प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह डर लगा रहता है कि अकेले रहने का फ़ैसला तो कर लिया है, पर कभी अचानक रात को तबियत ख़राब हो गई तो क्या करूंगी? अकेले रहने में और कोई परेशानी नहीं है। बहुत मस्त रहती हूँ जब से आपकी बातें सुनी हैं। मन शांत रहता है, जीना आ गया है। जीवन में रस है।
आचार्य प्रशांत: रात को तबियत ख़राब हो गई तो डॉक्टर बुला लीजिएगा।
प्रश्नकर्ता: फ़ोन कैसे करूंगी?
आचार्य प्रशांत: ये क्या सवाल है? _(मुस्कुराते हुए) _
प्रश्नकर्ता: बस यही है, और कुछ नहीं है।
आचार्य प्रशांत: नहीं, यही नहीं है। जो चीज़ मन पर हावी रहे, भीतर का माहौल ख़राब करके रखे, वो चीज़ छोटी थोड़े ही होती है।
प्रश्नकर्ता: नहीं, माहौल ख़राब तो नहीं रहता, फिर भी कभी-कभी आ जाता है डर।
आचार्य प्रशांत: कभी-कभी बाहर से थोड़े ही आ जाता है; भीतर हमेशा रहता है, कभी-कभी प्रकट हो जाता है। और अगर वो भीतर है, तो आप ये डर हटाने की व्यवस्था कर भी लेंगी तो वो किसी और मुद्दे को लेकर शंकित रहेगा। किसी और मुद्दे को बढ़ा-चढ़ा कर के अशांति का निर्माण कर लेगा। भीतर वो छुपा तो बैठा ही है न जिसे अशांति पसंद है। उसको तो बहाना चाहिए। सेहत का बहाना नहीं मिलेगा तो दूसरा बहाना ढूंढेगा। और अगर भीतर वो नहीं है जिसे अशांति चाहिए, तो बाहर अगर कारण मौजूद भी हैं अशांति के, तो भी उन कारणों को भीतर प्रवेश करने नहीं दिया जाता। उन कारणों को समर्थन और ताक़त नहीं दी जाती, तो वो कारण फ़िर बाहर-बाहर रहते हैं, भीतर प्रभाव नहीं डालते।







