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अपनी शक्ति जगाइए, कमज़ोरियाँ मत गिनाइए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी चरण-स्पर्श। हम सभी सन्तों, बुद्धों की ऊँची किताबें पढ़ते हैं और उन्हें अपने मन में ऊँचा स्थान देते हैं, पर आपके बारे में चर्चा करती हूँ तो लोग उस बात को नहीं सुनते हैं। उन्हें लगता है कि आप उन्हीं के समकक्ष हैं, आपने यहाँ उनके समय में ही जन्म लिया है। मैं आपकी भौतिक उपस्थिति को महसूस कर पाती हूँ। दुर्भाग्य है उनका जो इसको महसूस नहीं कर पाते। आगे आने वाली पीढ़ियों को आपका सानिध्य नहीं मिल पाएगा। तब शायद लोगों को वही बुद्धों, महावीरों की कृपा, आप जो किताबें लिखकर जा रहे हैं, उनके माध्यम से होगी।

मेरा प्रश्न आदि शंकराचार्य जी से सम्बन्धित है। वो मात्र तीन वर्ष के थे तभी उनके परिवार में किसी ऋषि का आगमन हुआ था और उन्होंने उनसे बहुत गहरे प्रश्न पूछे थे। जब बच्चा ठीक से बोल भी नहीं पाता तब उन्होंने एक-एक शब्द के माध्यम से उसके उत्तर दिये थे। और पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने अभिव्यक्ति दी थी कि वो घर छोड़कर जाना चाहते हैं और आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने ये करने का साहस भी दिखाया।

तो इस तरह के लोगों में ऐसा कौनसा तत्व होता है जो इतनी छोटी सी उम्र में ऐसा करके चले जाते हैं? क्या कोई दुर्लभ तत्व है? अगर वाक़ई कोई दुर्लभ तत्व है, तो वो दुर्लभ तत्व क्या है? धन्यवाद।

आचार्य प्रशांत: दुर्लभ तत्व कुछ नहीं है, प्राकृतिक गुण है। प्राकृतिक गुण है, संयोग भर है। कुछ बच्चे प्राकृतिक रूप से मौन-गम्भीर होते हैं, जिज्ञासु होते हैं, सत्यान्वेषी होते हैं, कुछ नहीं होते। और चूँकि उस बारे में कुछ करा नहीं जा सकता कि कौन, कैसे पैदा होगा कि आपकी जैविक सामग्री कैसी होगी, आपका जो पूरा जेनेटिक डिस्पोज़िशन (अनुवांशिक स्वभाव) है वो कैसा होगा, इसलिए उस विषय में बहुत सोचना नहीं चाहिए। इसमें कोई जादू, कोई चमत्कार नहीं है, ये बस संयोग है कि आप कैसे पैदा होते हैं। उसके बाद जो कुछ है वो संयोग नहीं है, उसके बाद आपका निर्णय होता है।

ये जो चीज़ है न कि किसी को ज़्यादा आग्रह होता है सच्चाई के प्रति — बचपन से ही, कोई छोटा बच्चा बार-बार ज़िद कर-करके पूछता है, 'नहीं, बताओ; नहीं, समझाओ।' कोई बच्चा होता है उसको बचपन से ही किताब मिल जाती है, तो वो किताबों की तरफ़ ज़्यादा आकर्षित होता है — इसे प्रतिभा कहते हैं। यही प्रतिभा की वास्तविक परिभाषा है, टैलेंट ये है। क्योंकि हम कौन हैं?

श्रोता: अतृप्त चेतना।

आचार्य: तो प्रतिभा की फिर एक ही परिभाषा क्या हो सकती है? यदि ऊँचाई की तरफ़, बोध की तरफ़ आपका प्राकृतिक झुकाव है तो आप प्रतिभाशाली हो। टॉंग उठाने को, ज़ोर-ज़ोर से नाचने को, गेंद पीटने को, ये सब टैलेंट नहीं कहलाता। कौन कितनी ज़ोर से भाग सकता है, ये टैलेंट नहीं होता। ये सब चीज़ें तो जानवरों में पायी जाती हैं। कोई भी इंसान का बच्चा चीते से तेज़ तो नहीं भाग सकता न, तो इसमें टैलेंट क्या है?

ये अकेली चीज़ है जो पशुओं में नहीं हो सकती, सिर्फ़ इसी को प्रतिभा कह सकते हैं, सिर्फ़ यही मनुष्य में पायी जाती है। सिर्फ़ मनुष्य पूछ सकता है, ‘ये (बाहर) क्या है, मैं कौन हूँ? ये क्या है, मैं कौन हूँ?’ जिसमें ये पूछने के प्रति जितना सहज झुकाव हो, उसे उतना प्रतिभाशाली माना जाना चाहिए, वो उतना टैलेंटेड हुआ। बाक़ी आप टीवी वगैरह में जो टैलेंट शो देखते हैं वो कुछ नहीं है, मज़ाक है, बेवकूफ़ी। उन्हें टैलेंटेड बोलना, टैलेंट शब्द का अपमान है। कोई एक ख़ास तरीक़े से नाच रहा है, पाँव पटक रहा है, धुन पर थिरक रहा है, ये सब टैलेंट नहीं होता। यहाँ तक कि कोई गा रहा है और गाने में वो बड़ा आपको आकर्षक लग रहा है, ये सब भी टैलेंट नहीं होता।

टैलेंट क्या है, ये जानने के लिए फिर उसी मूल सवाल पर जाना पड़ेगा कि टैलेंटेड वन कौन है। प्रतिभा क्या है, ये जानने के लिए पूछो किसकी प्रतिभा। हम किसकी प्रतिभा की बात कर रहे हैं? और उसमें फिर प्रश्न आएगा, ‘मैं कौन हूँ?’ क्योंकि मेरी प्रतिभा की बात हो रही है न। मैं कौन हूँ? मैं एक अतृप्त चेतना हूँ। तो प्रतिभा की फिर परिभाषा क्या हुई? तृप्ति की ओर सहज झुकाव, इसको प्रतिभा कहते हैं।

तो कुछ लोगों में होती है वो नैसर्गिक प्रतिभा। लेकिन चूँकि वो प्राकृतिक होती है, इसलिए मैं कह रहा हूँ, उसके बारे में ज़्यादा बातचीत नहीं की जानी चाहिए। हो सकती है किसी में, किसी में नहीं हो सकती है, जिसमें है, उसे इस बात का श्रेय नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि उसने उसे अर्जित नहीं किया, संयोग है। जिसमें नहीं है, उसे इस बात के लिए कोई दंड इत्यादि नहीं मिलना चाहिए, न वो हीन हो गया, क्योंकि उसने कहा नहीं था कि मुझे प्रतिभाशाली मत बनाओ। वो नहीं वैसा पैदा हुआ, वो क्या कर सकता है?

आपका श्रेय है, जितनी भी आपको प्रतिभा मिली है, उसका उपयोग करके प्रतिभा से आगे के काम करना। आप प्राकृतिक रूप से जिज्ञासु नहीं हो, कोई बात नहीं, आपके पास विकल्प है जिज्ञासु हो जाने का। विकल्प तो है न? प्रतिभा नहीं है, विकल्प तो है। सीखे-सिखाए नहीं पैदा हुए, सीखने का विकल्प तो है! बहुत कुशाग्र बुद्धि लेकर नहीं पैदा हुए, बहुत हाई आइक्यू लेकर नहीं पैदा हुए, लेकिन फिर भी अभ्यास और अनुशासन का विकल्प तो है। आसानी से हो सकता है आपको कोई बात न समझ में आ रही हो, आप प्रतिभाशाली नहीं हैं, लेकिन धैर्यपूर्वक लगन के साथ अभ्यास करने का विकल्प तो है न! हाँ, तो इस विकल्प की महिमा है। सदा इस विकल्प की बात की जानी चाहिए, प्रतिभा की नहीं।

किसी व्यक्ति को कितना सम्मान, कितना श्रेय मिलना है, वो इससे नहीं निर्धारित होना चाहिए कि वो कितना प्रतिभाशाली है, क्योंकि प्रतिभा संयोग मात्र है। सम्मान का अधिकारी वो है जिसने अपनी सीमित प्रतिभा, सीमित संसाधनों, सीमित शक्ति के बावजूद स्वयं से लोहा लिया, अपनी सीमाओं को तोड़ा और फिर बड़े-से-बड़ा काम करके दिखा दिया। आप बहुत सारी शक्ति और सामर्थ्य और प्रतिभा लेकर पैदा ही हुए थे और फिर आपने ज़िन्दगी में कुछ कर डाला, तो इसमें क्या है? कुछ भी नहीं। आप अतिसाधारण पैदा हुए हो और फिर अपनी लगन से सही काम करके दिखाएँ, तब बात है न!

बहुत बड़ी फ़ौज लेकर किसी को हरा देने में कोई गौरव है क्या? बोलिए, कोई गौरव है क्या? पचास पुलिस वाले चार छात्रों को खदेड़ रहे हैं, पुलिस वालों को क्या दें, शौर्य पदक? कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन जब कहा जाता है, “सवा लाख से एक लड़ाऊँ”, तब भीतर आग उठती है न कि ये हुई कुछ बात! ये हुई बात। तो होगा कोई जो सवा लाख लेकर पैदा होता होगा, होगी उसमें प्रतिभा, आपको थोड़ी सी ही मिली है, आप उस थोड़े से का पूरा उपयोग करके दिखाइए।

और ख़तरा है — आपने मान लिया कि तीन वर्ष में ही शंकराचार्य अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन करने लगे थे, पाँच वर्ष में संन्यास की इच्छा वगैरह देने लगे थे, आपने ये सब मान लिया तो आप हतोत्साहित हो जाएँगे। आप कहेंगे, ‘ये सब हमने तो किया नहीं। हम तो इतने बड़े तोप थे नहीं। तो माने आचार्य शंकर को जो कुछ उपलब्ध हुआ, हमें उपलब्ध भी नहीं हो सकता। तो चलो ठीक है, कोई बात नहीं हम अपनी साधारण, सामान्य ज़िन्दगी जियेंगे, हम कोई बड़ा काम फिर क्यों करें! बड़ा काम तो वही लोग करते हैं जो ख़ास पैदा होते हैं।’

और ये हमने बड़ी बेईमानियाँ करी हैं कि जिन भी लोगों ने ज़िन्दगी में बड़े काम करके दिखाये, उनके साथ हमने बड़ी हैरतअंगेज़ कहानियाँ जोड़ दी हैं। एकदम तिलिस्मी, जादुई, रहस्यमयी, मिस्टिकल। मिस्टिकल कहानियाँ जोड़ दी हैं। जैसे कि अब कोई भी हो, अवतार हो, महापुरुष हो, ज्ञानी हो, योगी हो, कोई भी हो, उसके साथ कहेंगे, ‘वो पैदा होने वाला था, उससे पहले उसकी माता जी को शिव आये सपने में और शिव ने कहा कि देखो, तुम्हारे गर्भ से जिस बालक का जन्म होगा, वो सम्पूर्ण मानवता को अज्ञान के अन्धकार से बाहर निकालेगा।

अब कितनी मीठी लगती है बात कि देखो, ये हमारे अवतार हैं न, इनका तो जन्म ही ख़ास हुआ था। आप समझ नहीं रहे हो कि ये कहानी गढ़कर आपने अपनी राह बन्द कर दी क्योंकि आपकी माता जी को तो ऐसा कोई सपना आया नहीं था। आप कहोगे, ‘मेरी अम्मा तो ऐसे ही, उसे तो कोई सपना वगैरह आया ही नहीं, उसको तो ये सपना आता था कि सासू माँ ने बेलन फेंककर मारा, उसके बाद मैं पैदा हुई। तो इसीलिए मेरा तो कुछ हो नहीं सकता, कुछ नहीं हो सकता मेरा।’

महापुरुषों के साथ बड़ी-बड़ी कहानियाँ मत जोड़ो, वो भी साधारण ही लोग थे। उनमें से बहुत ऐसे थे जो बिलकुल साधारण, औसत प्रतिभा के थे। वो बड़े इसलिए हुए क्योंकि उन्होंने चाहा बड़ा होना। वो इसलिए नहीं बड़े हुए क्योंकि उनकी तक़दीर, क़िस्मत, भाग्य, प्रारब्ध में लिखा था बड़ा होना। आपके पास कमी प्रतिभा की नहीं, आपके पास कमी संकल्प की है। संकल्प जगाइए, सबकुछ होगा।

आचार्य शंकर कोई नियम नहीं है कि एक ही हो सकते हैं। आचार्य शंकर के बाद आप सब तीन-सौ आचार्य खड़े हो सकते हैं यहाँ पर। कोई नियम थोड़े ही लग गया है, कोई सीमा-रेखा, वर्जना थोड़े ही डाल दी गयी है, पूर्ण विराम थोड़े ही लगा दिया कि अध्यात्म की इमारत में अब एक मंज़िल और नहीं जुड़ सकती। सात मंज़िली इमारत है, सात के आगे आठ नहीं आ सकता। अरे, संख्याएँ अनन्त हैं। सात होगा तो आठ होगा, आठ होगा तो दस होगा, दस होगा तो ग्यारहवाँ भी हो सकता है।

कौन होता है आपको आपके अधिकारों से वंचित करने वाला? शिखर पर क्या सिर्फ़ बीते हुए ही लोगों का अधिकार है, आपका अधिकार नहीं हो सकता क्या? शिखर पर आपका भी उतना ही अधिकार है। आप भी मनुष्य पैदा हुए हैं वो भी मनुष्य पैदा हुए थे। संकल्प दिखाइए, कहानियाँ मत बनाइए।

समझ में आ रही है बात?

अब उसी से सम्बन्धित वो बात है जो आपने कही कि आप मेरी बात लोगों से करते हैं, तो लोग कहते हैं, 'अरे ये तो साधारण, सामान्य आदमी हैं इनकी नहीं सुनेंगे।' वही वजह है न, मेरे बारे में भी क़िस्से फैला दीजिए तो सुनेंगे। ‘मैं एक बार हिमालय पर चढ़ा था और वहाँ फ़लाने पेड़ पर पन्द्रह-बीस साल बैठा रहा।’ कहेंगे, 'ग़ज़ब हो गया! बीस साल पेड़ पर चढ़े थे!' फिर सुनेंगे, एकदम सुनेंगे। क्योंकि हमारी आदत लग गयी है सिर्फ़ उसकी सुनने की जिसके साथ जादुई कहानियाँ जुड़ी हुई हों।

तो जितने मक्कार होते हैं उनको फिर सूत्र मिल गया। वो कहते हैं कि महापुरुष बनना है तो अपने बारे में जादुई कहानियाँ प्रचारित कर दो। क्योंकि जहाँ बताया नहीं कि मेरे साथ भी फ़लाना जादू हुआ था, सब आप लोग बिलकुल एकदम नमस्कारम! नमस्कारम! नमस्कारम! एकदम दंडवत लेट ही जाते हैं। ‘अच्छा, आपके साथ भी जादू हुआ था, बताइए आपके साथ कौनसा जादू हुआ? उसके साथ ये जादू, मेरे साथ ये जादू हुआ।’

इन्तहाॅं ये है कि यहाँ लोग आते हैं वो खड़े होकर — शिविर में एक सज्जन आये थे, बैंगलोर-मुंबई पता नहीं कहाँ का था — वो खड़े होकर मुझे ही बताने लगे कि मेरी बात सुनकर उन्हें जादू हो गया। मैं भौंचक्का! मैंने कहा, 'मुझे हुआ नहीं तुझे हो गया। मेरी बात सुनकर तुझे हो गया जो मुझे ही नहीं हुआ।’

बोल रहे हैं कि आपकी बात सुनकर मैं एनलाइटेंड हो गया हूँ। और ऐसे-ऐसे मुझे अनुभव होते हैं, वो लाल-लाल फ़ीते तैरते हुए दिखाई देते हैं, जैसे डीएनए का हेलिकल स्ट्रक्चर (पेचदार संरचना) होता है, वैसे मुझे दिखाई देता है। मैं समझ रहा हूँ कि ये प्रकृति ही है जो मेरे सामने आ रही है और बिलकुल सारे भेद खुल गये हैं और उसके बाद मेरे भीतर से ऊर्जा उठती है और मुझे लगता है कि मेरा वज़न कम हो गया है, मैं ज़मीन से उठने लग गया हूँ — पूरा उन्होंने सब खोलकर चिट्ठा रख दिया और मैं एकदम मुँह फाड़े उन्हें सुन रहा हूँ।

(श्रोतागण हँसते हैं)

मैंने कहा, 'मुझसे ये पाप कैसे हो गया! इसको ये क्या कर दिया मैंने!' उस बेचारे की, भोले आदमी की उम्मीद ये थी कि मैं बोल दूँ कि हाँ बेटा तेरा हो गया!

मुझे भी आते हैं, सलाह आते हैं। एक-से-एक धुरन्धर हैं, कहते हैं, ‘आप प्रचारित क्यों नहीं करते और ज़्यादा, कुछ भी, हो जाएगा।' बोले, 'अब महाशिवरात्रि आने वाली है मार्च में, वो तो आपका जन्मदिवस ही है, तो कह दीजिए बस, बोल दीजिए कि हो गया! बोले, ‘आपको इतना बढ़िया वरदान मिला हुआ है भगवान शिव का, आप सीधे-सीधे महाशिवरात्रि को पैदा हुए थे, फ़ायदा क्यों नहीं उठा रहे? बोलिए!' (श्रोतागण हॅंसते हैं)

एकाध-दो बार तो मुझे भी लगा कि बच्चू अब बोल ही दिया जाए इस बार। कोविड-ओविड आ रहा है, क्या पता अगला मौक़ा मिले न मिले। (श्रोतागण हँसते हैं)

ऐसा बोल दूँगा तो किनका सम्मान मिलेगा, मूर्खों का मिलेगा। हज़ार मूर्खों का सम्मान पाने की अपेक्षा, जो आपका ग्लैमर, पद ये सब देखकर देते हों, सौ ठीक लोगों से बात करना कहीं बेहतर है न, कहीं बेहतर है। फिर भी थोड़ा-बहुत करना पड़ता है, करते हैं, वो आप ही लोगों के लिए करते हैं।

ये जो राफ़ेल (ड्रोन) उड़ रहा है यहाँ पर, वो और किसलिए है। इतना चिढ़ाया है इसने मुझे तीन दिन में, मैं वो आदमी जिसे इतनी सी आवाज़ बर्दाश्त नहीं होती है सत्र में और इन्होंने बिलकुल हूॅं-हूॅं-हूॅं। लेकिन क्या करें, ज़रूरी है, करना पड़ता है। वो न करें तो आप ही लोग न आयें। आपमें से भी कई लोगों को असुविधा हुई होगी कि क्यों सिर के ऊपर मंडरा रहा है बार-बार, ये फ़ोटो शूट चल रहा है।

मैं बताऊँ, अभी जब ये वीडियो छपेगा न, आप ही उसे देखकर कहेंगे, ‘मैं, मैं भी गया था यहाँ पर देखो, देखो, मैं भी गया था, मैं गया था यहाँ पर, ये देखो!’ (श्रोतागण हॅंसते हैं) तब बिलकुल भूल जाऍंगे कि असुविधा हुई थी। आप ही लोग बहुत खुश हो जाऍंगे, सबको दिखाएँगे — बड़ा जलसा था, सैकड़ों लोग आये थे, मैं भी था। और सचमुच आपको अच्छा लगने लगेगा। ‘हाँ, बहुत अच्छा था, बहुत अच्छा था।’

हम क्या करें, हम ऐसे ही लोग हैं। सच से ही अगर हमें सरोकार होता तो आप मेरे पास दस साल पहले आ गये होते न। आज क्यों आये हैं? आप आज इसीलिए आये हैं क्योंकि आज बहुत प्रचार हो पाया। और दुनिया हमेशा से ऐसी ही रही है, जहाँ ज़्यादा प्रचार हो जाता है वहाँ चली आती है।

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