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आचार्य प्रशान्त की संस्था एक प्रोपगैंडा (प्रचार मात्र) है? || वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं आपको पिछले एक साल से सुन रहा हूँ। मैंने एक अपनी मित्र के जन्मदिवस पर आपकि एक पुस्तक उसको भेंट करी थी, महिला सशक्तिकरण के बारे में। तो मैंने उससे कुछ दिन बाद पूछा कि तुमने क्या सीखा, क्या तुम्हें सही लगा। तो उसने उत्तर दिया कि मैंने दो-तीन अध्याय पढ़े होंगे और ये एक प्रचार कि तरह लग रहा है। जैसे आचार्य जी एक बात को थोपना चाहते हैं कि तुम शरीर नहीं, आत्मा हो, तुम ये हो, वो हो। तो मैं उसी के शब्दों में पूछना चाहूँगा, क्या आचार्य प्रशांत की संस्था एक प्रोपगैंडा है? (श्रोतागण हँसते हैं)

आचार्य प्रशांत: ये अभी तक पता नहीं चला था तुम्हें? मेरे ही मुँह से कबूलवाओगे? (श्रोतागण हँसते हैं)

प्र: सर, उसे समझा नहीं पा रहा था।

आचार्य: मैं तो बोल देता हूँ, ‘कबूल है, कबूल है, कबूल है’ (श्रोतागण हँसते हैं)। प्रोपगैंडा पब्लिसिटी के बहुत क़रीब की बात होती है। हाँ, बस ये है कि अभी अगर तुम डिक्शनरी में प्रोपगैंडा का अर्थ देखोगे, तो वो थोड़ा सा नेगेटिव (नकारात्मक) आ गया है। प्रोपगैंडा शब्द आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है भ्रामक प्रचार के लिए। भ्रामक। लेकिन आवश्यक नहीं है कि प्रोपगैंडा का अर्थ यही हो कि भ्रम ही फैलाया जा रहा है।

आमतौर पर क्योंकि भ्रम ही फैलाया जाता है, इसलिए प्रोपगैंडा एक गन्दा शब्द हो गया है, नहीं तो प्रोपगैंडा गन्दा शब्द है नहीं अपनेआप में। ठीक है? मुझे कोई आपत्ति भी नहीं है अगर कोई मुझे प्रोपगैंडिस्ट (प्रचारक) बोले। ठीक है। मेरा और काम क्या है? प्रचार के अलावा, ये संस्था कर क्या रही है? उसके लिए ज़्यादा साफ़ शब्द पब्लिसिटी (प्रचार) है या रीचआउट (तक पहुँच) है। पर उसे कोई प्रोपगैंडा भी बोलना चाहता है तो मुझे कोई आपत्ति भी नहीं है, ठीक है। क्योंकि वास्तव में इस संस्था का और कोई काम है ही नहीं, प्रचार के अलावा।

हम और करते क्या हैं? दिनभर हम क्या कर रहें हैं? हम प्रचार का काम कर रहें हैं, जो लोग बैठकर के दिनभर फ़ोन कॉल कर रहे हैं। कोई पच्चीस करता, कोई पैंतीस करता, कोई पचास करता है, वो क्या कर रहे हैं, प्रचार ही तो कर रहे हैं। ये आप लोग जितनी भी डोनेशन देते हैं, अस्सी प्रतिशत वो कहाँ जाती है? वो प्रचार में ही तो जाती है, बाक़ी बीस प्रतिशत से सारा खर्चा-पानी चलता है। तो प्रचार के अलावा हम करते क्या हैं?

प्रश्न ये नहीं है कि प्रचार कर रहे हो या नहीं। अब आओ, असली प्रश्न पर। प्रश्न ये है कि किसका प्रचार कर रहे हो, सच का या झूठ का। ये होना चाहिए सवाल। ये सवाल पूछा ही नहीं। बोल ऐसे दिया जैसे प्रचार करना ही अपनेआप में गुनाह हो गया। प्रचार करना गुनाह हो गया? जो झूठ का प्रचार कर रहे हैं, उनको लेकर के आपको कभी तकलीफ़ नहीं होती। लोग हमारे पास आते हैं, ‘अ... विज्ञापन देते अ...।’ तो और क्या दें? घूँसा? एक-से-एक जलील चीज़ का तुम्हारे पास विज्ञापन आता है, तुम्हें आज तक कभी तकलीफ़ नहीं हुई, और हम विज्ञापन के नाम पर भी तुमको वीडियो ही दिखाते हैं। उसकी तुमको तकलीफ़ हो रही है। उस विज्ञापन में क्या लिखा है? पैसा दो? हम विज्ञापन पर खर्च कर रहे हैं, दूसरे विज्ञापन से कमाते हैं। पर तुम्हारी छोटी बुद्धि को ये अन्तर समझ में ही नहीं आता।

आप में से कितने लोगों ने संस्था के विज्ञापन देखे हैं? हाथ उठाइएगा। कहीं-न-कहीं; यूट्यूब, फ़ेसबुक, कहीं-न-कहीं देखे हैं। उनमें क्या रहता है? एक विडियो रहता है, लो देख लो, ये विडियो है और विडियो भी ऐसा रहता है कि आपको बहुत अच्छा लगे? बहुत प्यार भरा विडियो होता है? विडियो भी ऐसा होता कि उसको देखते ही तुरन्त हेट (नफ़रत) आती है। हम पैसे दे-देकर के हेट को आमन्त्रण देते हैं। हम कहते हैं, ‘लो देखो तो सही न। तुम्हें देखना पड़ेगा। हम पैसा खर्च करके तुमको दिखवाएँगे।’ दिखवाना गुनाह कैसे हो गया? दिन-रात आप सौ चीज़ों के विज्ञापन देखते हो और वों सारी चीज़ें आपके लिए नुक़सानदेह है और उनसे आपको कुछ नहीं मिलता।

संस्था पाई-पाई जोड़कर के आप तक एसी चीज़ पहुँचा रही है, जो कम-से-कम हमें लगता है अपनी पूरी ईमानदारी से कि सच है। उसमें आपत्ति क्या हो गयी भाई? तकलीफ़ क्या है? या नहीं पहुँचाएँ?

अच्छा, आप में से कितने लोग विज्ञापन देखकर के संस्था के सम्पर्क में आये। हाथ उठाइएगा (बहुत से लोग हाथ उठाते हैं)। ये दो-तिहाई क्या तीन-चौथाई लग रहे। माने हमने, ये ख़ुद भी हाथ उठा रहे हैं (प्रश्नकर्ता की ओर संकेत करते हुए),माने विज्ञापन नहीं दिया होता, तो आपको आचार्य प्रशांत का भी पता लगता?

तो विज्ञापन देकर गुनाह किया या एहसान किया? सीधे बोलिए। तो विज्ञापन दे-देकर के हम इस समाज पर एहसान कर रहे हैं, हम आपको वो चीज़ दिखा रहे हैं जो आप अपनेआप कभी न खोजते, न देखने को पाते। मैंने एक बार पूछा था, ‘गूगल पर पिछली बार कब अद्वैत शब्द खोजा था, या मुक्ति शब्द खोजा था? कब खोजा था? गूगल में पिछली बार समाधि कब खोजा था? और अगर ये सारे शब्द नहीं खोज रहे, तो मेरे वीडियोज़ कभी आपको दिखाई पड़ते क्या? हमारे वीडियोज़ आप तक पहुँच सकें, उसका एक ही तरीक़ा है, प्रचार।’ अब उसमें शर्मिंदा वाली क्या बात हो गयी? उसके लिए तो आपको हमे धन्यवाद देना चाहिए, नहीं देना चाहिए क्या? नहीं देना चाहिए क्या? आप जो पैसा देते हो, न कोई साधारण संस्था होती तो उस पैसे को खा भी सकती थी।

ये जितने लोग यहाँ पर काम कर रहे हैं, इनमें से कोई भी न तो अशिक्षित है, न किसी साधारण पृष्ठभूमि का है। यहाँ पर हम आइआइटी में सेशन कर रहे हैं, हमारे लिए बड़ी बात हो जाती है कि कोई आइआइटियन है, और न जाने कितने आइआइटियन हैं, जो अपना करियर छोड़कर के हमारी संस्था में बैठे हुए हैं। और बड़ी-से-बड़ी कम्पनियों में काम करने वाले संस्था में आ गये हैं, और जितना उनको वहाँ मिलता था, उसकी दस प्रतिशत तनख़्वाह पर काम कर रहे हैं, क्यों? ताकि हम प्रचार कर सकें। यहाँ लोग तनख़्वाहें नहीं ले रहे हैं ताकि हम प्रचार कर सकें, और ये इल्ज़ाम है कि प्रोपगैंडा हो रहा है। हाँ, हो रहा है, पर तुम्हारी भलाई के लिए हो रहा है।

नाम नहीं लूँगा, पर हमारे यहाँ पर आइटी में वरिष्ठ सज्जन हैं। पहले एप्पल में काम करते थे, इसलिए किस स्तर पर रह रहे होंगे, सोच लीजिए। कुछ नहीं करा, आज सुबह उनकी तनख्वा जा रही थी। एक बहुत ही मामूली सा मैंने उसमें आँकड़ा जोड़ दिया, उधर से उनकी आपत्ति आ गयी। बोले, ‘मुझे मालूम है कि संस्था का नियम है कि आचार्य जी जो कर रहे हैं उसको स्वीकार कर लो, लेकिन मैं ये नहीं स्वीकार कर रहा। मैं मना कर रहा हूँ, ये आया है, मैं लौटा रहा हूँ।’ और जो दिया गया है, वो उनकी पुरानी तनख़्वाह के एक छोटे से हिस्से से भी कम है। तो फिर मैंने उनसे आग्रह करा। मैंने कहा कि जो आपको मिल रहा है, न ये जो आपको लग रहा है, कि ज़्यादा जो गया है। आप इसको एफडी में रख दीजिए और उस एफडी का ट्रस्टी बन जाइए। एक दिन ज़रूर ऐसा आएगा कि संस्था आपसे डोनेशन माँगेगी, तब आप वो हमें वो वापस कर दीजिएगा। हमें माने अपनेआप को। वो संस्था के ही सदस्य हैं, तब वापस कर दीजिएगा।

प्रचार सस्ता नहीं होता। जिसको कह रहे हो न प्रोपगैंडा , वो बहुत महँगा होता है, भाई। बहुत-बहुत महँगा होता है। और वो हम करते हैं यहाँ पर भी, लोग हैं जिनके घर हैं, परिवार हैं।

आप तो तुरन्त बोल देते हैं, ‘नहीं, मैं सच्चाई के रास्ते पर कैसे चलूँ, मेरी मजबूरियाँ हैं, लाइबिलिटीज़ (उत्तरदायित्व) हैं। मेरी माँ हैं और मेरे बच्चे हैं।’ क्या ये जो इधर हमारे यहाँ पर लोग हैं, ये खजूर के पेड़ से गिरे हैं? इनके माँ-बाप नहीं होते? इनके बच्चे नहीं होते। नहीं, बच्चे तो चाहे मान लो नहीं भी होते, पर माँ-बाप तो होंगे, भाई-बहन तो होंगे, और सामाजिक प्राणी हैं तो ये भी देखते हैं कि उनके बैच के लोग कितना कमा रहे हैं, ये हो रहा है, वो हो रहा है। वो भी देखते हैं न? परफ़ेक्ट (पूर्ण) तो कोई भी नहीं होता, उनके भीतर भी उठता है कि हमारे ही साथ के ही लोग हैं, कोई गाड़ी पर चल रहा है, कोई कुछ कर रहा है, कोई कुछ कर रहा है; हम क्या कर रहे हैं? और उसमें तुर्रा ये है कि अ... प्रोपगैंडा। हम कर रहे हैं प्रोपगैंडा तो आपके लिए कर रहे हैं। फिर बोल रहा हूँ, बिना शब्दों में मिलावट करें। अगर हम प्रोपगैंडा कर रहे हैं, तो हम इस समाज पर एहसान कर रहे हैं। उसके लिए हम धन्यवाद के पात्र हैं, उलाहना के नहीं। ये आ रही है बात समझ में?

रिश्ते थोड़ा देख-समझकर बनाने चाहिए न। (श्रोतागण ताली बजाते हैं) काहे बेटा? तुम हम पर हमला करोगे, हम तुमको छोड़ देंगे? सच को हक़ नहीं है बोलने का और झूठ छत पर चढ़कर चिल्लाएगा? इतना बता दो बस। हम सच कि तरफ़ खड़े हैं, तो मौन हो जाए और हमारी तरफ़ जो भी कीचड़ उछाली जा रही है, उसको पीते जाएँ? जितना हमारा ज़ोर चलेगा, जितना हमारा बस है, हम भी बोलेंगे। लेकिन हम बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलता है। (श्रोतागण हँसते हैं)

बोलेंगे तो फिर भी। तुम्हें बोलना है, तुम अपना चैनल बनाओ। (श्रोतागण हँसते हैं) जो लोग मुझसे परिचित हो जाता बताइएगा। मैंने सोल शब्द का इस्तेमाल कभी भी करा है? कभी करा है? मेरे लिए दो ही चीज़ें होती हैं जो वेदान्त में एक मन, एक आत्मा। ये सोल क्या चीज़ होती है। और कोई बोले, ‘आचार्य जी कि किताब पढ़ी और उसमें माइंड, बॉडी, सोल की बात कर रहे हैं’, तो उसने कुछ भी पढ़ा है? ये तुमने किसी को किताब दी भी थी कि अपना ही सवाल सामने ला रहे हो? तुम्हारी कोई है भी गर्लफ्रेंड? मतलब बैचमेट या जो भी है? है? सही में? (श्रोतागण हँसते हैं)

नहीं, मान लिया, ठीक है। देखो, रिश्ते उल्टे-पुल्टे बनाओगे तो शक तो तुमपर भी होगा। तुम्हीं ने तो बनाये हैं।

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