
अपना और संसार का रिश्ता स्पष्ट होना बहुत ज़रूरी है। हम ऐसे दोस्त हैं जो लगातार एक-दूसरे से मुक्त होने के लिए व्याकुल हैं और हम ऐसे दुश्मन हैं जो एक-दूसरे के बिना जी नहीं सकते। ये है जीव और जगत का रिश्ता। दो दुश्मन जो एक-दूसरे के बिना जी नहीं सकते, दो दोस्त जिन्हें एक-दूसरे से नफ़रत है।
एक तरफ़ तो वो दुनिया पर लगातार अवलंबित है, और दूसरी ओर वो दुनिया से अपनेआप को पृथक, जुदा भी रखना चाहता है। दुनिया से ही सब कुछ लेता है लेकिन मान्यता वो ये रखना चाहता है जैसे कि दुनिया से अलहदा उसका कोई वजूद है।
जैसे मन के ही दो फाड़ हो गए हैं और पूछ रहे हैं कि बोलो भाई तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे! आगे कबीर साहब ने इन दोनों हिस्सों कि व्यथा आपको सुनाई है। गाएंगे और जानेंगे इस भजन को आचार्य प्रशांत संग।
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