स्वयं को जानना और बाहर मदद का होना — ये तो हमने कहा, सब एक साथ है। तुम्हारा लक्ष्य होता है स्वयं को जानना, तुम इधर को देखते हो लेकिन बाहर की मदद अपने आप होनी शुरू हो जाती है। वो कोई एक अलग काम थोड़ी है जो करना है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, पूछने से पहले एक चीज़ बोलना चाहूँगा बस — जब भी आपके सामने मैं आता हूँ, धड़कन बहुत तेज़ हो जाती है, ऐसे एकदम नर्वस हो जाता हूँ बहुत ज़्यादा।
आचार्य प्रशांत: उम्र ही ऐसी है तुम्हारी “आग का दरिया है, डूब के जाना है।” यहाँ वो लॉलीपॉप और टैडी बियर वाला नहीं है, कि चॉकलेट से काम चल जाएगा। यहाँ कौन सा वाला है?
श्रोता: आग का दरिया।
प्रश्नकर्ता: जी, मैं ये पूछ रहा था कि, जैसे आपने कहा कि — जो रिश्ते होते हैं अपने क़रीबी, उनके पास ले के जाइए, उनसे मांगिए या उनको दुख दिखाइए। तो मैं जब जाता हूँ उनसे बात करने, जो भी मेरे क़रीब हैं, कि चलिए ज़रा हम इन पर बात करते हैं — कि समाज में क्या हो रहा है? या फिर आप जिनको रिश्तेदार बोलते हैं, जिनको प्यार बोलते हैं, या फिर जो आपका काम है, इन सब चीज़ों को कैसे देखते हैं, इस पर आपका क्या ओपिनियन है? — तो डिस्कशन होता है बहुत ज़्यादा, घंटे-दो घंटे-तीन घंटे।




