वीडियो जानकारी: 21.04.2023, गीता समागम, ग्रेटर नोएडा Title : क्या जीवन सिर्फ़ दुःख सहने का नाम है? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता (2023) ➖➖➖➖➖➖ मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥ हिन्दी अनुवाद: हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों और विषयों का संस्पर्श ही शीत-उष्ण और सुख-दुःख का देने वाला है। वे आते हैं और नष्ट हो जाते हैं, इसलिए अनित्य हैं। हे अर्जुन, उन्हें तुम सहो। विवरण: इस वीडियो में आचार्य जी गीता के अध्याय 2, श्लोक 14 पर चर्चा करतें हैं, जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को “तितिक्षस्व” का उपदेश देते हैं। आचार्य जी इस बात को फ्रेडरिक नीट्शे के प्रसिद्ध कथन “To live is to suffer; to survive is to find meaning in the suffering” से जोड़ते हुए बताते हैं कि नीट्शे जीवन को केवल झेलने योग्य बनाने की बात करते हैं, जबकि कृष्ण जीवन से मुक्ति की ओर ले जाते हैं — जहाँ दुःख को अर्थ नहीं, बल्कि समाप्ति मिलती है। वे समझाते हैं कि वेदांत का मार्ग ‘सर्वाइवल(survival)’ से आगे बढ़कर आत्ममुक्ति तक जाता है। साथ ही, गीता के ‘गुडाकेश’ और ‘जनार्दन’ जैसे शब्दों पर चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि सच्चा बोध नामों में नहीं, दर्शन में है — गीता हमें कथाओं में उलझने नहीं, बल्कि अपने भीतर झाँकने और झूठ को हटाने का आमंत्रित करती है।