जितना हो सकता है, उतना रखता ही हूँ। और उसके आगे मेरे हाथ में नहीं है, उसके आगे आपके हाथ में है। जैसी स्थितियाँ हैं, उनमें जितना ख़ुद को देखा जा सकता है, देख लेता हूँ। बाकी, मेरे नियंत्रण की बात होती, तो मैं आपको आश्वासन दे भी देता। वो चीज़ मेरे हाथ में है ही नहीं ना।
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आचार्य प्रशांत: अब दूसरा सवाल।
प्रश्नकर्ता: दूसरा सवाल है कि जैसे आपको पता है कि आप हैं, तो हमारे पास गीता का सत्य — जो सच है वो आ रहा है। वैसे लोगों को धर्म वाले बाबा से तो आ नहीं रहा। तो "आप हैं" तो हम हैं, "आप हैं" तो कम्युनिटी है। तो आप अपना ध्यान क्यों नहीं रखते हैं? हम मानते हैं कि आप मिशन पर हैं। अब ऐसा बोलना मुझे ठीक नहीं लग रहा, पर "आप नहीं रहेंगे..."
आचार्य प्रशांत: अब ये काम भी मैं ही करूँ? आप अभी मुझे बिल्कुल संबोधित कर रही हैं पिताजी की तरह।
प्रश्नकर्ता: तो आप ही तो हैं हमारे परमपिता!
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो सब ठीक है, मैं ये जानना चाहता हूँ कि सारे काम मैं ही करूँ? आपका ख़्याल भी मैं रखूँ और अपना ख़्याल भी मैं ही रखूँ?




