वेदांत किसी और को बिल्कुल अनुमति ही नहीं देता आपके जीवन के निर्धारण में, सब आपका चुनाव है। अनुकंपा भी एक तरह से आपका अपना चुनाव है, अनुकंपा को आप आमंत्रित करते हो अपनी मेहनत के द्वारा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं आपको पिछले नौ महीने से सुन रहा हूँ और प्रतिदिन आपसे एक वंडरमेंट मुझे महसूस होता है। ऐसा लगता है कि जैसे कुछ नया। आज पहली बार आपके सामने इतने करीब से बैठा हूँ। तो जो आपसे मिला उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।
मेरा प्रश्न आचार्य जी यह है कि अनुकंपा और ग्रेस, ये क्या होती है? क्योंकि मैं अगर अपने जीवन को देखूँ तो ये सारे ग्रंथ या जितनी भी गीता, भगवद्गीता हैं या कबीर जी के दोहे, ये सारा जितना भी ज्ञान है ये हमारे सामने भी था। बचपन से हमने भी नाम तो सुना ही था, पढ़े नहीं थे तो। कभी-कभी ये सामने भी आए तो हमने इनको देखा भी, पढ़ा भी। पहले तो इनके प्रति कोई जिज्ञासा ही पैदा नहीं हुई और जिज्ञासा पैदा हुई भी तो जो उनकी टीकाएँ लिखी हुई थी, कभी इतना साहस ही नहीं हुआ कि इसके अलावा भी कुछ व्यवहारिक इनका अर्थ हो सकता है।
तो जब आपको मैंने पहली बार सुना और सोचा कि, जो ग्रंथ हैं इनका इतना व्यवहारिक अर्थ हो सकता है हमारे लिए। तो ये एक प्रश्न मेरे अंदर आता है कि आप कहते हैं कि आप में कोई विशेषता नहीं है, आप हमारे जैसे ही हैं।
तो जब उस समय में हमारे सामने ये ग्रंथ आए और हमें तो शायद ज़िन्दगी ने ज़्यादा ही ठोकरें दी हैं। आपके सामने तो प्रलोभन भी खूब आए हैं जीवन में। क्योंकि आपको तो जीवन ने ज़्यादा ही — मतलब एक अपॉर्चुनिटी ज़्यादा दी है। परंतु फिर भी आप इसको देख पाए। ऐसा क्या मतलब हम में ऐसा क्या — ये




