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अगर बच्चों का मन पढ़ाई में नहीं लगता हो || आचार्य प्रशांत (2018)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: आचार्य जी, मेरा एक बेटा आठ साल का है और एक दस साल का। उनका मन बिलकुल भी पढ़ाई में नहीं लगता, वो बिलकुल भी पढ़ना नहीं चाहते। ऐसा क्या करूँ कि उनका मन पढ़ाई में लगने लगे?

आचार्य प्रशांत: तुम उन्हें पढ़ाना क्यों चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: मुझे उन्हें नौकरी नहीं करानी है, पर वो कुछ तो सीखें ज़िंदगी में।

आचार्य प्रशांत: क्या?

प्रश्नकर्ता: वो कुछ भी नहीं पढ़ेंगे, तो ऐसा कैसे चलेगा?

आचार्य प्रशांत: पहले ये बताओ कि वो क्यों पढ़ें?

प्रश्नकर्ता: फिर वो ज़िंदगी को कैसे जान पाएँगे?

आचार्य प्रशांत: क्या चाहते हो कि वो जान जाएँ?

प्रश्नकर्ता: मेरा बेटा आठ साल का हो गया है, और वो अब तक हिंदी भी नहीं पढ़ पाता है।

आचार्य प्रशांत: हिंदी क्यों पढ़े वो?

प्रश्नकर्ता: क़िताबें पढ़ने के लिए।

आचार्य प्रशांत: क़िताबें क्यों पढ़े वो?

प्रश्नकर्ता: समझने के लिए।

आचार्य प्रशांत: क्या समझने के लिए?

प्रश्नकर्ता: कैसे जी पाएँगे दुनिया में फिर वो?

आचार्य प्रशांत: तुम फिर बहुत आगे कूद गए। मैंने पूछा, “क़िताबें क्यों पढ़ें?” तुमने कहा, “कैसे जी पाएँगे?” ये बच्चा यहाँ पर क़िताबें नहीं पढ़ता, ये जी नहीं रहा है क्या?

प्रश्नकर्ता: मैं नहीं चाहता कि ऐसा जिए वो।

आचार्य प्रशांत: तो समझाओ न। क़िताबें नहीं पढ़ेगा तो क्या हानि हो जाएगी?

प्रश्नकर्ता: व्यापार नहीं कर पाएगा।

आचार्य प्रशांत: व्यापार क्यों करे वो?

प्रश्नकर्ता: पैसा कमाने के लिए?

आचार्य प्रशांत: पैसा क्यों चाहिए?

प्रश्नकर्ता: जीने के लिए ।

आचार्य प्रशांत: वो कहे, “मुझे जीने के लिए बहुत कम चाहिए, वो हो जाएगा,” तो?

सवाल ये नहीं है कि बच्चा पढ़ता नहीं है, सवाल ये है कि तुम्हें नहीं पता कि उसे पढ़ना क्यों चाहिए। तुम्हें पता होता कि उसे क्यों पढ़ना चाहिए, तो अब तक तुमने उसे समझा दिया होता। पहले ख़ुद तो निश्चय करो कि वो क्यों पढ़े। अगर तुम उसे सिर्फ़ इसलिए पढ़ाना चाहते हो कि दुनिया के सब बच्चे पढ़ते हैं और यही प्रथा है, तो ये तर्क बच्चे को बहुत प्रभावित नहीं करता।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे बच्चे पढ़ने में औसत भी नहीं हैं।

आचार्य प्रशांत: मैं समझ गया बात को।

प्रश्न ये नहीं है कि वो ऊपर से लेकर नीचे तक किस पायदान पर खड़े हैं, प्रश्न ये है कि क्या तुम जानते हो कि उन्हें क्यों पढ़ना चाहिए। क्या तुम उन्हें साफ़-साफ़ दिखा पा रहे हो कि पढ़ने से क्या लाभ, और न पढ़ने से क्या हानि है? तुम दिखा पा रहे हो क्या? पहले पता तो कर लो कि पढ़ना आवश्यक क्यों है, फिर वो पढ़ेंगे। अभी तो उन्हें निश्चित रूप से न पढ़ने में ज़्यादा लाभ दिख रहा है।

जीव तो अपने लाभ हेतु ही, अपनी समझ से काम करता है। ठीक? एक बन्दर को भी जिधर केला दिखता है, उधर को चल देता है। एक कीड़े को भी जिधर ख़तरा दिखता है, उधर को वापस मुड़ लेता है। जीव तो काम करता है अपने स्वार्थ के लिए। तुम उन्हें दिखा पा रहे हो कि उनका स्वार्थ किधर है?

प्रश्नकर्ता: मैं उन्हें समझा नहीं पा रहा हूँ।

आचार्य प्रशांत: ख़ुद समझते हो? ख़ुद समझ लो न। शिक्षा बच्चे को क्यों मिले, पहले ख़ुद तो समझ लो। हम ख़ुद समझते नहीं, फिर हम बच्चा समझता नहीं, तो हम कहते हैं, “बच्चा बिगड़ैल है।”

प्रश्नकर्ता: पहले मैं उन्हें ख़ूब डाँटता था, पर आपके वीडियो देखने के बाद उन्हें डाँटना बंद कर दिया है। उन्हें अब बहुत प्यार करने लगा हूँ। बहुत प्यार से उनको समझाता हूँ, फिर भी नहीं समझ रहे हैं वो।

आचार्य प्रशांत: “आ बेटा आ! ये लॉलीपॉप ले और अब पढ़ाई कर।” कितना बुद्धु समझते हो उनको? किसी ने कहा है, “*चाइल्ड इस द फ़ादर ऑफ़ द मैन।*” जो कुछ तुम जानते हो, वो कुछ वो भी जानते हैं। उन्हें ज्ञान भले ही कम है, पर जो वृत्तियाँ तुम में हैं, वो वृत्तियाँ उनमें भी हैं, क्योंकि वो वृत्ति बच्चे में ही पहले होती है, व्यस्क में बाद में आती है। वो वृत्तियाँ बच्चे से ही व्यस्क में आती हैं। बच्चे द्वारा ही तो व्यस्क तक पहुँचती है वो। तभी तो कहा गया है, “*चाइल्ड इस द फ़ादर ऑफ़ द मैन।*” तो उनके पास ज्ञान नहीं होगा तुम्हारे जितना, पर वृत्तियाँ तो उनमें तुम्हारी वाली ही हैं।

अगर तुम जानते लालच, तो लालच तो वो भी समझते हैं। वो जान जाएँगे कि लालच दिया जा रहा है, ये प्रेम नहीं है। ये क्या है? प्रलोभन है।

प्रश्नकर्ता: फिर कैसे महत्त्व समझाऊँ उनको पढ़ने का?

आचार्य प्रशांत: समझो, पहले ख़ुद। ये जो पढ़ाई चल रही है, इसका क्या और कितना महत्त्व है, पहले ख़ुद समझो। फिर शायद ये भी जान जाओगे कि कैसे स्कूल में डालना है, कैसी क़िताबें देनी हैं, कैसी शिक्षा देनी है। अभी तो तुम ये चाहते हो कि किसी तरीक़े से वो औसत छात्र बनकर डिग्री वगैराह हासिल कर ले, ताकि तुम उनको किसी काम-धंधे में लगा दो। यही इच्छा है न?

प्रश्नकर्ता: नहीं, डिग्री की इच्छा नहीं है।

आचार्य प्रशांत: डिग्री की इच्छा नहीं है तो बाहर निकाल लो स्कूल से। स्कूल में तो डिग्री ही मिलती है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, डिग्री तो वो चाहेगा न जिसको नौकरी करानी हो।

आचार्य प्रशांत: तुम क्या चाहते हो उनको देना?

प्रश्नकर्ता: शिक्षा।

आचार्य प्रशांत: ‘शिक्षा’ माने क्या?

प्रश्नकर्ता: ज्ञान।

आचार्य प्रशांत: किस विषय में ज्ञान?

प्रश्नकर्ता: बस समझ आ जाए उनके जीवन में।

आचार्य प्रशांत: तुम उन्हें जीवन तो देना नहीं चाहते, तुम तो उनको व्यापार कराना चाहते हो। तुम उन्हें जीवन देना चाहते हो या व्यापारी बनाना चाहते हो? सही-सही बताना। तुम्हारी इच्छा तो व्यापार कराने की है। तुमने अभी क्या तय कर रखा है? कि मुझे उनसे नौकरी नहीं करानी है, मुझे उनसे व्यापार कराना है। तुम्हारे बच्चे आठ-दस साल के हैं, तुमने पहले ही तय कर लिया कि तुम उनसे नौकरी नहीं कराओगे, तुम उनसे व्यापार कराओगे।

वो ग़ुलाम हैं तुम्हारे कि तुम्हारी इच्छा पर चलें? जीवन जब तुमने उनका पहले की तय कर रखा है, तो तुम उन्हें जीवन दे कहाँ रहे हो? जीवन तो तुम उनको दे ही नहीं रहे। तुम्हारी चाहत ये है कि वो किसी तरीक़े से थोड़ा-बहुत पढ़ लें।

प्रश्नकर्ता: मैंने ये निर्णय इसीलिए लिया था क्योंकि मुझे लगता था कि ये ज़्यादा पढ़ तो नहीं पाएँगे। अच्छी नौकरी कैसे कर पाएँगे।

आचार्य प्रशांत: वो जब नर्सरी कक्षा में थे तब तुमने उपाधियाँ देखकर ही तय कर लिया था कि ये पढ़ने में तो कभी अच्छे हो ही नहीं सकते, तो चलो इनको व्यापार करा लेता हूँ। क्यों झूठ बोलते हो? आठ वर्ष का बच्चा तीसरी कक्षा में होगा। ठीक? और ये तुम और भी पहले से तय कर चुके हो। बालक पाँच वर्ष का है और तुम पहले से ही तय कर चुके हो कि अपने बच्चे को नौकरी नहीं व्यापार कराओगे। कह रहे हैं, “मैं तो बहुत ही उदार मना पिता हूँ। वो तो बच्चा पढ़ने में ठीक नहीं था, तो मैंने कहा कि व्यापार करेगा।”

तुम्हारे पास व्यापार पहले से है न ?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: तुम वही कर रहे हो जो हर आम व्यापारी करता है, कि – अपना व्यापार, अपनी दुकान संतान को सौंप जाऊँगा। वो क्यों तुम्हारे इरादों में सहभागी बनें भाई? तुमने उनसे पूछकर इरादे बनाए? तुम अपनी मर्ज़ी कर रहे हो, वो अपनी मर्ज़ी कर रहे हैं। तुमने अपनी मर्ज़ी से उनको जीवन दे दिया, अब वो अपनी मर्ज़ी से जीवन जी रहे हैं। तुमने उन्हें जीवन अपनी मर्ज़ी से दिया था न? उनसे पूछकर तो दिया नहीं। तुमने अपनी मर्ज़ी चलाई, अब वो अपनी मर्ज़ी चला रहे हैं।

तुमने अपनी मर्ज़ी से तय कर लिया कि उनको व्यापार कराना है, अब वो अपनी मर्ज़ी से तय करेंगे कि उन्हें क्या करना है। अब ये दोनों मर्ज़ियाँ आपस में लड़ती रहें, टकराती रहें। पूरा खेल तो समझो। तुम तो मुझसे युक्ति पूछने आए थे, तरक़ीब, कि – इन दो बालकों पर अपनी मर्ज़ी कैसे थोपूँ? कैसे आरोपित करूँ?

“मेरे दो लड़के हैं, वो मेरा कहा नहीं सुन रहे। उनको ढर्रे पर कैसे लाऊँ?” क्यों भई, मैं तुम्हारा साथ क्यों दूँ? मैं उनका साथ क्यों न दूँ?

पहले पता तो करो कि विकास माने क्या, शिक्षा माने क्या, इच्छा माने क्या। पहले पता तो करो कि जीवन की सार्थकता किसमें है। जब ये पता होगा, और ये तोहफ़ा तुम बच्चों तक लेकर जाओगे, तो बच्चे गदगद होंगे, तुम्हें स्वीकारेंगे। तुम उन तक वही सारी दुविधाएँ, तनाव और व्यर्थताएँ लेकर पहुँच जाओगे जो तुम्हारे जीवन में मौजूद हैं, तो बच्चे कहेंगे, “उपकार करो, हमें अकेला छोड़ो।”

“एक तुमने हमारे साथ अन्याय पहले ही कर दिया है हमें पैदा करके, अब आगे और अन्याय मत करो।”

अपने मन को देखो न कि क्या चाह रहा है, कि – व्यापार करेंगे, तो दुनिया का कुछ पता होना चाहिए। सरकार कैसे चलती है, रेलगाड़ी कैसे चलती है। ये सब पता क्यों होना चाहिए? ताकि इससे व्यापार करने में मदद मिले। भाषा का थोड़ा ज्ञान होना चाहिए ताकि पात्र इत्यादि लिख सके। कंप्यूटर का ज्ञान होना चाहिए, व्यापार में मदद मिलेगी। और वो अगर तुम्हारे इरादों से सहमति रखते ही न हों तो?

उनसे पूछा तुमने कभी कि, “ऐसा मेरा इरादा है, क्या तुम इससे इत्तेफाक़ रखते हो?” ये थोड़े ही पूछोगे तुम? घर के तो सब राजा होते हैं।

प्रश्नकर्ता: सुनते ही नहीं हैं वो मेरी।

आचार्य प्रशांत: अरे! तुम उनकी सुनते हो? क्यों सुनें तुम्हारी? और क्या सुनें? तुम्हारे पास बताने के लिए क्या है जो वो तुम्हारी सुनें? सिर्फ़ इसलिए तुम अपनी चलाना चाहते हो न ताकि तुम्हारा क़द ज़रा ऊँचा है, और तुम बाप कहलाते हो, और तुम्हारी उम्र ज़रा ज़्यादा है? “देखो मैंने तुम्हें पैदा किया है।” और ठीक इसी बात का वो तुम पर इल्ज़ाम रखते हैं। कहते हैं, “तुमने पैदा किया है।” तुम सोचते हो कि इसमें तुम्हारी बड़ी श्रेष्ठता है, बड़ा बड़प्पन है कि – मैंने पैदा किया है। वो कह रहे हैं, “तो ये गुनाह तुमने किया है?”

(हँसी )

अपने पर ध्यान दो, बच्चे ठीक हो जाएँगे अपनेआप, अगर ग़लत होंगे तो! अभी कोई आश्वस्ति नहीं है कि बच्चे ग़लत ही हों। ग़लत होते भी हैं अगर वो तो उसमें ज़्यादा बड़ा योगदान अभिभावकों का ही होता है। अपने पर ध्यान दो।

सबसे तो सीखने को तैयार रहते हैं बच्चे। टी.वी. देखते हैं, जो भी कुछ आ रहा होता है, वही सीख लेते हैं। तुम सोचो कि अगर तुमसे नहीं सीख रहे, तो कोई तो बात होगी न। उनको तो जो भी ज़रा-सा प्रभावित करता है, वो उसी से सीख लेते हैं।

तुम ऐसे तो बनो कि ज़रा प्रभावशाली लगो उनको। उन्हें भी पिता की बातों में ज़रा दम लगे, पिता के व्यक्तित्व पर ज़रा फक्र हो। फिर सीखेंगे। पहले तुम सीखो।

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