना भी घिसो, ये इंसान नहीं बनने वाला। ये प्रजाति ही दूसरी है। और ये सब जो चुन्नू-मुन्नू हैं, हाइब्रिड हैं, ये पता नहीं क्या। ये मैं आपको किसी को ताना कसने की सामग्री नहीं दे रहा हूँ कि जाकर के बोलना शुरू कर दो कि तू तो ओरंगुटान है।
मैं पहली बात बोल रहा हूँ पूरा प्रयास करो, और अपने माही टटोल, झाँक करके देखो कि कहीं स्वार्थवश तो नहीं किसी से कह रहे कि आओ गीता में, आओ गीता में। पहले अपना साफ़ करो मामला। स्वार्थ को लेकर के किसी को गीता में भी लाओगे तो ये पराजय ही है। ठीक है?
बहुत अव्यवहारिक बात लगी, कुछ कर नहीं सकते इसका। मैं क्या करूँ और? आप जिस अर्थ में व्यवहारिक बात चाहते हो, मैं वो कहाँ से लाऊँ? आप चाहते हो मैं कोई आपको मंत्र दे दूँ, सूत्र दे दूँ, कुछ गंडा तावीज़ कूरियर कर दूँ। जब पति सो रहे हों, उस वक़्त धीरे से जाकर के उनके पाँव के पास हल्दी, हींग, धनिया, मेथी, पुदीना और अपने कुछ बाल काट करके उसमें ये सब बाँध करके पति-परमेश्वर के चरणों के नीचे रख देना। जब वे सो रहे हों, और सुबह उठते ही वे बोलेंगे, “यदा यदा हि धर्मस्य,” आ गए गीता में।
मैं ये कैसे आपको नुस्खा बताऊँ? मेरे पास नहीं है। जो है, वो बताया। वही करिए, दर्द के साथ ही जीना होता है। और ये बड़े से बड़ा दर्द है कि उच्चतम आपको मिल रहा है और आप उसको बाँट नहीं सकतीं। उसके साथ जीना पड़ता है कई बार।
मेरी शक्ल देखिए न। मैं आपको दे पा रहा हूँ क्या जो मेरे पास है? मैं भी तो दिन-रात इसी दर्द में जी रहा हूँ। आपके पास तो बस घर है। मेरे पास तो संस्था है इतनी बड़ी और इतना फैला दिया, और दे मैं उनको कुछ नहीं पा रहा। मेरा दर्द समझिए। वाटर वाटर एवरीवेयर, बट नॉट अ ड्रॉप टू ड्रिंक। इतने लोग, इतने चेहरे, दे मैं किसी को कुछ नहीं पा रहा हूँ।