
सभी वस्तुएँ हर प्रकार से स्वभाव-रहित हैं। वे कारण अथवा प्रत्यय, समग्रता या अलगाव में नहीं रहतीं। अतः वे शून्य हैं ।।३।।
बुद्ध कह रहे हैं, ‘शून्य।’ जब आचार्य नागार्जुन बोलते हैं तो बुद्ध की ही बात बोलते हैं, तो हम वहाँ कह दें, बुद्ध बोल रहे हैं, तो एक ही बात है। तो बौद्ध दर्शन कहता है, ‘शून्य।’ अब ‘शून्य’ माने क्या होता है? शून्य माने ये नहीं होता कि वो वस्तु है ही नहीं। शून्य माने ये नहीं होता कि वस्तु है ही नहीं।
शून्य माने होता है, वैसी तो नहीं ही है जैसी आपको लगती है, बस इतना ही। शून्य का ये अर्थ नहीं होता कि जो अनुभव्य अर्थ है उससे हटकर आप कोई और अर्थ उसमें भर दें। शून्य का अर्थ होता है कि कोई भी अर्थ, जो आप उसमें डालेंगे, वो अर्थ सत्य नहीं है। शून्य का मतलब ये नहीं होता कि कुछ भी नहीं है, क्योंकि ‘कुछ भी नहीं है’ कहकर के आपने फिर एक बात को निश्चित करने की कोशिश की है कि कुछ भी नहीं है।
किसी चीज़ का न होना तो अपनेआप में बहुत निश्चितता, बड़ी आश्वस्ति की बात हो जाती है न। बुद्ध कहते हैं, ‘तुम ये भी आश्वस्ति के साथ नहीं कह सकते कि नहीं है।’ अगर इतना भी आपको साफ़-साफ़ पता चल जाए कि कुछ नहीं है, तो भी तो आप सत्य के ज्ञाता ही हो गये।
फ़िर क्या करें कैसे परिभाषित करें किसी चीज़ को। यह तो सच में पहेली जैसा है। परेशान मत हों, इस वीडियो सीरीज़ से जानिए पूरी बात।
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