वक्ता: जो भी कुछ इन्द्रियों से आ रहा है, उसमें समय होगा। कोई तुम्हें सिर्फ छू भी रहा है, तो उसमें समय है। वह एक न्यूरोनिक प्रक्रिया है, जो मस्तिष्क तक जाती है। एक विद्युत्-चुंबकीय (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक) तरंग है, और एक ट्रांस्वर्स तरंग है। दोनों की इक्वेशन में ‘टी’ (टाइम/समय) आता है। ठीक है? (अपने हाथ की ओर इंगित करते हुए) अगर यहाँ दबाव लगाऊंगा, तो उसमें भी समय सम्मिलित होगा।
आप यह जो पूछ रहे हैं कि क्या कोई ऐसी चीज़ हो सकती है जो समय और स्थान से आगे है, और साथ ही मन के आगे भी है। क्या आपको पता है आपने “मैं कौन हूँ?” प्रश्न का जवाब दे दिया है?
‘वो तुम हो’। इसी को हम कहते है ‘तत त्वम् असि’। वही तुम हो जो समय और स्थान से परे है। वही तुम्हारी असली पहचान है।
जो शब्द मैंने बोले हैं, वो बेकार हैं। क्योंकि मैंने जो बात बोली है वो तुमने इन्द्रियों, से अपने कानों से सुनी है। यह तुमने समय में ही सुनी है। यह सब मैं समय में ही बोल रहा हूँ। अगर तुम इसका शोध करोगे, वो भी समय में ही होगा। अभी तुम मुझे अपने आप से दूर देख रहे हो, उसमें भी समय और स्थान है। तुमने एक ऐसी बात जो समय-स्थान के परे है, उसे तुमने समय-स्थान में सुना है, तो उसे तुम मन से नहीं समझ सकते। बस एक सिद्धांत की तरह बता रहा हूँ कि बात यही है। इतना भी अगर जान लिया कि कुछ है जो समय-स्थान के परे है, और मन के परे है, और वो ‘मैं हूँ’, तो बस तुम समझ गए।
समय-स्थान से तुम अपने आप को पहचान मत दो, उनसे सामंजस्य मत बैठाओ। जो भी गतिविधियाँ हो रहीं हैं वो शाश्वत नहीं हैं। समय का क्या अर्थ है? वो जिसका आना-जाना लगा रहता है, वो जो शाश्वत नहीं है। बात समझ रहे हो? समय का क्या अर्थ है? वो जो आए और जाए, जैसे दिन-रात, जैसे उम्र, जैसे कोई तुमसे मिलने आए और जाए। यह सब समय में है ना? हर बात जो समय पर निर्भर करती है, उसे गम्भीरता से मत लेना क्योंकि वो सत्य नहीं है, क्योंकि वो असली नहीं है। इसका संकेत यह है कि जो भी चीज़ समय पर निर्भर है, उसे गंभीरता से ना लो। उसी तरह से जो भी चीज़ स्थान पर निर्भर करती है जैसे तुम्हारा शरीर, उसे गंभीरता से न लो।



