प्रश्नकर्ता: जब मैं कैम्प में था, तो मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने दुनिया को ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया। लेकिन जैसे ही वापस आया बीमार पड़ गया, तो ऐसा लगा कि मन पर दुनिया फिर से हावी हो रही है। काफ़ी सारे ढर्रे टूट चुके हैं, लेकिन कुछ ढर्रे ऐसे हैं कि नहीं टूटते। आराम करने की इतनी गहरी आदत लगी हुई है कि वो चाहकर भी नहीं टूट रही। और ऐसी ज़रूरत भी नहीं लग रही है कि तोड़ें। लेकिन ऐसा लगता है कि टूट गया तो कुछ और बचेगा नहीं।
ऐसा लगता है कि अगर कुछ करने का विकल्प मिले और व्यस्तता रहे, तो फिर कम्फ़र्ट (आराम) अपनी तरफ़ खींचेगा। ये तो काल्पनिक बात लगती है कि कम्फ़र्ट को छोड़ देंगे, लेकिन जब शरीर को धक्का लगा तो सब खुल गया, सामने आ गयी बात कि इतना आसान नहीं है। शरीर है, तो जब बीमार पड़ता है, तो पूरा ध्यान मॉंगता है, यही सब दिखा है।
आचार्य प्रशांत: ऐसा ही है। (मुस्कुराते हुए) देखो, जो हक़, जो स्थान, जो ताक़त, आत्मा की है, वो आत्मा की ही हो सकती है। ये बड़ा अहंकार है कि अपेक्षा की जाए कि वो ताक़त मन को मिलेगी अथवा वो सिद्धि शरीर को मिलेगी। अछूता रहना, स्वस्थ रहना, ये निर्गुण आत्मा के गुण हैं। शरीर को ये उपलब्धियाँ, ये वरदान नहीं सुलभ। शरीर तो शरीर है। ऐसा ही है। वो बीमार पड़ेगा, वो गिरेगा। जन्मा है, मृत्यु को भी प्राप्त होगा।
अब चुनौती है, अपितु ख़तरा है। आध्यात्मिकता के बारे में दो-चार शब्द जान लिये हैं। किसी ने कह दिया कि तुम ब्रह्म मात्र हो, सत्य स्वरूप हो और तुमने सोचना शुरू कर दिया कि मैं, मैं ही तो ब्रह्म हूँ। और जानते क्या हो तुम अपनेआप को? मन और शरीर। अब देखो कि होगा क्या।
तुम अपनेआप को मन और शरीर जानते हो। कहीं किसी शास्त्र में पढ़-सुन आये हो कि ब्रह्म हो, तो तुरन्त निष्कर्ष क्या निकलेगा तुम्हारा? कि मन और शरीर ही ब्रह्म है। ब्रह्म को भलीभाँति जानते हो कि कभी बीमार नहीं पड़ता। तो तुरन्त अब अपनेआप से भी क्या अपेक्षा करोगे? कि मैं भी बीमार नहीं पडूँगा। और अब जब बीमार पड़ोगे, और पड़ना तुम्हें है बीमार, क्योंकि शरीर रोगों का घर है। और अब जब बीमार पड़ोगे, तो तुरन्त क्या होगा?




