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अधूरेपन में आनंद || आचार्य प्रशांत (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: जब मैं कैम्प में था, तो मुझे ऐसा लग रहा था कि मैंने दुनिया को ख़ुद पर हावी नहीं होने दिया। लेकिन जैसे ही वापस आया बीमार पड़ गया, तो ऐसा लगा कि मन पर दुनिया फिर से हावी हो रही है। काफ़ी सारे ढर्रे टूट चुके हैं, लेकिन कुछ ढर्रे ऐसे हैं कि नहीं टूटते। आराम करने की इतनी गहरी आदत लगी हुई है कि वो चाहकर भी नहीं टूट रही। और ऐसी ज़रूरत भी नहीं लग रही है कि तोड़ें। लेकिन ऐसा लगता है कि टूट गया तो कुछ और बचेगा नहीं।

ऐसा लगता है कि अगर कुछ करने का विकल्प मिले और व्यस्तता रहे, तो फिर कम्फ़र्ट (आराम) अपनी तरफ़ खींचेगा। ये तो काल्पनिक बात लगती है कि कम्फ़र्ट को छोड़ देंगे, लेकिन जब शरीर को धक्का लगा तो सब खुल गया, सामने आ गयी बात कि इतना आसान नहीं है। शरीर है, तो जब बीमार पड़ता है, तो पूरा ध्यान मॉंगता है, यही सब दिखा है।

आचार्य प्रशांत: ऐसा ही है। (मुस्कुराते हुए) देखो, जो हक़, जो स्थान, जो ताक़त, आत्मा की है, वो आत्मा की ही हो सकती है। ये बड़ा अहंकार है कि अपेक्षा की जाए कि वो ताक़त मन को मिलेगी अथवा वो सिद्धि शरीर को मिलेगी। अछूता रहना, स्वस्थ रहना, ये निर्गुण आत्मा के गुण हैं। शरीर को ये उपलब्धियाँ, ये वरदान नहीं सुलभ। शरीर तो शरीर है। ऐसा ही है। वो बीमार पड़ेगा, वो गिरेगा। जन्मा है, मृत्यु को भी प्राप्त होगा।

अब चुनौती है, अपितु ख़तरा है। आध्यात्मिकता के बारे में दो-चार शब्द जान लिये हैं। किसी ने कह दिया कि तुम ब्रह्म मात्र हो, सत्य स्वरूप हो और तुमने सोचना शुरू कर दिया कि मैं, मैं ही तो ब्रह्म हूँ। और जानते क्या हो तुम अपनेआप को? मन और शरीर। अब देखो कि होगा क्या।

तुम अपनेआप को मन और शरीर जानते हो। कहीं किसी शास्त्र में पढ़-सुन आये हो कि ब्रह्म हो, तो तुरन्त निष्कर्ष क्या निकलेगा तुम्हारा? कि मन और शरीर ही ब्रह्म है। ब्रह्म को भलीभाँति जानते हो कि कभी बीमार नहीं पड़ता। तो तुरन्त अब अपनेआप से भी क्या अपेक्षा करोगे? कि मैं भी बीमार नहीं पडूँगा। और अब जब बीमार पड़ोगे, और पड़ना तुम्हें है बीमार, क्योंकि शरीर रोगों का घर है। और अब जब बीमार पड़ोगे, तो तुरन्त क्या होगा?

तुम्हारा ब्रह्म से ही यक़ीन टूट जाएगा। तुम आध्यात्मिकता पर ही शक करना शुरू कर दोगे। तुम कहोगे, ‘ये देखो। हमें बताया था कि हम अनादि हैं, अनन्त हैं। हमें बताया था कि हमारी ताक़त का कोई ओर-छोर नहीं और किसी छोटे से विषाणु ने आकर के ढपली बजा दी हमारी पूरी। पड़े हैं बिस्तर पर। ब्रह्म खाँस रहा है, ब्रह्म का पेट नहीं खुल रहा, ब्रह्म की रूमाल गन्दी।’

ये अच्छा तरीक़ा निकाला अहंकार ने। अपने से बड़ा कुछ उसे कभी भाता ही नहीं था। बताया क्या गया था? ब्रह्म अनन्त है। अहंकार को पुरानी चिढ़ थी कि ये जो भी है ब्रह्म इत्यादि, इसे ज़रा ऊपर से नीचे खींचकर लाऊँगा ज़रूर। और ले आया कि ये देखो, हम हैं ब्रह्म और ब्रह्म रहा है खाँस, तो ब्रह्म कैसे हो गया निर्विकार!

ये होता है जब सत्य को सत्य और संसार को संसार नहीं जानते। संसार सदा अधूरा है। देह और मन सदा अधूरे हैं। जब तक इनमें जी रहे हो, अधूरेपन में जीना सीखो। यही जीने की कला है। जिसे अधूरेपन में जीना नहीं आता, वो सदा तड़पेगा। जो लगातार पूरे की अकांक्षा करता रहेगा, वो पूरा कभी नहीं पाएगा। पूरा होने का हक़ — जो पहली ही बात कही थी उसे दोहरा रहा हूँ — पूरा होने का हक़ तुम्हारा नहीं है। पूरा वो है जो तुम्हारे पूर्ण समर्पण के बाद बचता है। पूरा वो है जो तुम्हारी अनुपस्थिति में बचता है।

पर देखो, तुम अपनी उदासी को देखो, अपनी निराशा को देखो कि कैसे तुमको बुरा लग रहा है। तुम कह रहे हो, ‘देखिए, कैम्प किया, वहाँ इतनी बातें सुनी, पर ज़रा सा बीमार हुए कि वो सारी बातें पीछे छूटीं, सब भूल गये।’ कैम्प में तुमसे कब कहा गया कि तुम बीमार नहीं होओगे?

‘सत्य बीमार नहीं होता।’

तुम सत्य हो क्या? अपने जीवन को देखो!

‘आत्मा की कोई मृत्यु नहीं होती।’

तुम आत्मा हो क्या? अपनी धारणाओं को देखो!

तो फिर तुम्हें क्षोभ क्यों हो रहा है कि मैं बीमार पड़ा और भूल गया? तुम तो अपनेआप को जो जानते और समझते हो, उसे बीमार पड़ना ही है, उसे भूलना ही है।

गहराई में जाओ, अपनी निराशा के कारण को समझो! कारण ये है कि तुम अपनेआप को वो मानते ही नहीं जो तुम हो। तुम हो एक सीमित देह, पर कहीं-न-कहीं मन में असीमित की आकांक्षा लिये हुए हो। ये आकांक्षा कोई बुरी आकांक्षा नहीं। पर गड़बड़ ये हो जाती है कि तुम देह रहते हुए असीमित की आकांक्षा रखते हो। तुम कहते हो, ‘मैं जैसा हूँ वैसा ही रहूँ और साथ में असीमित भी हो जाऊँ। मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहूँ और साथ ही कभी बीमार भी न पडूँ।’ बीमार तो तुम्हें पड़ना ही है और बीमारी में जीना सीख लो।

संसार में पूर्ण वही है जो अपूर्णता में भी आनन्दित रहता हो। ज्ञानी और अज्ञानी में यही भेद है। अज्ञानी सदा संसार से पूर्णता की माँग करता है। संसार पूर्णता दे नहीं सकता, क्योंकि पूर्णता तो मात्र सत्य की होती है। संसार कैसे दे देगा तुमको? पर अज्ञानी लगातार माँगे जा रहा है कि पूर्णता मिल जाए — पैसे में मिल जाए, प्रतिष्ठा मे मिल जाए, देह में मिल जाए, वासना में मिल जाए, मोक्ष में मिल जाए — कहीं तो मिल जाए, पूर्णता मिल जाए।

अब ये मज़ेदार बात है, क्योंकि जो अज्ञानी है, वो पूर्णता माँग रहा है और जो ज्ञानी है वो पूर्णता कभी माँगता नहीं। उसे पता है कि संसार कभी पूर्णता दे सकता नहीं, तो वो अपूर्ण में ही मज़े लेता है। वो कहता है, ‘यहाँ तो जो रहेगा सदा अधूरा रहेगा, इसी अधूरेपन में आनन्द में रहेंगे। अरे! पूरा यहाँ कुछ होता ही नहीं है, तो हमें कैसे मिल जाएगा! आज तक किसी को मिला नहीं, मिल सकता नहीं, तो हमें कैसे मिल जाएगा?’ तो वो ये माँग ही छोड़ देता है कि पूरा चाहिए।

जगत माने बीमारी, जगत से तुम स्वास्थ्य की आशा करते हो! देह माने बीमारी, देह से तुम स्वास्थ्य की आशा करते हो! देह को तो निरन्तर सुरक्षा चाहिए, संरक्षण चाहिए। जब लगे भी कि वो स्वस्थ है, तब भी उसे ख़तरा है बीमारी का। देह की दो ही अवस्थाएँ होती हैं — या तो वो बीमार होती है या तो वो बीमार पड़ने के लिए तैयार होती है। स्वास्थ्य उसे उपलब्ध कब हो पाता है? स्वास्थ्य की परिभाषा तो वो है कि जो अकम्पित रहे, जो अनछूआ रहे। स्वास्थ्य की परिभाषा ये है कि जो एक बार मिल गया तो फिर छिने न, वो आसन फिर डिगे न। स्वस्थान है स्वास्थ्य। बैठ गये वहाँ, तो बैठ ही गये।

शरीर के साथ तो तुम्हें ऐसा कभी मिलेगा नहीं। वास्तव में स्वस्थ शरीर जैसा कुछ हो नहीं सकता। स्वस्थ मन जैसा होना भी एक विरल घटना है। क्योंकि स्वस्थ मन आत्मा बन जाता है। शरीर, मन और आत्मा को जानना। शरीर कभी स्वस्थ हो नहीं सकता। मन हो सकता है, पर यदा-कदा। अद्भुत घटना होती है जब मन स्वस्थ हो जाता है, वो समाधि कहलाती है। आत्मा सदा स्वस्थ है।

शरीर कभी नहीं, मन यदा-कदा, आत्मा सदा — ये हुई स्वास्थ्य की बात।

अब तुम शरीर के अस्वस्थ पड़ने पर मुॅंह लटकाकर बैठ गये। शरीर अस्वस्थ नहीं पड़ेगा तो क्या पड़ेगा? बीमारियों में स्वस्थ रहना सीखो! अधूरेपन में पूरा रहना सीखो!

ये बात आ रही है समझ में?

ये सूत्र है जीने का। यही माँग करते रह गये न कि हम तो प्रफुल्लित तब होंगे जब सब पूर्ण हो जाएगा, तो कभी तुम्हें प्रफुल्लता नहीं मिलेगी। यही माँग करते रह गये कि हम तो तब नाचेंगे जब शरीर बिलकुल ठीक होगा, तो जीवन भर नाच नहीं पाओगे। यही कहते रह गये कि प्रेम तब मानेंगे, जब बिलकुल उपयुक्त वर मिले, तो भूल जाओ फिर प्रेम को।

जीवन में तो हमेशा कुछ छूटा हुआ रहेगा। साफ़-से-साफ़ पन्ने का कोई कोना गन्दा रहेगा। प्यारी-से-प्यारी किताब में भी कुछ त्रुटियाँ रहेंगी। जीवन का तो अर्थ ही है इम्पर्फ़ेक्शन (अपूर्णता)। उसका आनन्द लो! मत माँगो बार-बार! जो तुम माँग रहे हो, वो संसार से, मन से, देह से नहीं मिलेगा। और जब ग़लत द्वार याचक बनकर खड़े हो जाते हो, तुम उसकी अवहेलना कर देते हो, जो वास्तव में तुम्हें दे सकता है। संसार के सामने भिखारी मत बन जाना।

देह से आनन्द की अपेक्षा मत करना। देह से सुख-दुख मिल सकते हैं, आनन्द नहीं मिलेगा। देह चाहे सुख दे, चाहे दुख दे, सुख-दुख के पीछे के आनन्द में जियो। आनन्दित होकर दुखी रहो। सुख में भी आनन्दित, दुख में भी आनन्दित। इसका ये अर्थ नहीं है कि दुखी नहीं होते। दुख में भी आनन्दित!

अब जानो उस राज़ को कि ये दुख में भी आनन्दित रहना क्या होता है। कि काँप रही है देह, कराह रहा है कंठ, झर रहे हैं आँसू और आनन्द तब भी है। है खूब ज्वर चढ़ा, आधे बेहोश और उस बेहोशी में भी चुटकुला कह दिया। अब शरीर बीमार है, पर मन अभी भी आत्मस्थ है। जो जैसा है वो वैसा ही रहेगा, थोड़ा इधर का थोड़ा उधर का — इसी को तथाता कहते हैं। ऐसा ही है, और मत माँगना। इतना ही है। इससे आगे का चाहिए, तो वहाँ जाओ। इतना ही है।

प्र: सर, मन में हमेशा एक छवी रहती है कि कभी-न-कभी तो सबकुछ परफ़ेक्ट (पूर्ण) हो जाएगा और सारी इम्पर्फ़ेक्शंस (अधूरेपन) के जालों से निकल जाएँगे।

आचार्य: जब चिता भी जल रही होती है न, वो भी पूर्ण नहीं होने पाती है। कभी किसी श्मशान जाकर देखिएगा। आपकी आख़िरी यात्रा भी इम्पर्फ़ेक्ट (अधूरी) ही होती है। मौत तक वैसी नहीं होने पाती जैसी आप चाहें, जीवन तो छोड़िए। कई लोग हैं वो पाँच-पाँच बार आत्महत्या में असफल रह चुके हैं। मृत्यु तक तुमको वैसी नहीं मिलती, जैसे तुम सपने लेते हो। वो दिन कभी नहीं आएगा जब तुम्हारी सारी आकांक्षाएँ पूर्ण हो जाएँ।

और ये अच्छा है कि हम इस मुक़ाम पर आये, क्योंकि हम जिसको पूर्णता बोलते हैं, वो पूर्णता नहीं है, वो आकांक्षाओं की पूर्णता है। हम जिसको पूर्णता बोलते हैं, वो एक आन्तरिक परिपूर्णता नहीं है। वो कंटेंटमेंट (परितोष) नहीं है। वो सन्तोष है। दोनों का अर्थ समझ लेना। बड़े अच्छे शब्द हैं ये परितोष और सन्तोष। सैटिस्फ़ैक्शन (सन्तोष) और कंटेंटमेंट (परितोष)।

आप जब कहते हैं पूर्णता, तो आप सन्तोष माँगते हैं। सन्तोष के लिए असन्तोष ज़रूरी है। सन्तोष के लिए इच्छाएँ ज़रूरी हैं। इच्छाएँ माने असन्तोष। इच्छाएँ आपके पास हैं, पर इच्छाएँ हीं भर आपके पास हैं। आप सोचते हैं कि ये जब पूरी हो जाएँगी, उस सैटिस्फ़ैक्शन को ही शायद कंटेंटमेंट कहते हैं। नहीं, वो सन्तोष है, वो सैटिस्फ़ैक्शन है।

परितोष बिलकुल दूसरी बात है। वो इस चीज़ का नाम नहीं है कि इच्छाऍं पूरी हो गयीं। वो इस चीज़ का नाम है कि इच्छाएँ पूरी हों या न हों, हम मस्त हैं। वो परितोष है, कंटेंटमेंट। वो मरने से भी नहीं मिलेगा, क्योंकि वो मिलने की चीज़ नहीं है। उसकी तो परिभाषा ही यही है कि मिले तो भी बढ़िया, नहीं मिले तो भी बढ़िया। तो फिर वो मिलने पर आश्रित कैसे हो सकता है? जिसकी परिभाषा ही यही हो कि मिला तो बढ़िया और नहीं मिला तो? और बढ़िया! वो मिल कैसे सकता है? तो सन्तोष की अपेक्षा मत करो। परितोष, कंटेंटमेंट।

प्र: सन्तोष में तो आगे की बात कर देते हैं न, जबकि परितोष अभी है।

आचार्य: आगे की बात कर देते हैं। कंटेंटमेंट वो अभी है। क्योंकि उसमें दोनों ही स्थितियाँ शामिल हैं। दो ही घटनाएँ तो घट सकती हैं न आपके साथ। आपकी इच्छा है। अब दो ही घटनाएँ हो सकती हैं, क्या? पूरी होगी या नहीं होगी। परितोष में दोनों शामिल हैं। पूरी हुई?

श्रोता: तो भी ठीक।

आचार्य: नहीं पूरी हुई?

श्रोता: तो भी ठीक।

आचार्य: हमने चाहा। चाह के अनुसार हुआ, बढ़िया। और चाहत के अनुसार नहीं हुआ तो और बढ़िया! ये बेफ़िक्री है। ये मस्ती है। ये सहजता है। इसी को समभाव भी कहते हैं। समभाव का अर्थ ये नहीं होता है कि न इससे फ़र्क पड़ा न उससे फ़र्क पड़ा। समभाव का अर्थ ये होता है कि कुछ ऐसी मस्ती है, ऐसी बेशर्म क़िस्म की मस्ती है जो दुख में भी नहीं जाती। कि जैसे मुर्दा आँख मार रहा हो। ये हुआ समभाव। कि जब जीते थे, तब तो मारते ही थे, हम मरकर भी मारेंगे। ये है समभाव।

पर हमारी जो आम आध्यात्मिकता होती है, उसमें समभाव को क़रीब-क़रीब मुर्दा होने से जोड़ दिया है। कि स्वादिष्ट खाना मिला तो भी महाराज पत्थर सी सूरत और पत्थर सी आँखें लेकर बैठे हैं। और घटिया खाना मिला तो भी महाराज वैसे ही हैं। समभाव ये नहीं होता। समभाव होता है आनन्द में जीना। अखंड मस्ती है समभाव।

प्र: सर एक्सिलेंस (उत्कृष्टता) और परफ़ेक्शन (पूर्णता) में क्या अन्तर होता है?

आचार्य: कुछ नहीं। एक्सिलेंस पायी जाती है, परफ़ेक्शन है।

प्र: जैसे अभी आप कह रहे थे कि संसार में परफ़ेक्शन नहीं है और उसको पाने की कोशिश करना एक तरह का पागलपन है। फिर आप टॉर्चर (प्रताड़ित) ही करेंगे अपनेआप को। लेकिन एक्सिलेंस को अभी हम विडियो में सुन रहे थे, उत्कृष्टता, वो तो प्रेम से आती है। तो ये कैसे पता चलेगा कि अगर मैं क्लास लेने जा रहा हूँ तो मैं परफ़ेक्शन के पीछे भाग रहा हूँ या फिर एक्सिलेंस के पीछे भाग रहा हूँ?

आचार्य: परफ़ेक्शन पर बैठकर जो करोगे, वो एक्सिलेंट (उत्कृष्ट) होगा। जब पहले ही जानते हो कि पूर्णता पर बैठा हूँ, फिर जो कुछ करते हो, उसमें उत्कृष्टता रहती है। और जब अपूर्णता के केन्द्र से करते हो तो फिर जो भी करोगे, वो दिखे चाहे जैसा भी, होगा निकृष्ट ही। उत्कृष्ट नहीं हो सकता।

समझ रहे हैं बात को?

संसार की दृष्टि से देखेंगे, तो पहले एक्सिलेंस आती है और फिर परफ़ेक्शन आता है। और ज़रा समझ से देखेंगे, सत्य से देखेंगे, तो समझ में आएगा कि परफ़ेक्शन पहले आता है, फिर एक्सिलेंस आती है। जिसने अपने आन्तरिक परफ़ेक्शन को हासिल नहीं किया, वो क्या किसी प्रकार की उत्कृष्टता हासिल करेगा!

उत्कृष्टता सीमित है, मापी जा सकती है, ऊपर-नीचे होती है। परफ़ेक्शन असीमित है, मापा नहीं जा सकता, वो अडिग है, हिलता नहीं। जिनको जीवन में, अपने कर्मों में, अपने होने में, उत्कृष्टता का, एक्सिलेंस का अभाव दिखता हो, वो ग़ौर से एक बात समझ लें — अभाव उनको इसीलिए दिख रखा है, क्योंकि मन में कहीं-न-कहीं गहरा अधूरापन बैठा हुआ है।

जिन्हें एक आन्तरिक हीनभावना होती है, वही अपने बाहरी कर्मों में भी उत्कृष्टता नहीं ला पाते। और जो आन्तरिक रूप से सम्पूर्ण अनुभव करता है, वो बाहर फिर जो कुछ भी करता है, वो स्वयमेव उत्कृष्ट हो जाता है।

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