प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल एक किताब है डॉक्टर एम स्कॉट पेक की ‘द रोड लेस ट्रैवेल्ड’, उससे है। और शायद अभी जो पहले हम बात कर रहे थे मन की सफ़ाई करने की, तो उसमें एक चैप्टर (अध्याय) है ‘द मिरेकल ऑफ अनकॉन्शियस’ जिसमें शायद एक तरीक़े से कहना चाहिए कि उन्होंने मन को साफ़ करने के तरीक़े बताये हैं। उन्होंने फ्रायडियन स्लिप्स की बात करी है कि हमारी जो ज़बान भी स्लिप (फिसल) हो जाती है तो वो भी एक अनकॉन्शियस का इशारा है।
तो इस सब को उन्होंने आगे और जटिल बातों में भी जोड़ा है। जैसे — उन्होंने बताया है कि अगर आप किसी दुर्घटना से भी बाल–बाल बच जाते हैं तो वो भी एक अनकॉन्शियस का ही इशारा है। तो अब तक मुझे ये लगता था कि अनकॉन्शियस ब्रेन (अचेतन मस्तिष्क) होता है, मतलब फिजिकल (भौतिक) चीज़ है कोई—कॉन्शियस और अनकॉन्शियस। पर जिस तरह से उसमें उन्होंने चीज़ों की जटिलताओं को अनकॉन्शियस से ही जोड़ा है तो वो उसपर थोड़ा मुझे स्पष्टीकरण चाहिए था।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो जो चीज़ कह रहे हैं, उससे कहीं–कहीं ज़्यादा प्रकट है माया। वो तो ये कह रहे हैं कि अगर तुम्हारी ज़बान फिसल जाती है तो ज़बान का फिसलना अनायास नहीं होता, संयोगवश नहीं होता, उसके पीछे तुम्हारी वृत्ति बैठी होती है। तो ज़बान फिसल गयी, तुम कुछ न कुछ बोल गये, इस बात से तुम पकड़ लो, जान लो कि तुम्हारे भीतर क्या बैठा हुआ है। ठीक है?
ज़बान फिसल गयी, तब तो जान ही सकते हो कि भीतर क्या बैठा है। ज़बान जब नहीं फिसल रही तुम तब भी जान सकते हो भीतर क्या बैठा है। तुम्हें क्या लग रहा है कि वो जो मूल वृत्ति है, वो मात्र सबकॉन्शियसली ही अपनेआप को मैनिफेस्ट या अभिव्यक्त करती है? नहीं। जिसे तुम अपनी कॉन्शियसनेस, अपना कॉन्शियस सेल्फ़ बोलते हो, वो उस पर भी छायी हुई है। बस हमारी नज़र इतनी पैनी नहीं है कि हम पकड़ लें।




