प्रश्न: सर, जब जीवन अपना है तो हम कोई भी निर्णय लेते समय दूसरों की मदद क्यों लेते हैं?
श्री प्रशान्त: अभिषेक, जीवन अपना है ही नहीं, इसलिए दूसरों की तरफ़ देखते रहते हो। जीवन अपना बिल्कुल भी नहीं है। ईमानदारी से बताना अभी पहले सेमेस्टर के नतीजे आ चुके हैं; नतीजे आए हैं तो कुछ लोगों की बैक भी लगी होगी, और मैंने अक्सर देखा है कि जिन लोगों की बैक लगी होती है वो बड़े परेशान हो जाते हैं। तो मैं उनसे पूछता हूँ कि यह जो मार्कशीट है, अगर यह किसी को दिखानी ना होती तो भी क्या वो परेशान होते? तुमने परीक्षा दी है, तुम्हें नतीजा मिला है, किसी को दिखानी ना होती और यह संभावना भी ना होती कि कभी भी कोई इसे माँगेगा – बस वो मिलती और उसको ले जाकर एक अलमारी में रख देते – तो क्या तुम तब भी इतने ही उदास होते? कभी किसी के सामने ना इसका ज़िक्र आएगा, ना बात उठेगी; ना कहीं लिखना है, ना बताना है, तो क्या तुम तब भी इतने ही उदास होते?
तब इतने उदास न होते।
इसका अर्थ समझ रहे हो? वो तुम्हारी उदासी, अपने लिए नहीं है; उन लोगों के लिए है जिनको तुम यह दिखाने जा रहे हो। तुम्हें यह माँ-बाप को दिखानी है, तुम्हें यह टीचर्स को दिखानी है, स्टूडेंट्स देखेंगे और साथ-ही-साथ अंततः किसी इम्प्लॉयर (नियोक्ता)को भी दिखानी होगी। तुम्हें उसका डर है।




