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आश्रमों को बदनाम करना बंद करो || आचार्य प्रशांत (2021)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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प्रश्नकर्ता: सर, आप बार-बार धर्म की बात करते हैं, लेकिन आज सबसे ज़्यादा अधर्म तो धर्म के केंद्रों, माने आश्रमों वग़ैरह में ही पाया जाता है?

आचार्य प्रशांत: कितने आश्रमों में गए हो आज तक? बोलो कितने आश्रमों में गए हो, जिसके आधार पर वक्तव्य दे रहें हो कि आश्रम सब अधर्म के अड्डे हैं? यह कैसे कह दिया तुमने? आश्रम माने क्या? तुम्हें क्या लगता है, आश्रम माने क्या?

तुम कभी किसी आश्रम में नहीं गए होगे, और गए भी होगे तो कभी एकाध कहीं देख लिया होगा। वो भी संभावना यही है कि बाहर से ही देख लिया होगा।

तुम्हारे मन में आश्रमों की, साधुओं की जो छवि है, वो आयी कहाँ से; यह तो बताओ? मैं बताता हूँ कहाँ से आयी। अभी गूगल करो 'आश्रम'! और तुमको न किसी साधु की तस्वीर आएगी, न किसी ऋषि की आएगी, न किसी संत की आएगी; बॉबी देओल की आएगी!

गूगल कर लो अभी 'आश्रम'। करो!

आ गई न!

यहाँ से तुम्हारे दिमाग में आश्रमों को लेकर के एक बात बैठा दी गई है। और मीडिया ने पिछले आठ-दस साल में—यही हुआ है! ठीक है न, बॉबी देओल!

मुझे उस अभिनेता से कोई दिक़्क़त नहीं है। मैं सिर्फ़ बता रहा हूँ कि आश्रम माने क्या है तुम्हारे मन में। आश्रम माने यही जो टीवी पर आ गया, वेब सिरीज़ आ गई, जो भी आ गया।

और पिछले पाँच-साल दस-साल में कुछ ऐसे कांड हुए, जो जनता के सामने लाए गए। और मीडिया ने बिलकुल बढ़-चढ़कर उनको जनता के सामने परोसा। मज़े ले-ले करके जनता के सामने परोसा। तुमको लगा यह तो हमें ख़बर बताई जा रही है कि, 'फलाना संत, साधु, ऋषि जो भी हैं; फँस गया किसी केस में और उसको सज़ा हो गई।'

वो तुमको ख़बर नहीं दी जा रही थी, उस ख़बर के पीछे एजेंडा था। और एजेंडा ये था कि धर्म को ही बदनाम कर दिया जाए। ख़ासतौर पर सनातन धर्म को, हिंदूधर्म को।

ज़्यादातर हिंदुओं का वैसे भी उनके धर्म से कोई वास्ता बचा नहीं है, बस नाम के हिंदू हैं। कहने को तो दुनिया में इस वक़्त सौ करोड़ से ज्यादा हिंदू हैं, पर वास्तव में हिंदुओं की संख्या अब कुछ लाख भी हो तो बहुत बड़ी बात है। बाकी सब नाम के हिंदू हैं, उनके भीतर अब हिंदू जैसा कुछ बचा नहीं है। उनसे पूछो वेद, गीता, अष्टावक्र, आरुणि, नचिकेता, याज्ञवल्क्य? कहेंगे, हैं! (कुछ पता नहीं ऐसे दिखाते हुए)

उनसे कहो रामचरितमानस के दो पद सुना दो, तो इतना ही नहीं कहेंगे, "ये क्या बोल दिया?", इतना और कहेंगे, "छी छी छी! पिछड़ा हुआ आदमी है, गंदा गंदा!" तो उनके पास जाकर के बोलो कि सूर के या मीरा के दो भजन सुना देना? कहेंगे, भक्त हो क्या!

ये हाल तो चल ही रहा था हिंदुओं का, और जिनका एजेंडा ही है अध्यात्म को ख़त्म कर देना, उन्होंने पूरा फ़ायदा उठाया इस बात का कि कुछ आश्रमों में अनैतिक और गैरकानूनी काम होते हुए पकड़े गए। ये बुरी-से-बुरी बात थी कि उन आश्रमों में ऐसे काम हो रहे थे। और ग़लत-से-ग़लत हुआ कि जिन धर्म गुरुओं पर लोग भरोसा करते हैं, वह इस तरह के कामों में लिप्त पाए गए; उनका गुनाह साबित हुआ, जेल गए, इत्यादि-इत्यादि। यह बुरे से बुरा हुआ।

लेकिन मैं यह भी कहना चाहूँगा कि ये जो भी कुछ हुआ, उसका मीडिया ने भरपूर फ़ायदा उठाया, दुरुपयोग किया, जनता के मन में धर्म की ही छवि को कलंकित कर देने के लिए।

यह नहीं कहा गया कि फ़लाने आश्रम में ऐसी घटना घटी, माहौल कुछ ऐसा बना दिया गया जैसे सब आश्रम बलात्कारियों के और गुनहगारों के और लुटेरों के और फर्ज़ीवाड़े के अड्डे हों।

आम-आदमी के मन में आज आश्रम की ऐसी ही छवि बैठ गई है। ऐसे ही किसी आम-आदमी से इस तरह का सवाल आज मेरे सामने आया है, अनीश कुमार लख़नऊ से! जो कह रहें हैं, सबसे ज़्यादा अधर्म तो आश्रमों में होता है न!

पहले जाओ तो आठ-दस आश्रमों में, वहाँ जाकर देखो तो। तुम किस तरह के आदमी हो, बिना कुछ जाने समझे सवाल कर देते हो? और सवाल नहीं है ये, अपमान है, तोहमत है।

ऋषिकेश में शिविर होते हैं हमारे। आओ इस बार शिविर में, आमंत्रित कर रहा हूँ। और आश्रम-ही-आश्रम हैं ऋषिकेश में, हरिद्वार में। वहाँ जा करके देखना और मुझे बताना कि वह अधर्म के अड्डे कैसे हैं?

तीन-तीन, चार-चार कमरों के आश्रम हैं। तुम्हारे दिमाग में आश्रम की छवि ऐसी बना दी गई है कि कोई न जाने किलोमीटरों क्षेत्रफल का कोई आश्रम है। जिसमें किले जैसी ऊँची दीवारें हैं, और जिसके भीतर तमाम तरह के अनैतिक काम चल रहे हैं।

नहीं, ऐसा नहीं होता अनीश!

ज़्यादातर आश्रम छोटे-छोटे होते हैं, बहुत छोटे-छोटे। अमीरों की कोठियाँ देखी हैं न बड़ी-बड़ी? उनसे भी छोटे-छोटे होते हैं आश्रम। और उसमें बैठे होते हैं चार साधु, पाँच साधु; वह बैठकर के अपना राम नाम जप रहें होते हैं। आग जला करके अपना सेंक रहे हैं। और अगर दिन का समय है तो साधारण सी प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठकर के धूप सेंक रहे हैं। और उनकी जो दीवारें भी होती है न, वो इतनी कुल ऊँचाई की होती हैं, तीन-फीट चार-फीट। तुम देख सकते हो पूरा कि अंदर क्या चल रहा है।

नहीं बाबा! अंदर बलात्कार नहीं चल रहा।

आओ ऋषिकेश और आस्था पथ वहाँ बना है, उस पर ज़रा घूमो। और रामझूले से लक्ष्मणझूले तक का भी रास्ता बढ़िया बना है, उस पर चलो, आश्रम-ही-आश्रम हैं। और फिर मुझे बताना वो अधर्म के अड्डे कैसे हैं? साँझ से वहाँ पर से निकलोगे न, तो पाँच-सात बैठकर भजन कर रहे होते हैं। उनकी शक्लें देखना और तुम मुझे बताना, क्या वह तुम्हें अधर्मी लगते हैं?

साधु पारियाँ लगाकर के अखंड कीर्तन कर रहें होते हैं। छह-घंटे चार की टोली करेगी, फिर उसके बाद चार की दूसरी टोली आ जाएगी, वो करेगी। ये कैसे अधर्म के अड्डे हो गए, बोलो? दरवाज़ा उनका हमेशा खुला रहता है, जो चाहे अंदर जाकर के बैठ सकता है। कैसे?

और मैं बोल रहा हूँ, वेदांत मुझे जान से ज़्यादा प्यारा है। और ऐसे ही किन्हीं वनाश्रमों में उपनिषदों की रचना हुई थी। तुम मेरे सामने बोलोगे आश्रम अधर्म का अड्डा है, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा?

दुनियाभर में रोशनी के, प्रकाश के, ज्योति के, दुनियाभर के सारे अध्यात्म का जो स्रोत हैं उपनिषद्, वह आश्रमों में ही रचे गए थे। और तुम कह रहे हो, आश्रम में तो ये होता है, वो होता है। और ये सब वो लोग बोल रहे हैं, जिन्होंने आश्रम देखा कहाँ है? नेटफ़्लिक्स पर! वही एकमात्र 'आश्रम' है, जो तुमने देखा है।

जिस मौहल्ले में, जिस समुदाय, जिस कम्युनिटी में एक छोटा-सा भी आश्रम होता है न, वहाँ पर लोग तुलनात्मक रूप से ज़्यादा साफ़-सुथरा जीवन जीते हैं।

समझ लो यह बात!

तुम्हारे आसपास अगर कोई मंदिर नहीं है तो बनवा लो एक मंदिर, और प्रार्थना करो उसमें दो-चार साधु आकर के रहने लग जाएँ। दो कपड़े और दो रोटी पर जीते हैं वो। लेकिन उनकी आवाज़ से, उनको देखने भर से, तुम्हारे मौहल्ले की आ-बो-हवा बदल जाएगी, अपराध कम हो जाएँगे। लोगों के मन में जो घटिया विचार आते हैं, वो भी कम हो जाएँगे। और लोगों के मन में जो आत्मघातक विचार आते हैं, वो भी कम हो जाएँगे। ये होती है महिमा आश्रमों की। ये महिमा होती है मंदिर की और साधु की।

और वो साधु अब देखने को नहीं मिलता! तुम मुझे दिखा दो बड़े शहरों में, दिल्ली में, बेंगलुरु में कि साधु घूम रहा है।

दिखाओ! कहाँ है साधु?

साधु को खा गए वह सब, जिन्होंने धर्म को ही कलंकित कर दिया है। ज़्यादा नहीं आज से बीस-पच्चीस साल पहले भी शहरों में, कस्बों में, गाँव में साधु घूमते दिख जाते थे। और वो चोरियाँ नहीं कर रहें होते थे, न हत्या, अपहरण, बलात्कार कर रहें होते थे; राम नाम गा रहे होते थे, तुमसे दो रोटी माँग लेते थे, और किसी पेड़ के नीचे बैठकर खा लेते थे; बताओ कौनसा गुनाह कर रहे थे वो?

तुमने सब साधु ख़त्म कर डाले। ख़त्म ही नहीं कर डाले, तुमने उनके नाम पर इतना बड़ा कीचड़ उछाल दिया है। 'बाबा' शब्द को तुमने गाली बना दिया। 'आश्रम' शब्द को तुमने गुनाह का अड्डा बना दिया।

और यह लोग जो फ़िल्में बनाते हैं आश्रमों पर; मैं इनसे पूछ रहा हूँ — तुम बॉलीवुड में जो बदतमीज़ीयाँ और गुनाह चल रहें हैं, तुम उस पर फ़िल्में क्यों नहीं बनाते कभी? या तुमको सारा कलंक सिर्फ़ धर्म में दिखाई देता है?

इंसान की गतिविधियों का कोई क्षेत्र बताओ मुझे, जिसमें लोग ग़लती और गुनाह न करते हों? तुमने वहाँ पर फ़िल्में क्यों नहीं बनाई? सन दो हज़ार बीस में ही दर्ज़न से ज़्यादा आत्महत्याएँ करी हैं, जाने हत्याएँ हुई हैं, बॉलीवुड में। न जाने कितना सड़ा हुआ माहौल होगा, न जाने कितनी विषैली आब-ओ-हवा होगी वहाँ की। लेकिन उसके बारे में तो मैं नहीं देखता कि तुम फ़िल्में बना रहे हो।

फ़िल्म तुम बनाते हो — और मैंने वो जो 'आश्रम' नाम की फ़िल्म है, देखी नहीं है; सिरीज़ है, फ़िल्म नहीं है — तो अगर वो कोई बहुत उत्कृष्ट कोटि का उत्पादन हो, तो मैं क्षमा चाहता हूँ। पर जितना मैंने उसके बारे में सुना है, उससे यही पता चल रहा है कि आश्रम में गड़बड़ियाँ चल रही हैं। यही सब है न? (श्रोतागण सहमति देते हुए)

गाय मिल गई है और उसको पत्थर और डंडे मारे जा रहे हो। है न? हिंदुओं के आश्रम माने सड़क की गाय। कोई भी उसे ठेल देता है, कोई भी कोंच देता है।

धर्म के केंद्र होते हैं ये आश्रम। धर्म को उखाड़ देने का, बर्बाद कर देने का, यह बड़ा बढ़िया तरीका है; आश्रमों को ही बदनाम कर दो। आश्रम बदनाम हो जाएँगे तो लोग उनमें जाएँगे भी नहीं। लोग उनमें जाएँगे नहीं, तो फिर उनके बने रहने का औचित्य क्या? वो ख़ुद ही ख़त्म हो जाएँगे, मिट जाएँगे। बुड्ढे साधु हैं, वो मरने लगेंगे उसके बाद आश्रम खाली हो जाएगा। वहाँ पर कोई होटल बन जाएगा या कुछ और बन जाएगा।

अच्छे लोग, बुरे लोग दुनिया में हर जगह होते हैं। मैं नहीं इंकार कर रहा कि धर्म के क्षेत्र में पाखंडी नहीं होते। मैं नहीं इंकार कर रहा, कुछ लोगों ने धर्म का नाम ख़राब करा है। पर जिन्होंने धर्म का नाम ख़राब करा है, वो जाएँ अपने नर्क में सड़ें। भीतर से अस्तित्व उनको सज़ा दे रहा है और बाहर से कानून उनको सज़ा दे रहा है। तो उनको तो सज़ा मिल ही रही है; मैं बात उनसे करना चाहता हूँ, जो एक योजना के तहत, एक एजेंडा के तहत धर्म को, धर्म गुरुओं को और आश्रमों को बदनाम कर रहे हैं।

समझ में आ रही है बात?

किसी आश्रम में कोई काली-करतूत होती मिले, कड़ी-से-कड़ी सज़ा देनी चाहिए। जितनी साधारण आदमी को सज़ा मिलती है, उससे ज़्यादा सज़ा एक तथाकथित साधु को मिलनी चाहिए अगर वह किसी ग़लत काम में संलग्न पाया जाता है। बेशक़ दो! लेकिन उस साधु को सज़ा दो न, उस आश्रम को सज़ा दो न; तुमने तो समूचे धर्म का ही नाम ख़राब कर दिया।

तुमने ये जो फ़िल्म बना दी 'आश्रम', इसमें क्या किसी एक आश्रम की बात हो रही है? तुमने यहाँ आश्रम शब्द का प्रयोग किया है एक सामान्यतौर पर। व्यक्तिवाचक संज्ञा नहीं है यह, जातिवाचक संज्ञा है। तुम कह रहे हो, सारे आश्रम ऐसे होते हैं। यह बात तुम खुलकर नहीं बोल रहे पर यह बात निहित है, इम्प्लिसिट है, इम्प्लाईड है।

और फिर इस तरह की करतूतों से फिर इस तरह के सवाल आते हैं।

और यह काम — मैं नहीं कह रहा हूँ कि जिन्होंने फ़िल्म बनाई है, सिर्फ़ उन्होंने करा है — यह काम मैं देख रहा हूँ, लगातार पिछले दस-बीस साल से ज़ोरों-शोरों से किया जा रहा है, लिबरल मीडिया द्वारा। जिनका बड़ा ज़बरदस्त एजेंडा है कि किसी भी तरीक़े से धर्म ख़त्म होना चाहिए।

और मूर्ख हम लोग, सब भारतीय, जो इनके षडयंत्रों को समझ भी नहीं पाते, इनके इरादों को समझ भी नहीं पाते। हम सोचते हैं, हमें मनोरंजन परोसा जा रहा है; वो मनोरंजन नहीं है, वो तुमको एक विचारधारा की दीक्षा दी जा रही है। और तुम उस विचारधारा में धीरे-धीरे, पूरे तरीक़े से डूब जाओगे। तुम भी उसी विचारधारा के हो जाओगे। तुम सोचोगे, मैंने तो सिर्फ़ मनोरंजन लिया; वो मनोरंजन नहीं है। उस मनोरंजन के पीछे एक बहुत ही विषाक्त विचारधारा छुपी हुई है।

प्र२: ऐसे कुछ तथाकथित धर्म गुरु और ऐसे भी हैं, जो खुलेआम अंधविश्वास फैलाते हैं और खुलेआम ऐसी बातें करते हैं जो वैज्ञानिक तो छोड़िए, बहुत ही ख़तरनाक भी हैं। तो मीडिया या कोई भी उनकी तरफ़ कुछ एक्शन क्यों नहीं लेते हैं? काफ़ी प्रचलित गुरु हैं और प्रसिद्ध भी हैं, और जो खुलेआम… ?

आचार्य: देखिए, दो बातें इसमें बोलूँगा। आपने कहा, ऐसे धर्मगुरु हैं, जो अंधविश्वास फैलाते हैं।

पहली बात — ऐसे धर्मगुरुओं का विरोध किया जाना चाहिए। और आप अच्छे से जानते हो कि हमारी जितनी सामर्थ्य है, हम जी-जान लगाकर ऐसों का विरोध कर रहें हैं जो धर्म के नाम पर पाखंड और अंधविश्वास फैला रहे हैं। ऐसों की वज़ह से ही धर्म डूब रहा है, ऐसों की वज़ह से ही धर्म बदनाम हो रहा है।

ठीक है?

दूसरी बात — आप शायद ये पूछना चाह रहे हैं कि यह मीडिया वाले फिर ऐसे जो झूठे और पाखंडी धर्मगुरु हैं, इनका भंड़ाफोड़ क्यों नहीं करते? वो नहीं करेंगे न! क्योंकि उस तरह के धर्मगुरु के बने रहने से धर्म खुद ही डूबेगा; और यही तो एजेंडा है कि धर्म डूबे।

नहीं समझें?

क्रिकेट में कई बार ये किया जाता है। मान लीजिए आप बैटिंग कर रहें हैं और जो रिक्वायर्ड रन रेट है वो आठ का, नौ का हो चुका है। और जो बल्लेबाज है वह एकदम घटिया! वो गेंदें ब्लॉक कर रहा है, उससे मारा ही नहीं जा रहा। तो जो विपक्षी टीम होती है वो उसको आउट ही नहीं करती। कहती है, क्यों आउट करें इसको? बल्कि जो अगला आने वाला है, वो पिंच हीटर (ताबड़तोड़ बल्लेबाज) है, तो उसको आने ही क्यों दो? इसी को खिलाओ। इसी को अगर दो-तीन ओवर भी खिला दिया तो आस्किंग रेट बारह हो जाएगा। जीत गए!

तो ऐसा मीडिया जो धर्म को ख़त्म ही कर देना चाहता है, वह झूठे धर्मगुरुओं का भंड़ाफोड़ नहीं करेगा; क्योंकि झूठा धर्मगुरु ख़ुद ही धर्म को डूबो रहा है! वो ख़ुश हैं; अच्छी बात है डुबोए धर्म को।

समझ में आ रही है बात?

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=RvxKtGFX9b8&t=615s

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