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ऐसा सिरफिरा बंदा चाहिए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं हिंदी फ़िल्म सिनेमा उद्योग में एक एक्टर , एक कास्टिंग असिस्टेंट और असिस्टेंट डायरेक्टर की तरह काम कर चुका हूँ पिछले चार साल से। इस इंडस्ट्री में काम, वासना और पैसों का लालच बहुत गहरी तरह से मौज़ूद है और शायद मैं भी इसकी तरफ, मेरे इसकी तरफ आकर्षित होने के कारणों में से सबसे मेन दो कारण शायद यही हैं।

और सिर्फ़ ये इंडस्ट्री ही नहीं इसका प्रोडक्ट भी इन चीज़ों को बहुत प्रोत्साहन करता है जो थोड़ी-बहुत कौशल हैं वो इस इंडस्ट्री से सम्बन्धित ही है मेरे अंदर और ये भी लगता है कि इस इंडस्ट्री में क्षमता है एक बहुत ही सही बदलाव लाने का और एक बहुत व्यापक तौर पर बदलाव लाने का।

लेकिन क्योंकि हमारी जो देश है वो इससे बहुत ज़्यादा प्रभावित है।लेकिन ये बदलाव कैसे लाया जाए इसकी स्पष्टता नहीं है बिलकुल भी?

आचार्य: चलिए बात करते हैं, बताइएगा – पहले उनके पक्ष से बात शुरू करते हैं जिन पर इल्ज़ाम है क्योंकि उनकी निंदा वगैरह तो सब करते ही रहते हैं मैं भी कई बार कर चुका हूँ। पहले ज़रा वहांँ से देखते हैं जहाँ वो खड़े हैं। वो आपको जो भी माल मसाला परोस रहे हैं — आपने दो बातें कहीं पैसे का लालच और वासना वो आपको जो भी चीज़ें परोस रहे हैं क्या वो परोस सकते थे अगर उनकी सामग्री आपको बिलकुल ही स्वीकार न होती तो? ऐसा सम्भव था क्या?

वो आपको जो दे रहे हैं वो आपको स्वीकार है और स्वीकार इसलिए है क्योंकि वो कहानी सिर्फ़ बाहर के पर्दे की नहीं है। सिनेमा के पर्दे, उसकी स्क्रीन की नहीं है वो कहानी हमारी भीतरी स्क्रीन की है। वो जो रजत पटल है वहाँ ही नहीं है मानस पटल पर भी है वो कहानी।

वो लोग भी इसी समाज से उठ करके आते हैं वो लोग भी इसी सभ्यता, इसी संस्कृत की उपज हैं, इसके अंग हैं वो जो पटकथा लिखते हैं वो घर-घर की कथा से बहुत अलग कैसे हो सकती है, बताइए ना? हम जानते हैं भली भांति के अगर मैं कलाकार हूँ, एक निर्देशक हूंँ, निर्माता हूँ, कुछ भी हूँ तो मेरा दायित्व है कि मैं समाज को सही दिशा दूँ इत्यादि-इत्यादि, वो बात हम बाद में कर लेंगे।

पर पहले हमें समझना यह होगा कि ये जो इंडस्ट्री है ये बहुत अलग नहीं हो सकती प्राकृतिक तौर पर उस समाज से जिससे यह उठती है। अलग हो सकती है अगर कुछ जादू सा हो जाए अलग हो सकती है अगर कोई अकेला व्यक्ति अपने दम पर, अपनी चेतना की ताकत पर, अपने सत्य के विश्वास पर, विद्रोह करे और बिलकुल अलग राह चले तो तब एक अलग तरह के सिनेमा का निर्माण हो सकता है और वैसा हुआ भी है। हुआ है न? बीच-बीच में यदा-कदा उस अन्धेरे में हमें कोई चिनगारी देखने को मिल जाती है। कोई फ़िल्म आ जाती है जो बिलकुल अलग होती है, कोई अभिनेता आ जाता है जो घटिया रोल करने से मना ही कर देता है। लेकिन फिर हम ये भी पूछते हैं कि उन फ़िल्मों का हश्र क्या हुआ वो अभिनेता किस गुमनामी में खो गए?

अभी फ़िल्म आई है रॉकेट्री बुरी नहीं है, फ़्लॉप हो गई, किसने फ़्लॉप करी? फ़िल्म बनाने वाले ने या फ़िल्म देखने वाले ने? और देखने वाला कौन है उस इंडस्ट्री के अंदर का है या समाज के अन्दर का है?

तो उस फ़िल्म को फ्लॉप करने का जिम्मा किसका है? जिन्होंने वो फ़िल्म बनाई या जिन्होंने वो फ़िल्म देखी या नहीं देखी? बल्कि जल्दी बोलिए तो दोष इंडस्ट्री को दें? क्या इंडस्ट्री अगर कुछ ढंग का आपको परोस भी दे तो हमारी खाने की इच्छा कहाँ होती है? हाँ, अब कोई आ जाए बिलकुल सिरफिरा दीवाना सच्चाई का आशिक वो कहे मुझे कितना भी नुकसान होता रहे मैं तो सही सिनेमा ही बनाऊंँगा।

तो बिलकुल ऐसा हो सकता है कि वो एक के बाद एक घाटा सहते हुए भी, फ्लॉप सहते हुए भी अच्छा सिनेमा बनाता जाए और भविष्य के लिए अच्छी कला छोड़ता जाए कि देखो, कुछ अच्छा बना दिया है उस समय के लोगों ने नहीं देखा पर क्या पता आगे लोग देखें ऐसा हो सकता है पर ऐसा करने के लिए कोई बहुत दमदार बंदा चाहिए हमने कहा सच्चाई का आशिक। वो बात प्रकृति विरुद्ध होगी, प्रकृति की जो नियमित योजना है, प्रकृति का जो साधारण बहाव है, उसमें जो हमारे साधारण क्रियाकलाप होते हैं उनसे हटने के लिए बहुत जगह, बहुत सम्भावना, बहुत प्रोत्साहन नहीं उपलब्ध है।

दो बातें बोली थीं लोभ और काम उसमें हिंसा भी जोड़ दो उसमें और बातें भी जोड़ दो नशा है बहुत फ़िल्मों में मद जोड़ दो उसमें ये सब जो हैं काम, लोभ, मद, मोह — ये किसके अन्तर्गत आते हैं? ये प्राकृतिक गुण हैं ये वो सब चीज़ें हैं जिनको हम कहते हैं कि जंगल में भी पाई जाती हैं।

आप किसी पशु के पास चले जाइए उसमें आपको यह सब कुछ मिलेगा मिलेगा की नहीं मिलेगा? क्रोध भी मिलेगा, भय भी मिलेगा लोभ मिलेगा सब मिलेगा वहांँ पर। वो सब कुछ उस पशु में मिलता है, जंगल में मिलता है इसीलिए मानव में भी मिलता है और मानव के समाज में मिलता है।

मानव पशु है, समाज जंगल है। मानव केंद्रीय रूप से पशु ही है और ये हम जिसको अपना समाज बोलते हैं इसमें भले ही आपको सभ्यता के और मानव की निर्मिति के बड़े चिह्न दिखाई देते हैं।

ये इतना बड़ा ऑडिटोरियम है या इतनी चौड़ी सड़कें हैं, हमने इतना कुछ निर्मित कर दिया है विज्ञान है, टेक्नोलॉजी (तकनीकी) है यह सब कुछ जंगल में थोड़े ही पाया जाता है। नहीं, आप भ्रम में मत आ जाइएगा यह सब कुछ जो आपको दिखाई दे रहा है ये जंगल ही है। हो सकता है कि बहुत आधुनिक तकनीक का कोई इलेक्ट्रॉनिक यंत्र हो आपके हाथ में लेकिन है वो जंगल का ही उत्पाद।

देखिए, जंगल में और समाज में पशु में और मानव में अन्तर, बुद्धि का नहीं चेतना का होता है। ये हम बात नहीं समझ पाते आप अपने बच्चों को भी ऐसे ही कह देते होंगे न कि अरे-अरे-अरे! वो डॉगी है उसमें बुद्धि नहीं है और जब आप किसीको बेअक्ल देखते हैं, उसके पास बुद्धि नहीं होती तो आप उसको ऐसे कह देते हैं, 'अरे! निरा जानवर है, बुद्धि नहीं है।'

जानवर में और इंसान में अन्तर यह नहीं होता कि जानवर के पास बुद्धि नहीं है और इंसान के पास बुद्धि है। बुद्धि के होते हुए भी आप निरे जानवर हो सकते हैं और इसीलिए दुनिया की ये जो पूरी बुद्धिमान जनसंख्या है ये बुद्धिमान होते हुए भी निन्यानबे दशमलव नौ प्रतिशत पशु ही है।

बुद्धिमत्ता किसी भी तरीक़े से गारंटी नहीं है इंसान हो जाने की। आप बहुत बुद्धि रख सकते हैं लेकिन पूरे-पूरे जानवर हो सकते हैं। और वो बुद्धि आपकी दरिंदगी के ही काम आने हैं। इंसान कैसा है, तो बड़ा बुद्धिमान पशु है, है तो पशु ही, बुद्धि उसको और मिल गई है।

जंगल के पशु के पास सिर्फ़ नाखून होते हैं, पैने पंजे और जो शहर का पशु है उसके पास बुद्धि होती है तो बुद्धि के आधार पर भेद नहीं कर सकते। जानवर में और इंसान में अन्तर चेतना का होता है, चेतना बहुत दूसरी चीज़ है। बुद्धि का सम्बन्ध एक ऐसी चीज़ से है बुद्धि स्वयं एक ऐसी चीज़ है जो आपके पास होती है बुद्धि उपकरण है। ये (हाथ में एक इलेक्ट्रॉनिक सामान उठाकर बताते हुए) बुद्धि का निर्माण है। इसे किसने बनाया? बुद्धि ने बनाया। यह मेरे पास है इसे मैं हाथ में पकड़ सकता हूँ, यह बुद्धि है। जो भीतरी बुद्धि है जब वो एक टेंजबल एक स्थूल रूप ले लेती है तो ये बन जाती है। ठीक है!

यह बुद्धि है। बुद्धि क्या है? एक ऐसी चीज़ जो मेरे पास है, जो मेरे हाथ में है। चेतना क्या है? वो जो मैं हूँ। इन दोनों में बहुत अन्तर है। बुद्धि आपके हाथ की चीज़ है, कुछ जिस पर आपका स्वामित्व है समथिंग दैट यू ओन (कुछ ऐसा जिसके आप मालिक हो सकते हैं)। और चेतना क्या है वो जो आप स्वयं हैं। इसलिए बुद्धि तो चेतना की ग़ुलाम होती है। हमने कहा था न? बुद्धि पर तो चेतना का स्वामित्व होता है।

आप पशु हैं या मनुष्य — ये तय होता है आपकी चेतना से। चेतना ऊंँची है तो आप मनुष्य हैं और चेतना अगर नीची है, नीचे की चेतना से क्या आशय है? जो चेतना प्रकृति से ही बँधी हुई हो। चेतना अगर प्रकृति से बँधी हुई है और आप कहते हैं कि मैं प्राकृतिक हूँ, मैं देह हूँ या मैं देहबद्ध हूँ। तो आप क्या हो गए? – पशु। जो देह के पास में बँधा हुआ है उसका नाम पशु है, यही पशु की परिभाषा है।

पशु की परिभाषा ये नहीं है कि जिसमें बुद्धि कम है वो पशु है जो देह के पाश में बँधा हुआ है — पाश माने बंधन —जो देह के पाश में बँधा हुआ है, जो भौतिकता के पाश में बँधा हुआ है। देह माने कोई ऐसी चीज़ जो भौतिक है, भौतिक माने मटीरियल , जो देह के पास में बँधा हुआ है वो पशु है जो अपने शरीर से आगे कुछ जान ही नहीं पा रहा है, जो अपने शरीर से आगे अपनी हस्ती नहीं देख पा रहा वो पशु है।

अब आप अगर देह के पास में ही बँधे हुए हो लेकिन बुद्धि बहुत है तो वो बुद्धि भी फिर किसके इशारों पर नाचेगी? बुद्धि और पैनी बुद्धि है पर बुद्धि किसके इशारों पर चलेगी? देह के। और देह में क्या बैठे हैं? देह में यही सब तो बैठे हुए हैं। सब काम, क्रोध, मद, मोह जितने विकार हैं वो देह में ही बैठे हुए हैं, बच्चा ये सारे विकार अपने साथ लेकर पैदा होता है।

आपने बात फ़िल्म इंडस्ट्री की करी थी मैं बात को थोड़ा विस्तार में ले रहा हूँ, तो हम सब वैसे ही हैं। ठीक है? ये एक जंगल ही है हम जिसमें रहते हैं, जीते हैं। ये पूरा मेरा जंगल है। अब इस जंगल में अगर आपको वही सब देखने को मिल रहा है जो आपको पेड़-पौधे,पत्थर वाले हरे जंगलों में देखने को मिलता है तो इसमें आपको इतना ताज़्जुब क्यों होता है।

वास्तव में ये जो ताज़्जुब है ये स्वयं ही अहंकार और भ्रम का द्योतक है। प्रश्नकर्ता कह रहे हैं कि ये फ़िल्म इंडस्ट्री है और इसमें यही सब चलता रहता है कि झूठ दिखा दो, भ्रम दिखा दो जो देख रहे हैं उन्हें थोड़ी देर के लिए सपनों में पहुँचा दो।

किसी को भिड़ा दिया, किसी को नचा दिया निचले तल की भावनाएंँ उत्तेजित कर दीं। यही सब चलता रहता है। अरे बाबा! ये तो चलेगा ही न? क्योंकि ये तो प्रकृति का विधान है, यही सब जंगल में चलता है, है कि नहीं? जंगल में यही चलता है न? तो आपके शहरी जंगल में भी यही चलेगा। इस पर क्लेश करने से, इस पर छाती पीटने से कोई लाभ नहीं होना है।

जो वहाँ चल रहा है वो यहाँ चल रहा है। बस इतना सा है कि जो शहरी जानवर है वो कपड़े पहनकर के बैठ गया है। जो शहरी जानवर है उसके पास भाषा आ गई है। भाषा वहाँ भी होती है पर बड़ी अविकसित भाषा होती है। यहाँ चूँकि आपके पास बुद्धि है तो आपने भाषा विकसित कर ली है। आपने एक संयोजित तरीक़े से काम करना सीख लिया है तो आप बड़े-बड़े समूहों में काम कर लेते हैं।

आप अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग कर लेते हैं अपने स्वार्थ की खा़तिर आप व्यापार कर लेते हैं यहाँ से माल चलता है अमेरिका पहुँच जाता है वहाँ से डॉलर चलता है भारत आ जाता है लेकिन ये जो कुछ भी चल रहा है इसके आधार में वही सब सिद्धांत हैं जो जंगल की व्यवस्था चलाते हैं।

आप ग़ौर करके देखिएगा क्या हम कुछ भी ऐसा करते हैं जो पशु भी न करता हो बस पशु बहुत आरंभिक रूप में करता है हम उसको और विकसित रूप में कर लेते हैं। अभी हम व्यापार की बात करें तो व्यापार पशुओं में भी होता है। आप अपने लिए एक जगह बनाते हो कहते हो ये मेरा घर है, फिर कहते हो मोहल्ला है, फिर कहते हो कि प्रांत है फिर कहते हो देश इस तरह की व्यवस्था पशुओं में भी होती है।

आप जैसे सीमाएंँ खींचते हो यह मेरे घर की सीमा है पशु भी अपने क्षेत्र की, अपने इलाके की सीमाएंँ खींचा करते हैं और उनके इलाके में अगर कोई घुसपैठ कर दे, अतिक्रमण कर दे तो उन्हें भी वैसे ही क्रोध आता है जैसे आपको आता है। एक आम आदमी की, संसारी की ज़िंदगी दो-चार कामों में बीत जाती है — पैसे कमाने में, घोंसला बनाने में, साथी को ढूँढने में, खोजने में, मनाने में और जब उसको खोज ले तो फिर उसको किसी तरीक़े से निभाने में यही तो जंगल में भी हो रहा होता है न?

बस हमारे पास चूँकि भाषा है इसीलिए हम भाषा का उपयोग करके अपनेआप को भ्रम में रखे रहते हैं। जंगल में एक नर पशु एक मादा पशु के पीछे जाता है तो वहाँ बात बड़ी साफ़ होती है, दिख जाता है कि क्या चल रहा है पर वही काम हमारे सुसंस्कृत समाज में थोड़ा दबे-छुपे तरीक़े से होता है प्रछन्न होकर होता है, पता नहीं चलता।

कई बार तो हमको लगता है कि शायद किसी ऊँचे तल की घटना घट रही है ऊँचे तल की कोई घटना नहीं घट रही है यहाँ भी वही हो रहा है जो जंगल में होता है। बस पशु अपनेआप को धोखा नहीं देता और इंसान अपनेआप को धोखा देने में इंसान खुद को जता लेता है कि कोई ऊँचा काम कर रहा है। ऊँचा काम क्या कर रहा है?

तो एक इंडस्ट्री की बात नहीं है। फ़िल्म इंडस्ट्री भर की बात नहीं है। उनका जो उत्पाद है वो बहुत साफ़-साफ़ दिखाई दे जाता है कि देखो, नंगई कर रहे हैं बिलकुल दिख जाता है पर्दे पर आप कोई भी इंडस्ट्री उठा लीजिए वहाँ पाशविक काम ही तो हो रहे हैं। आप मुझे एक इंडस्ट्री बताइए न जिसमें कोई ऐसा काम हो रहा है जो चेतना के तल पर बहुत ऊंँचा है।

इंडस्ट्री कोई ऐसी नहीं हो सकती। हांँ, अपवाद कुछ ऐसे ज़रूर हो सकते हैं जैसे हमने आरंभ में बात करी थी कि कोई सरफिरा हो सकता है निर्माता, निर्देशक, अभिनेता जो एक के बाद एक फ्लॉप झेलते हुए भी कहे कि मुझे फ़िल्में तो अच्छी ही बनानी है।

इंडस्ट्री सब एक जैसी होती हैं। इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री हों, आईटी इंडस्ट्री हो, कोई इंडस्ट्री हो वो सब जंगली काम ही कर रही है। किसी एक उद्योग पर ही उंगली मत उठाइए। यहांँ तक कि आपका जो शिक्षा उद्योग है जो एजुकेशन इंडस्ट्री है वो भी ठीक उतनी ही जंगली है और उसमें भी जंगल का कायदा वैसे ही चल रहा है जैसे कि सी ग्रेड एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में। फ़िल्में आती हैं न, कोई ए ग्रेड है, बी ग्रेड है, सी ग्रेड है?

और शिक्षा कहने को तो बहुत ऊँची चीज़ मानते हैं न? पर शिक्षा जगत भी वैसे ही सी ग्रेड हो सकता है जैसे कि कोई सी ग्रेड मूवी। दोनों जगह काम किसका चल रहा होगा? वही पाशविकता का। एक कॉलेज है जहाँ पूरी पढा़ई का, जहाँ के पूरे माहौल का पूरा-का-पूरा प्रयास बस ये है कि किसी तरीक़े से नौकरियांँ लग जाए साम-दाम-दंड-भेद।

तो मुझे बताइए उसको कैंपस बोलूंँ या वाइल्ड लाइफ सेंचुरी जल्दी बोलिए क्योंकि पैसा माने क्या होता है? पैसा माने होता है कुछ ऐसा जिससे आपको भौतिक सुख मिलेगा। ठीक? अब वहाँ पूरी पढ़ाई हो रही है जिसका कुल उद्देश्य यही है कि कैंपस प्लेसमेंट। और इतना ही नहीं है वहाँ प्रचारित भी किया जा रहा है, 'हमारे यहाँ आओ, इतने लाख की नौकरी लग जाएगी।' ये जंगली घटना नहीं घट रही है यहाँ पर? ये जंगली शिक्षा नहीं है क्या?

तो फिर मैं सिर्फ़ फ़िल्म इंडस्ट्री को दोष कैसे दूंँ? लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री में जो हो रहा होता है वो कैमरे के सामने आपको दिखाई देता है आप कहते हो, 'देखो, एक अर्धनग्न स्त्री है, वो नाच रही है, छी:-छी:-छी:! आप ऐसे कहना शुरू कर देते हो।

और एक कैंपस है जहाँ पर प्रोफेसर जो कुछ पढ़ा रहे इस हिसाब से पढ़ा रहा है कि तेरा प्लेसमेंट लग जाए अभी जब इंटरव्यू होने आएगा तो ये जवाब दे देना, वहाँ आपको दिखाई नहीं देता कि वहाँ भी ठीक वैसे ही नंगा नाच चल रहा है। वहाँ तो नहीं दिखाई देता न? आप कहते हैं, अरे, नहीं-नहीं-नहीं, यहाँ तो फ़लाना कोर्स पढ़ाया जा रहा है, फ़लानी स्किल डेवलप की जा रही है।' अरे, वहाँ भी नंगा नाच चल रहा है और क्या हो रहा है!

यह बात समझनी बहुत ज़रूरी है नहीं तो हमें यह भ्रम रह जाएगा कि हमारा बाक़ी समाज तो बहुत अच्छा है बस फ़िल्म इंडस्ट्री ही कूड़ा है। इसी भावना से जैसे ही सवाल पूछा गया है कि साहब ये बाक़ी सब जो उद्योग चल रहे हैं ये तो सब दूध के धुले हैं ये फ़िल्म इंडस्ट्री वाले जो हैं इन्होंने ही आकर के भ्रष्टाचार फैला रखा है और सबको बर्बाद कर रखा है।

फ़िल्म इंडस्ट्री में जो हो रहा है वो हर इंडस्ट्री में हो रहा है और हर इंडस्ट्री में जो हो रहा है वो हर घर में हो रहा है फ़िल्म उसको निश्चित रूप से बढ़ा-चढ़ा करके दिखा देती है क्योंकि उनको आपमें उत्तेजना का संचार करके अपनी जेबें भरनी है।

लेकिन मूल रूप से फ़िल्में जो कुछ दिखा रही हैं देखिए, वो कहानी तो घर-घर की ही है। यह स्वीकार करने में सबको बहुत बुरी लगती है। एक छोटा सा वीडियो निकाला था संस्था की टीम ने और उसका शीर्षक दे दिया था घर-घर में पोर्न स्टार उसको देखा भी बहुत लोगों ने वो विज्ञापित भी किया गया।

और उस पर संस्था को गालियांँ भी खूब आईं। बोले, 'ऐसा थोड़े ही होता है। घर-घर में थोड़े ही पोर्नस्टार होते हैं!' क्या बोल रहे हैं ये? मैं अपनी बात पर क़ायम हूँ। बल्कि वो वीडियो इतना चला कि आपमें से भी कई लोग हो सकता है उसी को देख करके पहली बार मेरे पास आए हों। बहुत देखा लोगों ने उसको। इतना देखा इसी से सिद्ध होता है कि घर-घर में पोर्न स्टार। नहीं होते तो उस शीर्षक में इतनी रुचि क्यों होती?

हमने तो न जाने कैसे-कैसे शास्त्रीय शीर्षकों वाले वीडियो भी प्रकाशित करे हैं उनके चार सौ छियासी व्यू हैं आज तक, सात साल पहले से वो हैं। पर घर-घर में पोर्न स्टार के कितने हो गए? कितने हो गए, भाई कमल? दो करोड़ तो हो गए होंगे आराम से। देखे ही जा रहें हैं लोग उसको। और देखकर बोलते हैं, 'छी:-छी:- छी:!' ऐसा थोड़े ही होता है! हमारे घर तो ऊँची सभ्यता और चैतन्य संस्कृति के मंदिर हैं। इनमें ये सब नहीं होता।' मैं कह रहा हूँ — होता है। एकदम खुल्ला नहीं होता तो छुप-छुप कर होता है, बहुत स्थूल रूप से नहीं होता तो सूक्ष्म रूप से होता है। शारीरिक रूप से यदि नहीं होता तो मानसिक रूप से होता है, पर होता है। समझ में आ रही है बात?

अब मुझे बताओ करें तो क्या करें फ़िल्म इंडस्ट्री वाले? जब घर-घर में पोर्न स्टार। आपको कुछ और दिखाएंँ तो आप देख लोगे? हाल में दो फ़िल्में आईं जो मुझे ठीक लगीं एक ट्रिपल सेवन चार्ली और एक ये नंबीनारायमन वाली। हॉल खाली ही पड़ा था जब मैं वहांँ बैठा था, मैंने कहा, 'अच्छा है। बढ़िया।' और दोनों में एक बात साझा थी उत्तेजना कहीं नहीं थी, मसाला नहीं था। न तो हवा में कारें उड़ रही थीं, न वहाँ कोई बैठा था जो शर्ट फाड़कर के अपनी छाती दिखा रहा है, अपने बाजू दिखा रहा हो कि देखो मुझको, अभिनेता नहीं हूंँ, मैं पहलवान हूँ।

तो यह व्यवस्था ऐसी ही रही है और ऐसी ही रहेगी। प्रकृति हल्की चीज़ नहीं है उसने हमें जानवर बनाया है और हम जानवर ही रहने वाले हैं। जानवर हम सदा से हैं। फिर दोहरा रहा हूँ एक इमारत खड़ी कर लेने से और उस इमारत के भीतर गैजेट्स भर लेने से और कपड़े पहन कर बैठ जाने से और भाषा सीख लेने से इन्सान नहीं बन जाते हम।

नर नहीं हैं हम, नर पशु हैं। और हमारी सारी इंडस्ट्रीज का एक सा हाल है जो आपकी मैनुफेक्चरिंग इंडस्ट्री है, जो आपकी कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री है, ये इतनी जंगली हैं कि इतने सारे जंगल काट डाले। सोच के देखिएगा। चाहे मुंबई के आरे की बात हो, चाहे छत्तीसगढ़ के जंगलों की बात हो इसको तो आप इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोलते हो न?

इसमें इतने जंगली लोग हैं, इसमें इतने पाशविक इरादे हैं कि इन्होंने जंगल काट डाले। आदमी के भीतर का जंगल इतना ख़तरनाक है। पशुओं का जंगल तो बड़ा निरीह होता है बेचारा, आदमी का जंगल पशुओं के जंगल को तुरंत काट डालता है। कहीं के नहीं बचते हो।

तो क्या उपाय है? करें क्या? वही उपाय है जिसकी चर्चा दो बार कर चुका हूँ — सिरफिरे लोग चाहिए। सिरफिरे लोग चाहिए जो प्रकृति की धारा से छिटकने का ख़तरा उठाने को तैयार हों। क्योंकि प्रकृति की धारा तो जैसे चली वैसी ही चलती रहेगी इसलिए मैं सबसे ज्यादा दोष उनको देता हूँ, सबसे ज्यादा क्रोध भी मुझे उन पर आता है जो बातों को समझते हैं लेकिन फिर भी अपनी समझ पर अमल करने का जोखिम नहीं उठाते।

जिन्हें कुछ समझ में ही नहीं आया यूंँ ही बेहोंश घूम रहे हैं सड़कों पर उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं रहती, पर जो लोग बातों को समझने लगे हैं लेकिन फिर भी जी जानवरों के तरीक़े से ही रह रहे हैं, घुसे हुए हैं किसी इंडस्ट्री में और उस इंडस्ट्री के ही जंगली नियम क़ायदों का पालन करते हुए अपनी जेब भर रहे हैं उनसे मुझे बड़ी आपत्ति है। क्योंकि सिर्फ़ यही लोग हैं जो कुछ अलग कर सकते हैं। एड़े।

एडा़ समझते हो? क्या? – पागल। पागल घाटा सहे जा रहा है लेकिन कह रहा है, जानवर हूँ नहीं अगर तो जानवर की तरह जीऊंँगा भी नहीं और घाटा सहने में उसे बहुत तकलीफ़ भी नहीं हो रही है, बताओ क्यों? क्योंकि मुनाफे की बहुत माँग भी जानवर को ही होती है जब वो व्यक्ति जानवर रह ही नहीं गया तो फिर बहुत मुनाफा भी नहीं माँगता। मुनाफाखोरी का लोभ भी जंगल का ही गुण है, कुछ ऐसा करूँ जिसमें कुछ लाभ हो रहा हो, लाभ नहीं हो रहा तो मैं नहीं करूँगा।

शेर हिरण के पीछे दौड़ रहा है ऐसे थोड़े ही कि दौड़ने में आनंद आ रहा है उसको, कि आओ किल्लोलें करें। मैं और हिरण क्या करते हैं, हम आगे-पीछे दौड़ते हैं मज़े ले रहे हैं। शेर हिरण के पीछे क्यों दौड़ता है, बड़ी मेहनत से दौड़ता है ठीक उतनी ही मेहनत से जैसे एक सीईओ लगा हुआ है पूरी मेहनत से और लोग कहते हैं, 'तू कितना मेहनती! कितना मेहनती है!

शेर भी उतना ही मेहनती है पर वो मेहनत क्यों कर रहा है? क्योंकि उसे जान लेनी है, जान क्यों लेना है? क्योंकि वो देह है। और देह के पास एक पेट होता है, पेट भरना है उसको। समझ में आ रही है बात?

तो चाहे फ़िल्म इंडस्ट्री हो चाहे कोई क्षेत्र हो, राजनीति हो, विज्ञान हो आप उद्योग का नाम बताइए न! कोई उद्योग हो — शिक्षा उद्योग हो, हमें ऐडे़ लोगों की ज़रूरत है, हमें ऐसों की ज़रूरत है जो भीड़ से बिलकुल अलग खड़ा होने का साहस भी रखते हों और उस अलगाव में उस अनूठेपन में, उस अकेलेपन में उनको आनंद भी आने लग जाए।

वो उस एकांत को सिर्फ़ झेलें ही नहीं, उसका उत्सव मनाएंँ हमें ऐसे लोग चाहिए। फ़िल्म इंडस्ट्री में भी और हर जगह टेक्नोलॉजी में, स्वास्थ्य में, आप जितने भी उद्योगों का नाम ले सकते हो उन सब में हमें ऐसे लोग चाहिए। नहीं तो कोई भी उद्योग होगा वो क्या होगा? जंगल का ही एक सभ्य और सांस्कृतिक रूप होगा, और कुछ नहीं।

ऊपर-ऊपर से लगेगा — 'देखो, अरे वाह रे! वाह! बड़ी सफ़ाई है ऑफिस में, जंगल में इतनी सफ़ाई थोड़े ही होती है। फर्श देखो कैसे चमक रहा है ऑफिस का।' और आप थोड़ा सा जाकर उनका मन देखोगे तो मन में क्या पाओगे? खून, पैने दाँत, चाकूओं जैसे पंजे, हिंसक आँखें, आक्रामक इरादे, रक्त पिपासा। भीतर-ही-भीतर ये सब होगा। जानवर इस मामले में थोड़ा सा ईमानदार होता है। वह बाहर-बाहर सफ़ाई करके नहीं रखता।

कबीर साहब ने बोला कि कौए को भला मानो बगुले से। बगुला कैसा है? बाहर-बाहर सफ़ेद है और पानी में खड़ा हो जाता है एक पाँव उठाकर जैसे तपस्या कर रहा हो। और करता क्या है वहाँ वो? मछली का इंतजार कर रहा है।

"तासो ते कौआ भला, तन मन एक ही रंग।" कह रहे हैं — उस बगुले से तो कौआ भला है जिसका तन और मन दोनों एक रंग के हैं जिसका बाहर भी पता चल जाता है कि काला है। इंसान बगुला है। बाहर से सफ़ेद भीतर से काला। जंगल कौए जैसा है, वहाँ भीतर जो है बाहर भी वही होगा। वहाँ पता चल जाता है। शेर पहले आकर आपसे हाथ नहीं मिलाएगा, गले नहीं मिलेगा। ये नहीं पूछेगा, 'और भाभी जी कैसी हैं?' उसको आपको मरना है आपको देखेगा गुर्राएगा और ख़त्म कर देगा।

समझ में आ रही यह बात?

तो सबसे पहले तो ये अहंकार छोड़ दीजिए कि हम मनुष्य हैं तो हम जानवरों से तो श्रेष्ठ हैं। नहीं, हम जानवरों से ज़्यादा गिरे हुए हैं। और फिर ये भ्रम छोड़ दीजिए कि कुछ चुनिंदा उद्योग ही हैं जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री जिन्होंने भ्रष्टाचार फैला रखा है, जिन्होंने लोगों का मन ख़राब कर रखा है। सबने कर रखा है हर इंसान ने, हर उद्योग ने, हर धंधे ने, हर घर ने, सबने कर रखा है।

हर उद्योग में हमको कोई एड़ा चाहिए, हर घर में हमें कोई सरफिरा चाहिए। हर स्कूल में, हर कॉलेज में हमें कोई विद्रोही चाहिए समझ में आ रही है बात?

कोई सभा हो, कोई बैठक हो, कोई मजलिस हो, हमें एक क्रांतिकारी चाहिए। और एक कह रहा हूँ क्योंकि एक से ज़्यादा की मुझे कोई उम्मीद नहीं है। प्रकृति का बहाव बड़ा भारी है, वो पूरी जनसंख्या को बहा ले जाता है। उसमें से कोई एक भी मिल जाए तो गनीमत है।

ये उम्मीद करना कि कोई दिन आएगा जब पूरी-की-पूरी जनसंख्या चेतना के तल पर उठ खड़ी होगी और कहेगी, 'न हम जानवर हैं, न जानवर की तरह जीना है। यह मैं चाहता तो बहुत हूँ, सोचता ही भर हूँ।' तो ऐसा लगता है जैसे फुहार, आनंद आ गया बिलकुल।

पर वो सोच की ही बात है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जा रही मुझे समझ में आ रहा है कि बहुत उम्मीद रखनी नहीं चाहिए। वो दिन शायद कभी नहीं आ पाएगा जब धरती का हर इंसान एकदम देवता समान हो जाएगा। वो दिन शायद कभी नहीं आएगा, वो हो सकता हो या न हो सकता हो लेकिन कुछ लोग तो सिरफिरे ज़रूर हो सकते हैं। उन्हीं लोगों के दम से ये दुनिया है।

जीजस ऐसे लोगों को कहते हैं, "सॉल्ट ऑफ द अर्थ" (धरती के नमक)। यही वो कुछ गिने-चुने लोग हैं जिनके कारण ये जो बाक़ी समाज है, जिसमें पशु-ही-पशु हैं, ये भी बस चल पा रहा है। उन मुट्ठी भर लोगों का निर्माण करने के लिए ही हमारा भी पूरा आंदोलन है।

कितनी बार मैंने बोला कि श्रोता नहीं चाहिए, योद्धा चाहिए। लोग चाहिए जो जब यहाँ से वापस जाएँ तो कुछ ऐसा करें जिसमें चेतना की सुगंध हो। नहीं तो जानवरों की तरह खाना, कमाना; यह तो हर कोई कर लेता है। और देखो, अब समय वो आ गया है न, जब खाना, कमाना हर आदमी कर रहा है। हर आदमी के पास पैसा है और आज नहीं तो कल हो जाएगा।

आर्थिक तरक्की ज़ोरों से चल रही है तो अगर आपने यही बना रखा है अपनी ज़िंदगी का लक्ष्य कि आपके पास भी पैसा हो तो आपने कोई बड़ी बात नहीं कर दी कमा भी लिया बहुत तो।

आप यहाँ आए हैं, आप में से बहुत लोग वायु मार्ग से आए होंगे तो एयरपोर्ट पर भीड़ कितनी देखी? ज़बर्दस्त भीड़! मैं यहाँ उतरा बारिशों में पहली बार आ रहा हूँ। तो मैंने पूछा टैक्सी ड्राइवर से, मैंने कहा, 'यहाँ इस समय भी उतनी भीड़ जितनी जाड़ों में होती है, जितनी पीक सीजन में होती है उतनी अभी भी है।' होटलों के रेट जितने जाड़ों में थे उससे कुछ ज़्यादा ही होंगे, कम नहीं हैं। और लोग दे रहे हैं।

दे रहे हैं से आशय क्या है? कि पैसा अब सबके पास है। हर आदमी फ्लाइट से चल रहा है, हर आदमी महँगे होटल में रुकने की काबिलियत रखने लगा है और जो लोग आज नहीं रख रहे, मैं कह रहा हूँ वो कल रखेंगे। तो आपने कौन सा तीर मार लिया अगर आपने भी पैसा कमा लिया तो? बताइए न!

तो बताइए न इसी में खुश हुए जा रहे हो कि मैं अभी पाँच हज़ार वाले, दस हज़ार वाले होटल में रुक लेता हूँ, पंद्रह हजार वाले में। हर आदमी रुक रहा है। 'मेरे पापा जी बजाज स्कूटर पर चलते थे, मैं स्पाइस जेट में बैठकर आया हूँ।' वह पूरा भरा हुआ है, तुम नहीं, बैठे सब बैठे हैं, तुमने क्या कर लिया?

तुमने क्या कर लिया? कुछ करके दिखाओ न! एड़ा — वो चीज़ है जो कोई करके नहीं दिखा पा रहा। वो करके दिखाओ न! रही होगी कभी बहुत गरीबी, सौ साल पहले आज से। जब यही बहुत बड़ी बात थी कि फ़लाना आदमी अब दो वक्त की रोटी खा लेता है अच्छे से। मालूम है? तब एक समय ऐसा भी था जब यही बहुत बड़ी बात होती थी किसके घर में खाने को पूरा-पूरा है, वो बहुत बड़ी बात होती थी।

एक ज़माना था जब शक्कर तक नहीं होती थी लोगों के घर में। जब शक्कर भी नहीं होती थी लोगों के घर में तो कोई भी अगर चीज़ है जो खाने में अच्छी लगी तो उसको बोलते थे, 'बड़ी मीठी है, बड़ी मीठी है। क्यों बोलते थे बड़ा मीठा है? क्योंकि मीठा शब्द ही दुर्लभता का द्योतक हो गया था। जो चीज़ दुर्लभ हो उसको बोलते थे मीठी। क्योंकि शक्कर दुर्लभ होती थी। हर आदमी के घर में शक्कर होती नहीं थी, गुड़ भी नहीं होता। तो जो कुछ भी दुर्लभ हो उसको मीठा बोलते थे।

वो एक ज़माना था तब बड़ी बात होती थी कि किसी ने कुछ कमा लिया। कमा लोगे, कमा लोगे, क्या रखा है! अच्छे कपड़े पहन लिए एक समय की बात होती थी, बड़ी बात थी। हर आदमी के पास है अब अच्छे कपड़े। पहन लो क्या हो गया और पहन लेते हो न उसके बाद पता भी नहीं चलता कि कौन से ब्रांड का है। क्या पता! कुछ नहीं पता‌ गाड़ी भी आज सबके पास है। क्या कर लोगे अगर तुमने गाड़ी कमा ली तो?

सन् २००३ में मैंने अपनी पहली कार खरीदी थी नयी-नयी नौकरी थी तब। तो वो पाँच-छह लाख की तब आई थी और उसके बाद से बढ़ती कीमतों के बावज़ूद कारों की कीमत लगभग उतनी ही रही है, थोड़ी-बहुत बढ़ी होगी। छह लाख में आज भी आपको एक ठीक-ठाक कार मिल जाती है, कि नहीं मिल जाती है? और बीस साल पहले भी मैंने छह लाख में खरीदी थी तो हर आदमी आज कार खरीद सकता है। हर आदमी क्यों खरीद सकता है जानते हो? क्योंकि हर आदमी ने खरीद रखी है।

इकोनॉमिक्स ऑफ स्केल में यही होता है जब हर आदमी कुछ खरीदता है। तो चीज़ सस्ती हो जाती है। तो तुमने कौन सा लठ गाड़ दिया या तुमने क्या उखाड़ लिया अगर तुमने भी कार खरीद ली तो? तुम्हारे पास भी है, तुम्हारे पड़ोसी के पास भी है और ज़्यादातर घरों में एक नहीं, कई कारें हैं। और मैं कह रहा हूँ आज नहीं है तो कल होंगे तो इन सबको जीवन का लक्ष्य बनाकर बैठे हो क्या?

कुछ और करके दिखाओ न जीवन में। हम जब छोटे थे तो कुछ चुनिंदा दुकानें होती थीं जिनमें एसी लगा होता था तो कई बार भाग-भागकर आते उन दुकानों में। कुछ करना नहीं है फिर भी खड़े हैं। ख़ासतौर पर बरसात का मौसम और उत्तर भारत की बरसात जहाँ चिपचिपापन होता है, उमस के साथ गर्मी; तब जाकर वहाँ खड़े हैं।

आज एक-एक घर में चार-चार एसी लगे हुए हैं तो यही तुमने बहुत बड़ा काम कर लिया कि दो टन का एसी खरीद लाये? बग़ल का छंगूलाल भी ले आया है तो तुमने क्या उखाड़ लिया? क्या उखाड़ लिया? कुछ और करके दिखाओ न! है दम, वो आग कहाँ है जो भीतर के जंगल को जला दे? बाहर के जंगल तो सब जला दिए, काट दिए, राख हो गए; भीतर का जंगल कब जलेगा? नहीं समझ में आ रही बात?

ये हमारे बचाव का तरीक़ा होता है, 'अजी साहब, समाज को तो नेताओं ने ख़राब कर रखा है। सब नेताओं को गोली मार दो।' अच्छा! तो नेता बुरे हैं, समाज अपनेआप में बड़ा अच्छा है, समाज पाक साफ़ है! नेताओं ने आकर गंदगी मचा रखी है! अच्छा, इन नेताओं को चुना किसने? सौ-सौ रुपए के लिए तो वोट बिकते हैं और जहाँ सौ रुपये के लिए नहीं बिकते वहांँ पर जात के नाम पर बिक जाएँगे, धर्म के नाम पर बिक जाएँगे, किसी और बेवकूफ़ी के नाम पर बिक जाएँगे। कोई आकर कोई चीज़ बता दे — 'फ्री दे दूंँगा, फ्री दे दूंँगा।' खट से वोट पड़ जाएगा और (कहते हैं) 'नेता बुरे हैं, नेता बुरे हैं।'

नेता ठीक वैसे ही है जैसा घर है तुम्हारा। घर भ्रष्ट है, इसलिए नेता भ्रष्ट है। और घर क्यों भ्रष्ट है? क्योंकि मन भ्रष्ट है, मन भ्रष्ट है तो घर भ्रष्ट है, घर भ्रष्ट है तो समाज भ्रष्ट है, समाज भ्रष्ट है तो नेता भ्रष्ट है। बात कुल यह है कि आम आदमी भ्रष्ट है। आम आदमी ही भ्रष्ट है।

कोई मिल जाए बहुत ईमानदार नेता उसको सबसे पहले आम आदमी उठाकर बाहर फेंक देगा क्योंकि ईमानदार नेता से सबसे ज्यादा तकलीफ़ आम आदमी को हो जानी है। जो भी काम कर रहे हो उसमें कुछ चैतन्य करके दिखाओ। होगी आपकी कोई भी इंडस्ट्री , आप डॉक्टर हो सकते हैं, आप वकील हो सकते हैं, आप आईटी में हो सकते हैं। आप जहाँ भी हैं वहाँ होने का आपका मक़सद क्या है? वहाँ होकर आप क्या काम कर रहे हैं?

आप एक आईटी प्रोफेशनल (कर्मचारी) हैं हेविली पेड और कर क्या रहे हैं? 'बूचड़ खाने के लिए सॉफ्टवेयर लिख रहे हैं।‌' बड़ी-बड़ी हैं फूड प्रोसेसिंग कंपनियांँ (खाद्य प्रसंस्करण) हैं, वो फूड प्रोसेसिंग क्या है वो मीट प्रोसेसिंग (माँस प्रसंस्करण) है। उनको भी सॉफिस्टिकेटेड सॉफ्टवेयर चाहिए होता है।

आईटी प्रोफेशनल हैं करोड़ों में कमाते हैं वो भी डॉलरों में और कर क्या रहे हैं कसाई घर का सॉफ्टवेयर लिखते हैं कि वहाँ पर और ज़्यादा एफिसिएंटली (दक्षता) से जानवरों की हत्या हो सके।

'देखिए, पहले आपके पास एक आईटी बैकबोन (तकनीकी आधारित व्यवस्था) नहीं थी तो आप एक दिन में सिर्फ़ आठ लाख जानवर काट पाते थे। पर हमने जो आपको ये नया कोड लिखकर दिए हैं आपका आईटी एनेबल सिस्टम होगा। अब आप दिन में पच्चीस लाख जानवर काटोगे'

पर इनका दिखाई नहीं पड़ेगा न! एक फ़िल्मी एक्ट्रेस पर्दे पर अश्लील नाच करती है तो दिखाई पड़ जाता है सब लोग बोलते हैं – 'थू-थू-थू-थू!' ऊपर-ऊपर से थू-थूू बोलते हैं, बाद में तो ख़ूब देखते हैं। लेकिन यही जो एक आईटी प्रोफेशनल होता है जब एक बूचड़ खाने के लिए कोड लिखता है तो किसी को दिखाई नहीं पड़ता तो इसमें कोई थू-थू करने नहीं आता। तो बहुत आसान है कि नेताओं को कह देना कि नेता भ्रष्ट हैं और फ़िल्म इंडस्ट्री भ्रष्ट है।

मुझे बताओ, भ्रष्ट कौन नहीं है? और भ्रष्ट रहेंगे। ठीक? ये उम्मीद मत करिएगा कि जब सब साफ़ होंगे तो हम भी साफ़ हो जाएंँगे। सफ़ाई अपनेआप में एक विद्रोह है, एक क्रांति है। जिसे सही जीवन जीना है वो इंतज़ार नहीं करेगा कि जब बाक़ी सब सही हो जाएँगे तब हम भी सही हो जाएँगे।

जिसे सही मंज़िल पहुँचना है वो ये इंतज़ार नहीं करेगा कि सब लोग ग़लत गाड़ी में सवार हैं जब पूरी गाड़ी रुकेगी और जब सभी लोग उतरेंगे तब मैं साथ में उतरूँगा। नहीं। ग़लत गाड़ी में सवार हो, ट्रेन ही पूरी ग़लत है। भरी हुई है ट्रेन और जा रही है ग़लत दिशा की ओर तुम ये तो छोड़ दो कि जब सब उतरेंगे तब तुम कहो, 'मैं तभी उतरूँगा'। तुम ट्रेन के रुकने का भी इंतज़ार मत करो, तुम चलती ट्रेन से छलांग मार दो। बुरे से बुरा क्या होगा? मर जाओगे। पर अगर ज़िंदा रह गए उस ट्रेन के भीतर तो ज़िंदगी मौत से बदतर होगी। इससे अच्छा कूद पड़ो। मर गए तो मर गए लेकिन अगर बचोगे तो मौत जैसी ज़िंदगी से बच जाओगे।

और ये कितनी दुर्बलता का, कैसी नपुंसकता का तर्क होता है, 'अजी साहब, ज़माना ऐसा है। यह तो कलयुग है, साहब। यह तो कलयुग है। यहांँ तो ऐसा ही चलेगा। क्या कर सकते हैं! छोड़िए। — राधे-राधे! — यह तो कलयुग है, साहब सब भ्रष्ट हैं, हम भी भ्रष्ट हैं, क्या कर सकते हैं?'

देखिए, सबसे बड़ा दरिंदा ये आदमी है जो कहता है, 'सब भ्रष्ट हैं तो हम क्या कर सकते हैं?' अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता। कितना अद्भुत श्लोक सुनाया है तुमने! 'अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता'! ज़रूर सीधे उपनिषदों से आया होगा या भगवद्गीता या अष्टावक्र गीता से ही आया है! 'अकेला चना पहाड़ नहीं फोड़ सकता।'

संस्कृत में क्या कहेंगे इसको? कोई जानता है तो। वाह! क्या बात बोली है! 'घोर कलयुग, घोर कलयुग! राम-राम!'

कुछ नहीं कलयुग, सतयुग होता है। व्यक्तिगत बातें हैं। जो सही ज़िन्दगी जी रहा है वो आज भी सतयुग में जी रहा है। जो सही ज़िन्दगी जी रहा है वो आज भी सतयुग में जी रहा है और तुम्हारे सामने राम खड़े हों, चाहे कृष्ण खड़े हों उससे द्वापर या त्रेता नहीं आ जाते। कृष्ण के सामने शकुनी भी था तो कलयुग नहीं था क्या तब शकुनी के लिए? या यह कहोगे कि नहीं वो तो कृष्ण का युग था वो कलयुग कैसे हो सकता है?

कृष्ण के युग में भी शकुनी के लिए कौन सा युग चल रहा था? कलयुग ही चल रहा था।‌ तो यह बहुत व्यक्तिगत बात होती है आप पर निर्भर करती है। जो आपके मन की दशा है वैसा ही आपका युग चल रहा है। यह सब कुछ नहीं है कि अभी कलयुग चल रहा है आज भी बहुतों के लिए सतयुग चल रहा है और जब सतयुग चल रहा था तब भी अधिकांश लोगों के लिए कलयुग ही चल रहा था, यह तो आपके अंदर की बात है।

राम के सामने ये सब जो राक्षस-राक्षसनियाँ थे, जो आकर के ऋषियों का यज्ञ भंग किया करते थे, ज़िन्दा लोगों को फाड़ कर खा जाते थे; तब उनका सतयुग, द्वापर युग चल रहा था? क्या चल रहा था उनका? उनका तो कलयुग ही था न? तो कलयुग आज भी है जो भ्रष्ट लोग हैं उनके लिए और कलयुग तब भी था। और जो सही है उसके लिए तब भी सतयुग था आज भी सतयुग है।

तो युग वगैरह का हवाला मत दीजिए, ये बेईमानी की बातें है। इंसान हो अगर तो उठकर खड़े हो। जानते हो अगर सही क्या है तो उसपर जी कर दिखाओ। बोल रहे हो फ़िल्म इंडस्ट्री में हो और कि वहाँ पर बेईमानी बहुत है, उथलापन बहुत है तो कुछ गहरा करके दिखाओ न! शिकायत करने से क्या होगा?

नहीं? तो आइए ये फिर महोत्सव थोड़े ही चल रहा है इसको एक मातम में तब्दील कर देते हैं और सब लोग बैठकर के छातियाँ पीटते हैं कि हाय-हाय घोर कलयुग, घोर कलयुग, ज़माना ही ख़राब है, ये इंडस्ट्री भी ख़राब है वो भी ख़राब है, सब कुछ ख़राब है। एक सामूहिक रूदन करते हैं सब मिल करके।

उससे अहंकार को बड़ा सुख मिलता है कि पूरी दुनिया भ्रष्ट है और हम पाक-सफ़ा हैं बिलकुल। बड़ा मज़ा आता है। ये करने के लिए इकट्ठा हुए हैं यहाँ पर? मैं तो नहीं चाहूँगा ऐसा।

YouTube Link: https://youtu.be/7SQYg__9ksc

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