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अभिभावकों से मिली गलत सीख?
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
25 min
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प्रश्नकर्ता: बचपन में मुझे मम्मी-पापा और स्कूल ने सिखाया कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और साथ ही मुझपर दबाव बनाया कुछ गिने-चुने काम ही करना। मैंने कहा — मुझे गायक बनना है। वो बोले — नहीं, तुम्हें एम.बी.ए करना है। आज मैं एम.बी.ए हूँ और बहुत दुःख में हूँ। आज मुझे पता चल रहा है कि वास्तव में कुछ काम छोटे और कुछ काम बड़े होते हैं। मेरे माँ-बाप मुझे गलत बात क्यों सिखाते रहे? मुझे गलत काम की ओर क्यों ढकेलते रहे?

आचार्य प्रशांत: देखो भाई! एम.बी.ए भी करने गए, भले ही उससे तुम्हें दुःख और निराशा मिला हो, तो किसी एम.बी.ए कॉलेज मे न? कोई प्रबंधन संस्थान रहा होगा, इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट * । वहाँ ही गए होगे एम.बी.ए करने? * मैनेजमेंट सीखना है तो कहाँ गए? मैनेजमेंट इंस्टीट्यूशन में। ठीक है न? चिकित्सा सीखनी होती तो कहाँ जाते? मेडिकल कॉलेज में। इतनी-सी बात तो हम भौतिक विषयों पर भी जानते हैं कि लागू होती है, क्या? जो चीज़ सिखाने का जो हकदार हो, विशेषज्ञ हो, उसके पास जाओ न।

तुमने एम.बी.ए घर पर ही क्यों नहीं कर लिया? पापा कमा कर लाते हैं वो फाइनेंस सिखा देते और मम्मी घर चलाती हैं वो ऑपरेशन मैनेजमेंट सिखा देती, ह्यूमन रिसोर्स सिखा देती। दादा-दादी स्ट्रेटजी सिखा देते। बहन मार्केटिंग सिखा देती। घर में ही क्यों नहीं कर लिया एम.बी.ए?

अजीब तो हमारी स्थिति है, एम.बी.ए करने के लिए भी जोकि कुल मिला करके कोई बड़ी चीज़ नहीं है, निन्यानवे प्रतिशत लोगों से बाद में पूछो तो वो स्वीकार कर लेंगे कि समय ही ख़राब किया और बहुत पैसा ख़राब किया। नहीं भी पूछो तो, अगर वो दो पेग डाउन हैं तो खुद ही गरिया रहे होंगे अपने कॉलेज को कि "बीस-पच्चीस लाख लग गए, दो साल भी मारे गए, ये क्या हो गया हमारे साथ?"

उस एम.बी.ए के लिए भी, जो इतनी छोटी चीज़ है, जिसको हमने बहुत हौवा बना रखा है उसके लिए भी तुम घर से बाहर निकल करके किन्हीं विशेषज्ञों के पास जाते हो। ठीक? और जब जीवन के बड़े-बड़े निर्णयों की बात आती है, जीवन के अर्थ की ही बात आती है, जीवन के मूल सिद्धांतों और शिक्षा की बात आती है, तो उसके लिए तुम मम्मी-पापा से सीख लेते हो! मम्मी-पापा से ही सीखना है तो तुम एम.बी.ए, एम.बी.बी.एस, एम.टेक, पी.एचडी, एम.डी, डी.एम सब घर पर ही किया करो।

पर हमें जीवन के विशेषज्ञों से डर लगता है या ऐसा भी होता है कि उन विशेषज्ञों से हमें रूबरू ही नहीं होने दिया गया, उनसे हमें अपरिचित रखा गया। जीवन के उन विशेषज्ञों का नाम होता है — ऋषि। ऋषि कौन है? ऋषि जीवन का वैज्ञानिक है, ऋषि जीवन का विशेषज्ञ है।

माँ-बाप से ये सब पूछ लो तुम कि, "कपड़े कहाँ से खरीद रहे हो, रसोई में क्या पक रहा है?" इतना वो बता देंगे। दुकान में क्या माल रखते हो? वो माल कहाँ से लेकर के आते हो? इतनी बातें माँ-बाप बता सकते हैं। जीवन के बारे में बताने के लिए माँ-बाप कहाँ से अधिकारी हो गए, हुनरमंद हो गए, विशेषज्ञ हो गए भाई?

तो ग़लती तुम कर रहे हो। एम.बी.ए करने तुम बारह की उमर में तो पहुँच नहीं गए थे। एम.बी.ए का निर्णय तुमने बाईस-चौबीस की अवस्था में ही लिया होगा। बाईस-चौबीस साल के तथाकथित नौजवान हो तुम और जीवन का निर्णय तुम माँ-बाप से पूछकर कर रहे हो, तो फ़िर तुम्हें सज़ा मिले यही उचित है तुम्हारे लिए।

दुनियाभर के ज्ञान के स्रोत तुम्हें उपलब्ध हैं लेकिन तुम कह रहे हो — "मैं क्या करूँ, मैं तो गायक बनना चाहता था, माँ-बाप ने ज़बरदस्ती एम.बी.ए करा दिया।" तुम पाँच साल के होते तुम कहते — "मैं क्या करूँ मुझे माँ-बाप ने ज़बरदस्ती फ़लाने स्कूल में दाख़िल करा दिया।" तो मैं तुमसे कुछ सहानुभूति रखता। लेकिन तुम पाँच के तो नहीं थे जब तुम एम.बी.ए करने गए थे। तुम बाईस के थे, तुम चौबीस के थे।

तुम्हें अच्छे से पता था कि अगर दवाई चाहिए तो हलवाई के पास नहीं जाते। जानते थे कि नहीं बाईस की उमर में तुम? जूता खरीदने के लिए मिठाई की दुकान पर जाते थे? बोलो। और मिठाई की दुकान पर जाकर बूट पॉलिश माँगते थे? समझ चुके थे न बाईस-चौबीस की उम्र में कि जो चीज़ जहाँ मिलती है वहीं से लेनी चाहिए।

तो जीवन शिक्षा जहाँ से मिलती है, जीवन के बारे में सलाह जहाँ से मिलती है वहीं से क्यों नहीं ली? ऋषियों के पास क्यों नहीं गए? पर तुम क्या करोगे, जैसा समाज है हमारा, जैसी हमने व्यवस्था बना रखी है और हमारे अहंकार की जो हालत है उसमें हमने ये निर्धारित कर रखा है कि साहब ज़िंदगी में छोटी-से-छोटी चीज़ के लिए विशेषज्ञ चाहिए पर जीवन शिक्षा के लिए कोई विशेषज्ञ नहीं चाहिए।

उसके लिए तो हम ही बहुत हैं। हमसे पूछो हम बताएँगे न और आपके पास पात्रता क्या है बताने की? हमारे पास पात्रता ये है कि हम साठ साल के हैं या हम चालीस साल के हैं। तो? चालीस साल तक कोई बेहोश पड़ा रहे, सोता रहे तो उससे उसमें बड़ी बुद्धि, बड़ा बोध आ जाएगा? और आपने तो अपना पूरा जीवन ही बेहोशी में गुज़ारा है। आप में कहाँ से पात्रता आ गई किसी को जीवन शिक्षा देने की? एम.बी.ए, एम.बी.बी.एस करने के लिए भी किताबें पढ़नी पड़ती हैं, प्रयोग करने पड़ते हैं और फीस माने कीमत माने शुल्क चुकाना पड़ता है, ठीक? ये तीन चीज़ें होती हैं? यही तीन चीज़ें आध्यात्मिक शिक्षा, जीवन शिक्षा में भी चाहिए।

कोई अगर आपको जीवन के बारे में ज्ञान दे रहा हो, तो ये तीन चीज़ें जाँच लेना — उसने क्या आध्यात्मिक साहित्य का गहरा पाठ, गहरा सेवन करा है? कोई डॉक्टर बन रहा हो और बोले, "मैंने मेडिकल की आज तक कोई किताब नहीं पढ़ी!" ऐसे डॉक्टर से इलाज करवाना चाहोगे? वैसे ही कोई गुरु बन रहा हो, ज्ञान दे रहा हो और बोले, "मैंने आज तक कोई आध्यात्मिक किताब नहीं पढ़ी!" ऐसे गुरु से ज्ञान लेना चाहोगे? ये हुई पहली शर्त।

दूसरी शर्त — उसने जीवन में प्रयोग करे हों। जो डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ रहे होते हैं छात्र, वो सिर्फ किताब ही नहीं पढ़ते वो प्रयोग करते हैं। क्या इस व्यक्ति ने किताब में पढ़ी हुई बातों को, जीवन में, समाज में आज़मा कर देखा है? प्रयोग करके देखा है? क्या ये किताब में लिखी हुई बात को अपने चारों ओर की ज़िंदगी से जोड़कर देख पा रहा है?

तीसरी शर्त — क्या इसने शुल्क अदा करा है? कीमत चुकाई है? अब जो कीमत लगती है एम.बी.ए, एम.बी.बी.एस में वो तो यही है कि दस-बीस-चालीस लाख जो लगना है लग गया। जीवन शिक्षा पाने के लिए जो कीमत लगती है वो बहुत आगे की है। पैसे तो खर्च करने ही पड़ते हैं या कई बार पैसे कमाने के अवसर गँवाने पड़ते हैं। साथ-ही-साथ अपनी मान्यताओं की, अपनी धारणाओं की, अपने अहंकार की बलि देनी पड़ती है। बड़ी साधना करनी पड़ती है तब आप जीवन विशेषज्ञ बनते हो।

मैंने कहा, उसी जीवन विशेषज्ञ का, उसी जीवन वैज्ञानिक का नाम होता है — ऋषि। सिर्फ उससे जीवन के बारे में सलाह या निर्देश लिए जा सकते हैं। बाकी किसी से नहीं भाई! चाहे माँ-बाप हों, चाची-चाचा हों, चाहे ताऊ हो रामपुर वाले वही। ये कहाँ से आ गए तुम्हें जीवन के बारे में एक शब्द भी बताने के लिए? ये कौन हैं?

कोई आए और तुमसे बोले कि "मैं तुमको अभी बताता हूँ कि डीजल इंजन कैसे काम करता है!" कहेगा "मैं तुमको पूरा डीजल साइकिल बताता हूँ, इसमें कौन-सा प्रोसेस एडियाबैटिक है, कौन-सा आइसोथर्मल है, पूरा जो उसका पीवी कर्व है वो मैं तुमको बनाकर दिखाता हूँ अभी। कैसे-क्या काम करता है।" तुम बोलो, "आप ये सब कैसे करोगे?" वो बोले "मैं साठ साल का हूँ, हमने ज़िंदगी देखी है।" पागल ज़िंदगी देखी है उससे तू मुझे डीजल इंजन बता देगा?

और साठ साल का हो गया है, ज़िंदगी देखी है तो फिर काहे को भागते हो डॉक्टर के पास जब पेट में दर्द होता है? तब ये साठ साल वाले ही काहे डॉक्टर के पास भागते हैं? अस्पतालों में सबसे ज़्यादा तो यह साठ साल वाले ही नज़र आते हैं। इन्होंने ज़िंदगी देखी है ये अस्पताल में क्या कर रहे हैं?

जो भी लोग अपने बच्चों को ये तर्क देते हों कि "हम बताएँगे तुमको, हमने ज़िंदगी देखी है।" इन्हें तो सबसे पहले अस्पतालों में दाखिला नहीं मिलना चाहिए। बाहर लगा होना चाहिए — 'जिन्होंने ज़िंदगी देखी हो वो अपना उपचार खुद ही कर लें।' भाई तुम तो ज़िंदगी देख-देख कर ही सब जान जाते हो न। "हम बताएँगे तुम्हें क्या पढ़ना चाहिए, हम बताएँगे तुम्हें क्या करना चाहिए, हम बताएँगे तुम्हारी शादी कब हो, यहाँ तक कि हम बताएँगे कि तुम बच्चा भी कब पैदा करो। हम बताएँगे तुम कौन-सी नौकरी करो, हम बताएँगे कि तुम गायन नहीं करो तुम एम.बी.ए करो।"

तुम अपनी ज़िंदगी को देखो मियाँ! साठ के हो गए। तुम अपने लिए क्या कर पाए कि अपने बेटे पर चढ़े जा रहे हो? तुम अपने-आपको देख कर गौरव अनुभव करते हो क्या? और तुम्हें अगर दूसरा मौका मिले अपनी ज़िंदगी जीने का तो वैसे ही जियोगे जैसे तुमने जी है? तुम खुद तो सही जी नहीं पाए, तुम अपने लड़कों पर क्यों चढ़े जा रहे हो, बर्बाद किए जा रहे हो?

लेकिन ग़ुरूर सबको होता है। वजह बताए देता हूँ — आपके घर में एक छोटा-सा बिजली का कनेक्शन खराब हो गया हो, पंखा नहीं चल रहा। वहाँ आप विशेषज्ञ बनकर खड़े होने की ज़ुर्रत नहीं करोगे। क्यों? बहुत ज़ोर का झटका लगेगा और तत्काल लगेगा और शरीर पर लगेगा। चित्त गिरोगे और हाय-हाय काँपोगे बिलकुल।

पहले एक विज्ञापन आया करता था, न जाने कौन-से स्विच का, जिसमें सब एक दूसरे को पकड़कर नाचने लगते थे क्योंकि उनको बिजली का झटका लग रहा है। वो हालत हो जाएगी पूरे खानदान की। ये जितने जीवन विशेषज्ञ हैं सब नाच रहे होंगे बिजली का झटका खाकर और बात ज़ाहिर हो जानी है क्योंकि बात शरीर के तल की है, शरीर पर करंट लग रहा है न? तो वहाँ तुम ज़ुर्रत नहीं करोगे ये कहने की कि "हम ही विशेषज्ञ हैं, हमने ज़िंदगी देखी है। हमने ज़िंदगी देखी है तो हम इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग बताएँगे, पंखा हम ठीक करेंगे।"

वहाँ पर तो तुम इस ज़रा-से काम के लिए भी मकैनिक को बुलाते हो — "जी! जी! हाँ, आ जाओ आ जाओ यार, बहुत देर कर रहे हो। दो दिन से कह रहे हो, अभी भी नहीं आए। अरे! आ जाओ भाई। अच्छा चलो पैसे थोड़े ज़्यादा ले लेना।" उसके नखरे भी सह लेते हो पर ये नहीं हिम्मत करते कि जा कर के खुद ही प्लग में उंगली डाल दे।

ज़िंदगी के साथ लेकिन तुम तमाम तरह की ज़ुर्रतें कर जाते हो। तमाम तरह के दुस्साहस कर जाते हो। क्यों? क्योंकि वहाँ जो तुम्हें कर्मफ़ल मिलता है, जो दंड मिलता है वो तत्काल दिखाई नहीं देता, वो करंट के झटके की तरह नहीं होता और जब वो फल तुम पर बरसता भी है, वो दंड जब तुम्हें मिलता भी है तो शरीर पर नहीं मिलता न। एक तो तुरंत नहीं मिलता दूसरे शरीर पर नहीं मिलता। करंट तुरंत लगता है और शरीर पर लगता है।

ज़िंदगी तुमने गलत जी, ज़िंदगी के निर्णय तुमने गलत लिए तो तत्काल धमाका नहीं होता। बिजली के तार तुमने गलत जोड़ दिए तो धमाका तत्काल होगा। ज़िंदगी के तार तुमने गलत जोड़ दिए, अपने लड़के को पकड़ कर एक गलत लड़की से शादी करवा दी, दो तार जो जुड़ने नहीं चाहिए थे, तुम्हीं विशेषज्ञ बनकर जोड़ आए और हो तुम कुछ नहीं। होगे साठ साल के, हो लल्लू ही। जोड़ दिए गलत तार। कोई धमाका तत्काल तो होगा नहीं। धमाका नहीं होता है फिर, फिर जीवन भर की यातना मिलती है और तुममें इतनी ईमानदारी भी नहीं कि तुम स्वीकार करो कि वो जो यातना मिल रही है अब तुम्हारे ही बच्चों को वो तुम्हारी ही वजह से मिल रही है।

तुम कह दोगे "नहीं! नहीं! वो तो और भी कई वजह हो सकती हैं।" क्योंकि तुमने ये जो तार जोड़ दिए, ये जो गठबंधन करा दिया, यातना दिखाई देनी उसके दो साल बाद शुरू होती है। तुम कहोगे "नहीं दो साल में उसने कुछ और कर लिया होगा। यही नालायक है। हमारे जैसे बाप के होते हुए भी ये सुधर नहीं पाया। हमारे जैसे बाप के होते हुए भी ये बेवकूफ़ निकल गया। यही नालायक है!"

धमाका तत्काल हो गया होता, अगर ऐसी कोई व्यवस्था होती अस्तित्व में कि विवाह की बेदी प्रज्वलित है और पंडित आता है और लड़की का वो वस्त्र लेता है और लड़के का लेता है और जहाँ गाँठ बाँधता है तहाँ भड़ाम। शॉर्ट सर्किट हो गया और पूरे मोहल्ले में अंधेरा। ज़बरदस्त विस्फ़ोट। तब ये जितने इकट्ठा हुए थे ताऊ-ताई, फूफा-फूफी दोनों तरफ के लड़की-लड़का तब बच्चू की अकल ठिकाने आती कि हमने कौन-सा तार, क्या जोड़ दिया। तत्काल होता ही नहीं धमाका।

फिर ये जो तुम्हारे लड़के-बच्चे होते हैं इनकी ज़िंदगियाँ सुलगती रहती हैं। जल्दी से ये नहीं होता कि धमाका हो गया, आग लग गई, जीवन भर सुलगती रहती है और अद्भुत चमत्कार ये है कि ये जिनकी ज़िंदगियाँ जीवन भर सुलगती हैं आगे फिर ये अपने बच्चों के साथ भी वैसे ही विशेषज्ञ बनते हैं जैसे इनके बाप इनके साथ बने थे। ये चमत्कार तो बुद्धि के बाहर का ही है बिलकुल। समझ में ही नहीं आ सकता।

तो मैं इसमें ये सब बताने के बावजूद लेकिन तुम्हारे माँ-बाप को दोष नहीं दूँगा। ये एम.बी.ए करने तो बेटा तुम अपनी मर्ज़ी से गए थे। तुम अच्छे खासे नौजवान थे जब तुम घुस गए थे कि, "मुझे तो एम.बी.ए करना है!" अब कह रहे हो एम.बी.ए करके बड़े दुःख में हूँ। इतने दिनों में, पच्चीस-सत्ताईस के होकर, तुम्हें ये समझ आया कि ऐसा नहीं होता कि सब काम एक बराबर होते हैं।

सब काम एक बराबर होते तो चाहे तुम दुकान पर गीता की प्रतियों का वितरण करो और चाहे तुम दुकान पर शराब के विक्रेता बन जाओ और चाहे तुम किसी वैश्यालय में जा करके जिस्मों के विक्रेता बन जाओ, बात एक होती। "कोई काम तो छोटा-बड़ा होता नहीं!" फिर तो गीता का वितरण करना और शराब का विक्रय करना बिलकुल एक ही बात होती न?

कौन-से शास्त्र में लिखा है कि काम छोटे-बड़े नहीं होते, मुझे बताओ? हाँ, काम बिलकुल छोटे-बड़े होते हैं। गीता अगर तुम्हारे घर वालों ने ज़रा पढ़ी होती, समाज ने ज़रा पढ़ी होती और लोगों ने ज़रा पढ़ी होती तो वहाँ साफ़-साफ़ बता रहे हैं कृष्ण कि सकाम कर्म भी होता है, निष्काम कर्म भी होता है, अकर्म भी होता है, विकर्म भी होता है।

अरे! अलग-अलग होते हैं काम। सब काम अगर एक से होते तो कोई काम अकर्म, कोई विकर्म और कोई निष्काम कर्म क्यों कहलाता? लेकिन नहीं, ये हमारी जनश्रुति है। ये हमारी कन्वेंशनल पॉपुलर विज़डम (पारम्परिक ज्ञान) है। मुझे तो ये फ्रेज़ (वाक्य) ही समझ में नहीं आता। ये पॉपुलर विज़डम क्या चीज़ होती है भाई? जैसे ' पॉपुलर मेडिसिन ' कि, "आपने कोई दवाई क्यों ली?" "वो हमने पूरे मोहल्ले में जनमत संग्रह कराया था, मोहल्ले के अड़तालीस लोगों ने मतदान किया, सत्ताईस लोगों ने बोला कि फलानी दवाई ख़ा लो तो हमने ख़ा ली।" मूर्खों का मोहल्ला! सत्ताईस लोग तुम्हें कोई दवाई खिला रहे हैं तुम ख़ा लोगे? वैसे ही ये समाज है उसमें कोई चीज़ चल रही है इस तरीके से — 'कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता' तो तुमने मान ली ये बात।

तुमको जीवन के सूत्र समझने थे, तुमसे श्रीमद्भगवत गीता कितनी दूर थी बताओ? तुमसे कठोपनिषद कितनी दूर था, तुमसे अष्टावक्र कितनी दूर थे? तुमसे नानक, कबीर, और रैदास कितनी दूर थे? तुम इनसे क्यों नहीं गए पूछने? जिन्होंने अपना पूरा जीवन, जीवन को ही समझने में लगा दिया तुम इनसे क्यों नहीं गए पूछने? तुम अपने लल्लू ताऊ जी से जा कर क्यों पूछ रहे थे?

और उन्होंने बता दिया कि "बेटा! कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता।" फिर तो किसी बूचड़ खाने में जानवरों को काटकर बेचना बराबर ही हो गया, दुनिया के किसी भी और काम के। फिर तो जितनी चेतनाएँ हैं सब एक ही तल की हो गईं। कोई फर्क ही नहीं पड़ता कौन-सी चेतना किस भाव से काम कर रही है और अपने लिए किस कर्म का चयन कर रही है।

फिर तो मुक्ति की बात ही व्यर्थ हो गई। क्योंकि मुक्ति भी सही कर्म करने का एक चुनाव होता है। अगर सारे कर्म एक बराबर होते तो सही कर्म कुछ नहीं, गलत कर्म कुछ नहीं। फिर तो विवेक शब्द ही अर्थहीन हो गया न क्योंकि विवेक का अर्थ ही होता है सही और गलत के बीच की पहचान। जब सब कर्म एक बराबर हैं तो कुछ सही नहीं, कुछ गलत नहीं, काहे का विवेक!

न जाने किस मूर्ख ने ये मुहावरा प्रचलित कर दिया कि 'कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता' और ये काम न जाने कितने दुर्बुद्धियों के लिए बहाना बन गया जीवन में गलत काम चुनने का। और ऐसा नहीं है कि लोग स्वयं नहीं मानते भीतर से कि कोई काम छोटा बड़ा होता नहीं। मानते हैं लेकिन, हारे को हरिनाम। जब तुम्हें तुम्हारी कामना का काम करने को न मिले, तो कह दो कि ये जो दूसरा काम मिला है ये भी कोई छोटा थोड़े-ही है, बिलकुल छोटा नहीं है।

न जाने कितने इस तरह के लोकप्रिय मुहावरे हैं जो अति मूर्खतापूर्ण हैं लेकिन समाज में खूब प्रचलित हैं। और जब भी किसी को कोई बेवकूफी का काम करना होता है, तो वो इस तरह का कोई मुहावरा छोड़ देता है और अपनी बात को जायज ठहरा देता है।

अरे भैया ये मुहावरे हैं, ये उपनिषदों के श्लोक थोड़े ही हो गए। ये संतों की सीख थोड़े ही हो गए। ये तो यूँ ही किसी ने कोई बात चला दी जो चलती जा रही है, चलती जा रही है। इन मुहावरों में कभी-कभी बीच में मिल जाती है ऐसी बातें जो सच्ची भी हैं लेकिन साथ-ही-साथ इन मुहावरों में बहुत सारी अनर्गल और व्यर्थ बातें भी छुपी हुई हैं।

इन लोकोक्तियों को और इन सब बातों को सत्य का दर्जा मत दे देना कि तुम कहो — "वो हमारे गाँव में एक कहावत चलती है" और तुम्हारे गाँव की वो जो कहावत है वो कृष्ण की गीता के वचन के बराबर हो गई। और होता यही है क्योंकि गाँव की कहावत याद रखना ज़्यादा आसान है, गीता का श्लोक याद रखना मुश्किल है तो अधिकांश लोग अपना जीवन गीता के श्लोकों पर नहीं आधारित करते, अपने गाँव की कहावत पर चल देते हैं। बचना इस तरह की पॉपुलर कन्वेंशनल विज़डम से।

बोध, कन्वेंशनल माने परंपरावादी नहीं हो सकता। बोध का उद्भव तो रहस्य से होता है, परम्परा से नहीं। बोध कहाँ से आता है, ये बात ही बात के पार की है।

तुम कहो, "हमारा एक घरेलू मुहावरा है हम उस पर चलते हैं, हमारा एक पुश्तैनी मुहावरा है हम उस पर चलते हैं।" तुम पगला गए हो? तुम होगे किसी भी खानदान के, तुम होगे किन्हीं भी पुश्तों के, तुम्हारे खानदान के लोग, तुम्हारे पुरखे, कृष्ण से ऊपर के हो गए क्या? कि तुम कहो, "हमारे दादा जी सिखा गए थे फलानी बात हम इसीलिए उस पर चल रहे हैं।"

होंगे कोई तुम्हारे दादा जी, समझता हूँ तुम्हारे मन में दादा जी के लिए बड़ा अनुराग है, बड़ा सम्मान है, होंगे कोई तुम्हारे दादा जी, अरे वो कृष्ण से ऊपर हो गए क्या? तुम कहो, "नहीं मेरे दादा जी ने फलानी सीख दी थी मैं आज भी उसका पालन करता हूँ।" और बहुत लोग आते हैं इस तरीके के और वो बहुत जाँबाज़ी के साथ कहते हैं — "साहब मैं आपको एक बात बताता हूँ, एक बार मेरे दादा जी ने अद्धा मार कर के मुझसे एक बात कही थी बोले, 'बेटा यहाँ आ, थोड़ी-सी मेरे पैरों पर मल यही दारू और उसके बाद मैं तुझे जीवन ज्ञान दूँगा' और फिर उन्होंने जो मुझे जीवन ज्ञान दिया था क्या बात है! तो साहब वो जो मेरे दादाजी का ज्ञान था न मैं उसी पर अमल करता आया हूँ।"

दादा जी का ज्ञान गया भाड़ में। लेकिन बड़ा अच्छा लगता है — "मेरे दादाजी!" कृष्ण से तुम इस तरह का संबंध बैठा ही नहीं पाते। कह ही नहीं पाते — "मेरे कृष्ण! मेरे कान्हा!" कह ही नहीं पाते। दादा जी के साथ खून का और माँस का और देह का रिश्ता है तो दादाजी की कही बात पर तत्काल अमल कर देते हो। भूल ही जाते हो कि तुम्हारे दादा जी ले देकर... क्या बोलूँ उनकी शान में!

जो भी लोग आज इसको (सत्र की सीधी प्रसारित वीडियो को) देख रहे हों, आज से दस साल बाद इसको देखें, उन सबसे आग्रह करूँगा — भाई! माँ-बाप गुरु नहीं होते। ये भी जो एक प्रचलित मान्यता है कि माँ-बाप ही पहले गुरु होते हैं, बाज़ आइए इस तरह की बातें करने से। माँ-बाप बहुत सम्माननीय हैं, बहुत प्रेम के अधिकारी हैं लेकिन गुरु कहाँ से हो जाएँगे भाई! माँ-बाप को तो ख़ुद गुरु की ज़रूरत है। वो तुम्हारे गुरु कहाँ से हो जाएँगे? इतनी-सी बात नहीं समझ रहे।

'माँ के चरणों में जन्नत होती है।' अच्छा! गजब! 'बाप आकाश होता है माँ धरती होती है।' अरे खत्म हो गया आज क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग! अभी आग लग गई।

कृष्ण तो कुछ और ही बता रहे थे। तुमने कह दिया — बाप आसमान हैं, माँ धरती है। आज अभी हम गीता के पंद्रहवें अध्याय की बात करेंगे वहाँ भी आसमान और धरती की कुछ बात हुई है। उसमें तो मुझे माँ-बाप कहीं नहीं दिखाई दे रहे भाई! या हो सकता है श्रीकृष्ण से ही चूक हो गई हो तुम्हारे गाँव की कहावत ज्यादा होशियारी की हो।

माँ-बाप का सम्मान करना या उनका तिरस्कार करना मेरा ध्येय नहीं है। भाई! आप जिस तरीके से जीते हैं उसमें माँ-बाप अपने लिए भी तो आफत पैदा करते हैं न। ये सीख मैं जितनी औलादों को दे रहा हूँ, उतनी ही अभिभावकों को भी दे रहा हूँ। अभिभावक खुद भी तो समझे कि उन्हें स्वयं ही अभी मार्गदर्शन की, जीवन शिक्षा की ज़रूरत है। उन्हें खुद जाना चाहिए किसी गीता की शरण में, किसी ग्रंथ की शरण में।

खुद सीखने की जगह वो अपने-आपको विशेषज्ञ समझने लग जाते हैं। क्यों? क्योंकि अब वो औलाद पैदा हो गई है, वो उन पर निर्भर है। वो भाग कर जाएगी कहाँ? दुनिया में और किसी के सामने तो ज्ञानी बन नहीं सकते तो एक मिल गया है नमूना। उस पर चढ़ बैठेंगे कि "अब हम तुझे बताएँगे कि हम भी गुरु हैं।" क्योंकि गुरु बनने का चस्का तो सभी को होता है। गुरु बनने की ख़्वाहिश तो पैदाइशी होती है।

दुनिया में इससे ज़्यादा कोई चीज़ नहीं सुहाती कि, "हम ही गुरु हैं!" और दुनिया में आपकी ख़्याति खूब फैली हुई है, एकदम आप मशहूर हैं, सड़क का ठेलेवाला भी नहीं आएगा आपका ज्ञान स्वीकार करने। मंच पर चढ़ जाएँ आप ज्ञान देने के लिए तो माइक भी मंच छोड़कर भाग जाए। वो भी बर्दाश्त न करे कि उसके भीतर आपके शब्द प्रवेश कर रहे हैं, किसी का कान क्या बर्दाश्त करे! लेकिन एक है जिसको झेलना ही पड़ेगा आपको। वो कौन है? आपका अपना लौंडा। वो भागेगा कैसे? वो छोटा है। तो उसको पकड़ लेते हैं "आ मैं तुझे आज ज्ञान दूँगा।" और जो ज्ञान दिया उसको पकड़-पकड़ कर, पकड़-पकड़ कर पंद्रह-बीस साल, तबाह हो गया लौंडा। यही चाहते थे? और फिर ख़ुद ही अपना सर पीटते हैं माँ-बाप। क्या? "हमारी औलाद बर्बाद निकली! बर्बाद निकली!"

अरे तुम्हारी औलाद को पहली बात पैदा किसने किया? परवरिश किसने की? संस्कार उसमें किसने भरे? करा सबकुछ तुम्हीं ने और अब तुम रोना रो रहे हो कि औलाद बर्बाद निकल गई। कारण? तुम्हारा अपना अहंकार। तुमने ये तो माना ही नहीं कि तुम्हें खुद जीवन सीखने की ज़रूरत है। तुमने अपना अज्ञान अपने बच्चे के ऊपर भी थोप दिया, आरोपित कर दिया और अब रो रहे हो।

सत्य प्राकृतिक नहीं होता, बात समझ रहे हैं? उम्र क्या होती है? प्राकृतिक। आप बेहोश पड़े रहो, उम्र बढ़ती रहेगी। सत्य प्राकृतिक नहीं होता। सत्य यूँ ही आपके पास नहीं आ जाएगा। साँस यूँ ही चल लेती है, भूख यूँ ही हो जाती है। खाना खा लेते हो यूँ ही पच जाता है। खाना खाने के बाद मल का उत्सर्जन भी यूँ ही हो जाता है। आप बैठे रहते हो आप डकार मार लेते हो, पाद मार लेते हो, वो सब यूँ ही हो जाता है। उसके लिए आपको कोई श्रम नहीं करना पड़ता, उसके लिए कोई पात्रता नहीं प्रदर्शित करनी पड़ती।

पर अध्यात्म यूँ ही नहीं होता। हालाँकि दार्शनिक बनने का और विचारक बनने का सबको शौक होता है। ज्ञान बाँटने का सबको शौक होता है। गुरु कहलाना सबको पसंद होता है लेकिन गुरु होने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है।

थोड़ी देर पहले मैं तीन शर्तें बता रहा था न? वो तीन शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। ऐसे थोड़े ही कि गए और अपने फेसबुक पर कुछ यूँ ही ज्ञान डाल दिया कि "जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।"

आजकल ये मुहावरा न जाने किस हुनरमंद ने उड़ाया है। मुझे सुनने को बहुत मिल रहा है। कुछ वीडियो हैं, जिसमें मैंने कहा है कि "भाई! तुम मूर्खतापूर्ण कामों में पाँच-पाँच, दस-दस साल जाया कर रहे हो। ये तुम कर क्या रहे हो अपनी ज़िंदगी के साथ? खासतौर पर नौकरियों के पीछे लगे हुए हो, लगे हुए हो।" तो वहाँ आते हैं और कहते हैं सर आप हमें बहुत डीमोटिवेट (हतोत्साहित) कर रहे हो। हमारा नारा है 'जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं।'

ये तुमको किस मूर्ख ने सूत्र सिखा दिया? किसने? जिसको देखो वही गुरु बना हुआ है। कुछ भी जुमला उछाल रहे हैं। फिर इसीलिए धर्मग्रंथों से दूरी बनाना ज़रूरी हो जाता है। जितना ये जुमला उछालने वाले लोग हैं, गुरु घंटाल, इन सब में एक साझी बात है। ये छह घंटे बोल जाएँगे, उस छह घंटे में न गीता शब्द आएगा, न उपनिषद शब्द आएगा, न ऋषि शब्द आएगा, न ध्यान शब्द आएगा। तुम सुन लेना।

इनका कोई यूट्यूब चैनल हो, उसमें इनकी दस हज़ार घंटे की रिकॉर्डिंग पड़ी हो, उस दस हज़ार घंटे में तुम एक बार दिखा दो कि इन्होंने गीता का कोई श्लोक उद्धृत करा हो, कि उपनिषदों की कोई बात बोली हो। कोई बात नहीं बोलेंगे क्योंकि वहाँ जो बात बोली गई है, वो इनकी बात के सर्वथा विपरीत है। ये अपना बताएँगे "जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं।"

और बहुत इस तरह की शायरी है। मोटिवेशनल शायरी का बाज़ार ज़बरदस्तरूप से गर्म है और हर शायर अपने-आपमें एक गुरु है। वो दूसरों को ही संबोधित करके कोई बात बोलता रहता है — "पंखों से नहीं, हौसले से उड़ान होती है।" यही बाते हैं और इन पर तुम कहते हो "हाँ, यही तो जीवन का सत्य है, इसी पर तो मुझे चलना है।"

कर्ता कौन है, ये नहीं समझना। कर्म क्या है, ये नहीं समझना। मन क्या है, ये नहीं समझना। इंद्रियाँ क्या हैं, ये नहीं समझना। विचार क्या है, ये नहीं समझना। विचार और वृत्ति का संबंध क्या है, ये नहीं समझना। जीव क्या है, ये नहीं जानना। मूलवृत्ति क्या है, ये नहीं जानना। जीवन क्या है, ये नहीं जानना।

दो टके की घटिया सड़क-छाप शायरी को तुमने जीवन-सूत्र बना लिया, कि, "इन्हीं बातों पर हम ज़िंदगी चला लेंगे!"

फिर जब दो टके के तुम्हारे सूत्र होते हैं तो जीवन भी उसी तरह का दो टके का, सड़क-छाप हो जाता है। ताज्जुब क्या है!

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