किसी अपने ही नीचे वाले से तुलना करके अपने आप को बस धोखा दिया जा सकता है। अपनी तुलना किसी ऐसे से करो, जो तुलना के पार चला गया हो। ये वो लोग होंगे, जिन्होंने जो कुछ भी तोला जा सकता है, उसके पार कुछ अर्जित करना चाहा। अपनी तुलना ऐसों से करो, जिन्होंने प्रेम, करुणा, आनंद और मुक्ति को ज़्यादा कीमत दी हो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आपको जब से सुनना शुरू किया है लाभ-ही-लाभ है जीवन में, अब आप मेरे जीवन की प्रेरणा बन गये हैं। मेरा मूल प्रश्न ये है कि मैं तुलना बहुत ज़्यादा करता हूँ। मन हमेशा जोड़-घटाव करता रहता है। दूसरों से खुद की, अपनी अपने आदर्शों से। आचार्य जी मुझे इस विषय में मदद चाहिए, मेरा मन बहुत सताता है मुझे जोड़- घटाओ करके। क्या लाभ-हानि का, नफ़ा-नुकसान का हिसाब लगाते रहना सही है। अगर नहीं तो मुझे इससे मुक्ति का रास्ता दिखाएँ; प्रणाम।
आचार्य प्रशांत: रमन, तुलना में कोई बुराई नहीं अगर तुम तुलना करने की विधा जानते हो। आमतौर पर हम जो तुलना करते हैं वो कैसी होती है? कोई हमारे ही जैसा है मूलभूत रूप से, हमारे ही तल का है। हमसे आगे है या हमसे पीछे है, है हमारे ही तल का; हम उससे तुलना कर लेते हैं।
उस तुलना से क्या होगा? कुछ परिवर्तन आ सकता है तुममें; कुछ हो सकता है अपनेआप में जोड़ लो, कुछ हो सकता है अपनेआप में घटा दो लेकिन तुम बदलोगे अपने ही तल के भीतर रह-रहकर। वो बदलाव तुमको मूलभूत रूप से बदल नहीं देगा; सतही होगा, बाहरी होगा, मौलिक नहीं होगा।
तो इसीलिए पूरी दुनिया तुलना का खेल खेलती है। इस दुनिया की जैसे सब ऊर्जा ही तुलना और तुलना से ही आती हो। लेकिन तुलना करना अगर इतना ही लाभप्रद होता तो कोई तो दिन आना चाहिए था जब तुम कहते कि तुलना कर-करके लाभ हो गया, अब आगे कोई तुलना करनी नहीं हैं। क्या कोई ऐसा भी है जो तुलना कर-करके तुलना करने की वृत्ति से ही छूट जाए। मतलब समझो इस बात का।




